Tuesday, October 28, 2014

सियासत की विरासत
मुझे हिन्दू से क्या लेना,मुझे मुस्लिम से क्या लेना
मेरा जरिया सियासत है,सियासी ही मुझे कहना
पागल कौम के कचरे,मुझे नेता बनाते हैं
ये उनकी बेवकूफी है,मेरे जो गीत गाते हेैं
फिर वो हिन्दुओं की हो,या मुस्लिम की हो सैना
मुझे हिन्दू से क्या लेना,मुझे मुस्लिम से क्या लेना

ये जनमत हेै मेरी मन्जिल,जिसे तेैयार करता हूँ
मैं पागल कौम की भीडो से,हरदम प्यार करता हूँ
मुझे फिरका परस्ती के ,पागल ही तो भाते है
वतन में आग लगती है , तभी हम मुस्करातेे है
वही तो है सियासत में,सियासी का सफल होना
मुझे हिन्दू से क्या लेना,मुझे मुस्लिम से क्या लेना

समझदारी वतन में होे ,हमें फिर कौन पूछेगा
अमन ओैर चैेन हो जाये,तो हमसे कौन जूझेगा
हमी तो हैं,जो चराते हैं,भीडो के जखीरो को
सियासत का मजा देते हैे,हम पीरों,फकीरो को
मेरी मंजिल हूकूमत हेै,ये मजहब है मेरे नैना
मुझे हिन्दू से क्या लेना,मुझे मुस्लिम से क्या लेना

सियासत से ये पाकिस्तान,बंग्ला,चीन चलता है
भीडो का जखीरा भी सियासत से ही पलता है
ये भीडें ही कमा करके हमें आराम देती हैं
हमारी इस सियासत में,जमाते ही तो खेती हैं
हमारा काम होता है,इमारत को सदा ढहना
मुझे हिन्दू से क्या लेना,मुझे मुस्लिम से क्या लेना

स्कूलों में मदरसो में सियासत हम ही लाते हैं
ये हडताल,ये पुतले,फूंकाना हम ही सिखाते हैं
कब बाजार बन्द होगा इशारे हमसे होते हैं
युवा ताकत हमारी हैं,तभी तो बोझ ढोते हैं
हम सोना तपा करके,बनाते हैं खरा गहना
मुझे हिन्दू से क्या लेना,मुझे मुस्लिम से क्या लेना

कंही मन्दिर,कंही मस्जिद,के झगडे हम बनाते हैं
तभी तो कौम के पागल हमारे साथ आते हैं
हमारे मौलवी,पण्डित,यही तो काम करते हेैं
हमारे योग के साधू,जहर जनता में भरते हैं
कैसे जुल्म करना हैे औेर कैसेे जुल्म को सहना
मुझे हिन्दू से क्या लेना,मुझे मुस्लिम से क्या लेना

हमारी ही सियासत से ये हिन्दुस्तान जिन्दा है
हमें औकात मालूम है,कंहा कैसा परिन्दा है
हम पारस हैं,जो सोने को मिट्टी में मिलाते हैं
कब्रिस्तान,मरघट में,अमन की धुन सुनाते हैं
पुरूष,पिचास बनते हैं,नारी बनती है डायना
मुझे हिन्दू से क्या लेना,मुझे मुस्लिम से क्या लेना

बचपन से सियासत का कठिन अभ्यास होता हेै
पचपन में सियासत का,वो धन्धा खास होता है
हमारी जुर्म की दुनिया,कू-कर्मो से गुजरती हेै
तभी तो ये सियासत भी सरीफों को अखरती है
इशारा आग का समझो,सियासत से बचे रहना
मुझे हिन्दू से क्या लेना,मुझे मुस्लिम से क्या लेना।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815 
यह रचना भारत की राजनीति के गिरते हुये मुल्यों पर है,कृपया चित्र देखने के बजाय रचना पढ कर आलोचना करेगें तो ही कविता  समझ में आयेगी।         

                  नेता की नक्कासी
अगर किसी को गाली देनी हो तो बस,नेताजी बोलो
एक शब्द काफी है,चौराहों पर पूरी पोल ना खोलो
खादी कुर्ता और पाजामा,मफलर,टोपी,सब कहती है
प्रजातन्त्र में जनता,नेता जी को शदियों से सहती है
फिर चुनाव आने वालें है,जाओ जोकर के संग डोलो
अगर किसी को गाली देनी हो तो बस,नेताजी बोलो

सडक छाप पर मुहर लगाकर सभी नमूने तूने चूने 
बोट माॅगने घर-घर जाकर ये झुनझूने तूने चूने 
जिसका कोई ठौर ठिकाना काम,धाम पैगाम नही था 
शहर,गाॅव के गली,मुहल्लो में नक्कारा,नाम नहीं था 
नंग,मतंगो और मलंगो में भूखा हो उसे टटोलो
अगर किसी को गाली देनी हो तो बस,नेता जी बोलो

भ्रष्टाचार,बलात्कार और व्यभिचार इनका पेशा है
जूते,चप्पल,गाली खाकर शान्त खडा,कैसा भैंसा है
गाॅधीजी के आर्दशों का लालन-पालन करने वालों
उपवाशों के जनवासो में,चौबीस घण्टे चरने वालों
लोकतंत्र की खुली तुला पर भूखी,नंगी जनता तोलो
अगर किसी को गाली देनी हो तो बस,नेता जी बोलो

