Thursday, December 31, 2015

गुलामी का अन्जाम
दुर्भाग्य है इस देश का जो अब भी सो रहा है
अपनेा को भूल बैठा दुसराें को रो रहा है
संस्कृति पुरानी अपनी अनजाने खो रहा है
मुर्दा गुलामियत का यह देश ढो रहा है

साहित्य संस्कृति के विद्वान हो रहे हैं
हर वर्ष नवोदय फनकार हो रहे हैं
भारतीयता को मल - मल के धो रहे हैं
प्रारम्भ जनवरी से नव वर्ष हो रहे हैं

स्वतंत्रता के बाद नव वर्ष आ गया है
अनजान थे जो इससे उनको भी भा गया है
रोता है वतन आज अपनी ही भूल से
विंध गया मेरा चमन अपने ही शूल से

क्या चैत्र मास का कभी नव वर्ष आयेगा
क्या संस्कृति का कोइ निष्कर्ष आयेगा
क्या जन की आत्मा से संघर्ष आयेगा
क्या देश प्रेम का कभी स्पर्स आयेगा

मूक होके जीना अब हो गया है धर्म
किस मूंह से कहें हिन्द, अब आ रही है शर्म
जान कर भी बोला जाता नहीं है मर्म
आग लग रही है ओैर हंस रहा है धर्म

राष्ट्र भांषा हिन्दी अब वो भी खो रही है
वतन की आत्मा भिंच भिंच के रो रही है
अभिव्यक्ति भाव भाषा हिन्दी ही बोलती है
परीधी में वृत्त की हिन्दी क्यों डोलती है

आदेश हो रहे हैं हिन्दी में काम कर
साहित्य का तो हो गया ये आखिरी सफर
मुर्दों से क्रान्ती की उम्मीद कर रहे हैं
कवि लेखकों को देखेा बे मौत मर रहे हैं

कर में कलम को कस लो जगा दो देश को
पाष्चात्य संस्कृति के मिटा दो भेष को
बाहर निकालो धर्म के छिपे अखिलेष को
महर्शि पार्णिनि के खोजो अवशेष को

चिन्गारियों में शब्द पतंगों से जल रहे हैं
आदर्श संस्कृति के, भुजंगो से पल रहे हैं
आडम्बरों के भेष में ये राष्ट्र खो रहा है
कवि आग मृत शवों को, ये देश ढो रहा है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

दुर्भाग्य है इस देष  का जो अब भी  सो रहा है
अपनेा   को  भूल  बैठा  दुसरो!  को  रो  रहा है
स!स्कृति   पुरानी  अपनी अनजाने  खो  रहा है
मुर्दा   गुलामियत   का   यह   देष  ढो  रहा है
साहित्य  स!स्कृति  के  विद्वान  हो  रहे हैं
हर   वर्श  नवोदय    फनकार  हो   रहे हैं
भारतीयता  को मल- मल  के धो  रहे हैं
प्रारम्भ जनवरी  से नव  वर्श    हो   रहे हैं
स्वतंत्रता   के  बाद  नव  वर्श  आ   गया है                                                                                         अनजान थे जो इससे उनको भी भा गया है
रोता   है  वतन   आज  अपनी  ही  भूल से
वि!ध  गया  मेरा  चमन  अपने   ही  षूल से
क्या चैत्र मास का कभी  नव वर्श आयेगा
क्या संस्कृति का  कोइ  निश्कर्श  आयेगा
क्या जन  की आत्मा  से  संघर्श  आयेगा
क्या  देष  प्रेम  का  कभी  स्पर्ष  आयेगा
मूक  होके जीना  अब   हो   गया    है  धर्म
किस मूंह से कहे!, हिन्द अब आ रही है  षर्म
जान  कर  भी बोला   जाता   नहीं  है  मर्म
आग  लग  रही  है   और  हंस  रहा  है  धर्म

