Saturday, April 30, 2016

मेरा भारत महान
व्यापारी, नेता, साधू के इतिहासों को खोल सको तो
अभिनेता,दल्ले,अधिकारी पर भी हल्ला बोल सको तो
काली माया निकल आयेगी,हमको भी अरमान नही है
अब नंगे,भूखे,अंगले,कंगलो का ये हिन्दुस्तान नही है

भीख मांग कर खाने वाले अरब-खरब में खेल रहे हैं
नगे - भूखे देश के मालिक नेताओं को झेल रहे हैं
व्यवसायी का माल मिलावट पूरी जनता चबा रही है
फिल्मी दुनिया सारा पैसा परदेशों में दबा रही है

भगवानो को बेचने वालों पर भी ईश्वर मेहरबान हेै
व्यवसायों में चोरों की भी ऋषि, मुनि से पहचान है
आज देश की राजनीति में कालनीमि की बडी शान हेै
राम,कृष्ण की इस धरती में व्यभिचार का गुणगान है

अहिसुष्णता फैल रही है, अन्धों की भी आँख नही है
वाणी भूषण ,बुद्वि बल्लभ की भी अपनी शाख नही है
युवा शक्तियां इन मुर्दो का मत से मातम मना रही है
हर डाकू के पीछे चल कर, सबके बीहड बना रही है

विश्वविद्यालय राजनीति के कीडे ही तो पाल रहा है
अब नेता अपने डी.एन.ए. को हर बच्चे मे डाल रहा है
क्यों वर्णशंकरी पीढी, भारत की सीढी को तोड रही है
धर्म,ग्रन्थ और वेद शास्त्र को अपने हित में मोड रही है

हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई अपने ही घर सींच रहे हैं
सारे मिलकर,दल,बल की संख्या से भारत भींच रहे हैं
अगडे,पिछडे,उँच, नीच के आरक्षण अब भी जारी है
कौम कबीलो के आरक्षण, अब आरक्षण में नारी हेै

डेढ अरब की जनसंख्या हेै अब भी हमको चैन नही है
सम्प्रदाय में बच्चे पैदा करने का कंही बैन नही है
डाकू,चोर,उचक्को की नजरों में भारत ही महान है
कवि आग की कविता में तो भ्रष्टाचारी राष्ट्रगान है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, April 29, 2016

केवल शास्त्रज्ञ एवं साधको के लिये

योगः चित्तवृत्ति निरोधः
पातञ्जलि का आयुर्वेद और योग सभी को भाता है
अष्टांग योग के पांच अंग तो बाबा कब से गाता है
अब ध्यान, धारणा,और समाधी,कौन हमें समझायेगा
योग सध गया बाबा जी फिर बिजनेस कौन चलायेगा

कई जन्मो की कठिन तपस्या से परिणाम निकलता है
सुयोग्य शिष्य की परम्परा से धर्म हमेशा फलता हेै
विज्ञापन,सौन्दर्य प्रसाधन पातञ्जलि का काम नही है
माया की दुनिया का साधू, धर्मो का अन्जाम नही है

आटा,चावल,मिर्च, मशाला, पातञ्जलि का शोध नही है
कवि आग हूं मेरे चिन्तन मन्थन में अवरोध नही है
राम देव का नाम बिके तो इसमें कुछ भी क्रोध नही है
पातञ्जलि का नाम चलेगा,फिर बाबा को बोध नही है

हे, धर्म भेष के मुर्दो जागो धर्म पडा है चौराहो में
ऋषि, मुनि,भगवान बिकेगें, व्यवसायी की ही बाहों में
सब बाबा का जाप करो अब धर्म-कर्म निपटाने को
अब कालनीमि तैयार खडे हेेै,उद्योग जगत में आने को

बाबाओं में की प्रतिष्पर्धा है अब मण्डी नयी लगाने की
धर्मो में तो भगवानो की कीमत हेै दो आन्ने की
टूथ, पेस्ट, कच्छे, बनियाने, गुप्त-अंग, नव-रंंग बनाओ
काम-देव की दुनिया में भी पातञ्जलि को खूब नचाओ

जब बबा का उद्योग शुद्व हेै, क्या जरूरत विज्ञापन की
हजार करोड की एक लंगोटी, फिर भी इच्छा है धन की
योगी का मन मचल रहा है विश्व-गुरू बन जाने का
अब बाबाओ का काम यही है,धर्म पन्थ भटकाने का

मुर्दो के शव चिता बनाकर भस्मि-भूत कर डालूंगा
मै ऋषि,मुनि,उपनिषद,शास्त्र को आत्मसात कर पालूगा
धर्मो के हर व्यवसायी पर, कवित्त छन्द से थूकूंगा
मै कवि आग हूँ आडम्बर को अग्नि शिखा से फूकूंगा।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, April 28, 2016