भाषण की भी भांषा देखो,रामराज की आशा देखो
दाॅव लगे तो पाशा फेंको,सारा सदन, तमाशा देखो
एक टाॅंग रेलों में देखो,एक टाॅंग जेलो मे देखो 
जूॅंआ,सट्टा और अय्यासी,लूटमार खेलों में देखो 
हे,कु-कर्मो के बे-शर्मो, मुस्टन्डो के झण्डो झोलों 
अगर किसी को गाली देनी हो तो बस,नेताजी बोलो

अब तो सडक छाप आवारा जनमत से चुनकर आते है!
चाट पकोडी बेचने वाले राष्ट्र-ध्वजो को फहराते हैं
रहने को घर-बार नही था,फारम-हाउस की बाते है!
राजनीति में हिन्दुस्तानी नेता की कितनी जाते है
प्रजातन्त्र के विषमन्थन से,सागर में अब विष ना घोलो
अगर किसी को गाली देनी हो तो बस,नेताजी बोलो

रोटी है तो दाल नही है,नेता को कुछ ख्याल नही हेै
मंहगायी मलाल नही है,बिखरे स्वर है ताल नही है
पल-पल में प्राविधान बदलने से तो भारत शर्माता है
कुछ तो शर्म करा बे-शर्मो,अब नंगी भारत माता है
मां की सेवा में अर्पित हो करके अपने पाप तो धोलो
अगर किसी को गाली देनी हो तो बस,नेताजी बोलो

बंग्ला,पाकिस्तानी,चीनी सीमा पर हरकत करते हैं
मेरे  देश  के  नेता  देखो, आपस  में लडते मरते हैं
संविधान की  कस्में  खाकर झूठ फरेबों में जीते हैं
ये नर भक्षी सात दशक से खून हमारा क्यों पीते हैं
नेताओं के चमचों आओ,अपना सिर फोडो और रोलो
अगर किसी को गाली देनी हो तो बस,नेताजी बोलो

डेढ़ अरब में भूखे-नंगे इनके कारण ही मरतें हैं
नेताओं के धन्धे देखो,धोती कुर्ते क्या करते हैं 
सोने की चिडिया का भारत मिट्टी में कैसे मिलता है
संविधान का प्राविधान भी,नेताओ से क्यों हिलता है
कवि‘आग’के श्रोताओं को क्यों डसते हो सर्प सपोलों 
अगर किसी को गाली देनी हो तो बस,नेताजी बोलो !! 
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

    नौकर की हैशियत्
हे शंसद के संसय नायक,मुझे बतादो क्या चाहते हो
व्यभिचार के नटखट नायक,कैसे लोकसभा आते हो
छल,बल,कपटी,बाणीभूषण को जनता क्यों मान रही है
शकुनि की ये, नशल देश में कैसे सीना  तान रही है
चौराहे में भारत  माता की इज्जत  क्यों लुटवाते हो
हे शंशद के संसय  नायक ,मुझे बतादो क्या चाहते हो

हिन्दू,मुष्लिम,सिक्ख,ईसाई के तुम ही तो परिणेता हो
प्रजातंत्र के  इस नाटक के कुशल क्षेम के अभिनेता हो
बस्ती-बस्ती, गाॅंव- गाॅंव, नगर-डगर तुमने  बाॅंटा है
देश में  तेरे  साडू  भाई , अंबानी, बिडला, टाटा हैं
जनता की तुम गाली खाकर भी बे-शर्म बने  जाते हो
हे  शंशद के संसय नायक मुझे  बतादो क्या चाहते हो

जांतपांत में कमल,हाथ में रिक्सा,साइकिलऔर हाथी है
डबरों  की ये राजनीति भी,मूरख मजहब  को भाती है
धन- दौलत,दारू ,अय्यासी, तेरी सीढी  बन  जाती है
पाॅंच साल  की  राजनीति  में पीढी  दर पीढी खाती है
मेकप  करके पुरा-तत्व  की कथा मॅंच पर दोहराते हो
हे  शंशद  के संसय नायक मुझे बतादो क्या चाहते हो

साठ साल के बूढों को तो,बानप्रस्त प्रस्थान  लिखा है
बानप्रस्त में इन बूढों को,दिल्ली का फरमान दिखा है
यौनशक्ति की इस औषध को जीवन में कितना खाओगे
हे भारत के भूत भविष्यत कफन औढ कर कब जाओगे
सतरंज, चौपड  के माहिर ऊॅंट,अश्व, पैदल प्यादे  हो
हे शंशद के संसय नायक मुझे बतादो क्या चाहते हो

विश्व-बेंक का सारा कर्जा तुम सब मिलकर चाट रहे हो
राजनीति मतभेद भुला  कर ,माया  बन्दर बाॅंट रहे हो
ऋण सारा तुम ही खाते हो ,ब्याज हमी पर पेल रहे हो
हम ही खेल के र्निणायक हैं,खेल हमी से खेल  रहे हो
गली,मुहल्ले के खलनायक ,आज देश के सहजादे हो
हे शंशद के ससय नायक मुझे बतादो  क्या  चाहते हो

