Saturday, January 30, 2016


दोशी कौन?
सात माह का बच्चा पैदा करने वाले
लावारिस जिसको भी चाहे बाप बनाले
उत्तराखण्ड का भ्रूण गर्भ में चिल्लाता है
राजनीति,का भूत शिशू को क्यों खाता है

लावारिस के वारिस देखो , चौराहों पर
अधमरे शिशू को सभी, समेटे हैं बाॅंहो पर
स्वीटजर- लैंड बनाने के सपने देखें है
राजनीति ने ये कैसे पासे फेके हैं

राजनीति में अफरा - तफरी कैसे आयी
काट रहे हैं बकरे देखो खटिक कसाई
केन्द्र - समर्पित होता तो नेता ही मरते
सडक छाप क्यों उत्तराखण्ड मे आज पसरते

फिर कौन खोदता भ्रष्टाचारों की ये खाई
लोक - पाल की क्या जरूरत थी मेरे भाई
राजनीति विस्तार स्वयं का ही करती है
नई पीढी तो बिना मौत के ही मरती है

अब तो मरने वाले भी क्या सोच रहे हैं
अपने कफन से अपने आॅशू पोंछ रहे हैं
चौराहों पर प्रतिमायें भी चिल्लाती हैं
असुरों की ,इस देव भूमि में, क्यों ख्याति है

जो मरे राज्य के खातिर दर-दर भटक रहे हैं
सभी विरोधी सत्ता कैसे सटक रहे हैं
बलात्कार की कीमत नेता बाॅंट रहे हैं
उत्तराखण्ड की इज्जत घर-घर छाॅट रहे हैं

गाॅंव बसाने से पहले भिखमंगे छाये
पिता बडोनी अपने पुत्रो से शर्माये
ना समझी के संघर्षों ने राज बनाया
देव-भूमि को , दिल्ली वालो ने ही खाया

मूॅंछों का अस्तित्व दाॅंव पर लग जाता है
बिना मूॅंछ का आॅंख मूंद कर क्यों खाता है
पढे़- लिखे भी धूल सडक की फाॅंक रहे हैं
सेवा से निवृत्त चाकरी झाॅंक रहे हैं

उत्तराखण्ड में सन्यासी की ,कैसी मस्ती
सभी विरक्ति बसा रहे हैं अपनी बस्ती
राजनीति में आने को तैयार खडे हैं
देव-भूमि में, काले-धन के अलग धडे़ है

नेताओं के फारम हाउस बन जाते हैं
जाॅंच कराओ ,कंहा से ये पैसे आते हैं
सारी माया परिवारों में बंटी पढी है
नई पीढी क्यो चौराहों पर आज खडी है

नेता जी भी वेतन भत्ता मांग रहे हैं
सेवाओं की सारी शर्तों को लांघ रहे हैं
भीख मांग कर जनता से जनता को खाया
उत्तराखण्ड बना कर हमने ये क्या पाया

लोकपाल की बात सदन में करने वालों
मास, मदिरा खाओ, उत्तरा - खण्ड पचालो
क्या इन सबके बच्चे भी भूखे सोते हैं
असुर आज अस्तित्व शिखर का क्यो खोते हैं

उत्तराखण्ड मे भू - माफिया ही भारी हैं
तहसीलों में फर्जी बे - नामा जारी है
बाबाओं की लीजें नेता कटवाता है
भिखमंगा, भिखमंगो का कैसा भ्राता है

यही सार है, नंगा , उत्तरा - खण्ड खडा है
चोर - उचक्का नैतिक - वादी , आज बडा है
कालीदास ने सदा ही शाखाओं को काटा
उत्तराखण्ड को उत्तराखण्ड वालों ने बाॅंटा

गंगा का जल झीलों में क्यों रूका हुआ हेै
क्यों भारत का भाल, शर्म से झुका हुआ है
राजनीति का, क्या इस पर चिन्तन होता है
ये शिखर सदा से मुर्देां को ही क्यों ढोता है

समय आ गया जागो, उत्तराखण्ड बचाओ
पानी और जवानी अब ना और बहाओ
नई पीढी क्यों भटक रही दाने - दाने को
उत्तराखण्ड मोहताज खडा इज्जत पाने को ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, January 29, 2016

गैर - सैण
वाह रे उत्तराखण्ड तेरी ये किस्मत न्यारी
पहुंच गये है गैर - सैण में सभी जुॅवारी
राजनीति की चीलें उतरी धरा में आयी
ढूॅढ रहा है पर्वत अपनी पीर परायी