Wednesday, December 30, 2015

                           नव-वर्ष-2016 
नव - वर्ष  मनाने  से   पहले,  ये   हर्ष  मानाने  से पहले
उत्कर्ष  मनाने    से    पहले ,  आदर्श   दिखाने  से पहले
अपने  दिल के भावों  को, सब  शीश  झुकाकर  तोलो ना
यें भारत है, इस  भारत  को, बस, भारत-माता बोलो ना
हिन्दू, मुस्लिम मीत बने,हर जाति - पाँति नवनीत बने
ये गर्म हवा  अब  शीत  बने,  हर  कौम  कबीले गीत बने
तुुम सन्त,बसन्तसे  डोलो  ना,  द्वार  हृदय  के खोला ना
यें भारत है, इस भारत  को,  बस, भारत- माता बोलो ना
भष्टाचार हटे दिल से,  व्यभिचार  मिटे  इस  महफिल से
ईमान बंटे बस, तिल - तिल से,राष्ट्र  दिखे  हर मंजिल से
भारत  हो  तन  में मन  में, इस  रंग से अंग भिगोलो ना
यें भारत है, इस भारत  को,  बस, भारत- माता बोलो ना
धर्म,  मजहब  के  कूँओं  में,  पाताल   का  पानी  एक रहे
भाण्डो की खडकन बन्द करो, बस,  प्रेम  रवानी  एक रहे
हिन्दू, मुस्लिम,सिक्ख, इसाई हाथ  पकड  कर डोलो ना
यें भारत है, इस भारत  को,  बस, भारत- माता बोलो ना
राम,कृष्ण  की  धरती  में  कुरान   को  इतना प्यार मिले
चमन में कलियाँ ईसा की,  निर्भय  होकर  हर बार खिले
धर्म,मजहब के फूलों में स्वछन्द सी गन्ध को  घोलो ना
यें भारत है,इस भारत  को,  बस,  भारत-माता  बोलो ना
हो चैत्रमास का स्वागत भी,आनन्दित  हो अभ्यागत भी
बस,राष्ट्र- भक्ति  हो  भारत की, आजाद रहे शरणागत भी
कलह,  कष्ट  सब  दूर  करो,  हृदय  में  प्यार  टटोलो ना
यें भारत है, इस भारत को,बस , भारत- माता  बोलो ना
कौम, कबीले, मजहब में,बस,प्यार  की,यार की रीत बहे
हर बोली,  भांषा  आशा  से,  माँ  भारत के ही  गीत कहे
नववर्ष में आग के छन्दो से,जो गन्द मिली वो धोला ना
यें भारत है, इस  भारत  को,बस, भारत - माता बोलो ना।।
                       राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                              मो0 9897399815
                 rajendrakikalam.blogspot.com


Tuesday, December 29, 2015

झोपड की चौपड
मेरे बाप का क्या जाता हैे,वादे कर दो
ये वादे पूरे कब होते हैं, आधे कर दो
मोदी ने जो किये हैं पहले उनको देखो
झोपड पट्टी जाओ अपनी रोटी सेंको

सात दशक से कांग्रेस ने यही किया हेै
चोर, उचक्को ने भारत का खून पिया है
इसी बात का छोटे - मोटे दल खाते हेैं
झूठ,कपट,छल प्रजातन्त्र की औकाते हेैं

झोपड पट्टी राजनीतिक उद्योग खरा है
इतिहास गवाह है,नेता ने ये खेत चरा है
ये नंगे - भूखे राजनीति की हरियाली हेै
इस बंजर खेती के बस, नेता माली है

प्रजातन्त्र झोपड पट्टी से ही जिन्दा हेै
सत्ता पाओ, फिर तो नंगो की निन्दा है
राजनीति की नर्सरीया उत्तम बीजो की
प्रथम पाठशाला है, सरकरी लीजों की

अरविन्द केजरी,मोदी हो या राहुल भैय्या
लालू और मुलायम,ममता,ललिता मैय्या
ये झोपड पट्टी राजनीति को पनपाती है
इस गुरूकुल से नेता की पीढी आती है

केवल नेताओं की भीड जुटाने ये आते हैे
पहले मुफ्त ,अब तो ध्याडी भी पाते है
लोकतन्त्र की बुनियादों के ये पत्थर है
आंखो से ओझल है, जीवन भी बद्तर है

हर नेता नंगो पर टुकडे फेंक रहा है
प्रजातन्त्र को कवि आग ही देख रहा है
भारत में नगा ही सत्ता दिलवाता हेै
वादे करदो, मेरे बाप का क्या जाता है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Monday, December 28, 2015

सियासत के फनकार
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
ये संसद के शंसय नायक भारत की गौरव गााथा है
बडे-बडे फनकार छिपे है खादी कफन लिबाशों में
कफन हटाकर, अरबो-खरबो देखो इनकी लाशों में
स्वीस बैंक के लाकर में भी गिरवी ये भारत माता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै

