Friday, January 30, 2015

 प्रजातन्त्र में भगवान
प्रजातन्त्र के लव-कुश को तो  वाल्मिकी  ही पाल रहे हैं
राजनीति  के राम-भक्त  सब  रावण  को  खंगाल रहे है
माता सीता,लोकतन्त्र की लोक-लाज  से  भटक रही है
अंजनी माता हनूमान  की पूँछ  पकड कर लटक रही है

रावण से  तो  मन्दोदरी भी,अब तलाक ही माँग रही है
शबरी माँ अब राम लला को,बेर की झाड में टाँग रही है
अहिरावण , हनुमान  बना, राम, लखन अगुवा  करके
देख  विभीषण  मरवाता हेै, मेघनाथ  को ठगुवा करके

राम लखन के  नाक  कान अब सूपर्णखाएं काट रही है
बालि  और  सूग्रीव को तारा, पिया प्रेम सा बाट रही है
यति,सति अब फिल्मी दुनिया में अधनंगी नाच रही हैं
नई  पीढी भी  कामदेव  की  रामायण  को  बाँच रही हेै

यादव सिंह  अब जामवन्त हेैं,खुद ही टेन्डर बाँट रहे हेैं
सारी  फाइल  अंगद लेकर, बैठ  कमीशन   छाँट रहे हैं
रामलखन की चचा विभिषण, कुम्भकर्ण से रिस्तेदारी
दोनो  दल की  सेैनाओं  में  राजनीति  कैसी  बलिहारी

बजरंग दल अब हनुमान को अपने ढंग से पाल रहा है
शिवसैना भी मकरध्वजों को अपने रंग में  ढाल रहा हेै
विश्वा मित्र, सुषैन वैद्य  से, कल्प  औषधी  मांग रहे हैं
गुरूवशिष्ठ भी आज लंगोटी को खूंटी पर  ही टांग रहे हैं

कालनिमि अब राष्ट्रसन्त है,भोग,योग से सिखा रहे है
अष्टांगयोग  से  पातंजलि  को, उद्योगों  में दिखा रहे है
काम -कला के दश-दश बच्चे,भारत माता  झेल रही है
बाबा पीढी ऋषि - मुनि की  परम्परा  से,  खेल रही है

कलियुग में तो रामराज भी कामराज बन कर बैठा हेै
रावण अब चुपचाप खडा है,राम-भक्त  खुलकर ऐंठा हेै
सभी विभीषण,राजनीति में राजयोग   को छाँट रहे हैं
लंका और अयोध्या मिलकर,आपस में  ही बाँट रहे हैं

वो  धर्म-युद्व,ये कर्म-युद्व ,सत्ता  से  निखर के आता हेै
रावण और  राम  में बैर नही,आपस में दोनाे भ्राता है
बस ,हम तुम जैसे मरते  है,इस लोकतन्त्र मैदानो मे
झण्डो  की  जीवन लीला हेै,योद्या के  सर-सन्धानो में

यंहा  रावण, राम बनाते हेैे, बस,सत्ता के गलियारों से
यंहा खबर सभी को मिलती हेै,घर-घर में अखवारो से
अब  वाक - युद्व  ही  होता है,बस,सत्ता के समझौते से
कवि आग भी लिखता है ,इस राजनीति को न्यौते से।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       मो0 9897399815
            rajendrakikalam.blogspot.com

                 केवल हास्य-व्यंग का मजा लें
                     क्रव्यूह में अभिमन्यु
चकव्यूह  में   अभिमन्यु  को   कौरव  सैना घेर रही है
अपने घर  की सत्यवती भी बच्चों  से  मूँह फेर रही है
भीष्म तात, अन्ना  सैया पर, पुत्र मोह  मे फंसे हुये है
द्रोण, कृपाचार्य  कौरव  के  अंक,  पंक  में धँसे  हुये हेै

धनश्याम  भी   कुरूक्षेत्र  में अपनी  मुरली बजा रहे हेै
धृतराष्ट्र  तो  गान्धारी  को  हाथ  फेर कर  सजा रहे है
जयद्रथ, कर्ण,दुशासन तीनो, पूरी  दिल्ली  छान रहे है
वर्णशंकरी  सन्तानो  के  देखो  क्या अरमानन  रहे हेै

एक केजरी, पूरा  भारत, दिल्ली रण  में  जुट जाता है
कर्मयुद्व मे राम भक्त का,सत्य सडक  में लुट जाता है
घटोत्कच्छ,अमितशाह बेचारे, सीना  ताने घूम रहे है
बी. जे. पी  के  मुख्यमंत्री, चरण  मोदी  के चूम रहे है

योगी, साधू,सन्यासिन  भी, काम  क्षेत्र मे कूद पडी है
जाने कितनी, यति, सती  भी चौराहे  में आज खडी है
स्मृति,सुषमा और शादिया,बेदी  के  संग चिल्लाती है
कहने  को  कुछ  बचा  नही है,ओबामा, मोदी गाती है

कांग्रेस  के   सभी  शिखण्डी,  शब्जी  मण्डी ढूँढ रहे हैं
नये-नये  चेलों  को  राहुल आँख मूंद  कर   मूड रहे हैं
झोपड  पट्टी  को  सब  पट्टे  भाषण में ही बाँट रहे हैं
माँस, मदिरा, वैश्या-गामी,  ढूंढ - ढूंढ  कर  छाट रहे है

आर. एस. एस. के सारे सेवक कर्म युद्व मे लगे पडे हैं
इनके भी कुछ उप समूह  है,उनके अपने अलग धडे हैं
धर्म-कर्म के सभी  सरगना अभिमन्यु  को मार रहे हैं
दिल्ली  के  इस  कूरूक्षेत्र  मे, योद्या सब अवतार रहे हैं

सारी  जनता अभिमन्यु  के रण-कौशल को देखरही है
पूरी  दिल्ली  छत  के  उपर  से, वोटों  को  फेंक रही है
केवल  नेता  ही  सडकों  पर जमघट लेकर घूम रहे हैं
मजबूरी मे सभी मिडिया,चरण-कमल  को चूम रहे है

कौरव,पाण्डव ओैर  दुषासन से  मेरा  भी काम नही है
गान्धारी और द्रोपदीयो से दिल्ली  भी अनजान नही हेेै
वब्रूवाहन,घटोत्कच्छ सब लावारिस क्यों  भटक रहे है
कुर्सि एक, ये अनेक क्यों,किस आशा से  लटक रहे है

कौरव - पाण्डव  के  इस रण मे जनता कृष्ण मुरारी हेै
दुर्भाग्य, जनमत  की  शक्ति,आसक्ति से हरदम हारी हेै
मैं  भी  सजय  की  दृष्टि  से  कुरूक्षेत्र  को  देख  रहा हूं
कवि आग हूँ,अंगारो  को  शब्द  बाण  से  फेंक  रहा हू।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                 मो0 9897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, January 29, 2015

               मुफ्त में लुफ्त
बिजली,पानी  फ्री  में  देंगे ,अब  जुगाड  सब हो जाता है
जिसका जूता उसी के सिर पे,मेरे बाप  का क्या जाता हेै
प्रजातन्त्र  का  गन्दा  नाला   बहते-बहते  रूक  जाता है
राजनीति  के  चरणो  में तो संविधान  भी झुक जाता है
चोर,  चकारी,  गुण्डागर्दी,   लोकतन्त्र   से   ही  आता है
जिसका जूता उसी के सिर पे,मेरे बाप का क्या जाता हेै

झोपड. पट्टी, पुल और चट्टी, राजनीति  की सौगातें है
सडक, गूल और नाली,खडुंजे,ये सब फाइल  की बातें है
मलिन बस्तियों का भी पैसा,आपस में  ही बँट जाता हेै
नेता अच्छा हो  तो  कोहरा, भरी  सर्द   में  छँट लाता है
राजनीति  का  राष्ट्र  गीत  तो   केवल  नेता  ही  गाता हेै
जिसका जूता उसी के सिर पे, मेरे बाप का क्या जाता हेै

बलात्कार पर रोक लगाओ,मिल जाये तो भोग लगाओ
मंहगायी से जनता मरती, नेता जी तुम खुलकर खाओ
नारी के  आयोग, भोग  को  खुल्लम  खुल्ला झेल रहे हेैं
बलात्कार  के  कानूनो   को  बलात्कार   ही  खेल रहे हैं
किरण बेदी  आई.पी.एस.थी, उसका  तो  इससे नाता हैे
जिसका जूता उसी के सिर पे,मेरे  बाप का क्या जाता हेै

चौराहों पर  आज  केजरी, आम  आदमी  खास  हो गया
प्रोफेसर  विस्वास  कवि  था,उसका  सत्यानास हो गया
जाने कितने  पढे  लिखे  थे, अब दिल्ली में आम हो गये
कलतक जो भी  चरित्रवान थे,सडको में बदनाम हो गये
नया-नया तोता पढ लिखकर राजनीति  को सहलाता हेै
जिसका जूता उसी के सिर पे, मेरे बाप का क्या जाता हेै

सेवा  से  निवृत्त  हुआ   जो  उनके  तो  अब ठाठ हो गये
गांधी  के  ये  खादी  कुर्ते, अब  मुर्दो   की   हाट   हो गये
साठ  साल  सरकार  को  चूसा, अब  देश को चूस रहे हैं
बे-रोजगार  सडक  में  घूमें, ये  माल  घरों में ठूँस रहे हैं
प्रजातन्त्र  में  हम  मुर्दो  को, ये  मुर्दा  ही   क्यों भाता हेै
जिसका जूता उसी के  सिर पे,मेरे बाप का क्या जाता हेै

सारे  जोकर  अब  सडकों पर अपनी सर्कस दिखा रहे हैं
सांप, नेवले  दोनो  मिल कर, भाँषा कर्कस  सिखा रहे हैं
सभी  मिडिया, मजा  ले  रहे  हैं  दिल्ली   के   चौराहों में
सिमट गयी है आज सियासत, ओबामा की गलबाहों में
वो  भी  टुकडा,  हवा  में  नंगो  के   उपर  ही  लहराता हेै
जिसका जूता उसी के सिर पे, मेरे बाप का क्या जाता हेै

कितना  ओछी  राजनीति है,धूल सडक की फाँक रही हैेे
प्रजातन्त्र  की  हरकत, नेता  जी  की  आँखे ताक रही हेै
काम वाशना  की  ये कुर्सी,क्या-क्या करतब करवाती है
लोकतन्त्र  के  मुर्दघाट में ,गरूढ.पुराण  ही क्यों गाती है
कवि  आग  का  अंगारा  भी ,इसी राख  से  ढक जाता है
जिसका जूता उसी के सिर पे,मेरे बाप का क्या जाता हेै।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  मो0 9897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com

Wednesday, January 28, 2015


                     दिल्ली के शेख-चिल्ली
दिल्ली में भी झगडा देखो,हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख, इसाई
मैं भीअब तक समझ ना पाया,ये  दिल्ली किसकी है भाई
कंही  केजरी,माकन हैं, कंही किरण भी  दावा ठोक रही है
आप, कांग्रेस, बी.जे.पी. भी सब, सबके  रस्ते रोक रही है
जनता  भी  भयभीत  खडी  है, देख  के नेता की परछायी
मैं भी अब तक समझ ना पाया,ये दिल्ली किसकी है भाई

झोपड  पट्टी  को  घर  देंगे, बिजली , पानी  फ्री  कर देंगे
घर - घर  में  स्कूल ,मदरसे, शिक्षा   आसमान  से  बरसे
नंगी  जनता  रोटी,  कपडा  और  चाकरी   को  भी तरसे
नेता  जी  के भाषण  सुनकर, कांप  रहा  है  भारत डर से
धर्म ,मजहब  की  खोद  रहे  हैं, सारे  नेता मिलकर खाई
मैं भी अब तक समझ ना पाया,ये दिल्ली किसकी है भाई