क्या राजधानीयों से ये,पर्वत सुधर जायेगा
अब गैरसैण का मुद्दा,देखो किधर जायेगा
शैशवता के बाद ,उठी कैसी तरूणायी
शोला बन कर चिन्गारी पर्वत में छायी

बी. जे. पी. अब गाली देकर कोस रही है
यू. के. डी. इस मुद्दे से अफसोस रही है
थर्ड - फ्रंट स्टंट किसी के काम ना आये
अपने भी दिखते है हमको आज पराये

पक्षो और विपक्षों का हल्ला जारी है
हर विकास पर राजनीति ही क्यों भारी है
इस जनमत से मुद्दों को कब तक ढोओगे
उत्तराखंड की इज्जत को कितना खोओगे

अब गैरसैण पर्वत प्रदेश का मध्य भाग है
ये ग्लेशियर भी राजनीति में छिपी आग है
मैं तो ज्वालामुखी धधकता देख रहा हूॅं
दावानल की ताप अभी से सेंक रहा हूॅं

नवजात शिशू पर अब कितना बोझा डालोगे
क्या मुंगेरी के सपनो से जन-मत पालोगे
दशकों का ये अश्क हमें क्याें छला रहा हैें
ये कवि आग है बुझी राख को जला रहा हैे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Wednesday, January 27, 2016

मातृ देवो भवः
भारत के मन्दिर, मस्जिद में नारी का प्रवेश नही है
भारत माता,मातृशक्ति का अब ये भारत देश नही है
मातृशक्ति को अपने मन्दिर, मस्जिद नये बनाने होगे
पुरूषों से हट कर नारी को नये मजहब अपनाने होगें

प्रकोप धर्म पर शनि का मन्दिर,शैनै-शैने दिखा रहा है
नारी का अपमान धर्म की दिशा बदलना सिखा रहा है
सरस्वति, लक्ष्मी, उमा से धर्मो की बुनियाद पडी है
सीता, सावित्री, द्रोपदी क्यो सडकों पर लाचार खडी है

आज पुरूष प्रधान देश में, नारी का अपमान देश में
बलात्कार शमशान देश में, ये कैसी पहचान देश में
अन्धे लूले, लंगडे, बहरे, देश की सत्ता चला रहे है
सीता और सावित्री, चौराहों पर जिन्दा जला रहे हैं

मजबूरी में यति,सती भी विचलित कभी नही होती है
मातृशक्ति है भारत की जो इज्जत कभी नही खोती है
मानवता क्यों काम-वाशना के कारण गिरती जाती है
सत्युग,त्रेता,द्वापर युग की, खेती अय्यासी खाती है

बन्दर के हाथों में चाकू, बलात्कार ही करवाता है
पाश्चात्य की मदर इण्डिया, हिन्दू की भारत माता है
पूरा-तत्व की शिक्षा,दीक्षा पुनः धरा में लानी होगी
कामवाशना की दुनिया में, फिर से आग लगानी होगी

पढे लिखे संभ्रान्त वाशना के कीडे़ क्यों पनपाते हो
मेरे उद्यानों की कलियों को गलियों में क्यों खाते हो
जन्म-दायिनी बालायें भी अभिशापों में क्यों जीती हैं
जिसको हमने शक्ति माना उसकी ये क्या परिणीति है

नर को पैदा करने वाली, नारी अब उपहास नही है
भारत में तो धर्म-कर्म बिन नारी के कुछ खास नही है
अर्धांगिनी माना है जिसको, उसको क्यों तरसाते हो
क्यों सतित्व से मन्दिर, मस्जिद में ये आग लगाते हो

संविधान के अनुच्छेदों में परिवर्तन को लाना होगा
नारी को भी संस्कारों का रहन, सहन अपनाना होगा
संस्कारी परिधान निमन्त्रण,भोग विलासी बनजाता है
कविताओ से कवि ‘आग ’का छंद हमेशा समझाता है!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Wednesday, January 20, 2016

धर्म का मर्म
अल्लाह ,ईश्वर , ईशा, मूसा मजहब कंहा बनाते है
ब्रह्मा ,विष्णु, शिव, लम्बोदर दुनियां में कब आते हैं
राम,कृष्ण,महावीर,बुद्व ने केवल अपनी बात कही है
राधास्वामी,निरंकार,सिक्ख सम्प्रदाय भी सभी सही है

