Wednesday, February 4, 2015

               रार का वार
मेरे देश  में  राजनीति   उपहास  हो गयी
झोपड पट्टी अब दिल्ली में खास हो गयी
इस चुनाव में  नंगो  की  अरदास हो गयी
गांधी  तेरी, खादी   इज्जत  नास हो गयी

पूरे  देश के  नेताओं  के अब दिल्ली में डेरे
बीन   बजाते   घूम   रहे  हैं  सभी   संपेरे
देख  रहा  हूं,   राजनीति  में   आज  ठठेरे
ये  धनी  भिखारी  किसके हेैं, ना  तेर, मेरे

इनको  तो  बस, बोट - बैंक से बोट चाहिये
मोदी  के  चरणो   में   थोडी   गोट  चाहिये
जो  विरोध में है ,उसमे  कुछ  खोट चाहिये
मुख्यमन्त्री   बन   जाये, वो  चोट  चाहिये

अब  अच्छे  दिन आने वाले हैं, भूखे  नंगो
क्या  सोच  रहे हो  प्रजातन्त्र के छंगो,पंगो
तुम  चूनाव  के निर्णायक हो, सुनो अपंगो
आज  तुम्हीं  हो सबकी  आशा, अंगो भंगो

कृष्ण, सुदामा  के  चरणों  को  धोने आया
चरण-कमल पर  केवट ने भी शीश नवाया
चाल, चरित्र  और चेहरों  की ये कैसी माया
अन्ना  के   चेलों  को  आपस में  लडवाया

उगते  सूरज  की किरणों में, किरण खडी हैे
ये  राजनीति  का  असमंजस हेै,गले पडी है
पूरे   देश   की   सैना  भी  तो  साथ खडी है
लोकतन्त्र  में  नये   ढंग   की  कील गढी है

सब,  सबकी  औकातें  खुलकर, खोल रहे है
जो  जिसके   मूँह  में  आता  है, बोल  रहे हैं
राजनीति  की  तुला  को   नगे  तोल   रहे हैं
प्रजातन्त्र  के   साँड  सडक   में  डोल  रहे है

टी. वी.  चैनल   आग   लगाने  में माहिर है
ये चौथे स्तम्ब - खम्ब  अब  जग  जाहिर है
चैनल  में  चण्डाल - चौखडी   जुड   जाती हेै
जिसकी   माया, गीत  उसी   के  ये  गाती है

कवि  आग  हूँ , भाग्य  देश  का  देख रहा हॅू
मैं  लाचारी  में   शब्द, सरों  के  फेंक  रहा हूँ
समय  नही  है, मुझ  गरीब को कौन सुनेगा
बीहड   के   डाकू  को  जनमत  मौन  चुनेगा।।
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
              मो0 9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com

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