सबको  लेकर साथ चलेंगे,कब तक जन-गण,नाथ जलेंगे
जनमत  कब  तक  हाथ  मलेंगे, कितने  भूखे  पेट पलेंगे
सत्ता वाले सब सडको  पर, नजरें लडकी  और लडकों पर
धनी भिखारी भीख मांगते,झोपड  पट्टी और कडकों पर
घूम   रहे   हैं   योगी,  भोगी,  वैरागी,  जोगी   और  माई
मैं भी अब तक समझ ना पाया,ये दिल्ली किसकी है भाई

लोक-सभा  के पूरब ,बिहारी, सबकी   अपनी  हिस्सेदारी
जाट, पंजाबी  पकड  रहे  हैं, वाह रे ,सांसद  की बलिहारी
कंही   जेतली,  सुषमा, रूढी,  अपने   पासे   फेंक   रहे है
इस  राजनीति  के  हवन-कुण्ड मे,मोदी आंखे सेंक रहे है
नाप  रहे  है, किस जोकर के पोखर  में कितनी  गहरायी
मैं भीअब तक समझ ना पाया,ये दिल्ली किसकी है भाई

सुन्दर - सुन्दर  हीरो, हीरे,  बम्बई  के ककडी  और  खीरे
सौन्दर्य  प्रसाधन  वाली  नारी, लुटि  पडी  हैं सबकी चीरे
प्रजातन्त्र  के  इस  नाटक  में   वोट  मांगती  घूम  रही है
दिल्ली  की  लावारिस  जनता, इसी  आड. में झूम रही है
भाट,चारणोे  ने  भी अपनी,फिल्मी धुन सडकों पर गायी
मै भी अब तक समझ ना पाया,ये दिल्ली किसकी है भाई

अन्ना  जी  के  सारे  चेले, गिल्ली - डण्डा  सडक मे खेले
बूढे  को  सडको  पर  छोडा,  बिल्ली  ने  भी  नाता  तोडा
मच छोड  कर  सारे तोते, अब मार  रहे  दिल्ली  मे गोते
जिनको  घोडा  समझ रहे थे,निकले सब टट्टू और खोते
अन्ना ने देखो,किस-किस की किस्मत कितनी चमकाई
मै भीअब तक समझ ना पाया,ये दिल्ली किसकी है भाई

अनुमानो   के   जोड - तोड  में  सारे  चैनल,  लगे  हुये हैं
नेताओं   के   आगे - पीछे  सब  भाग  रहे  है  जगे  हुये हैं
जिसको जितना माल मिला है,उतना गुणा-भाग करता है
ये भारत  का  प्रजातन्त्र  तो  आज  मिडिया  से  मरता है
कवि  आग  की  मजबूरी  है  लिखता  है सबकी चतुरायी
मैं भीअब तक समझ ना पाया,ये दिल्ली किसकी है भाई।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                   मो0 9897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, January 24, 2015

                 हकीकत
सियासत  ने   हमारी   कौम   को   मुर्दा  बना डाला
सिर खोकर जवानो का किया क्योंअपना मूॅंह काला
ये  मुर्दे  हैं  मेरे  घर  के   जिन्हे   हमने  सदा  पाला
मेरे  घर  को  मेरे  घर   के   दरिन्दो  ने, ही खंगाला

यहाॅ  तो,  मौेत   के   मंजर   को  मुर्दे   रोज  ढोते हैं
सियासत  के  शवों  से  क्यो  सदा  इतिहास खोते हैं
हमें   गीता   बताती    है , कि   कैसे   पेश  आना है
अब   तो  लाश   को   ढोना   तिरंगे   का  फसाना है

क्यों पाकिस्तान का खण्डहर मेरी बुनियाद  ढोती है,
क्यों   कब्रिस्तान  के   मुर्दों   से , ये  जेहाद  होती हेै
कंही  तो  हल  छिपा  होगा  इन्हें  जड़  से हटाने का
अजब   कैसा  तरीका  है ,सियासत   को  बचाने का

मुर्शरफ  की   खुशामद  से   यंहा  पर  रेल चलती है
हमारी   कूटनीति   से    हूकूमत   इनकी   पलती है
कंही  कोइ  समय  सीमा  भी, है  इनसे निपटने की
गीता  और  कुरानो   में   कंहा   हैे   बात  कटने की

यहां  तो  एक  ही  रोना  है  बस, बातें  ही  चलती हेैं
हूकूमत  जब  बदलती  है, तो  येहरकत मचलती है
हमं  भी  गीत लिखतें  हैं,मिटा दो उनकी हस्ती को
कलम  कर  दो  हूकूमत  से इस फिरका परस्ती को

नंगो  और   मतंगो   के   ये   पंगे  हम  ही  सहते हैं
ये  घुस -  पैंठ   करके  भी  मेरे  घर  में  ही  रहते हैं
गरीबी  और  मंहगायी,का   ये   भी   एक  कारण है,
पाकिस्तान  का   आतंक,  दुनिया   में  उदाहरण है

कंही  अगंला, कंही  कंगला, कंही   बंगला  डराता है
हमारे    देश   का    नेता    हमें    गीता   सुनाता है
कचहरी  में  पढी  गीता, अमल  में   कौन  लाता है
वही   है   कृष्ण   जो   मेरा,  सरहद   में  समाता है

सुनो  दिल्ली, सुनो  मुम्बई ये हम से रोज कहता है
यहाॅं  तो  न्याय  के  मंन्दिर  में भी आतंक रहता है
यहाॅ  हर  शख्स  विस्फोटों  के साये  में ही जीता है
ये  आलम  है सभी घर का निकलना भी फजीता हेै

यहाॅं  आदर्श   गाॅधी  के  क्यों  गाॅंधी- वाद  गाता है
बापू   की   हकीकत   को  तो मेरा   नेता  बताता है
यहाॅ   उपवास   होता   है   तो   भष्टाचार   चलते है
खादी  के  लिबासों  में  ही  नक्सल - वाद  पलते है

पाकिस्तान  का  दरिया  मेरे  घर  में  क्यों बहता है
फितरत  है  मेरे  घर  की, जो हरकत रोज सहता है
अगर  हम  भी  करे  पंगा, तू  नक्शे  में न रह पाये
सरहद  पर  अगर  मूतें  तो  पाकिस्तान  बह  जाये

अमरीका  की  कठपुतली  बन  के कब तक नाचोगे
महाभारत  की  औलादों  गाॅधीको कब तक बाॅंचोगे
अहिंसा  छोड़ कर, ताण्डव  करो  कैलाश बन जाओ
गाॅंधी   का    करो   आदर  ,पर   सूभाष  को  गाओ

इन सपोलों  के  कपोलों  में  कितना   दूध   डालोगे
इन  आतंक  की  नश्लों  को   कितना   और  पालोगे
उठाओ  अस्त्र  अपने  अब  जहाॅ  आतंक  दिखता है
नेता  को  कुचल  डालो जो इनका भाग्य लिखता है

हूकूमत   का   भरोशा   छोड़   कर   तैयार  होना है
तिरगे  को, सियासत  की फिजां से अब ना ढोना है
उठाओ  अस्त्र  अपने  अब, बस, घुसते  चले  जाओ
वतन का एक ही फतवा हेै,बस,तुम आग बनजाओ

मुटठी  भर  दरिन्दों  का   क्यो   इतिहास  गाते हो
महाभारत  को  पढकर  भी  इतना   खोंप  खाते हो
यहाॅं   संहार   करने    को   खुद   अवतार  आता है
ये हिंसा  भी  अहिंसा   है,  ये   मुरलीधर  बताता है।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, January 23, 2015

(अगर यह रचना यतार्थ लगे तो अवश्य अपनी टिप्पणी दें )
                ध्वजाहंकार
गज भर केे  कपडे़  से बंधी  है ,आबरु  हर  देश की
आठ  गज  के  दण्ड  में  लिपटी हैे भांषा क्लेष की
ध्वज धरा में गाढ़ कर परिचय वतन का हो रहा है
मरती  हैं  कौमें  आन पर कैसा जतन ये हो रहा है

कुछ  पागलों  की  मूढता  से  गीत  भी बनते गये
इन  मूढता  के  गीत  से   सारे  वतन  तनते गये
हर  वतन  के  अपने - अपने  इस जहां में गीत हैं
कारण  यही  है बैर का अब हर  वतन  विपरीत है

हम,पीर और पैगम्बरों को भी ध्वजों से जानते हैं
आवाम भीअस्तित्व अब इन ध्वजों को मानते हैं
पैबन्द  का  अम्बर  यहाॅं  अखिलेश  है हर भेष में
क्यों  मजहबी  आका , पताका बन  रहा है देश में

शोक  में  भी  झुक  रहा  है ,राष्ट्र  गौरव  गान का
क्यों राजनीति में कफन है कौम के  सम्मान का
ये! सियासी मृत शवो  की रूग्णता को  ढो रहा है
राष्ट्र का सम्मान भी अस्तित्व  अपना  खो रहा है

सरहदों  पर  भी  ध्वजा  अब  जंग  का  प्रतीक है
हर तरह  के  द्वन्द में भी , क्यों  ध्वजा  सरीक है
हम  शपत  लेते   बस,  झण्डा   बचाने  के  लिये
यहाॅं  आदमी  मजबूर  है  दो  वक्त  खाने के लिये

मूढता  में   हर   मजहब   भी  राष्ट्र  से  उपर बडा
चर्च,मन्दिर,मस्जिदों पर व्योम  को  झण्डा चढा
मजहबों ने धर्म को तो ध्वज  धूरी  पर  धर दिया
स्वछन्द  सागर  प्रेम  का पूरा  जहर से भर दिया

शान्ति  के   सम्मेलनों   में  बात  है चैनो- अमन
लहरा रहा  अणु बम लपेटे,हर ध्वजा  ओढे कफन
विस्फोट लिपटा हैध्वजों में जब हवा में झूमता है
काल बनकर  ये  ध्वजा  भी सरहदों को चूमता है

कहीं राष्ट्र है, कहीं  धर्म  है ,कितने कबीले कौम है
सब लड. रहें  हैं  लक्ष्य कर  कौन  छूता  व्योम है
झण्डा धरम का राष्ट्र का गर इस तरह बढता रहेगा
जब तक  धरा  में  श्रृष्टि है इन्सान तो लडता रहेगा !!
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
               मो0 9897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

          तिरंगे का  अपमान
मरकर   नेता   राष्ट्र   तिरंगे  में   लिपटा है        
राजनीति का भूत वतन पर क्यों चिपटा है
राष्ट्र  तिरंगा  भारत  की    गौरव   गाथा है
शदियों  से  भारत  मुर्दो  का  बई  खाता है

स्वाभिमान मुर्दो  का  ध्वज से  दूर  हटाओ
जीवंत  राष्ट्र का  भाव  तिरंगे  में   फहराओ
राष्ट्र  ध्वजों से  मुर्दों  को  कब  तक ढोओगे
स्वाभिमान भारत का अब कितना खोओगे

सम्मान  राष्ट्र  का  झण्डे  से  उंचा  होता  है
आज  प्रतिष्ठा  भ्रष्ट्र  आचरण  क्यों  खोता है
निर्जीव ध्वजों  से आज  दरिंदे  हठ  जायेंगे
भारत  मां  का  गीत   परिन्दे    भी  गायेंगे

स्वच्छ छवि क्या राजनीति से बच  पायेगी
लगता  है  भारत   को  खादी    ही  खायेगी
हर  नेता  को  स्वाद लगा  है अब चन्दे  का
राजनीति  उद्योग   बना  है  बिन  धन्धे का

राजनीति  का  लाभ  धनी  ही   उठा रहे  हैं
भाग ,काग ,हंसों   का   देखो   जगा  रहे  हैं
राम,कृष्ण की धरती  क्यों  मरती जाती  है?
भारत  माता   क्यों  बच्चों   से  शर्माती  है

क्यों राष्ट्र -पर्व ,तौहीन ,तिरंगा  झेल रहा है
महाराष्ट्र ,सौ - राष्ट्र , लहु   से  खेल  रहा  है
क्यों   खादी  में   भ्रष्टाचारी    छिपे   पडे हैं
एक  तिरंगा , राजनीति   में   लाख  धडे हैं