वेतन ,भत्ता पाने को तो ,सभी विरोधी एक  साथ  हैं
ये खादी का धोती, कुर्ता पायजामा सब एक जात है
संस्कारों को भोग- विलाषोें से मिलकर कितना तोडोगे
हे भारत के  भले भिखारी, भीख माॅंगना कब छोडोगे
खादी में भी छिपी व्याधियों को जनता में फैलाते  हो
हे शंशद के संसय नायक मुझे बतादो  क्या चाहते  हो

कंही कोलगेट,कंही घासलेट,कंही गैस,घरों में भारी है
नेता जी के कारण  ही तो  भारत  आज  भीखारी है
कंही आरक्षण,कंही संरक्षण, ये राजनीति फैलाती हेै
प्रजातन्त्र में  ये महामारी  जन-मत से ही आती है
हे शल्य चिकित्सा के माहिर,तुम उपचारों में लगजाते हो
हे  शंशद के संसय नायक मुझे बतादो  क्या चाहते हो

कही सपा.बासपा.बी.जे.पी.कंही कम्युनिष्ट की हाट लगी
इस प्रजातन्त्र में डाकू की टोली  भी  अपने  बाट लगी 
ये सारे  मुद्दे   ढूॅंढ  रहे  हैं मुर्दो  को  भटकाने को
हम  जैसे मुर्दे तरस रहे, दो-वक्त  की  रोटी  खाने को
क्यों जनता  की  लाशों के उपर से कफन चुराते हो
हे शंशद के  संसय नायक मुझे बतादो  क्या चाहते हो

जग में था सम्मान हमारा जो अब तुम से अपमानित है
जयचन्दों की राजनीति ही आज  राष्ट्र  में सम्मानित है
हम  भी  तो मुर्दें  हैं भारत में मुर्दाें को पाल रहे  हैं
दुर्भाग्य  हम  कवियों का है ,हमको ये संभाल रहे  है
कवि आग कीे कविता सुनकर झूठ मूठ तुम हॅंस जाते हो
हे  शंशद के संसय नायक मुझे बतादो  क्या  चाहते हो।।
        राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
           मो09897399815
साथियों आज तक हिन्दुस्तान में कोई भी साधू,सन्त या कवि,लेखक इस पीडा को लिखने की हिम्मत ना कर पाया हो,मैं खिन्न होकर भविष्य में घटित होने वाले खतरे की तरफ इसारा कर रहा हूं,आज से से पचास वर्ष पहले के और अब के संस्कारों में परिवर्तन तो आपको स्पष्ट दिखायी दे रहा होगा,पूर्व के साधू,सन्त,विरक्ति और आज वालों में क्या परिवर्तन है यह भी स्पष्ट दिखलायी दे रहा होगा,इसका एक ही कारण है कि हम पूर्ण रूप से पाश्चात्य होते जा रहे हैं,
अगर यह व्यवस्था मात्र धन कमाने तक ही सीमित होती तो शुभ थी, परन्तु धन,वैभव के लिये संस्कार और संस्कृति को गिरवी रखना उचित प्रतीत नही हो रहा है,
और ज्यादा दुख इस बात का है कि जिनको हम धर्म रक्षक मानते हैं, इस महत्वपूर्ण कार्य में वे ही लगे हुये हैं।
भारत विश्व गुरू तभी तक है जब तक हमारे पास आध्यात्मिक धरोहर है, यदि यह लुट गयी तो हम सांसारिक भिखारी तो हैं ही, आध्यात्मिक भिखारी होने में भी देर नही लगेगी,मैं इस खतरे को महसूस कर रहा हूं,आप भी रचना पर चिन्तन,मन्थन करके ही टिप्पणी दें।
धर्म बिक रहा है
आज हमारा धर्म विदेशी धरती का एक हाट हो गया
जैसे लावारिस गंगा मे, मन मर्जी का घाट हो गया
सभी विरक्ती इस धन्धे में तन मन धन से लगे हुये है
हम जैसे कुछ थोडे मुर्दे,इस भारत में जगे हुये है
गोपनीय आध्यात्म जगत को हम कौडी में बेच रहे हैं
माया मिथ्या कहने वाले,केवल माया खैंच रहे हैें
अतरंग चेतना की ये विद्या,तन से मन में डाल रहे हैं
दो कौडी के मायाधारी को धर्मो से पाल रहे हैं
गायित्री मंत्रो की कैसी चोैेराहो पर हाट लगी है
आज धरोहर धर्म-कर्म की क्यों मुर्खो की बाट लगी है
कू-पात्र भी वेद,शास्त्र और धर्मग्रन्थ को खोल रहे हैं
ऋषि मुनि की वाणी देखो सारे तोते बोल रहे हैं
आश्रम,मठ,मन्दिर में केवल,परी विदेशी नाच रही है
बृन्दावन की रास,नाश कर,गोरी चमडी बाँच रही हेै
सुर-तालो की इस माया में,बाबा जी संस्कार भूल गये
काम-वाशना की शूली में,सभी लंगोटेदार झूल गये
जो विदेश में गया यंहा से,वो ही इज्जत दार हो गया
दो पैसे क्या पडे हाथ में,कुल-द्रोही अवतार हो गया
आज विदेशी धरती जाने वालों की क्यों होड लगी हेै
देख रहा हूँ,जटिल व्याधि है,संस्कारो में कोढ लगी हेै
आज सनातन ठेकेदारो के हाथों से लुटा पडा हेै
भारत की ये मूल धरोहर योग,भोग से घुटा पडा है
तन्त्र-मंत्र की सारी विद्या,अखवारो में छप जाती हेै
पातंजलि की योगी पीढी,भीख मांग कर क्यों खाती है
आओ मिलकर धर्म बेचने वालों का बहिष्कार करो
ये इज्जत के योग्य नही है,मिल कर सब तृष्कार करो
आध्यात्म की गुप्त धरोहर का फिर से सम्मान करो
माया में जो गुरू फँसे है,उनका ना गुणगान करो
आध्यात्म जगत का छत विक्षत,विध्वंश दिखायी देता हेै
नासूर धर्म में छिपा हुआ,वो अंश दिखायी देता हेै
मैं सचेत करता हूँ केवल छन्दो की परिभांषा से
कवि आग हूँ,बोल रहा हूूूू,बुझा हुआ कुछ आशा से ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
योग में सयंम नियम जो खो गया,योगी नही है
गेरूवे  में  भी  सियासत है, तो वो जोगी नही है
आडम्बरों से सत्य और सम्मान भी पलता नही है
आग में ना हो भभक तो स्वर्ण भी गलता नही है
                    हल्कापन
हे काले धन के मतवाले,अब कंहा है वो बर्छी भाले
क्यों नंगो  मे सपने  डाले,बस धोखे से अपने पाले
तू खोल रहा था सब ताले,अब कंहा गये वो घोटाले
हे स्वाभिमान के मतवाले क्याें पढे हैं मुंह में अब छाले