नंगे-भूखे घर से चलकर राष्ट्र-नियन्ता बन जाते हैं
चोर,उचक्के भी भारत के अब अभियन्ता बन जाते हेैं
खूनी,कतली, कालनिमि भी साधू-सन्ता बन जाते हैं
खुजराहो की गुफा देखकर,सभी अजन्ता बन जाते हैं
राजनीति में साधू, नेता, कच्छे - नाडे का नाता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै

अरब-खरब की सभी योजना,दिल्ली से पैदल आती हेैं
चौराहों में खादी कुर्तो और दल्लो से टकराती हैं
देश के लेखाकार,सी.ए.सब,गुणा-भाग में लग जाते हैं
सदनों में सभी सियासी, गजट,बजट को दिखलाते हैं
आज मीडिया नेताओं की गौरव-गााथा दिखलाता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै

पेट्रोल, डीजल दोनो सस्ते फिर भी मंहगायी जारी है
राजनीति के मन्दिर में साँड भाण्ड ही क्यों भारी है
जरा गरीब से जाकर पूछो, दो - रोटी कैसे खाता हेै
सरकारी स्कूल का बच्चा, केवल राष्ट्र - गीत गाता हेै
राम,बेर भिलनी के खायें, रामभक्त क्या-क्या खाता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै

हम तुम जैसे सोच-सोच कर इसी फिक्र में मरजाते हैं
गीदड, कौवे, चील, भेडिये, लाश हमारी ही खाते हैं
नेता,व्यवसायी,बाबा का स्वीस बैक में क्यों खाता है
प्रजातन्त्र में भिखमंगों का,जनमत सबको पनपाता हेै
देश का पैसा,खुद ही चलकर हर नेता के घर आता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै

हम,तुम जैसे,जाने कितने ,इसी सोच में मरे हुये है
मठ,मन्दिर और नेताओं के,नोट के बोरे भरे हुये हैं
भुखमरी,गरीबी,मंहगायी,हम तुम मिलकर ही झेलेंगे
ना समझी के इस जनमत से, अब तो भडुवे ही खेलेगे
कवि आग की हर पंक्ति में,चोरों की गौरव गाथा हेै
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Sunday, December 27, 2015

दोस्त या गोस्त
इन्दिरा ने भी ऐसा धोखा भिण्डर वाले से खाया है
वही अस्त्र अब पाकिस्तानी सरकारो ने अपनाया है
भस्मासुर को पाला है तो मिटने को तैयार रहो
अगर आदमी बनना है तो प्यार कहो,बस,प्यार कहो

लालन पालन ,सर्प सपोलों का तुमने ही सिखलाया है
भारत मे आतंकवाद भी सरहद से छिपकर आया है
दुसरों की खाई खोदोगे, खुद भी उसमें गिरना होगा
नई पीढी को राजनीति के षडयन्त्रो से मरना होगा

कब से मातम मना रहे हैं अब मिलजुल कर रहना सीखो
अगर पडोसी अच्छे हो तो,कुछ तो अच्छे बनकर दीखो
कोमल कलियां मशल रहे हो राजनीति के जज्बातों से
अब क्यों औलादे काट रहे हो अपने ही कर्कस हाथों से

अभी समय है हाथ बढाओ ,उग्रवाद निपटाना है तो
देर नही है, सोचो समझो, प्रेम - पन्थ में आना है तो
कमजाेरी में अकड के रहना अपने ही घर को खाता है
दुनियां में ना समझी वाला,नजरों से भी गिर जाता हेै

तालीबानी अल्लाह - अल्लाह कह कर ही तो मार रहे हैं
क्या कूरान में छिपे हुये थे,ये भी कुछ हथियार रहे हैं
दुःख होता है एक धर्म है,फिर भी बच्चों को खाता है
किस मूंह से आतंकवाद भी,आयत अल्लाह की गाता है

बच्चे चाहे किसी मजहब के हो,खुद ही अल्लाह होते हैं
खुद अल्लाह को मारने वाले खच्चर बोझा क्यों ढोते हैं
पाकिस्तानी आवामो को मैं छन्दों से समझाता हूँ
जब-जब तुझको दुख होता है,मैं भी दुख से कहराता हूँ

अब ये जेहादी हरकत छोडो, सीमा को सीने से जोडो
पूरातत्व के इन काँटो से कोमल कलियों को मत तोडो
तुम तो मेरे ही हिस्से हो,फिर भी किस्से काट रहे हो
कवि आग की चिन्गारी को क्यों शोलों मे बाँट रहे हो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, December 26, 2015