मन्दिर,मस्जिद,मॅंहगाई , कहीं माओवादी
क्यो आज तिरंगा  देख रहा  है ,ये  बरबादी
देश   की  जनता राजनीति  से हरदम हारी
आज  तिरंगा  हल्का  हैं , बस!  नेता  भारी

आदर्श राष्ट्र   का  चौराहे  पर  रखना  छोडो
राष्ट्र  प्रेम  को  राजनीति से अब ना   जोडो
शव को राष्ट्र ध्वजों  से ढकना क्यों भाता है
राष्ट्र तिरंगा    वस्त्र   नहीं , भारत   माता है ।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                   9897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, January 22, 2015

  वोट  के  भिखारी
प्रजातंत्र    में ,  कलाकार    की  माया  देखो
राजनीति   के   सम्मोहन   से    रोटी  सेंको
घर  में  आया  प्रजातन्त्र  का  एक  भिखारी
बोला   भैया   कैसे  हो  तुम  श्याम   बिहारी
 
दयानिधि  हो  तुम  तो  आने   वाले  कल के
मेरुदण्ड   हो,  बैशाखी   हो, छल  के  बल के
पहले भी उपकार  किया  था  अब भी कर दो
परिवारों  के  वोट  मेरी   झोली   में   भर दो
 
घूम  रहें  हैं   भीख   मांगते   धनी  भिखारी
कितने  पागल   बन  जाते हैं  श्याम बिहारी
भूखी  ,नंगी   जनता   सीढी   बन   जाती है
क्यों प्रजातंत्र, भिखमंगो की  पीढी  खाती है
 
ये  भ्रष्टाचारी   सदियों  से   हम  देख  रहे  हैं
ब्रह्म - अस्त्र   मतदान,  धूल   में  फेंक  रहे हैं
मत  देना   भी   मत - दाता  की  मजबूरी है
ये  संविधान  ही   चोर  उच्चकों  की  धूरी है
 
बडे  -  बडे. भिखमंगे  देखो  आज    देश  में
निर्भय  घूम   रहे   हैं  गीदड.  सिंह  भेश  में
बिष्टा, निष्ठा  की   भाषण  में   क्यों  होती है
भारत  माता   आज   प्रतिष्ठा  क्यों खेाती है

फजलू,ननकू,जाँन, मुहम्मद  की मति मारी
राजनिति   के  नौकर, मालिक  पर हैं भारी
अब किरण,केजरी, माकन  डोरे डाल  रहे हैं
हम श्याम बिहारी, राजनीति को पाल रहे हैं
 
ये मुर्दा  मतंग  देख, सासन में  कैसे  आया
जनता  को  भिख  मंगा   देखेा  कैसे  भाया
नंगेपन  का मतलब  चिन्तन  हीन  दिशा है
क्यों भ्रष्ट रोशनी  पाता  है, आदर्श   निशा है
 
समय काल के साथ बदलना  खुद को जानो
गीता भी कहती  है  खुद  की गति पहचानो
राजनीति से  धर्म  मजहब  को  दूर  हटाओ
बस,एक धरम की मानवता  धरती में लाओ
 
चिन्तन  की  बुनियादों पर  तो  राष्ट्र खडा है
भटक गयी  है भीड.,  भिखारी,  देश सढा है
मालिक होकर ,आज प्रजा  नौकर  से  हारी
वतन,पतन के कारण हैं  हम  श्याम बिहारी ।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                 9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com

Wednesday, January 21, 2015


                  दिल्ली का दंगल
मुझे  भी  देश  का  नेता,  अरे  कोई  बना  दो ना
बिकता  है  वतन  मेरा , क्रेता  कोई  बना  दो ना
सियासत  के  भँवर में  हूँ,खेता कोई  बना दो ना
डकैती  किस  तरह  होगी, वेत्ता  कोई बना दो ना

दिल्ली  में  सियासत  का  ये सर्कस खेल जारी है
यहाँ  पर  मर्द  जोकर  है, यहाँ  सर - दर्द  नारी है
कही  बेदी, कंही मोदी, कंही  अरविन्द  दिखता है
यहाँ झोपड  पट्टी  से  सियासी भाग्य लिखता है

खादी  के  लिबाशों को  यहाँ  पर  भीख मिलती है
नंगो  से  सियासत  की यहाँ  बुनियाद  हिलती है
सफर  सत्ता  का  मजदूरों  के बोटो से ही आता है
डकैतों  को  भी  खादी  में  यहाँ  वोट   बनाता  है

यहा  शब्दो  के  सौदागर  सियासत को  लुटाते है
यहा  हर  कौम  के  कल्में, नेता   जी  ही  गाते है
कंही  पानी, कंही  बिजली  के  सौदे  रोज  होते है
जहर  जाति  के जज्बातो के  नेता  जी ही बोते है

यहाँ हिन्दू, यहाँ मुस्लिम,यहाँ पर सिक्ख, इसाई
हजामत  रोज  करते   हैं  सियासत में  छिपे नाई
यहा  प्रधानमन्त्री   भी  तो   बोटो   के भिखारी है
हूकूमत  देश  की  दिल्ली   के  दरबारों से  हारी है

दल  बदलू   सियासत  में  यहा  हर रोज  आते है
जो  देते  थे  कभी  गाली, अब  मोदी  ही  गाते है
हूकूमत  ही नमूनो  को सडक  पर  खींच लाती है
नेता   की   यहाँ   औकात  ये  दिल्ली  बताती  है

हमें   चैनल  जमूरो  की  जमातो   को  दिखाता है
यहा  हर शख्स,तारीफों में अपने ही  गीत गाता है
मैं  भी  इन जमातो से, सफर  सत्ता  के सिखता हू
तभी मैंआग की लपटो से,खुलकर रोज लिखता हू।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                   9897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

Tuesday, January 20, 2015

              रज में ध्वज
अब मैं  नही  चाहता, मुझे   सम्मान दो
अब मैं  नही  चाहता  मुझे  बलिदान दो
अब मैं  नही  चाहता  शहीदों  का  सफर
अब मैं  तो बस चाहता हूं हिन्दुस्तान दो

हैशियत  क्या    हेेै   मेरी   पहचानता हूं
आज   हिन्दुस्तान   को    मैं  जानता हूं
क्या - क्या  नही   होता   है मेरे नाम से
दुर्भाग्य  है  मैं  फिर भी सीना तानता हूं

लुट गयी  इज्जत , मिली  थी  जो कभी
घुट गयी  कलियां, खिली  थी  जो कभी
अब तो  शवों  पर  फूल  चढते जा रहे हैं
छूट गयी  पोशाक, सिली  थी  जो कभी

क्या कमी  थी  ,मुझ   में , मेरी शान में
क्या  फर्क   हैे  उपवाश   में  रमजान में
क्या  तर्क   है  उस कृष्ण में  रहमान में
क्या हो  रहा   हेै   आज   हिन्दुस्तान में

मैं  तिरंगा   ठूंठ    पर    लटका  हुआ हूं
जज्बात  पर  जर्जर हुआ अटका हुआ हूं
देश  के    हर    भेश   को  पहचानता हूं
मैं  शहीदो   की   तरह    पटका  हुआ हूं

हर  वर्ष   राशन   भाषणों   से  बांटते हैं
उसमें भी  कुछ  अपने, पराये  छांटते हैं
शब्द  में  अतिश्योक्ति   इतनी हो रही है
ये  धरा   केवल   ध्वजों   को  ढो रही है

मुझको   नही   नेता   को सारे देखते हैं
शब्द  से   चैनल   भी    रोटी   सेंकते हैं
विष्लेषणों   में   तर्क   को  ही  ढूंढते हैं
धार  से  ध्वज   को   धरा   में  मूंडते हैं

चौराहों में  कब  तक  मुझे तुम  ढोओगे
सम्मान  मेरा  औेर   कितना   खोओगे
छल  कपट  से  रोज   मरता  जा रहा हॅूं
पथ  में   मेरे   शूल   कब   तक बोओगे

गणतन्त्र  को   कितने   मनाते   हैे यंहा
गिनती  करो, कितने  हैं, जो  आते यंहा
मजबूर   नोैकरशाह   लाइन   में  खडे हैं
वो  कोैन   है  जो   राष्ट्र   स्वर गाते यंहा

गणतन्त्र ,ओबामा  की  शौकत  शान में
हम झुक  गये  अमेरिका  के सम्मान में
अब राष्ट्र  भी  उसकी  सुरक्षा  में  खडा है
इस  देश  में  अब  मैं  नही,  नेता बडा है

आग ही  तो  दर्द  ध्वज  का लिख रहा है
आग ही तो फर्द  ध्वज  का  लिख रहा है
चिन्गारियां   हमको  नजर   आती नहीं
फिर भी ये हमदर्द ध्वज का लिख रहा है।।
        राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  9897399815
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Monday, January 19, 2015

                      बाबा का ढाबा
पहले दो,फिर चार  हुये, अब  दश  को  भी तैयार हुये
उस मशीन  से  भी पूछो, जिस  पर ये अत्याचार हुये
अब एक  पालना  भारी  है, उस  पर भी मारा मारी है
ये बाबा, माई, साधू  हैं, या  गेरू  में  छिपे  शिकारी है

हम सभी गृहस्थी बैल हुये ये सांड  सडक के शैल हुये
हम घास,फूस हैं, छप्पर हैं, ये  बाबा अब खपरैल हुये
हम मजदूरी  करके  खाते  हैं ,बच्चे भी हमी बनाते हेैं
ये खुले  सांड क्यों घूम  रहे,जो  जगह-जगह गुर्राते हैं

इस डेढ. अरब  की  भीडो  में , अण्डे सडते है नीडो में
जो बच्चे  पैदा  होते हैं, मरते  हैं,  लावारिस  कीडो में
बेरोजगार  हैं  सडको  पर, नजरें हैं लडकी,लडको पर
दाल हवा  में गलती  है,तुम  छोंक  रहे हो तडको पर

ये कालेधन  के रखवाले,  भगवान ये  के बर्छी-भाले
ये कालनिमी,ये  दरवेषी, हम  सभी गृहस्थों ने पाले
ना जाने अपनी लावारिस,ये कितनीे  फौज बनाते हैं
बेफिक्र,आवारा सांड यंहा,मस्ती और मौज मनाते हैं

शंकराचार्य बने चार थे, क्यों  अब  चार सौ साठ बने
इन सबके चांदी  के आसन है, देखो ये कैसे ठाठ घने
छप्पनभोगों की भिक्षा है क्या यही सनातन शिक्षा है
मठ,मन्दिर आलिशानों में  भी पंच-विकारी इच्छा है

अल्लाह  के  बन्दे  भी अन्धे, इसी काम में माहिर है
बच्चे ही पैदा करने में, ये सर्व-विदित जग  जाहिर है
ना रोटी  है,  ना  कपडा  है, रहने  को नही ठिकाना है
ये ग्वाल - बाल की  धरती  है,धर्मो का ताना-बाना है

तीस  करोड  थे,दश हजार मुगलों ने हम को लूटा था
फिर हम चालीस करोड हुये,अंग्रेज ने हमको कूटा था
अब  डेढ अरब  गुलाम हैं हम, आजाद देश में रहते है
रहने  को  घर - बार  नही, बस  भारत माता कहते है

अपने  ही  हमको  लूट  रहे, ये  राजनीति बतलाती है
गुमनाम गरीबो की बस्ती बस,चोरों की ही ख्याती है
ना गृहस्थी का ठौरठिकाना है,विरक्त हैआलीशानो में
अपनी भी गिनती होती है,बस लावारिस मेहमानो में

