खादी की व्याधी
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै
तभी तो भारत में खादी की मांग बढी है
हर खद्दर - धारी, चूर नशे में डोल रहा है
जो भी मूँह में आता र्हेेै ,बस,बोल रहा हेै
क्यो चौराहे में भारत माता आज खडी है
अब राजनीति के हर कूँवे मे भांग पडी हेै
काम - राज को राम - राज से दरसाता है
ये साँड क्यों जनमत की फसलें खाता है
मेहनत और मजदूरी केवल हम करते है
हम भूखे हैं, पेट इन्ही के क्यों भरते है
ये सारे नेता व्यभिचारों की एक कडी है
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै
तेल,गैस का गणित सुना है कितना सस्ता
भाशण सुनो ,तो कहता है हालत है खस्ता
मंहगायी के मुकुट पहन कर घूम रहा है
सत्ता के मद - मस्त नशे में झूम रहा है
शब्द सुनाे, जैसे जादू की हाथ छडी है
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै
बे-सूमार धन, हर चुनाव में झोंक रहा है
अहंकार में चूर, सभा में भौंक रहा है
सुन्दर - सुन्दर शब्दो से गाली देता हेै
लावारिस जनमानस हेै, ताली देता हेै
जनता की लाशों पर देखो नजर गढी है
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै
आतंक-वाद कर्कस शब्दो से पनपाता हेै
राष्ट्र - गीत भी राष्ट्र - द्रोह कैसे गाता है
लालकिले में गढा तिरंगा झेल रहा है
बद्किस्मत है झण्डा,फण्डा झेल रहा है
दुर्भाग्य, फिर भी नेता की मांग बडी है
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै
ये राजनीति और ब्यूरोक्रेसी एक जात है
एक पिता और एक पुत्र, ये महातात हैं
भ्रष्टाचारी - व्यभिचार के दोनो माहिर
दोनों के किस्से हैं, भारत में जग-जाहिर
अमावस्या की पैदाइस, दोनो एक घडी हैं
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै
ये मैं नही भारत की जनता बोल रही है
नेता जी का भांषा कपडे खोल रही है
जनता अमली, नेता अमली चूर नसेडी
प्रजातन्त्र की चाल देख लो टेढी-मेढी
कवि आग,बे-बाक शब्द की लगी झडी है
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै
तभी तो भारत में खादी की मांग बढी है
हर खद्दर - धारी, चूर नशे में डोल रहा है
जो भी मूँह में आता र्हेेै ,बस,बोल रहा हेै
क्यो चौराहे में भारत माता आज खडी है
अब राजनीति के हर कूँवे मे भांग पडी हेै
काम - राज को राम - राज से दरसाता है
ये साँड क्यों जनमत की फसलें खाता है
मेहनत और मजदूरी केवल हम करते है
हम भूखे हैं, पेट इन्ही के क्यों भरते है
ये सारे नेता व्यभिचारों की एक कडी है
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै
तेल,गैस का गणित सुना है कितना सस्ता
भाशण सुनो ,तो कहता है हालत है खस्ता
मंहगायी के मुकुट पहन कर घूम रहा है
सत्ता के मद - मस्त नशे में झूम रहा है
शब्द सुनाे, जैसे जादू की हाथ छडी है
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै
बे-सूमार धन, हर चुनाव में झोंक रहा है
अहंकार में चूर, सभा में भौंक रहा है
सुन्दर - सुन्दर शब्दो से गाली देता हेै
लावारिस जनमानस हेै, ताली देता हेै
जनता की लाशों पर देखो नजर गढी है
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै
आतंक-वाद कर्कस शब्दो से पनपाता हेै
राष्ट्र - गीत भी राष्ट्र - द्रोह कैसे गाता है
लालकिले में गढा तिरंगा झेल रहा है
बद्किस्मत है झण्डा,फण्डा झेल रहा है
दुर्भाग्य, फिर भी नेता की मांग बडी है
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै
ये राजनीति और ब्यूरोक्रेसी एक जात है
एक पिता और एक पुत्र, ये महातात हैं
भ्रष्टाचारी - व्यभिचार के दोनो माहिर
दोनों के किस्से हैं, भारत में जग-जाहिर
अमावस्या की पैदाइस, दोनो एक घडी हैं
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै
ये मैं नही भारत की जनता बोल रही है
नेता जी का भांषा कपडे खोल रही है
जनता अमली, नेता अमली चूर नसेडी
प्रजातन्त्र की चाल देख लो टेढी-मेढी
कवि आग,बे-बाक शब्द की लगी झडी है
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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