Tuesday, February 17, 2015

   रोडे. के घोडे.
सब कहते  है  कैसे  होगा,  अब   तो   कुछ  सहयोग करो
आज समस्या भारत की  है, कुछ बुद्वि  का  उपयोग करो
वैमनस्य की अभिलााशा से क्यो जनमत को तोड रहे हो
सारे मिल कर  आम  आदमी  को  ही क्यों निचोड रहे हो

जो - जो   वादे  तुमने  बोले, उसने  भी  तो  वही  बोले हैं
जिस लिबास में  तुम  बैठे हो, उनके  भी तो वही चोले हैं
सब मिलकर प्रयास करें  तो  इसका  हल  भी आजायेगा
वैमनस्य  की  राजनीति  को,वैमनस्य कब तक खायेगा

कुछ ना कुछ तो मची है हलचल आम आदमी के आने से
व्यभिचारी  भयभीत  हुये है,  राष्ट्र- भक्ति के  इस गाने से
ये  जनता  जागीर  नही  है, सभी  तो  ये  भारत वाशी है
नेताओं  कुछ  शर्म  करो  ये  सत्ता, जनमत  की  दासी है

मुझे  बताओ कौन है ऐसा जो विकास को नही चाहता है
मुझे  बताओ  कौन  है  ऐसा, अभिव्यक्ति  से  मुर्झाता है
हम सात  दशक  तू-तू-मै-मैं  करके  ही  तो बर्बाद हुये है
इस राजनीति की  वैमनस्यता  से  ही  तो  जेहाद हुये है

राजनीति  से  सत्य-तथ्य, ईमान धर्म सब जुड जायेगा
सोने  की  चिडिया   भारत, फिर से सोम,व्योम जायेगा
निन्दा, चुगली  छोडो   नेता,  बस  थोडा  सा  नेक बनो
इन बच्चो  के  साथ  जुडो  बस ,इस भारत मे एक बनो

नये - नये   बच्चे   है  माना , भाव  राष्ट्र  भरपूर  भरा है
इस राजनीति में बे-दाग  हैं, लगता  है  ये स्वर्ण खरा है
चोरों को  तो  डर  लगता  है, तकनीकी  के  आयामो से
अब  बूढे  भय-भीत  हुये   है, अपने  ही  गिरते दामो से

युवा  देश के  एक  बने  सब , पत्थर  भी  पानी छोडेगा
नामुमकिन भी मुमकिन होगा भाव हृदय के ही जोडेगा
झण्डो - डण्डो  से  बच्चों  को  भटकाना अब बन्द करो
उल्टी - सीधी भांषा  से  अब  जनमत मे ना गन्द करो

सारे  नेता  अय्यासी  के  सब   धन्धों   पर   रोक  करें
वेतन - भत्ते, पेन्शन  और  कमीशन  को  भी चोक करें
केवल  सेवा- भाव  राष्ट्र  का  थामें, मिलकर  काम करें
अपनी  निष्ठा  देंखे  बस,  ना  दुसरे   को   बदनाम करें

अगर राष्ट्र- भक्ति की निष्ठा है  तो  सारे  काम  जरूरी है
तुमने  भी  जो  किये थे वादे उनमे भी क्या मजबूरी है
सब  कुछ  सम्भव हो सकता है राष्ट्र-धर्म को अपनाओ
कवि आग  की विनती है बस,अौर ना भारत को खाओ।।
                    राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                             9897399815
              rajendrakikalam.blogspot.com

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