बाबा ये बच्चे बन्द करो,कुछ प्रेम प्यार की बात करो
इन डेढ अरब की भीडो में,ना जनसंख्या आघात करो
राम ,कृष्ण,महावीर, बुद्व,बस, एक ही सूरज पनपाओ
कवि आग की विनती है, बस धर्म  सनातन ही गाओ।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                  मो09897399815
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                प्रजातन्त्र के जोकर
क्यों मेरे घर की लकडी से  अपना  चुल्हा  सुलगाते हो
मॅंगायी  हम  झेल  रहे, पकवान  तुम्ही  क्यों खाते हो
हे,बे-शर्मो नमक,तेल और लकडी का कुछ  ध्यान करो
इस चोर,डकैती कीमाया से हम पर कुछ एहसान करो
क्यों  भ्रष्टाचारी   पतनाले  शदियों  से तुम्ही  बहाते हो
क्यो मेरे  घर  की  लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो

इस  राजनीति  में  नंगा  और लफंगा तुमको देखा था
तुम थे  नजरों  से  गिरे हुये थोडा भी नही सलीखा था
अब चरित्रवान का ठप्पा है खादी के कफन लिबासों में
जनता भी  तुझको  मान  गयी ,जीती  है तेरे झाॅंसों में
हमसे ही जनमत पा करके हमको ही आॅंख दिखाते हो
क्यों मेरे  घर  की लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो

डेढ़ अरब  की  आबादी कुछ जोकर मिलकर हाॅंक रहे
धर्म,मजहब की खिडकी से भारत की इज्जत झाॅंक रहे
तुम  राजनीति  की नजरों से माॅं को भी नंगा पाते हो
व्यभिचार के खलनायक तुम राष्ट्र-गीत क्यों गाते हो
भारत की खुशहाली में तुम, मिलकर आग लगाते हो
क्यों मेरे घर की लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो

संसद की दोनो दीवारें अबऔकात तुम्हारी जान गयी
तुम कितने बडे़ कमीने  हो,ये सारी जनता मान गयी
इस राजनीति के नाटक में तू, सबसे बडा खिलाडी है
तू कैसा मालिक है घर  का  ना  खेती  है  ना बाडी है
जनता से जनमत पाकरके अब जनता को ही खाते हो
क्यों मेरे घर की लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो

इस राजनीति के चक्कर में ये राष्ट्र फंसा कहराता है
तू कूरूक्षेत्र का महाभारत, शकुनि  का छोटा भ्राता है
तू नक्शल  वादी,  आतंकी  बैठा  है  घात लगाने को
तैयार खडा है नर-भक्षी क्यों डेढ-अरब को खाने को
वैेमनस्य की अग्नि  से  जनता  की चिता जलाते हो
क्यों मेरे घर की लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो

दलब दलू,नौटंकी नायक,पहचान भीअपनी भूल गया
अपना ही बाप बदल डाला,दुसरे  की गोदी झूल गया
नारी भी तेरे साथ चली, जो खसम को धोखा देती हैं
ये राजनीति है नगर - वधु, या ये  लावारिस खेती है
अपनी पत्नी को छोड-छाड ,इनसे ही दिल बहलाते हो
क्यों मेरे घर की लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो

अखण्ड -राष्ट्र के सपने  को, ये  तूने  कैसे  चूर किया
क्यों भारत को खण्डो  में  जनमत से  मजबूर किया
क्या मर्जी  है  दर्जी  तेरी ,तू , कितने  टुकडे़ काटेगा
इस राम,कृष्ण की धरती का,बैनामा कितना बाॅंटेगा
मैं कविआग हॅूं पर तुम तो मुझपर भीआग लगाते हो
क्यों मेरे घर की लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो!!
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                 मो09897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, January 17, 2015

                 पोखर में नौकर और जोकर
राष्ट्र ध्वजा को आई.ए.एस.,आई.पी.एस.भी फहरायेंगे
मालिक बनकर अब नौकर,हमको औकात  दिखायेंगे
मेजर,जनरल,कर्नल,बर्नल,अब आग यंहा सुलगायेंगे
इस  प्रजातन्त्र  में  चपरासी,  अधिकारी, बाबू,आयेंगे

ये  संविधान  तो  नंगे, भूखे,सबके रस्ते  खोल रहा है
चोर, उचक्के, डाकू  सबको ,अपना काकू बोल  रहा है
उद्योगपतिऔर बाबाओं को सस्ता रस्ता दिखा रहा है
डेढ अरब  को राम नाम  की लूट,छूट से सिखा रहा है

आओ भैया,तुम भी आओ,इस गंगा में पाप को धोलो
बस,थोडा सा कष्ट  यही है, सधे,गधे को बाप ही बोलो
अनपढ, भौंदू के चरणो में,स्वाभिमान का माथा टेको
चौराहों के हर  जमघट  पर,मुंह  में जो भी आये फेंको

किरण, केजरी   जैसे  जाने, कितने नौकर घूम  रहे हैं
सरहद  के  फौजों  के  झण्डे,  चौराहों  पर झूम  रहे है
छोड   मिडिया, पत्र - कारिता,   सत्ता, सत्तू चाट रहे है
अब  बैरिष्टर  भी  लालाहित, संविधान को बांट रहे हैं

जज,मुजरिम दोनो हीअन्दर,सारे गांधी जी के बन्दर
जो जितना  लूटेगा भारत,वो ही सबसे बडा सिकन्दर
सारे  अपने- अपने  अनुभव,प्रजातन्त्र  में  छोड रहे हैं
कुछ नौकरसाही से जोडा,अब लोकतन्त्र से जोड रहे है

हम जैसे मुर्दे  भारत  में ,जब तक शव,शमशान रहेंगे
सांड, गधे, घोडे, कुत्ते  भी, तब  तक ये फरमान कहेंगे
आरक्षण, संरक्षण  कीडे, सब प्रजातन्त्र  में लहरायेगे
कौम कबीले,जाति- पांति  के कीट-पंतगे अब आयेगे

हे,जनमत के नायक,मत की कीमत  कब पहचानोगे
तुम  ही  तो भारत की असली ताकत हो कब जानोगे
साठ साल  की  नौकर साही,राजनीति  में  बन्द करो
कवि आग के छन्द पढो, और कुछ  ऐसा प्रबन्ध करो।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  मो09897399815
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Friday, January 16, 2015

                     दिल्ली की बिल्ली
इस राजनीति में  नई - नई   तस्वीर उभर कर आती है
अब तक जो अनजान  थी जनता  अब वो भी शर्माती है
नयी    तकनीकी    नया   दौर  हैे, नये  नमूने  आयेंगे
फेसबुको से ओैर  ट्वीटर से,ये जन-मत  को भरमायेंगे

रस्ते और  घुमस्ते  रोको , टम - टम गाडी  दस्ते रोको
सन्ता,बन्ता,जनता रोको, अगर मिले  भगवन्ता रोको
आप,बाप के खाप को रोको,भीडों के अभिशाप को रोको
लावारिस इस चाप  को रोको,कोई सडक छाप को रोको

आम आदमी इतना  नंगा, क्यों बनता है खास मतंगा
गंजा   बेच   रहा   है  कंघा,  कवि राज  का  देखो पंगा
लोक-तन्त्र का कीट  पतंगा, सडकों  पर करता  हैे दंगा
हाथ के  उपर  फंसा  हैेे छंगा, बी.जे.पी.का  देख अडंगा

आज केजरीवाल  खडा  है, प्रजा-तन्त्र का काल खडा हेै
घर के अन्दर अलग घडा है,किरण चमकी चांद चढा है
लावारिस  का अलग धडा हेै, टुच्चा इज्जत-दार बडा है
भालू ,बन्दर ,खूब लडा है,लोक-तन्त्र चुप-चाप खडा है

अन्ना छोडा मोदी पकडा,किरण,सादिया का ये लफडा
लालकिले  के  चौराहे  में, हर लावारिस झण्डा अकडा
घर के भेदी सभी विभीषण और जयचन्दो को भी ढूंढो
ये मोदी  का  नया  अखाडा, छांट-छांट  कर  चेले मूंडो

किरण के आगे सारे  दीपक, बुझे-बुझे से झपक रहे हैं
अब मुख्यमंत्री कौन बनेगा,आंसू  सबके टपक  रहे हैं
शब्दों  के  सौदागर  सारे, शब्द  बाण  को  झेल रहे हैं
नया अखाडा बी0जे0पी0 का, बस मोदी ही खेल रहे हैं

अमर सिंह की  चाल  निराली,बी.जे.पी.में चेली डाली
आर.एस.एस.की  खेती को,सींच रहा लावारिस माली
भटकी बिल्ली,चाल,चरित्र, चेहरों  को ही क्यों भाती है
यति,सती तो राजनीति में नगर-वधू भी बन जाती है

अब कांग्रेस की कौरव सैना, मम्मी,पापा झांक रही है
टिकट हाथ में लेकर सैना,रण में थर-थर कांप रही है
भीष्म-पितामाह  कांग्रेस  के  सर सैया में पडे हुये हैं
घोटालों  के  अम्बारों  से , सब  के  सीने जडे  हुये हैं

भारत मां के गीत सुनाओ,गांधी को सडको पर लाओ
सब टी0वी0चैनल में छाओ,आम,खास के गानेगाओ
नारे बोलो  देश बचाओ, राजनीति की आड  में खाओ
दिल्ली को दरवेष बनाओ,दुनिया कोऔकात दिखाओ

वैश्या  वृत्ति, भांड को पकडो, चौराहों सडको पर अकडो
गली,मुहल्ले कांड को पकडो,मुस्टंडों की टांड को पकडो
राम देव ब्रह्माण्ड को पकडो,मोदी  नये ब्राण्ड को पकडो
महगांई है खांड को पकडो,बिखरे चावल मांड को पकडो

संविधान  के  पन्ने  कोरे, खोल  रहे  हैं  सभी  छिछोरे
दक्षिण  काले, उत्तर   गोरे, डाल  रहे  जनमत  पर डोरे
लावारिस  सब  छोरी ,  छोरे, राजनीति की पन्ने कोरे
सब के घर  नोटो के  बोरे,फिर भी हाथ मे भीख कटोरे

मन्दिर, मस्जिद,  गिरजे  न्यारे,  झण्डे उंचे रहे हमारे
सम्प्रदाय सबके  हैं  प्यारे, इनसे  राष्ट्र - ध्वजा भी हारे
सभी  सपूत  भारत  के  प्यारे,  चाट  रहे  हैं  नेता चारे
कवि ‘आग’ के छन्द करारे, फेस - बुकों  में  भटके हारे!!
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
                    मो09897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com
               

Thursday, January 15, 2015


(हास्य,व्यंग के साथ भविष्य में होने वाले खतरे के प्रति सचेत कर रहा हूं, अवशय पढें)          

                 अमेरिका का सपना
अमेरिका  हूॅं  दुनिया - भर  के  भिखमंगों  को पाल रहा हूॅं
समृद्व - राष्ट्र  की  कमजोरी  और  लाचारी  खंगाल  रहा हूॅं
छल,बल,कपटी राजनीति का कातिल,शातिर,मैं माहिर हूॅं
अलसायी, व्यवसायी  दुनिया  के  धन्धे में जग जाहिर हूॅं

छोटे - छोटे  टुकडे़  करके   खेल   खिलाना  मेरा  शौक है
आज मेरा  घर  दुनिया  भर की नीलामी का नया चौक है
मेरे  दर  में  भीख  माॅंगते  सभी  राष्ट्र  और  देश   खडे हैं
मेरे  कारण  दुनिया  भर  में  राजनीति  के  लाख  धडे़ हैं

तहस - नहस  हो  दुनिया  सारी,मैं विस्फोटक फैलाता हूॅं
घर - घर में, मैं  आग  लगाकर  ज्ञानी, दानी कहलाता हूॅं
मौतों   का    सामान    बेचना , ये   मेरी   दुनियादारी है
चरण   चूमना   मेरे  ,सब   की  मजबूरी   है,  लाचारी है

हर  धन्धों  में  प्रतियोगिता, शदियों  से  मैं  करवाता हूॅं
मजदूरों  की  इस  दुनिया  में  बैठ-बैठ  कर  मैं खाता हूॅं
पहले   मैं  आतंकी   पैदा   करता   हूॅं,  फिर  मरवाता हूॅं
मैं दुनिया में कपट कराकर शान्ती दूत बन कर आता हूॅं