आग और पानी
पूरे देश में आग लगी है,पानी का आकाल पडा है
जंहा भी देखो नेता साधू, व्यवसायी का जाल खडा है
क्यों भू-माता ब्रिगेड बनी है धर्म - ध्वजा को को
अहिसुष्ण गरीबी घूम रही,मोहताज पडी दाने दाने को
हर चैनल पर बाबा अपने उद्योगो के साथ खडा है
पूरे देश मे आग लगी है, पानी का आकाल पडा है

आगस्ता के उडन खटोलो की संसद में धूम मची है
चोर - चोर मौसेरे भाई, कथा सभी ने एक रची हेै
सब नया सगूफा छोड रहे है , राजनीति गर्माने को
सारे तोते उछल रहे है ,अपनी - अपनी धुन गाने को
संसद तो बीहड है भैय़्या, हर डाकू का अलग धडा है
पूरे देश में आग लगी है, पानी का आकाल पडा है

बाबा तो उद्योग जगत को पनपाने में लगा हुआ है
सभी शक्तियां मौन पडी है, केवल बाबा जगा हुआ है
सुबह-सुबह टी .वी. मे देखे बाबा सब कुछ बेच रहा है
ब्रह्म जगत में जीने वाला कैसे माया खैंच रहा है
ब्रह्म सत्य और झूठी माया, पर बाबा परवान चढा है
पूरे देश में आग लगी है, पानी का आकाल पडा है

हर प्रान्त में अब चूनाव है, केवल नेता भौंक रहे हैं
सुरा,सुन्दरी,धन,बल,माया,आन बान सब झोंक रहे हैं
अपशब्दो के सर्कस में सब,अपने तरकस छोड रहे हैं
झूठी मान, प्रतिष्ठा पाने को सब पागल दौड रहे हैं
जोकर देखो राजनीति में बिन पेंदी का चिकना घडा हेै
पूरे देश में आग लगी है, पानी का आकाल पडा है

शिक्षा भी अब राजनीति में अपने पिल्ले रही है
नेताओ के बीज नर्सरी में चुन-चुन कर डाल रही है
विद्यालय से कृष्ण, कनैह्या, राधा, गोपी ही आयेंगी
रास मण्डली, भजन सियासी, गली ,मुहल्लों में गायेंगी
अब कुरूक्षेत्र के विद्यालय में दोणाचार्य गुरू खडा है
पूरे देश में आग लगी है, पानी का आकाल पडा है

अगल - बगल के सभी पडोसी,अब हमको घूर रहे हैं
ये माल हमारा खाने वाले अब हमको ही चूर रहे है
तिब्बत, नैपाली और बंग्ला भारत मां के पूत हो गये
हिम्मत देखो,जूते खाकर हम शान्ती के दूत हो गये
क्या ये भारत नगर वधू का लावारिस शमशान थडा हेै
पूरे देश में आग लगी है,पानी का आकाल पडा है

कविता लम्बी है पर भारत वालो पढकर आंखे खोलो
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई छोडो भारत की जय बोलो
टी.वी.चैनल वालों अपनी प्रतिभाओ को आगे लाओ
अहिसुष्णता फैला करके राष्ट्र -भक्ति को ना गर्माओ
कवि आग के हर छन्दो मे ढूंढो तो कोहीनूर गडा है
पूरे देश में आग लगी है,पानी का आकाल पडा है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Wednesday, April 27, 2016

अगर ध्यान से पढोगे तो ही समझ आयेगी

धर्म संकट
बाबा ने अवतार लिया है, मैं कहता हूं सब कुछ बेचो
पातञ्जलि आदर्श ऋषि है उसको सडको पर ना खैंचो
आटा,चावल ,मिर्च, मशाला पातञ्जलि से बिकवाओगे
साबून, सर्फ, सौन्दर्य प्रसाधन ,पातञ्जलि से करवाओगे

वेद,शास्त्र,उपनिषद, ऋषि को, कहा रसातल में डालोगे
विज्ञापन, उद्योग जगत से, क्या आदर्शों को पालोगे
क्यों भारत की गुप्त धरोहर, विज्ञापन में नचा रहे हो
क्यों बाबा व्यवसायी दुनिया, धर्म पन्थ से सजा रहे हो

रामदेव हो, बालकृष्ण हो,सब में अपना नाम चलाओ
हर गली,मुहल्ले, चौराहों में उद्योगो की हाट लगाओ
प्रतिष्प्रधा में सबको रगडो,हम पर कुछ एहसान नही है
पर बाप को सडक में बेचो,ये वो हिन्दुस्तान नही है

पातञ्जलि के योग शास्त्र से, कंही किसी को बैर नही है
आयुर्वेद भी अपना ही है, इसमें कुछ भी गैर नही है
पर हेमा के बिस्कुट, मैगी, ये ऋषियों का काम नही है
पातञ्जलि का व्यवसायी दुनिया में कुछ अन्जाम नही है

धर्म-मोक्ष को अर्थ-काम के आयामो से ढकना छोडो
वेद-शास्त्र की मर्यादाएं अन्तर दिव्य ,दृष्टि से जोडो
अर्थशास्त्र की दुनिया में भी दिशा,धर्म से भटक रही है
क्यो पातञ्जलि के उल्टे,सीधे उद्योगो मे लटक रही है