मनमोहन मौनी बाबा था,राहुल जर्सी बछडा था
फ्रीजन गाय बनी सोनिया,ये सब तेरा लफडा था
कांग्रेस गद्दार बता कर तू  भी  रण में कूद गया
हम को  तो लगता है  बाबा अब तेरा वजूद गया

सूभाष,भगत,शेखर ,अबदुल्ला के तूने गाने गाये थे
चाणक्य खुदी बतला कर तुम चन्द्रगुप्त रण में लाये थे
ऋषि,मुनि के चमत्कार से, अपने को ही तोल रहे थे
इस कलियुग मे सतयुग वाली भांषा बाबा बोल रहे थे

काले घन वालों की सूची,हाथ में लेकर घूम रहे थे
काया,माया की छाया में पागल होकर झूम रहे थे
अच्छी-अच्छी नसल के तोते,वक्ताओं को पाल रहे थे
अष्टांग योग की भट्टी में तुम जनमत को उबाल रहे थे

शास्त्र गवाह है कालनिमि की नकली दाडी,मूछ रही हेै
कालाधन और स्वाभिमान अब जनता तुमसे पूछ रही है
मैने तो बस तेरे शब्दो को ही कविता में गाया है
बुझी हुयी इस चिन्गारी को कवि आग ने सुलगाया हेै।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
            rajendrakikalam.blogspot.com 

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Sunday, October 26, 2014

              नेता की नौकरशाही
अब  तो  सेवक  सर्विसों  के   दायरे  में  आ रहा है
इस  देश  को  धोती नहीं, कुर्ता ,लंगोटा खा रहा है
आज  प्रजातन्त्र  की  आॅंखों  में आॅंशू  दिख  रहे हैं
भेडिये  भटके  हुए ,क्यों भाग्य भारत लिख  रहे हैं

क्यों राजनीति भोग और उद्योग बनती  जा  रही है?
खादीयाॅं , बर्बादियाॅं  क्यों ? बादियों को खा  रही हैं
बे-वजह  कुर्ता , पजामा , बस्तियों  को   छानता है
कोई  माने  या ना  माने  ये  स्वयं   को   मानता है

गणतंत्र की गरिमा गिरी वेतन से नेता से जुड गया
उन  शहीदों की  सहादत  से ,कफन क्यों  उड गया?
इन सेवकों  की  हरकतों से आज भारत मर  रहा है
ये  भिखारी  देश  में , क्यों  राजनीति  कर  रहा  है

कौन  ? उकसाता   है  इनको,  देश  की  सेवा  करो
कौन ? कहता  है कि   चौराहों   पे  चिल्लाकर  मरो
ये  कौन सा षडयन्त्र  है, जो  देश  को  ही  खा  गया
वो  गुलामी  का  जमाना  लौट कर   फिर  आ  गया

इनको  टिकट  भी  राजधानी  के  मसीहा  बाॅंटते हैं
व्यभिचार  के शिरोमणि,व्यभिचार को ही छाॅंटते हैं
छल बल कपट से जीतकर दिल्ली में डेरा डालता है
देख लो  इस  देश   को  ,व्यभिचार  कैसे  पालता है

साठ    वर्षों   में   तो   सेवा    से  पृथक   कानून हैं
हर  पाॅंच  वर्षों  में   नया   ये  कौन ? अफलातून है
निशुल्क है सेवा,धरम् है ,इतिहास,भारत बोलता है
ये  सियासत  का  सिपाही, धन  से  सेवा तोलता है

अब पालिका   पंचायतों   में   ये   बिमारी   आयेगी
राज्य   की   वित्तीय   व्यवस्था   राजनीति  खायेगी
पेन्सनों   से   देश   के   सब   कोष   लुटते   जायेंगे
हर   पाॅंच  सालों  में   नये  रंगरूट  फिर  से  आयेगें