कहा-कहाॅं, क्या-क्या होता है,निगरानी सबकी करता हूॅं
निर्बल  की  रक्षा  करने   की ,आडों   में  सैना  भरता हूॅं
पूरब, पश्चिम ,उत्तर ,दक्षिण   मेरी  दहशत्  से  जीता है
मैं  कलियुग  का  गिरधारी  हूॅं, घर-घर  में मेरी गीता है

हिन्दुस्तानी,  पाकिस्तानी  कठपुतली  का  सूत्र-धार हूॅं
दोनो  आपस  में  लडते   है,  मैं  दोनो   का  वफादार हूॅं
परम्परा और  संस्कारो  में  जहर  भयंकर  डाल रहा हूॅं
ब्रह्म - जगत  में  जीने  वाले  भले  भिखारी पाल रहा हूॅं

खाडी  और  पहाडी  अरबी  दुनिया  को  मैं मार  रहा हॅूं
दुनिया  भर  के  भूखे,  नंगे, मुर्दों   का  अवतार  रहा हूॅं
वेद,शास्त्र और उपनिषदों में धरती का  पाताल लोक हूॅं
अधोगति  में  मरने  वालों  का  भी  तो,मैं महाशोक हूॅं

प्रतिष्प्रधा  में  जर्मन  और जापन,चीन को भाॅप रहा हूॅं
विश्वजगत की अर्थव्यवस्था में भी,मैं अभिशाप  रहा हूॅं
हर धन्धो मे अर्थ - व्यर्थ, चौपट  करने का कलाकार हॅूं
दुनिया  भर  के  सरपंचो  की  चैपालों का सलाहकार हूॅं

वालमार्ट की चमकधमक से राजनीति को समझाउंगा
खेती,बाडी  और  किसान  को  मैं ही सडकों पर लाउंगा
खुदरा ,मुद्रा, भी  तोडूंगा़  अपने   डालर   की   भाँषा से
अमरीका  की  मुहर लगेगी अमरीका की अभिलाषा से

रोजगार  विहीन  बनाकर  मैं   ही  भारत   को  पालूॅगा
इस महाद्वीप  के  युद्व-पोत  के  अड्डो  को मैं खगालूॅगा
जापान,चीनऔर रशिया को भी टुकडो-टुकडो मे तोडूंगा
मैं एशिया - महाद्वीप को, नैपाल  बना  कर  ही  छोडूॅगा

अब   मोदी   आने   वाला  है,मार्च  नही, अप्रेल  चलेगा
जापान  की  रेल  चलेगी, मेरा  भी  कुछ   खेल  चलेगा
भारत  के  उद्योग - जगत  को  भीख मांगते देख रहा हूं
अच्छे  दिन  आने  वालें  हैं ,मैं  भी   टुकडे  फैंक  रहा हूं

इस कलियुग में छल,बल,कपटी,रंगमंच जंजाल रहा हूॅं
अमरीका  हूॅ  दुनिया-भर के  भिखमंगों को पाल रहा हूॅं
इस रचना में हास्य - व्यंग है, चिन्तन  की गहरायी है
अमरीका  के  उदार - वाद  में, देखो  कैसी  चतुरायी है

शदी  अन्त  तक पूरा परचम इस दुनिया मे लहराउॅगा
मैं  ही  दुनिया  पाल  रहा हूॅ, मैं  ही दुनिया  को खाउॅगा
भीख मांगकर मरगें सारे,मुझको कोई समझ ना पाया
राष्ट्रभक्ति के इस खतरे को,कवि आग ने खुलकर गाया।।
                 राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                         9897399815
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Wednesday, January 14, 2015


                        वृक्ष की वेदना
बंजर जमीं  में  अंकुरित  होता  हूॅं क्यों श्रृंगार कर?
बलिदान में भी जी  रहा  हूॅं मैं स्वयम् को मारकर
बेमौत मरने  का हूनर और  हस्र  भी मैं जानता हूॅ
मैं आदमी  की  हरकतें, संस्कार  से पहचानता हूॅ
झकझोरतीे है अस्मिता,मुझको धरा से प्यार कर
बंजर जमीं में अंकुरित होताहूॅं --
 
वो  जमाना  था  कभी जब खुद  खडा होता था मैं
मौसम,ऋतु  के  आासियाने  में ब डा होता था मैं
नर्सरी  की  परवरिस ,बे   मौत  मुझको मारती है
लावारिसी  हर राह  पर, बस,ठोकरें ललकारती हैं
हो  गया  अस्तित्व  मेरा   इस  जहाॅं में दर -बदर
बंजर जमीं में अंकुरित होता हूॅं -----------
 
मैं ऋतु के पुष्प ,फल  की ,फितरतों  में  जी रहा हूॅं
तृष्कार  में  भी  विष की वृष्टि सा,लहु को पी रहा हूॅं
आजाद   होकर  भ्रूण - हत्या  के  नियम से पार हूॅं
पर्यावरण  और   प्राणियों   का  भी  परं  आधार हूॅं
बस, ये  मेरी  ही  जीत  है ,मेैं  जी  रहा  हूॅं हार कर
बंजर जमीं में अंकुरित होता हूॅं --------
 
माफियाओं   की   नजर   मेरी  जवानी  छाॅंटती है
बस,कौडियों  के  भाव में, बे-दर्द मुझको काटती है
कुर्बान  होकर  भी तुम्हारी  शान,मैं दिखला रहा हॅूं
मैं अहिंसा  प्रेम  का  सबको सबक सिखला रहा हूॅं
नित दे  रहा  हूॅं श्वांस  सब  को,मैं पवन संचार कर
बंजर जमीं में अंकुरित होता हूॅं -------
 
मठ,मन्दिरों, और  आसियानों में हमेशा से जडा हूॅं
जलजीवजीवन और धरा कीआस में हरदम खडा हूॅं
जन्म  से   मैं   मृत्यु  तक  उपयोग  होता  जाउंगाॅं
खुद  फॅंना  होता  हुआ  भी  काम  सब  के  आउंगाॅं
निर्जीव  होकर  जी  रहा  हूॅं , जीव  को  संभाल कर
बंजर जमीं में अंकुरित होता हूॅं -------
 
मजबूर  हूॅं  जीवन, मरण, पर्यावरण  से बॅंट रहा हूॅं
मैं सदा  इस  आदमी  के  हाथ  से  ही  कट  रहा हूॅं
मै----- प्रकृति   हूॅं ,  मुझे   बस !  छेडना  जेहाद है
कोई  तो  मुझको  बतादो  क्या ?  मेरा अपराध है
मैं  सतत्  प्रहरी  बना  हूॅं  , काल  के  हर  द्वार  पर
बंजर जमीं में अंकुरित होता हूॅं ------
 
मुझको  बचाना  आदमी  की  हो  गयी मजबूरियाॅं
बन  गयी  हैे  आवश्यकता  की   प्राकृतिक दूरियाॅं
मैं मौन  था  मरता  रहा  इस  आदमी  के  हाथ से
अब  आदमी  ही  घुट  रहा  है , कुदरती आघात से
संस्कार से  जो  कुछ मिला, देता रहा मन मारकर
बंजर जमी  में अंकुरित  होता  हॅूं  क्यों  श्रृंगार कर
 
नंगी धरा  को  देख  कर  आश्चर्य मुझको हो रहा है
मेरी  सुरक्षा  से  यहाॅं   अस्तित्व   मेरा  खो रहा है
मैं लंगोटी  की  तरह  अब इस जॅंहा को ढक रहा हॅूं
त्रैमास की  मौसम, ऋतु से मौन होकर बक रहा हॅूं
हर शख्स लिपटा है कफन में सृश्टि का संहार कर
बंजर  जमी  में  अंकुरित  होता  हूंं क्यों श्रृंगार कर
 
रूग्णता  बिमारियों ,से  जब   कभी  मैं  सूखता हूं
लाश बनकर, लाश  मानव  की  बराबर  फूंकता हूं
जातियों,   कौमों,   कबीलों,   मजहबों   से   दूर हूं
पर्यावरण  की  दृश्टि  में , मैं  आज   भी  नासूर हू
लिख   रहा   है   आग   मेरी    वेदना,   अंगार पर
बंजर जमी  में  अंकुरित  होता  हूं  क्यों श्रृंगार कर
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
                         मो09897399815
               rajendrakikalam.blogspot.com

Tuesday, January 13, 2015

                    त्यौहार में सियासत
ये खिचडी संक्रान्त,निमन्त्रण है खिचडी सरकारों की
भभक  रही   है आग  लोहडी में,  सत्ता  गलियारो की
भुखमरी,गरीबी बनी अंगीठी, शीत लहर सरदारों की
बांंट   रहे   हैं, सभी   रेवडी,  नारों   में   मक्कारों की

चौराहों   में  बैनर, पोस्टर,  सभी   बधायी ,खायी में
ये  नंगे, भूखे   नेता  घूमें  कोट,  पेन्ट   और  टाई में
राजनीति  के  दुश्मन  आपस  में आलिंगन  करते हैं
वाह  रे, खिचडी,  तेरे  कारण, कितने  टुच्चे  तरते हैं

अच्छा  होता, प्रजातन्त्र की  सोच  प्रजा में आ जाती
आज भेडियों की नश्लें,जनमत की  खिचडी  ना खाती
लोहडी,खिचडी में तपकर,कुछ चिंतन,मंथन भी होता
प्रजातन्त्र का मालिक,सडको पर लावारिस  ना रोता

त्योहार मनाये जाते  हैं, सम्पन्न,समर  संसारों  में
नेता  खिचडी,  ढूंढ   रहे   हैं,  भुखनंगे गलियारों  मे
कई   करोड़  के  खर्चे   हैं,  चुनाव, चरण परचारों में
शाम को दारू,अय्यासी,  होती  है मिलकर  यारों में

त्यौहार बने थे संप्रदाय सब मिलकर खुशी मनायेंगे
ये  राजनीति  के  नरभक्षी, ना कौम, कबीले खायेंगे
त्यौहार,तालाबों के डबरे, घुट-घुट  के मनाये जाते है
ये हिन्दू  है,ये मुस्लिम है, कौमो से  गिनाये जाते है

प्रारम्भ चैत्र  से  संवत्सर, इस आर्यखण्ड में होता है
अंग्रेजों  की जनवरीयाें को  ये भारत कबसे  ढोता है
सब मौसम,ऋतुवें जीवन की उत्कृष्ट  गवाही देती हैं
ये वर्ष,हर्ष,संघर्ष सदा से,इस  आर्यखण्ड की खेती है

त्यौहार में बोटों की गिनती,नेता कीआंख से होती है
सम्प्रभुता मेरे भारत की, क्यों उत्सव  में भी रोती है
त्यौहार  हमें भी भाता है,आडम्बर से कुछ हटकर हो
कवि‘आग ’के छन्द पढो,बस,भाव हृदय में डटकर हो!!
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                         ऋषिकेश
                   मो09897399815
         rajendrakikalam.blogspot.com

Monday, January 12, 2015

   नेता की नक्कासी
अगर किसी को गाली देनी हो तो  बस, नेताजी बोलो
एक शब्द काफी है, चौराहों  पर  पूरी  पोल ना खोलो
खादी कुर्ता और पाजामा,मफलर,टोपी, सब कहती है
प्रजातन्त्र में जनता ,नेता  जी को शदियों से सहती है
फिर चुनाव आने वाले हैं,जाओ  जोकर  के संग डोलो
अगर किसी को गाली देनी हो तो  बस, नेताजी बोलो

सडक छाप पर  मुहर  लगाकर  सभी  नमूने तूने चूने
बोट माॅगने घर - घर   जाकर  तूने  चूने  ये  झुनझूने
जिसका कोई ठौर ठिकाना काम,धाम पैगाम नही था
शहर,गाॅव के गली,मुहल्लो में नक्कारा,नाम नही था
नंग,  मतंगो  और  मलंगो  में  भूखा  हो  उसे टटोलो
अगर किसी को गाली देनी हो तो बस ,नेता जी बोलो