नये-नये निर्माण नियन्त्रित, पातञ्जलि के फलैट बिकेगे
पातञ्जलि के नामो से क्या ,अब बाबा के प्लाट कटेगे
अब भू-माफिया पातञ्जलि के नामो से धरती घेरेंगे
सब चोर,उचक्के पातञ्जलि के नामो की माला फेरेंगे

धर्म-गुरू भी सब मौन खडे हैं, व्यवसायी चौराहों में
रविशंकर की आर्ट लिविंग .उद्योग जगत की बांहो में
क्या अपने भगवान, ऋषि, मुनि, धर्म,ग्रन्थ लावारिस हैं
इस कलियुग में कालनिमी बाबा ही इनके वारिस हैं

जो कुछ भी करना है बाबा, केवल अपना नाम चलाओ
आध्यात्म जगत को,संसारो के चौराहो में ना चमकाओ
पातञजलि को व्यवसायों से अब कितना और गिराओगे
कवि आग इस ना समझी से खुद ही मुह की खाओगे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Sunday, April 24, 2016

विक्लांग उत्तराखण्ड
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये
मूल निवासी आज यंहा अभिशाप हो गये
अब मेरा जूता, मेरे सिर पर मार रहे हैं
जब से उत्तराखण्ड बना ये भार रहे हैं
हम पञ्चायत के मोहरे ,ये खाप हो गये
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये

बीडी ,सिगरेट मांग-मांग कर पीने वाले
जिस घर में भी जांये,रोटी मांग के खालें
कोदा, मंडवा खाने को मोहताज पडे थे
लावारिस थे, पहाडों पर चुपचाप खडे थे
कू-कर्मी अब देव-भूमि के पाप हो गये
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये

नाली,मुट्ठी पास नही थी, भूमि हीन थे
फटे, पुराने ,टल्ली, झगुले भी महीन थे
अब टैरीकोट है ,जींस , सपारी सूट बूट है
उत्तराखण्ड में डाका डालो, खुली छूट है
हम इज्जत को तरस रहे,ये आप हो गये
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये

अब राज्यसभा के मुर्दे भी हम ही ढोयेंगे
फसल काट कर ये खायेंगे, हम बोयेंगे
बोटबैंक लायसेन्स लूट का इन्हे मिलेगा
कांग्रेस कंही बी.जे.पी का कमल खिलेगा
अब इनकी ही माला फेरो,ये जाप हो गये
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये

ठाकुर, पण्डित, वैश्य, शुद्र की ठेकेदारी
सब टिहरी, पौडी और कुमैय्ये हैं घरबरी
अब देशी और पहाडी का भी भेद भरा है
निशाचरों ने देव - भूमि को सदा चरा है
राज्य बना,पर ये कैसे सन्ताप हो गये
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये

हम अनाथ हैं, नेता ही असली मालिक हैं
उत्तराखण्ड की ये लावारिस ही कालिख है
आठ बाप सोलह सालों मैं हमने झेले
इस बीहड में सारे डाकू खुलकर खेले
अब कवि आग के शोले भी उत्ताप हो गये
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, April 23, 2016

नेता की नीलामी
हम बिकने को तैय्यार खडे हैं कोई लेलो
हम खेल खिलौने हैं सत्ता के हमसे खेलो
सब अपनी सरकार बचाओ हम को झेलो
सभी खटारा खींचो, और हमको भी ठेलो

हम भूखे, नंगे, आवारा हैं ,सूत्रधार हैं
हम असली औलाद नही हैं,पुत्र जार हैं
हर बीहड की राजनीति में जुडी तार हैं
चोर, उचक्के हर विरोध में खास यार हैं

बे-बुनियादी ,फिर भी अपने भवन खडे हैं
चोर, डाकुओं के अपने ही अलग धडे हैं
सत्ता और सियासत में हम चिकने घडे हैं
समय-समय के साथ हमारे भाव चढे हैं

अब सत्ता की मजबूरी माया फेंक रही है
हममे भी, वो माल टिकाऊ देख रही है
धन,माया के साथ-साथ पद भी पाते हैं
हम नरभक्षी हैं,लाश वतन की ही खाते हैं

हम कांग्रेस और बी.जे.पी. की मजबूरी हैं
सत्ता और सियासत की हम ही धूरी हैं
सभी सियासी हम पर बोली लगा रहे हैं
राष्ट्रपति सासन को हम ही भगा रहे हैं

प्रजातन्त्र के नंगे हम पर आस लगायें
हम टेढी - मेढी राजनीति के हैं चौपाये
हम जुगाड के लोकतन्त्र में अहं भाग हैं
हम हंस भेष में प्रजातन्त्र के जगे काग हैं

हम अपंग होकर भी सरपट भाग रहे हैं
कफन ओढकर भी मुर्दों में जाग रहे हैं
हम महारोग हैं,प्रजातन्त्र हम ही खायेंगे
कवि आग भी हम पर ही कविता गायेंगे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
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