Saturday, February 21, 2015

                     भगवान का अपमान
राजनीति ने  भगवानो  को  सडक  में  लाकर  छोड दिया
सब  धर्म  के  ठेकेदारों  ने   ही   मर्यादा   को   तोड दिया
कोई  धनुष-बाण  खुद  लेकर के, राम  लला  को  ढोता है
कोई  कृष्ण,बाँसुरी  ले रथ पर, गिरधारी  को  ही खोता हेै

कोई शब्द  विषैले लेकर  के  शंकर  बनकर  के  घूम रहा
कोई गणपति बाबा बनकरके फिल्मी दुनिया मे झूम रहा
कंही  दुर्गा माँ  के जगराते, चौराहों  की धूल  को  चाट रहे
कंही अखण्ड  पाठ रामायण  के सुख  समृद्वि  को बाँट रहे

कंही  राम  लीलाये   होती  हेै, मर्याादा   की   नीलामी से
कंही कृष्ण बनाये  जाते  है, यमुना के  तट  पर कामी से
कंही  राधा  कुंज  लताआें  से, काम   कला  झलकाती हेै
कंही गोपी  नग्न सरिता  की  लहरो  में ही  बल खाती है

कही नारद काम के कारण ही विष्णु को शापित करता है
बे-गुनाह श्रवण भी दशरथ के बाणों से तडफकर मरता हेै
निजी  स्वार्थ के कारण  ही कंही ,बालि-वध  हो  जाता है
कंही इन्द्र,अहिल्या की क्रिडा को, प्रथम प्रहर बतलाता है

कंही  प्रहलाद को  होली  में, अपनो  से  जलाया जाता है
कंही हिरण्याक्ष भी शापित हेै,नरसिंह से चिराया जाता हेै
कंही रावण ताण्डव करता  हेै शंकर  को स्वंय लुभाने को
कंही लालाहित है इन्द्र-परी,हर भोग विलाश में जाने को

कंही धनुष राम के हाथो में,कंही सुदर्शन कृष्ण चलाते हैं
कंही  खडग  हाथ  में  दुर्गा  के  काली का रूप दिखाते हैं
कंही  परशूराम  क्षत्रिय  भंजन,,खूनो की  नदी  बहाते है
कंही दीन दरिद्र सूदामा  है,जो, भीख माँग  कर  खातें हैे

भगवान को फिल्मी दुनियाँ भी  चौराहे  में नंगा करती हेै
कुछ राजनीति की  भीडें भी  ना  समझ है पंगा करती है
कानून बने अब कुछ ऐसा,भगवान से भक्त ना खेल सके
उपनिषद ,वेद   की   पूंजी   को  ना चौराहों  में ठेल सके

मेरी रचना  में  तर्क  करो,  पर  चिन्तन  बहुत जरूरी है
संसार   में   जीने  वालों  की  भगवान  नही  मजबूरी है
आध्यात्म धर्म को समझोगे तब कुछ समझ में आयेगा
ये कवि आग की  आदत हेै, हर शब्द सत्य दिखलायेगा।।
                 राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       मो09897399815
            rajendrakikalam.blogspot.com

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