भ्रष्टाचार,  बलात्कार  और  व्यभिचार  इनका पेशा है
जूते, चप्पल, गाली खाकर  शान्त खडा,कैसा भैंसा है
गाॅधी जी के  आर्दशों  का  लालन-पालन  करने वालों
उपवाशों  के  जनवासो  में, चौबीस  घण्टे  चरने वालों
लोकतंत्र की खुली तुला पर  भूखी, नंगी  जनता तोलो
अगर किसी को गाली  देनी  हो तो बस,नेता जी बोलो

भाषण की  भी  भांषा  देखो, रामराज  की आशा देखो
दाॅव लगे तो  पाशा  फेंको,  सारा  सदन, तमाशा देखो
एक  टाॅंग  रेलों  मे  देखो,  एक  टाॅंग   जेलों  में  देखो
जूॅंआ, सट्टा  और  अय्यासी,  लूटमार  खेलों में देखो
हे, कु- कर्मो के  बे - शर्मो, मुस्टण्डो  के  झण्डो झोलों
अगर किसी को गाली  देनी हो  तो  बस,नेताजी बोलो

अब तो सडक  छाप  आवार जनमत से चुनकरआते है
चाट ,पकोडी  बेचने  वाले  राष्ट्र- ध्वजों  को फहराते हैं
रहने  को  घर-बार  नही  था, फारम-हाउस की बाते है
राजनीति  में  हिन्दुस्तानी  नेता  की  कितनी  जाते है
प्रजातंत्र के विषमन्थन से,सागर  में अब विष ना घोलो
अगर किसी को  गाली  देनी  हो  तो बष,नेताजी बोलो

रोटी है  तो  दाल नही  है,नेता को  कुछ ख्याल नही हेै
मंहगायी  मलाल  नही है, बिखरे  स्वर है ताल नही है
पल-पल में  प्ररिधान  बदलने  से  तो भारत शर्माता है
कुछ तो शर्म  करा  बे-शर्मो, अब  नंगी भारत माता है
मांकी सेवा  में अर्पित  हो  करके  अपने पाप तो धोलो
अगर किसी को गाली  देनी  हो  तो बस,नेताजी बोलो

सभी लंगोटे, हाथ  में  लोटे ,लेकर  दिल्ली भाग रहे हैं
ईमाम बुखारी आयत पढकर, मुर्छा से अब जाग रहे हैं
अगडे,पिछडे ,झोपड पट्टी, सभी को चारा डाल रहे हैं
भारत माता के  बच्चों  को  सब, भाषण से पाल रहे हैं
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाइ, कीअग्नि के ठण्डे शोलों
अगर किसी  को  गाली  देनी हो तो बस,नेताजी बोलो

डेढ़  अरब  में  भूखे - नंगे  इनके  कारण  ही  मरतें हैं
नेताओं  के  धन्धे  देखो, धोती   कुर्ते  क्या   करते हैं
सोने की चिडिया का भारत  मिट्टी में कैसे मिलता है
संविधान का प्राविधान भी,  नेताओ से क्यों हिलता है
कवि‘आग’ के श्रोताओं  को क्यों डसते हो सर्प सपोलों
अगर किसी को  गाली  देनी  हो तो बस,नेताजी बोलो !!
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                    9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

                     नेता की नक्कासी
अगर किसी को गाली देनी हो तो  बस,नेताजी बोलो
एक शब्द काफी है, चौराहों  पर  पूरी पोल  ना खोलो
खादी कुर्ता और पाजामा,मफलर,टोपी, सब कहती है
प्रजातन्त्र में जनता,नेता जी को शदियों  से सहती है
फिर चुनाव आने वाले हैं,जाओ  जोकर  के संग डोलो
अगर किसी को गाली देनी हो  तो  बस,नेताजी बोलो

सडक छाप  पर  मुहर  लगाकर सभी  नमूने तूने चूने
बोट माॅगने  घर - घर  जाकर  तूने  चूने  ये  झुनझूने
जिसका कोई ठौर ठिकाना काम,धाम पैगाम नही था
शहर,गाॅव के गली,मुहल्लो में नक्कारा,नाम नही था
नंग, मतंगो  और  मलंगो  में  भूखा  हो  उसे  टटोलो
अगर किसी को गाली देनी हो तो  बस,नेता जी बोलो

भ्रष्टाचार, बलात्कार  और  व्यभिचार  इनका  पेशा है
जूते, चप्पल,गाली  खाकर  शान्त खडा,कैसा भैंसा है
गाॅधी जी  के आर्दशों  का  लालन-पालन  करने वालों
उपवाशों  के  जनवासो  में, चौबीस  घण्टे चरने वालों
लोकतंत्र  की  खुली तुला पर भूखी,नंगी जनता तोलो
अगर  किसी को गाली देनी हो तो बस,नेता जी बोलो

भाषण  की  भी  भांषा  देखो, रामराज की आशा देखो
दाॅव लगे  तो  पाशा  फेंको, सारा  सदन, तमाशा देखो
एक  टाॅंग  रेलों   मे   देखो, एक  टाॅंग  जेलों  में  देखो
जूॅंआ, सट्टा  और  अय्यासी, लूटमार  खेलों में  देखो
हे,कु-कर्मो  के  बे - शर्मो,  मुस्टण्डो  के   झण्डो झोलों
अगर किसी  को  गाली  देनी हो तो बस,नेताजी बोलो

अब तो सडक छाप आवारा जनमत से चुनकर आते है
चाट ,पकोडी  बेचने  वाले  राष्ट्र- ध्वजों  को  फहराते हैं
रहने  को  घर-बार  नही  था, फारम-हाउस  की बाते है
राजनीति  में  हिन्दुस्तानी  नेता  की  कितनी  जाते है
प्रजातंत्र के विषमन्थन से,सागर में अब विष ना घोलो
अगर  किसी  को  गाली  देनी हो तो बष,नेताजी बोलो

रोटी  है  तो  दाल  नही  है,नेता को कुछ ख्याल नही हेै
मंहगायी  मलाल  नही  है,बिखरे  स्वर  है ताल नही है
पल-पल में  प्रारिधान  बदलने से तो भारत शर्माता है
कुछ  तो  शर्म  करा बे-शर्मो, अब नंगी भारत माता है
मांकी  सेवा  में अर्पित  हो  करके अपने पाप तो धोलो
अगर किसी  को  गाली  देनी हो तो बस,नेताजी बोलो

सभी लंगोटे, हाथ  में  लोटे ,लेकर  दिल्ली भाग रहे हैं
ईमाम बुखारी आयत पढकर,मुर्छा से अब जाग रहे हैं
अगडे,पिछडे,झोपड पट्टी, सभी  को  चारा डाल रहे हैं
भारत माता के  बच्चों  को सब, भाषण से पाल रहे हैं
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाइ,कीअग्नि के ठण्डे शोलों
अगर किसी  को गाली  देनी  हो तो बस,नेताजी बोलो

डेढ़  अरब  में  भूखे - नंगे  इनके   कारण  ही  मरतें हैं
नेताओं  के  धन्धे  देखो,  धोती   कुर्ते   क्या  करते हैं
सोने की चिडिया का  भारत मिट्टी में कैसे मिलता है
संविधान का प्राविधान  भी, नेताओ से क्यों हिलता है
कवि‘आग’ के श्रोताओं  को क्यों डसते हो सर्प सपोलों
अगर किसी  को गाली  देनी  हो तो बस,नेताजी बोलो !!
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                    9897399815
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Sunday, January 11, 2015

                      लालकिला
मैं लालकिला हूं सातदशक से  झण्डे ही ढोता आया हूं
मुगल और  अंग्रेजो  की  भी  मैे  ही  पुस्तेनी  काया हूं
प्राचीर  से  राजनीति  के  चीर  हरण   को  मैं  ढोता हूं
संविधान की  काम-वाशना, बलात्कार  से  मैं रोता हू
स्वतन्त्र,गणतन्त्र दिवश के अधिनायक से शर्माया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं

नेहरू,लालबहादुर,इन्दिरा का परचम  भी लहराया था
जाने कितने लावारिस ने मुझ पर  झण्डा फहराया था
मुझ पर चढ कर भाषण देना नेता की  गौरव गाथा हेै
रातनीति में हर नेता को मुझपर चढना  क्यों भाता है
कहने को तो  स्वाभिमान  हूंं, नेता से  लुटता आया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं

मेरे  उपर   चढकर   नेता   भारत  को  भरमाते  आये
देश से  किसको  क्या लेना  है,सबने अपने गाने गाये
धर्म,मजहब और सम्प्रदाय  की नेताजी  बातें करते है
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई  झगडो  में  सब मरते है
व्यभिचारी  और   भ्रष्टाचारी, हर  नेता  की मैं छाया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं

छोटे - छोटे राजनीति   के   डबरे   मुझको  देख  रहे हैं
गठबन्धन  की  आशाओं  से, अपनी  नजरें सेंक रहे हैं
कौम,कबीले, जाति-पांति  के   गठजोडो से भरमाते है
देखो  कालनिमी  भारत   के  राष्ट्र-गीत   कैसे  गाते हेैं
जिस  पर  किया भरोसा मैंने,उससे  ही मैं पछताया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं

अब मोदी पर किया  भरोशा, स्वाभिमान को पाने का
कुछ  वंहा  भी  मौका  ढूंढ  रहे हैं,राजनीति गर्माने का
वो  अटल बिहरी ,सिंह  नाद  से  संसद   में   गुर्राते थे
कंहा  गये  वो  देश  के  नेता, राष्ट्र - भक्ति  जो गाते थे
मैं आलीशान भवन दुनिया का था,अब जर्जर काया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं

संविधान  की कसमे,रस्मे खाकर मुझपर चढने वालों
भारत मां को लूट-लूट कर, खाने  वालों  सभी दलालों
आशा,भांषा,भाव,भंगिमा  से  मुझको क्यों तोड रहे हो
राजनीति  से  टुकडे-टुकडे  करके  भारत  जोड  रहे हो
आजादी  के  बाद  आग  के  छन्दो   से  मैं  गर्माया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                      9897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, January 10, 2015


                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  fiz; ikBdks vkids Lusg vkSj vkf’kZokkn Lo#i eq>s eka ljLofr dh  d`ik ls ;g o/kq’kkyk ‘krd jpus dh izsj.kk feyh gS A ;g esjs gn; dh dq.Bk  Hkh  gS vkSj m}xkj Hkh]D;ksa fd bl HkkSfrd txr esa bZ’ojh; iszj.kk ls eq>s tks dqN Hkh izkIr gqvk]pkgs og osn gks]mifu”kn gks] ;k xhrk]jkek;.k]dqjku] ckbfcy vkfn xzUFk gksa A esjh vYi cqf} esa tks Hkh fpUru vk;k og ek= iq#”k iz/kku dh lRrk ek= dk gh jgk gksxkA pkgs og nsork]_f”k] eqfu] ;k vk/kqfud lkfgR;dkjksa ls lEcfU/kr  D;ksa uk gks A ge rks ;g Hkh ugh tku ik;s fd tks L=h J`f”V dh jpuk djrh gS  mls D;ksa fuEu Lrj ij j[kk  x;k  A
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                            ukjh ‘kfDr ds Hkkoks ls m}sfyr gks dj]eeRo] okRlY; iw.kZ lekt ls izsj.k ikdj o/kq’kkyk ‘krd  fy[kus dh fgEer tqVk ik;k gwa! Vius ikBdksa ls ;g vkdka{kk j[krk gwa fd bl vcks/k cqf} ls ifjyf{kr gqbZ bl o/kq’kkyk ds ‘kCnksa ds vUrjky esa tks fod`r lekt dh tks Hkko Hkafxek gS mldh tfVyrk ls mij mBdj ukjh osnuk dks /;ku ls ifjyf{kr djsa rks;g Li”V gks tk;sxk fd lekt esa ukjh dk D;k eqY;kadu gksuk pkfg;s Fkk!vkSj ;fn ;gh #<h-oknh ijaijk lekt esa pyrh jgh rks vkus okyj lekt  ,d fod`r #i ys ysxk blesa lansg ugh gS! Uk kjh ds  okfLrfod lkSUn;Z dks cpkuk gh  o/kq’kkyk dk  ,d  ek=   m}s’;  gSA

o/kq’kkyk & ‘krd

1

dkSf’k’k   gS   vax&rjxa      cus
vkufUnr     vax   cuk     Mkyk
lkeatl     Hka`x    rjaxks      dk
jprk          upjax      o/wk’kkyk

