संकल्प और विकल्प
इस प्रजातन्त्र के मंन्दिर में कुछ अच्छीअच्छी मूरत हों
विभत्स-रोद्र से हट करके कुछ अच्छीअच्छी सूरत हों
सब ज्ञान-वान हों निष्ठा से, ना व्यभिचारी ना धूरत हों
जो इस भारत को देख सकें, बस ऐसी राष्ट्र जरूरत हों
खादी के कफन लिबाशों ने तो देश को पूरा चाट लिया
अखण्ड- राष्ट्र था दुनियां में टुकडों-टुकडों में बाट दिया
जाति मजहब की छूरी से हर घाव-भाव का काट दिया
हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख, इसाई से भारत को छाँट दिया
अब व्यभिचारों की चोटों से ये राष्ट्र, कष्ट कहराता हेै
सर्जन भी नया नमूना है ,जो उपचार हमें बतलाता है
नया चिकित्सक, व्याधी में भी नया रोग दिखलाता है
आरोग्य-धाम चिकित्सालय ही भारत भाग्य विधाता है
अधमरे मरीजों के उपर, अब ग्लूकोष चढाये जायेंगे
जनमत की शल्य - चिकित्सा से, राष्ट्र-ध्वजा फहरायेंगे
अपने ही घर के राष्ट्र - गीत, सब लालकिले से गायेंगे
शमशान शवों को नर-भक्षी, अब पक्ष-विपक्षी खायेंगे
बलशाली वोट की ताकत में, फिर ये कैसी कमजोरी हेै
इस लोकतन्त्र षडयन्त्रों में क्यों बैठा मन्त्र अघोरी है
जनमत के भीख, भिखारी की क्यों होती सीनाजोरी है
क्यों सातदशक से संविधान की पुस्तक अब भी कोरी है
जिस राष्ट्र का यौवन,मुर्दाें की, कफन ध्वजा को ढोता है
जिस राष्ट्र का नेता धृणा के बीजों को मजहब में बोता है
जिस राष्ट्र का चिंतन मंथन भी माकूल समय में सोता है
उस राष्ट्रका जीवन दुनिया में निष्क्रीय,निकृष्ट ही होता है
लिखता हूँ छन्द,दबंगो का,फिर से मैं अलख जगाने को
स्वप्नो में भारत डाल रहा हूँ,जनमत झलक दिखाने को
व्याकुल भी हूँ कई जन्मो से,मै राष्ट्र - गीत को गाने को
मैं दिल से आग उगलता हॅू,अंगार बुझे सुलगाने को।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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