निस्वार्थ  की  सेवा  में  ये सम्पन्न  होते  जा  रहे हैं
बोलती  है  सुर्क   चेहरे   की  चमक , ये   खा  रहे हैं
आज   भारत - वर्ष  को  सूली   पे   नेता   टाॅंगता है
देख  लो  सेवक  सदन   में ,शुल्क   कैसे  माॅंगता हैं

जो छोड  दे  वेतन और भत्ते,सहुलियत सब त्याग दे
पेन्सनों  के  इस  कफन  को, मृत  शवों  सी अाग दे
बस, धर्म  सेवा  का  पुनः  हो   हर  सियासी  भेष में
फिर से दिखेगी  आग  वो, जो  लुप्त थी  इस  देश में।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग )
                  9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

                    सिंह नाद
सिंह नाद से शिखर,सिहर-सिहर के कह रहे
तुंगनाथ  से  कहर, लहर शिखर  के बह रहे
वादियों  के हर शहर,प्रखर,पहर को सह रहे
पर्वतों  की  पीर, तीर  अधीर हो  ये कह रहे

जल ,अरण्य,व्योम,सोम,रोम-रोम खोलता
हिमनदों से  पर्वतों की  कौम  को है बोलता
धेर्य को  भी आपदा की इस तुला पे तोलता
कौन  है जो  मौन  हेै, हिला-डुला  के डोलता

पर्वतों  को  छोड  कर  क्यों  जवानी जा रही
ये सियासी,सल्तनत  की  बाड खेत खा रही
बांझ है  क्यों  धरा,जरा  संभल  के  सोचिये
इस  तरह  ना देव-भूमि की धरा को नोचिये

चकबन्दियो से खेत हों अलग रख रखाव के
हों  पृथक, उड्यार, छान, डोखरे भी  गांव के
काम ,हाथ  को  मिले, व्यस्त  हों ये पीढीयां
हों हरे सिहर,शिखर  फिर  दिखे  वो सीढीयां

हो  खडे, पडे-पडे  क्यों  ढो  रहे  हो जिन्दगी
देव-भूमि  की  धरा  में,जन्म  ही  है बन्दगी
पर्वतों  के  धर्म, कर्म, मर्म  को  भी  जानिये
कल्पना   गणेश  की , गरीब  आग  मानिये।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  9897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, October 25, 2014

ना समझी का उत्तराखण्ड
मै तो एक परिन्दा हूॅं कविता में व्यंग दरिन्दा हॅूं
एक छोटे पद का बाबू हॅूं जो पहले से बे- काबू हूॅं
जनमानस में भाव जगा था नया राज्य बनवायेंगें
सुख सुविधा से इस प्रदेश का भारत भाल सजायेंगें

राजनीति की दुर्वाशना खण्ड-खण्ड से खुश होती है
हल्केपन की राजनीति से नई पीढियाॅं ही रोती हैं
केन्द्र समर्पित हो जाते तो जीवन स्वालम्बी होता
उत्तराखण्ड का जनमानस क्यों भ्रष्टाचारों को ढोता

पलता था जीवन घ्याडी में अब घूम रहैं हैं गाडी में
मुर्ग मसल्लम चलता है जीते थे धबडी बाडी में
घर में नही झंगोरा था अब बासमती की बातें हैं
परेशान थे भाडे़ से अब बत्ती लाल घुमाते हैं

तृष्कार का जीवन था अब संग में डी.एम डोल रहा है
राजनीति की कृपा से बस भ्रष्ट जोर से बोल रहा है
मुश्किल था लखनउ में जाना अब तो देहरादून ठिकाना
देख के नेता गली- गली में भैरव गण ने भी पहचाना

घूम रहे थे मारे - मारे नाली मुटठी पाने को
नेता जी अब ढूॅढ रहे है देहरादून ठिकाने को
जनता सब कुछ देख रही है धन्धा चोर चकारी का
नेताओं पर आस लगी है ,कैसा खेल मदारी का

कोई पौडी का कोई टिहरी का ये कैसा खेल जगीरी का
कुमाॅंऊ यहाॅं पर भारी है ,गुरू दोणाचार्य तिवारी हैं
क्या विकास की बोली है बश भरती अपनी झोली है
हर नेता यहाॅं अधूरा है चमचों का रूतबा पूरा है

कोई नेगी है कोई रावत है हर पद के पीछे दावत है
विस्थापित बशवाने हैं पर अपने नही ठिकाने हैं
सभी मुवावजा खातें हैं नाली का बिगाह बनाते हैं
भू- माफिया भारी है बस मालिक यहाॅं भिखारी है

उत्तराखण्ड में इश्क समाया नेता से इन्दर घबराया
उर्वषी,मेनका,रम्भा गायब देखा तो मंत्री संग पाया
अय्यासी का जो फन देखा हुआ इन्द को खुद में घोखा
बोला चलो मेनका दीदी यहाॅं का नेता बडा अनोखा

ये राज नही अब राग बना36व्यंजन का साग बना
जो राजसभा को भातें हैं वो उत्तराखण्ड से जाते हैं
बाण नही बस तरकस है ये देव भूमि अब सरकस है
सबकी नजरों में टुकडा है ये कैसा गजब का जुकडा है

अधिकारी सब पर भारी है बस खेल उन्ही का जारी है
नेता की हस्ती पहचानी करते हैं अपनी मनमानी
नौकर से मालिक डरता है फिर दोनों का घर भरता है
इनकी ही कलमें चलती हैं फाइल से सत्ता पलती है