2
                                                                      
tqYQsa   pUnu   cu   O;ky  cuh
[kq’kcw       gS     na’k   djky cuh
gj  ‘kk[k   esa   fyiVh  ekyk  lh
?ku   ?kskj     ?kVk  ?ku’kky   cuh
3
                                           eLrd   esa   xxu   lek;k   gS
D;k  lkse   O;kse   dk  ukrk   gS
f=us=   Hksn   dh     xqIr      xqgk
yV   ls     yykV   cy  [kkrk  gS

                                                                4
                                           lj   lU/kku   lh    Hk`dqfV   cuh
dSlh    gfj   gj   dh    n`f”V     gS
uV[kV   gj   gjdr   gkV   cuh
T;ksa     bUnz    /kuq”k   ij  o`f”V  gS

5
Uk;uk     gS    rhoz      dVkjksa   ls
futZu   cu   ljy  ljksoj   lh
Luku   /;ku   _f”k    nsoksa     dk
J`f”V    lksUn;Z      euksgj     lh

6
Hk`dqfV      Hk;adj    cu      tk;s
Tkc      ckr   g`n;  dks   uk  Hkk;s
dgha   fo/qk   o/kq  ‘kskyk   curh   gS
dgha    izse    u;u    esa     gj”kk;s
7
Ikyds      u;uk      iydkrh     gS
n`f”V       ls       }kj     gVkrh     gS
dc    cUn    djs  dc    [kqytk;s
gjh]   gj    ls     gkV    gVkrh    gS
     
8
iydksa    ij     cky    >jksa[ksa    ls
mudk     viuk    gh     /kks[kk    gS
dqatksa      ls    ;kSou    >kad    jgk
dqnjr   dk    [ksy    vuks[kk     gS

9
dUnjkg    gS   d.kZ   fgeky;   ls
tgka    xeu  ‘kCn    dk   gksrk  gS
lw{e    ‘kCn       ;ksxh      cudj
fiz;re    ds   fg;   esa   [kskrk   gS

10
dSls    diksy   gSa  jfo    ‘kf’k    ls
LoNUn    O;ofLFkr    e/kqj  je.k
lU/;k    lksUn;Z      ?kfVr     gksrk
T;ksa    uHk    lkxj  esa Nfo   niZ.k

                                                                 11
v/kjksa       dh     ykyh     erokyh
fgyfey    lksan;Z      c[kku    djs
ljl         J`f”V   v/kjk /kj     dh
eklwe     v/kj     jliku       djs

12

lapkj    O;oLFkk    ftOg;k      dh
;s    xqIr   xsg     jljkt      cuh
dgha     pwe   jgh    dgh  >we jgh
laxhr    lwjksa   dh      jkx     cuh

13
 o/kq     daB     lq/kk     lao/kZu     gS
;s      lfjrk   ljl   cgkrh       gS
la;ksx    fo;ksx    J`axkj      e/kqj
 p/kq’kkyk    d.B      ls  xkrh     gS

14
cqf}   g`n;      e/;Lr        cuh
la;ksx     ;ksx     cuokrh       gS
voyEcu   gS      nks    }hiksa   dk
fpUru    eUFku    djokrh     gS

15
Lru    gSa  f’k[kj    fgeky;   ls
fge   ef.Mr   ls  vkPNkfnr   gSa
jfo    ykS   ls    FkksMk   lk  fi?kys
xEHkhj   n`f”V    laEikfnr       gS

16
xksykd`fr    gS    egkf}iksa      dh
vkdf”kZr   J`f”V   Hkze.k    djrh
gj    NSy     Nchyk    o/kq ;kSou
vklDr    o{k     viZ.k     djrh

17
Lru  gS  ifjp;   eka  f’k’kw   dk
i;    iku  o/kw     ls    gksrk     gS
uj    dk   vkd”kZ.k    o{k     cus
vrjax  [kkst      esa   [kksrk     gS
                                                                 18

o/kq    dk    ifjp;  Lru    gh   gS
;s      mez   dk   Hksn     crkrk   gS
eeZLFky   fiz;re    xqIr  je.k
gj   o/kq     dh    ;kSou  xkFkk   gS

19

ukHkh   gS   Hkaoj    cgkvksa        dk
tgka    uj    irax   gh  Qalrk  gS
lapkj  dsUnz      mtkZ      dk       gS
bUnzh    dsk    jlksa    ls   dlrk  gS

20
;s   dke     nso   Tokyk eq[k      gS
ykok   dh   ygjs     xqIr      yiV
dke   ok’kuk     dh   ykS          ls
;s    ‘khry   ru   vaxkj     fodV

21
Hkx   tue  }kj    gS    thoksa   dk
Tkgka    cht   vadqfjr     gksrk    gS
Lkgok’kksa   ls    cnuke          gqvk
gj    tho    izfr”Bk       [kksrk    gS


22
;s    izFke    lnu  gS    jpuk   dk
tgka  jt   gt   iq.;   dekrk   gS
ukS   ekl    lekf/k   lqjfr     p<h
uotkr      f’k’kq     ?kj   vkrk    gS

23
gj  tho   dh  xsg    xqQk   ?kj   gS
;ksxh] o/kq  dksd  esa    Hkze.k    djs
fQj   dkeok’kuk      iq#”kksa      dh
o/kq’kkyk o/kq  fey       je.k     djs

24
ta?kk;sa   nks       voyEc         cuh
ru   rLdj    bl   ij  Mksy   jgk
LrEHk    gS      vEcj    vkPNkfnr
Rku   ds   lksUn;Z   dks  [kksy    jgk

                                                                  25
bl dnyh &dUn  ds    Nwus       ls
jksekap   o/kq     gks        tkrh       gS
/keuh  ls   /kMdu  fny  rd   dh
vax&   vax  esa    jxa  tekrh     gS
26

ykykfgr    dj   Li’kZ          gqvk
engks’k      o/kq    gks       tkrh    gS
uj     dks    egkjr     gkfly    gS
o/kq     yiV  Toky   cu  Tkrh    gS
27

o/kq   dk   ‘kjhj    gS        o/kq’kkyk
dSlk     gksxk     jc        erokyk
fdl     Hkko     fi.M  jpk     gksxk
vkufUnr    gS    d.k & d.k  [kkyk
28

;s  xeZ     gqbZ    rks      xyrh    gS
‘khryrk   esa     ty      tkrh    gS
dSlh      ;s     jpuk    jgcj   dh
gj   Qu   esa    ;sa  cy  [kkrh    gS



29

J`f”V ls   o/kq  dk    tue     gqvk
;k     o/kq     us  J`f”V  dks      ikyk
;s    Hkkoksa     dk   vUos”k.k         gS
tks    Lo;a      cksyrh      o/kq’kkyk

30

dqf.Br  iq#”kksa    dh      Hkk”kk    us
ukjh     dks   ujd   cuk      Mkyk
lEiUu  gq;h    gS     vkt       o/kq
[kqn      fy[krh    gS  o/kq  o/kq’kkyk

                                                                 31

o/kq   ckyk  gS   o/kq    ;kSou       gS
o/kq   c`}k     gS   le’khj       cuh
;s    dSlh   txr   dh  tuuh  gS
gj  oDr  dh   ;s  rk’khj      cuh

32

osnsak  us   foLe`fr    esa           ns[ksk
ukjh  dks   fu”dzh;    dj     Mkyk
vieku   esa   ukjh      ds      ns[kks
lc  /keZ  ‘kkL=    Hkh    jp   Mkyk

33

;s  le;  dh   ‘khry    lfjrk  gS
tks    vkt   Hk;adj     gS    Tokyk
e/kq   ls    lc  nqfu;k  eLr  gq;h
o/kq   dh   eLrh     gS       o/kq’kkyk

34

lr;qx  ds    lkjs     xzUFkksa        esa
lc     esa      ukjh    dk  ‘ksk”k.k  Fkk
dkenso      dk      #i            fy;s
ukjh   voyEcu      iks”k.k        Fkk



35

r`Irh      ok’kuk     dk        lk/ku
nsoksa    us   o/kq       dks   cuk  Mkyk
vr`Ir    gqvk   ekuo   tx      esa
vc    <wa<  jgk       o/kq    o/kq’kkyk


36

=srk   esa   lhrk    dk       thou
vaxkjksa   dh   ykS     dk   iFk Fkk
e;kZnk   iq#”k     Jh    jke  cus
lhrk   rks    ek=    euksjFk   Fkk

                                                                 37
                                            ladYi       fd;k     oSnsgh      us
vkn’kZ    jke   gks     J`f”V     esa
tud   lqrk     cqfu;kn     cuh
Li”V   gqvk    tx     n`f”V    esa
38

taxy &  taxy    esa   HkVdk;k
lhrk   lh   o/kq   us   D;k  ik;k
vc   Hkh   lc   jke   iqtkjh  gSa
uk   lhrk   Hkko    g`n;    vk;k
39

vkt     jke      iq#”kksRre   gS
lhMh   lhrk   dks    cuk   Mkyk
lkxj  le  #i   g`n; o/kq  dk
d”Vksa   esa    dkS’ky    o/kq’kkyk
40

}kij esa    nzksinh     dh     ihMk
?kj   dh  o/kq  dk r`”dkj  fd;k
;s   ,ls  le;   dh  ?kVuk    gS
?ku’;ke  Lo;a   Fks  cus   fi;k

41
bfrgkl  xokg   gS     }kij     dk
ukjh    us      ikapks     dks      ikyk
;sk}k  ifr    Hkh   vlgk;      gq;s
o/kq   dh    bTtr   Fkh   o/kq’kkyk

42

dgha   y{eh    gS   dgha     ikoZrh
dgha    cuh     ljLorh   o/kqckyk
lr;qx    =srk     }kij   dfy;qx
ukjh    gS   tx     dh    e`xNkyk
43

uk   tkus   fdruh     lfr;ka     gS
ftlus    e;kZnk     dks         ikyk
vkt       g`n;    vo#}       gqvk
e/kq  &  en    esa   eLr   o/kq’kkyk
                                                                 44

iq#”kska    esa    bUnz     lek;k     gS
jEHkk     lh    lqUnj     ukjh      gS
moZ’kh      esudk        dh      ckrsa
vc  Hkh    bfrgkl  esa  tkjh      gSa

45

ukjh   euksjatu   gS    tx     dk
;s   dkO;  ‘kkL=   esa   jp   Mkyk
vkt  le;   foijhr          gqvk
j.k    p.Mh     gS    o/kq   o/kq’kkyk

46

dfo    Hkr`gfj   dh   jpuk   us
fdruk  ukjh  vieku    fd;k
dkfynkl  us   ukjh            dks
bl   J`f”V   dk  migkj   fn;k

47

nq”;Ur  dks  izse  esa   ukjh    us
jktk   ls  jad   cuk         Mkyk
dkfynkl  dh   jpuk          esa
mRd`”V   cuh   gS       o/kq’kkyk




48

dfo   ukjh  ls   fifMr    gks  rks
dfork fo;ksx  mxyrh         gS
izse   iq”Ik    fodflr  gks     rks
o/kq  ls  gh  dfork  Qyrh    gS

49
                                             dqekj  lEHkoe~     esa      ns[kks
o/kq   dks  J`axkj   cuk     Mkyk
dfo dkyhnkl  dh  jpuk    esa
o/kq  cuh  J`f”Vdk   geI;kyk
                                                               50

ukjh   dk   ;s  dkSek;Z    cnu
curk  J`f”V    lksaUn;Z    iru
dgha  ;kxh  #i   gS  ‘kadj dk
dgha vax&vax jerk  gS enu

