Thursday, February 19, 2015

                       आराधना
मै  तो  बस  विनती  करता  हूॅं,भारत  में  भगवानो से
लूट रहे  हैं  तेरी   दुनिया,   निपटो   इन   मेहमानो से
खादी  में   बढती    आबादी , देखो   धर्म   लिबाशों में
फंसा  पडा  है  आज  गेरूआ,  चौपड  के   हर  पासे में
अश्लीलता  झलक  रही    है   अब   तो   तेरे  गानो से
मै  तो  बस  विनती  करता  हूॅं, भारत में भगवानो से

हर मजहब में  देख  रहा हूॅं,  राजनीति  प्रवेश  हो गया
आज दरिन्दा,शातिर दुनिया में दानव, दरवेष  हो गया
धन, दौलत,अय्यासी वाला ,बाबाजी  का भेष  हो गया
दुनिया भर के व्यभिचारों का,मेरा भारत  देश  हो गया
क्यों युवक देश  के  बूढे  हो गये ,पूछो जरा  जवानो से
मै  तो  बस, विनती  करता  हूॅं, भारत में भगवानो से

राजनीति  में  खद्दर  धारी  बूढे  भी  अब   बाप हो गये
भरी उम्र  में  डी. एन. ए. होते  हैं,  कैसे   पाप  हो गये
अरबो,खरबों की  माया है,मालिक का  भी  पता नही है
तुलसी कहें राम  रचि राखा,मानवता  की  खता नही है
ये चोर,उच्चक्के दुनिया में  जीते  हैं,  शौकत, शानो से
मै  तो  बस, विनती  करता  हूॅं, भारत में भगवानो से

कंही मथुरा है,कंही काशी है, घर-घर  में  भरी उदासी है
अब हिन्दू,मुस्लिम झगडों  में, ये सत्ता सत्यानासी हेै
सिक्खो में दंंगे भडक रहे कंही अगडे़ पिछडे़  कडक रहे
घर-घर में बर्तन खडक रहे,शोले शबनम  भीतडक रहे
यंहा भूखी नंगी, कौमें भी मोहताज हैं दानो  - दानो से
मै तो  बस ,विनती  करता  हूॅं, भारत में भगवानो से

कंही सूटों की नीलामी है,कंही  फ्री  में  बिजली पानी है
अब  नेता  सारे  कामी  हैं,  मुर्दों  में   भरी  जवानी है
कंही रामराज के सपने हैं,कंही कंस, दुसाशन अपने हैं
अब  ये  राजनीति  मजबूरी  है, सत्ता में सारे खपने है
हम जैसे  दीपक  बुझते  हैं, इस  हवा और तूफानों से
मै  तो  बस, विनती  करता  हूॅं, भारत में भगवानो से

कनिमोझी , कलमाडी  हैं, बे - नाम,  नाम  के धारी है
चाल, चरित्र  और  चेहरों  में, गाॅधी  के  बन्दर भारी हैं
कंही आठ हजार में थाली है,कंही  भूखे  पडे़ भिखारी हैं
डेढ़ अरब  की  आबादी  में  शिशू  -  निकेतन  जारी है
ये कवि आग की कविता है,जो  भरी  पडी फरमानो से
मै  तो  बस,विनती  करता  हूॅं, भारत में भगवानो से!!
                   राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                          मो09897399815
             rajendrakikalam.blogspot.com

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