खर्चा कई लाख करोडों में बस माल नदारद रोडों में
फाइल में सडक बनाते हैं ये खुल्लम खुल्ला खातें हैं
जो भी सत्ता में आता है अपना ही खेल दिखाता है
पाॅंच साल का करा धरा उसमें भी जाॅंच बिठाता है

विद्यालय बन जाते हैं बच्चे भी फर्जी आते हैं
जो अन्न मिला सरकारों से मिल बाॅंट सभी खा जाते हैं
वेतन भी अच्छा पाते हैं शिक्षक सरकार हिलातें हैं
गुरूजी तो घर में रहतें हैं ये शिशू निकेतन कहते हैं

शिक्षक हडताले करता हैे समाज इन्ही से डरता है
बस माॅंगे पूरी होती हैं बच्चों की किस्मत रोती हैं
गुरूजी के बच्चे अंग्रेजी स्कूल में शिक्षा पाते हैं
उत्तराखण्ड के नवअंकुर बस पहाडों में सड़जाते हैं

नदियाॅ तो हिम से झरती हैं जनता प्यासी क्यों मरती है
पाताल से पानी लाना है पहाडों में पम्प लगाना है
पानी से बिजली गायब है ये कैसी बात अजायब है
बे - सिर पैर की बातें हैं ये नेता की औखातें हैं

शिखरों में रेल बिछायेगें ये कैसा खेल खिलायेगें
बस गैरसैण की बाते हैं कुछ इसी बात की खाते हैं
घर-घर मे खाने के लाले दो चार बने बस मतवाले
भाषण में कैसी भांषा है ये उत्तराखण्ड तमाशा हैं

गुल चमन है इनकी बातों में रिस्ता है कितनी जातों में
कहीं नदी वार कहीं नदी पार ये कैसा युद्व अनाथों में
यहाॅं पुरूष घूमते बाडों में नारी है नरक पहाडों में
शिखरों में सूरज अस्त हुआ गढवाल में भैजी मस्त हुआ

नीचे से दारू ढोते हैं उत्पात यहाॅं पर होते हैं
खडा कौन है पाओं पर घर बार लगा है दाॅंव पर
आज हिमालय लुटता है घर-घर मे रिस्ता टुटता है
देव भूमि की लीला है यहाॅं लाल खून भी पीला है

राज्य लूटकर चन्दा भी दिल्ली के दल में जाता है
उत्तराखंड को राजनीति का मरा भूत भी खाता है
क्यों होते हैं रोज फैसले राजनीति गलियारों से
मुख्यमंत्री बदल रहे है दिल्ली के दरबारों से

भीख माॅंगकर उत्तराखण्ड को स्वीटजरलैंड बनायेंगे
स्विस बैंक के सारे खाते उत्तरारखण्ड में आयेंगें
सपने देखो अपने देखो राजनीति ये गाती है
अब तो टुच्चेपन के भाषण से जनता शर्माती है

सबसे ज्यादा उत्तराखण्ड में रामदेव की धरती है
योग - पीठ गलियारे में सरकारें पानी भरती हैं
सारे आसन राजनीति के टी0 वी0 में दिख जाते है
सत्ता और सियासत की ये कपाल भारती गाते है

पातंजलि के योग सूत्र से स्वाभिमान को गाता है
एक लंगोटा दस साल में दुनिया में छा जाता है
छिपी हुयी है बीस अरब की माया एक लगोटी में
राम देव जी भारत को देखो गरीब़ की रोटी में

आज दिवाकर,त्रिवेन्दर पीछे से छिपकर झाॅंक रहे है
मुख्यमंत्री सभी विधायक,यू0के0डी के भाॅंप रहे है
सत्ता और सियासत भी तो हड्डी मुॅंह में डाल रही है
यू0के0डी के नेताओं की ,क्षमता को खंगाल रही है

मचा हुआ है द्वन्द यहाॅ पर देशी और पहाडी का
तकनीकी के नये दोैर मे देखो खेल कुल्हाडी का
काट रहे है उत्तराखण्ड को जग लगे हथियारों से
आग धधकती देख रहा हूॅ शिखरो में सरकारों से

गाॅव बसाने से पहले , भिखमंगें क्यो चिल्लाते है
क्षेत्र,जाति की आग लगाने सत्ता मे क्यो आते है
क्यो मिलती है पनाह यहाॅ पर दरियादिली दलालो को
उत्तराखण्ड क्यो पाल रहा हैे आवारा फिक्वालो को

शमशान शवो के मुर्दो के आतक शब्द से झेल रहा हूॅ
मै भी तो मुर्दा हूॅ,कविता मे शब्दो से खेल रहा हॅॅू
फिर भी हिम्मत करता हूॅ मुर्दो मे अलख जगाने की
उत्तराखण्ड मे क्यो होती है ,बाते पागलखाने की

प्रमाण पतित पा जाता है शिखरो के भ्रश्टाचारो से
व्यभिचार पनपते जाते है क्यो चुनी हुयी सरकारो से
क्यो बोते हेै बीज घृणा के प्रजातन्त्र की खेती मे
उत्तराखण्ड की देख सियासत् चोरी और डकैती मे

पागल जनता से ही तो ये पागल चुनकर आते है
हम भी पागल प्रतिभाओ से उत्तराखण्ड बनाते है
फिर होती है शूरू लडायी बत्ती पाने वालो की
न!गे - भूखे उत्तराखण्ड मे भरती है घोटालो की