51
                                             ;ksx& Hkksx     le#i     ljl
J`f”V us   ,slh      jph     ckyk
;s fo”k;  o`f”V  ukjk;.k     dh
o/kq  ls  curh     gS    o/kq’kkyk
                                                                                                                                      
52
                                             dqN  o/kq  fojks/kh   etgc     gSa
ukjh  fud`”V    cuk         Mkyh
gj ‘kCn  iq#”k  iz/kku        cuk
dSlh  ukjh  dh  Nfo       dkyh

53

ukjh  gS  u’ky &  Qly  jpuk
tks   iq#”k  o`{k dh    gSs    Mkyh
o/kq   us  xqy peu cuk    Mkyk
falapu djrk  gS     uj     ekyh

54

dgrs  gSa     ukjh    csxe       gS
tks  xe  dk  thou  thrh     gS
                                             lgrh   gS  vR;kpkj       fodV
fut   ?kwaV  ygq  dk   ihrh      gS

55

D;k   /keZ  btktr  ugh   nsrk
[kq’k  gks   thou  esa   e/kqckyk
vkt    etgc detksj    gqvk
g`n; fonh.kZ    gS         o/kq’kkyk
56

etgc    esa  ukjh  nQu    gq;h
?awk?kV  esa   thou  vLr     gqvk
fof{kIr ujksa  dh    nqfu;k     esa
laLdkj  J`f”V   ls   iLr   gqvk

57

tagk uwj  tUerk   csxe       ls
xe   ls   csxe  dks  Hkj   Mkyk
vcyk vc  lcyk    cu    cSBh
dSlh     fljdLr        o/kq’kkyk

58

if’pe  us  o/kq  dks   [kksy fn;k
gj  o/kq    cuh    gS       o/kq’kkyk
uj     ij  ukjh   ijHkkoh         gS
J`f”V  esa    ‘ka’k;    dj      Mkyk

59

ogka ek=   Hkksx   gS     o/kq   cuh
thou   esa   efnjk   dk    I;kyk
fof{kIr  cuk   uj    thou    esa
ukjh     gS     eLr       o/kq’kkyk

60

LokyEch  thou     if’pe     dk
Ukkjh   Lo;a        cuk           Mkyk
Oskn    &   ‘kkL=    ls    ofpar     Fks
Ukj   dSls      curk        erokyk



61

ukjh  dks  tuuh    ugh       ekuk
uj  &  ukjh   esa   dksb   Hksn   ugh
je.kh  [kqn  je.k &  Hkze.k   djrh
uj  dks      ukjh   ls    [ksn     ugh

                                                                  62

nksuks  xkMh-     ds      pkd    cus
LoNUn  lkFk    esa      pyrs     gS
Ukkjh  dh  fodflr   {kerk    ls
Lkc  jk”V~z   Lo;a   esa  iyrs      gSa


63

ukjh dk    iw.kZ     euksjFk       gS
uj  v’o   cuk  ukjh   jFk      gS
ru    ls eu  ls  LokrU=    cus
ukjh  dk  er    gh   lriFk    gS

64

if’pe   dh   ukjh  lcyk     gS
fod`r vc Hkksx  dk  Hkko  cuk
tks Lo;  esa   thou  thrk     gS
mldk   thou  uk    ?kko   cuk

65

eu efLr”d  dh   ukjh         us
g`n;  izos’k  vc   dj        Mkyk
;s    le;   pdz         cryk;sxk
oks  ohj     csusxh           o/kq’kkyk

66

fel   eSjh   dk  cqr   ns[k  tjk
bZ’kk  dks  ftlus    tUe    fn;k
;s  peRdkj   gS    ukjh         dk
HkVdh gq;h dkSe dks lue fn;k


67

vkt txr    esa   ukjh        fcuk
dksb  dke  pyrk   &  Qyrk   gS
dkSe  dchyk  jk”Vª            teh
lc   ukjh   ls    gh   pyrk       gS
68

dgh   Hkksx   esa  ukjh  dsk  ns[kks
dgha  ;ksx  czge esa  yhu  cuh
dgha  jpuk J`f”V  dh      djrh
dgha  jk”Vz`ksa  dh  xexhu    cuh

69

,ojsLV  ij      ukjh             dk
dSlk ;s   fot;    irkdk        gS
vc    la?k”kZ      izoh.k         cuh
dSlh   dqnjr dh   vkdk        gS

70

ukjh   uHk esa    mM-ku        Hkjs
dgha rSj  jgh tyf/k   ry    esa
dghs dke  nso  Tokyk  eq[k   gS
dgha  fiz;re  gS  ru ‘khry esa

71

dgha   djrh   dke   djks-Mks   dk
gj   vnk  esa   uj  ?kk;y      gksrk
J`axkj    J`f”V  oj   nku       feyk
gj   dke   izse  dk  iy      gksrk

72

vgadkj     uj    esa                ns[kks
ukjh   LokfHkeku   dh   ewjr      gS
eka]   Hkxuh]  ifRu    esa        ns[kks
ukjh  esa     jc     dh     lwjr      gS



73

fud`”V    ujksa     dh   jpuk       esa
ukjh  D;ksa    uxj    o/kw         gksrh
etcwjh    uke    gS     vcyk    dk
J`f”V    ekuork      ij          jskrh

                                                                74

oS’;ky;     gks    ;k          nsoky;
lksaUn;Z       J`f”V     dk    nsrh     gS
dgha  d#.kk    gS   dgha    r#.kk   gS
Hkkoksa  esa   lcdks      fHkxksrh       gS

75

uj   ds   dkj.k  o/kq   of/kd   cuh
lagkj  J`f”V    dk   dj         Mkyk
foLe;     esa   vkt   lekt  cuk
o/kq   cuh    Hka;dj         o/kq’kkyk
76

efUnj      esa    iwtk    ewjr     dh
o/kq’kkyk   esa      gS     lwjr      dh
efUnj    esa     iRFkj    dh     ewjr
o/kq’kkyk    izse   dh      gS     lwjr

77

;s    ejge  fnyksa    ds    ?kkoksa  dk
g`n;     esa    izse     ds     Hkkoksa dk
VwVs     gq;s    fny      cgykrh     gS
o/kq’kkyk       izse       yqVkrh      gS

78

o/kq    gkyk    gS    e/kq    I;kyk  gS
o/kq     fodjky   lh  tokyk     gs
o/kq     lqdqekj  lh       ckyk    gS
   o/kq  ;kSou   eq[k    ij   rkyk   gS


         

79

dgha      “kM;U=    dk    tkyk gS
dgha  ij   ;s  oru  dh   [kkyk gS
dgha   g`n;  izse   izQqfYyr      gS
dgha   d`ik.k  dgha   Hkkyk        gS

                                                                 80

lg;ksx    ;ksx   e`xNkyk     gS
jtuh  esa  T;ksfr    mtkyk     gS
[kcjksa    esa    fepZ   e’kkyk    gS
dgha  tkyh   gS  dgha  tkyk    gS

81

euskjatu   esa    e/kqckyk       gS
j.k   esa   fodjky   djkyk     gS
lksaUn;Z  J`f”V   dh   tuuh     gS
;s   esjh o/kq   o/qk’kkyk           gS

82

vkj{k.k  djus    okyksa         usa
ukjh  detksj     cuk      Mkyh
LFkku   nwljk       dj      Mkyk
Tku& eu  esa  ckr  lek Mkyh

83

LokfHkeku    n`M     ukjh    dk
n;k    ls   nhu   cuk     Mkyk
jpuk   esa   esjh    fgEer    gS
;s   lcy  Hkko   gS   o/qk’kkyk

84

fyax& Hksn  vc   [kre    gqvk
e/;Lr   dh  dksb  ckr    ugh
foKku   us    Hksn   feVk   Mkyk
uj] ukjh  dh  dksb  tkr  ugh



85

tc   lkjk   dke   cjkcj   dk
vcyk D;ksa  fHkUu   O;oLFkk  gS
tks   n;k  fn[kkrs   ukjh       ij
ukjk;.k   mu  ij    galrk     gS
                                                                86

vkj{k.k  lcyk     dks     nsdj
mldk  cy  {kh.k  cuk    Mkyk
tks  flag  aokfguh     j.k   p.Mh
j.kNksM-  cus   D;ksa    o/kqckyk


87

vkt   iq#”k  detksj      cuk
vkj{k.k   mls      t#jh       gS
iw.kZ   lcy   vc   ukjh       gS
vc   ugh    o/kq  etcwjh     gS

88

fodyakx  cuk   tks  thou    esa
vkj{k.k   mls   t#jh            gS
esjh  rks  dye   bZye   o/kq   gS
o/kq  vkRe’kfDr  gS     o/kq’kkyk

89

e/kq   e/kq’kkyk   gS   Kku    dqat
Jksrk  ftldk   jl   ihrs          gSa
o/kq      o/kq’kkyk   gS       izse  iqat
tgak  czgeHkko  gh   thrs         gS

90

tM    psru  vkSj  czgeak.M   taeh
tx  esa   ;s    J`f”V   f’kokyk     gS
ckgj  ls   izse    dk       HkksxHkkx
                                           varj    esa      izHkq    o/kq’kky      gS



91

o/kq  fnO;  ‘kfDr  gS  vc   tx   esa
eu    efUnj   efLtn    vky;  gSa
;agk  izse   HkfDr   dk  fu;e  ugha
;s   fonzksgh        fo|ky;             gS

                                                                 92

lr;qx        =srk      )kij       ns[kks
ukjh      us      izse       yqVk;k      Fkk
cl     Hksn   ;gh    Fkk   euq”k     ugh
_f”k]     eqfu]  nso     us   ik;k    Fkk

93

o/kq   rks  lfjrk    gS   lkxj      dh
e/kq’kkyk   gS    e/kq     xkxj    dh
o/kq ifFkd   izse  ds   czge  fudV
e/kq’kkyk   e`R;q     vYi     fodV

94

lc   nq[ksak   {k.k    esa       nwj    djs
ekuo &  ekuo   esa    Hksn       ugha
o/kq   g`n;   izse    Hkjiwj         djs
o/kq’kkyk   dks   dksb    [ksn    ugh

95

fQj   Hkh   o/kq  izse    yqVkrh    gS
tu & tu   ds   fny  cgykrh  gS
gj   Qu ds  yksxksa  ds   fny    esa
o/kq  ‘kkyk   izse      txkrh       gS

96

dke  dzks/k    en   yksHk       eksg
fodV  fo”k;   dh   Tokyk       gS
vuqHko   ls  thou    dks     ns[kks
;s      thou    gh   o/kq’kkyk     gS



97

ladYi    fd;k      esjs     fny    us
o/kq   dks   o/kq   dk    LFkku    feys
uk  jk  ;  .k dh  bl  j  p  uk    esa
izse   o`{k       dh       ‘kk[k     fgys

                                                                 98

e/kq    ikBd   gks    o/kq   jpuk    gks
iSx     ls     iSxEcj    >we       mBs
lk  dk  j   cus  o/kq   o  /kq  ‘kk  yk
lksUn;Z    J`f”V  dks     pwe        mBs

99

o/kq  o  ’kq  U/k   jk  cu tk   ;s   xh
uj     ef.k  jRu  d   g  yk  ;s  xk
J`f”V  dk    vfeV    [ktkuk      gS
lksaUn;Z  t  x  r    esa   vk   ;s  xk

100

fQj   u  e  u  djsxh   J`f”V   dks
                                          vk   n    ‘kZ      o/kq       o/kq     gksxh
                                          o/kq’kkyk   ls  o/kq   fu   [k   js    xh
                                          o  /kq  ‘kk  yk    esjh      o/kq     gkxh AA

                                  bfr    o/kq’kkyk    ‘krde~
                                            UUUUUUUUUUUUUUUUUUUUUUUUUUUU