आप की नाप
राजनीति में जूते खाना और खिलाना आम बात है
पांच खसम की आप पार्टी गौर से देखो अभी अनाथ है
अहंकार की सारी कडियां जुडी हुयी,पर अलग-थलग हैं
काठ की हण्डी फुंकी जा रही,ये तो उसकी एक झलक है

ज्यादा बुद्विमानी होना राजनीति में अभिशाप है
सत्ता और सियासी पञ्चायत में गुण्डा अलग खाप हेै
योगेन्दर,प्रशान्त और गांधी, पुरातत्व अवशेष हो गये
आशूतोष, गोपाल, सिसोदिया चाण्क्यों के भेष हो गये

संजय और,विस्वास आम के झगडे में भी खास हो गये
खेतान सरीखे छोटे - छोटे सारे पप्पू पास हो गये
सढसठ डलहौजी के खोजी, फौजी, रोजी ढूँढ रहे हैं
मठाधीस अरविन्द केजरी, सब चेलो को मूंड रहे हैं

काठ की हण्डी राजनीति के ताप,चाप को झेल रही है
दिल्ली में बच्चो की सैना देख कबडडी खेल रही है
सारा भारत सोच रहा था, सर्कस में कुछ नया खेल है
राजनीति में स्वाभिमान ,सिद्यान्त हमेशा रहा फेल हेै

अब कांग्रेस भी सत्तर साल पुरानी ,मिटटी चाट रही है
सिद्यान्त स्वंय के तीस साल से बी.जे.पी.भी बांट रही है
स.पा.,बा.स.पा,ममता,समता,घुटनो के बल दौड रही है
दो साल की आप पार्टी, स्वांस हांप कर छोड रही है

वैमनस्य की राजनीति में मर कर भी कुछ जीना सीखो
अपनो के ही जूते खाकर,जहर जहन का पीना सीखो
छोटे - मोटे स्वार्थ स्वंय ही अहंकार से गिर जाते है
तेज दौडने वाले शावक ,राजनीति में मर जाते है

इतिहास गवाह है अपना का अपमान हमेशा मरवाता है
पद के मद में हद से कद भी, रद्द होकर जूते खाता है
अपनो के मेहनत के आंशू से बुनियादे हिल जाती है
सच्चायी को कवि आग की कविताएं खुल कर गाती है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, December 25, 2015

राजनीति में धर्म
राजनीति में आज विभीषण होने से ही काम चलेगा
अब हनुमान भी नैतिकता के आदर्शों से नही पलेगा
लंकापति और रामलला में अब त्रेता का बैेर नही है
राम राज और रावण युग में सभी एक है, गैर नही है
रावण की नाभी में विष है अब वो अमृतपान नही है
श्रीलंका भी अलग देश है अब वो हिन्दुस्तान नही है
मेघनाथ के शक्तिबाण में अब वो वैसी धार नही है
सुषैन वैद्य की औषधीयों में भ अब वो उपचार नही है

मन्दोदरीयां अब तलाक तो खुद रावण से मांग रही है,
आज सुलोचना मेघनाथ को भी सूली पर टाग रही है
मारीच सूबाहू अब सोने का मृग बनने से कतराते है
नाक कान कटवाने लक्ष्माण, सूपर्णखा के घर जाते है

सीता माता स्वयं राम को कोर्ट कचहरी दिखा रही है
अश्वमेध की पीडा जंगल में लव-कुश को सीखा रही है
आज राम की अग्नि-परीक्षा लेने की औकात नही है
सुख में तो मुमकिन है लेकिन दुख में सीता साथ नही है

रावण भी तो आज लखन को कूटनीति ही सिखलाता हेै
हनूमान और मकरध्वजो का राजनीति से ही नाता है
मकरध्वज तो हनुमान का डी.एन.ए. खुद बन जाता है
ब्रह्मचारी हनुमान कंहा अब पूत्र - मोह से बचपाता है

अब तुलसी भी शव-साधन से सरिता पार नही करता है
कामातुर भी आसक्ति से ,यती - सती पर नही मरता है
कितने तुलसी, वाल्मीकी की रामायण को झांक रहे हेैं
चरित्र सभी का अपने-अपने मुल्यांकन से आंक रहे हैं

राजनीति ने रामचरित की परिभांषा को अपनाया है
अवधेशों का पता नही है,पर रावण खुलकर आया है
इस कलियुग में अवतारों की राजनीति अभिशाप रही है
कवि आग ने हास्य - व्यग में, होने वाली बात कही है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com