कर्मो का फल भोग रहे है! उत्तराखण्ड बनाने से
अस्तित्व दाॅव पर लगा हुआ है निशाचरो के आने से
देव भूमि की जनता से विनती है इन्हे भगाने की
पागल की औखात यहाॅ है आन्ने और दो आन्ने की

जन-मत का प्रमाण यहाॅ परिणाम दिखाने वाला है
क्षेत्र जाति का पतनाला क्यो गगाजल मे डाला हेै
दूर करो प्रदूषण को जो उत्तरा - खण्ड बचाना है
देव-भूमि की धरती मे क्यो टूच्चो का याराना है

यहा आपदा आती है तो खूब सपदा लाती है
नौकर शाहो नेताओ मे आपस मे बट जाती है
अमछे,गमछे,चमचे भी,खुर्चन मिल बाट के खाते है
जो बाढ़आपदा झेल रहे है ,भूखे ही मर जाते है

उत्तराखण्ड बन जाने से अस्तित्व यहाॅ का खोता है
पानी और जवानी का क्यो रोज पलायन होता है
धृश्टराश्ट्र की राजनीति से वस उजडता देख रहा हूॅ
मै तो अपनी कविता में,ये आग शब्द से फेंक रहा हूॅ

दिव्य शक्तियाॅ मौन पडी है जनता के कू-कर्मो से
देव - भूमि बर्बाद हुयी है हम जैसे बे - र्मो से
चिन्तन,मन्थन ऐसा हो,पहचाने चोर - चकारों को
समय आ गया उत्तराखण्ड से,दो धक्का मक्कारों को

नई पीडी में काम नही है राजनीति में आयेगी
फर्जी निर्माण दिखा करके सत्ता से हाथ मिलायेगी
जिला गाॅंव और पंचायत में नये- नये खे खिलायेगी
उत्तराखण्ड में हेरा - फेरी अब यौवन में आयेगी!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, October 24, 2014

                आतंक के श्रोत
पराधीनता    फैलाता  हूॅं, राजनीति  की  जेहाद हूॅं
इस दुनिया में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं
मैं  मारूगाॅं  मैं काटूगाॅं  घर-घर  टुकडों में बांटूगाॅं
मावोवादी, नक्शलवादी  पूरी  दुनिया से  छांटूगा
चोर, लूटेरा ,भ्रश्टाचारी ,व्यभिचारी  हूॅं  आबाद हूॅं
इस दुनिया में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

हिन्दू,मुश्लिम,सिक्ख,ईसाइ मैं ही तो पैदा करता हूॅं
वैमनस्यता फैलाता  हॅूं ,दुनिया का करता,धरता हूॅं
संस्कारों के घने अरण्य की,पढी मूल में मैं बिष्टा हूॅं
पाप ,पूण्य की परिभांषा हॅूं अहंकार की मैं निष्ठा हूॅं
मैं आलोचक भी  रोचक हूॅं समरसता का संवाद हॅूं
इस दुनिया में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

संविधान  का  परिणेता  हूॅं,भ्रष्टाचारी अभिनेता हूॅं
अय्यासी में जीने  वाले  नर, नारी का  मैं क्रेता हूॅं
सर्प विषैले  पाल रहा  हूॅं,अपने ढंग में ढाल रहा हूॅं
घनश्याम की गीता में भी अन्याय खंगाल रहा हॅूं
भटकी कौमें के मुॅंह पर मैं लगा हुआ  वो स्वाद हॅूं
इस दुनिया में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

दहशत,व्यभिचार का रस्ता,मैं हूॅं साधन सबसे सस्ता
मंदिर,मस्जिद,गुरूद्वारा भी मान रहा है मुझे फरिस्ता
धर्मो का मैं शास्त्र नियंता आदि अंत का मैंअभियन्ता
मानवता के मन मन्दिर में,राग-द्वेष का मैं भगवन्ता
युगों-युगों  से  इस  श्रृष्टि में  दबा हुआ मैं अवसाद  हॅूं
इस  दुनिया  में पनप रहा हूॅं  मैं ही  तो आतंकवाद हॅूं

मैं  माया हूॅं, मैं  काया  हूॅं ,उस  परमेश्वर की छाया हूॅं
सत्य,सनातन के विरोध में हर विरोध को मैं लाया हूॅं
मैं  श्रृष्टि  के  आदि  अन्त  से  आवारा  हॅूं  घूम रहा हूॅं
भव सागर  के  तल  में बैठा, देख  रहा हॅूं सूॅंघ रहा  हॅूं
सत्ता  और  सियासत के  इस सर्कस में भी आजाद हूॅं
इस  दुनिया  में पनप रहा  हूॅं मैं ही  तो आतंकवाद हॅूं

चमक-दमक में जीने वालों का मैं ही पोषण करता हॅू
अल्पमृत्यु आकालमृत्यु से जीवन का शोषण करता हॅूं
सम्प्रदाय  के  विष मन्थन से द्वन्द गन्द मैं फैलाता हॅूं
अभिलाषाओं की दुनिया में दहशत् से दिल दहलाता हॅूं
हर   फतवे  से   फैल  रहा  हॅूं कलि,फूल  में फौलाद हॅूं
इस  दुनिया  में पनप रहा  हूॅं  मैं ही  तो आतंकवाद हॅूं

कुत्सित अभिलाषा के कारण व्यभिचारी मानव होता हॅूं
आस निरास की दुविधाओं का जीवन आजीवन ढोता हॅूं
अन्तस्थल की लगी आग से उठा  घुआॅं मैं बन जाता हूॅं
छल,बल,कपटी जीवन  ढोने  वालों  को  मैं  ही भाता हॅूं
पावन मन-मन्दिर की सरिता में बहती मैं छिपी गाद हॅूं
इस  दुनिया   में  पनप  रहा  हूॅं मैं  ही  तो आतंकवाद हॅूं

काम, क्रोध,मद, लोभ, मोह  की  अंर्तदृष्टि की  छाया हॅूं
उसी  ब्रह्म  से प्रतिबिम्बित हॅूं, उसी ब्रह्म की  मैं माया हॅूं
भरे  हुये  हर  भोग  विलाषों  से  मैं  आतंकित  होता हॅूं
भय  के भावों के इस  भ्रम  से दहसत् गर्दी  को ढोता हूॅं
अन्र्त बर्हि  चेतनाओं  की असमंजस  की  मैं  फसाद हॅूं
इस  दुनिया  में  पनप रहा   हूॅं मैं ही  तो  आतंकवाद हॅूं

स्वाभिमान की  ध्वजा बना  हूं सबके उपर घूम रहा हॅूं
मेरे   नीचे   मार  काट  हेै , मैं  व्योम  को  चूम रहा हॅूं
राष्ट्र,धर्म और अहंकार को पोषित कर मैं पाल रहा हूॅं
राजनीति की  भ्रष्ट-व्यवस्था शदियों से संभाल रहा हॅूं
धर्मगुरू  की  राजनीति  में  सहस्रार से  उठी  नाद हूॅं
इस  दुनिया  में पनप रहा  हूॅं मैं  ही तो आतंकवाद हॅूं

मैं स्वयं अन्त हॅूं महासन्त हॅूं परिवर्तन में छिपी कला हॅूं
सत्,रज,तम के उपयोगों में आदि,अन्त से सदा चला हूॅं
निर्विकार हॅूं, निर्विचार  हॅूं, चंचल  मन से  चहक  रहा हूॅं
पंच - विकारों  से  बहता  हॅूं, दावानल  से   दहक  रहा हॅूं
संस्कारों की समर भूमि  में,संभल गया तो परं स्वाद हॅूं
इस    दुनिया में  पनप रहा  हूॅं  मैं ही  तो  आतंकवाद हॅूं
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग )
                           9897399815
           rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, October 23, 2014


                शिशू-धर्म
क्या  भारत  इन बच्चों जैसा  हो  सकता है
क्या सम्प्रदाय, औकात स्वयं की खो सकता हेै
स्कूल, मदरसा, क्या  शैशवता   बो सकता हेै
दाग कफन  पर लगे मजहब भी धो सकता है

सम्प्रदाय का   इन बच्चों  को  ज्ञान नही है
खतना,  टोपी, चोटी  का  अनुमान  नही हेै
पूजा,  नमाज, पाठ,  प्रार्थना  क्या  होती है
अचकन, कुर्ता  और  लंगोटा क्या  धोती है

बच्चों को  तो दुर्गन्ध  प्रदूषित ही  करती है
सम्प्रदाय   से  शैशवता  ही  तो   मरती है
ये कच्ची मिट्टी  है जैसा भी खेल  बनालो
पत्थर, ढेला   मारो  या   खपरैल  बनालो

ये  मन्दिर,मस्जिद, गुरूद्वारे  हमने ही खोले
अल्लाह, ईश्वर, गुरू,गाड सदा हमने ही बोले
बच्चों  को आभाष  नही  कुछ , ज्ञान नही हेै
इन सम्प्रदाय के झगडों का अनुमान नही हेै

हम पढे़ लिखे ,बूढे हैं,फिर भी भान  नही है
अनुभव में  हरकत  तो है, पर जान नही है
सम्प्रदाय  से  राष्ट्र, सदा  घुट  कर  रोता हेै
बस, चलने  का प्रमाण पहुंचना ही होता हेै

इस कट्टर पन ने,कंहा  हमें लाकर छोडा है
हर बच्चे का पथ,मग,और रग-रग मोडा हेै
ये मन्दिर, मस्जिद,गुरूद्वारे,संग्राम अखाडे़
इन बच्चों ने कम, बूढों ने  ये  चमन उजाडे़

राम,कृष्ण, अल्लाह,  ईसा का बचपन देखा
कंहा  खिंची  हैे  सम्प्रदाय,मजहब  की रेखा
टोपी, माला,  कण्ठी, क्रास,  इन्हे  दे  डाला
ये बीज  द्वन्द का  बचपन से हमने ही पाला

हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई  सारे  आओ
इस लव जेहाद को  छोडो, भैया-दूज मनाओ
क्रिसमस, होली, ईद, मुर्हरम सभी समान है
ये  भारत  तो , हर  मजहब  का  बागवान है

बस,शैशवता का क्रन्दन हो,सब झगडे़ छोडो
इस मानवता के भाव हृदय  में सभी निचोडो
क्यों मजहब, अब इस विकार से ही पकता है
शैशवता  का  राग ‘आग’ ही  लिख सकता है!!
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                मो09897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com