दुर्गा, लक्ष्मी, और शारदा चौराहों पर भटक रही है
सुन्दर नारी काम वाशना की नजरों में खटक रही है
ज्ञानी,ध्यानी इन्द्र देव सब कामुक हो कर घूम रहे है
उर्वशी, मेनका, रम्भाओं की छााती में सब झूम रहे है

वेद,पुराण,गीता ,रामायण दुनियां भर में बांच रहे हैं
प्रवक्ता तोतो को सुनकर, अन्ध भक्त सब नाच रहे हैं
इस कलियुग में धर्म का धन्धा केवल बापू पनपाते हैं
धर्म के पण्डित व्यवसायी सब ,धर्मो से रोटी खाते है

चौराहों पर धर्म - कर्म के वक्ताओं की हाट लगी है
प्रेम अहिंसा गौण हो गयी ,बस पापों की बाट लगी है
परम्परा पर चलने वाले, ज्यादा हिंसा फैलाते हैं
डाकू, चोर, लुटेरे भी अब गीत धर्म के ही गाते हैं

आतंकवाद भी धर्म-कर्म की इस रूढी में बसा हुआ है
विपरीत धर्म का देख शिकंजा,आपस में ही कसा हुआ है
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख ,इसाई, प्रतिद्वन्द्वी को काट रहे हैं
धर्म-गुरू सब मिलकर मानव को डबरो में बाट रहे हैं

धर्म ,धरा से निपट गया है, अब केवल बातें होती हैं
ज्ञान-ध्यान की इस धरती में क्यों केवल घाते होती हैं
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई, कौम कबीले दूर करो
एक जाति हो मानवता बस, मानवता भरपूर भरो

ईश्वर,अल्लाह सभी एक है पञ्चतत्व का भेद नही है
अन्ध-भक्त के अपशब्दो का मुझको कोई खेद नही है
अब कोई ऐसा धर्म बने , बस मानवता निर्माण करो
कवि आग कहता है, धरती मां का कुछ कल्याण करो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com 

खाक में पाक
अगर सांप को पालोगे तो जहर जहन में भरना होगा
जिस दरिया में विष घोला है उस दरिया में बहना होगा
घर में ही आतंक पला है दहशत की कोई जात नही है
कांटे बोकर कांटे पाओ अल्लाह ने यही बात कही है

दहशतगर्द दरिन्दो को तो तुम शदियो से झेल रहे हो
इन परहीन परिन्दो से तुम सत्ता में भी खेल रहे हो
क्यों कूरान के लब्जो को, इन कब्जो में ढाल रहे हो
सर्प-संपोले काट रहे है, फिर भी उनको पाल रहे हो

घर-घर ताण्डव मचा हुआ है शहर,गांव,बाजारों में
क्या भविष्य तुम देख रह हो, इन खूनी औजारों में
इन मौतों से सबक सीख लो देश बचाना चाहते हो
क्यों कूरान की आयत को तुम अपने ढंग से गाते हो

भारत की हिंसाओ का भी प्रमाण नजर नही आता है
अब जो सबूत हम भेज रहे हैं , उनको तू झुठलाता है
कितना नाटक और चलेगा कब्रिस्तान बनाने को
ये तेरी फौजें क्यों तत्पर है आतंकी पनपाने को

अभी समय है सोचो,समझो मिलकर के उपचार करो
हिन्दू,मुस्लिम एक बनो फिर से आपस में प्यार करो
शमशान शवों के मरघट से घर का श्रृंगार नही होता
इस बुझी आग के शबनम से शोला अंगार नही होता

दहशतगर्द दरिन्दो का मजहब से प्यार नही होता
मुर्दा नमाज के पढने से कुछ जीवन सार नही होता
बस,एक लक्ष्य हो सत्ता का, ढूंढो दरवेष दरिन्दो को
कवि आग का फतवा है पकडो परहीन परिन्दो को।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
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Tuesday, January 19, 2016

आरक्षण या हत्या
युगों युगों की इन भूलों से हम हरिजन को बचा ना पाये
वर्ण-व्यवस्था के विकार के इस जहर को पचा ना पाये
ठाकुर,पण्डित,वैष्य,शुद्र से ही तुम खुद को काट रहे हो
हिन्दू-हिन्दू कहने वालों क्यों हिन्दू को बांट रहे हो

भेद-भाव की यही व्यवस्था विद्यालय में दौड रही है
आविष्कारी वर्ण - व्यवस्था में शदियों से होड रही है
आरक्षण के मतभेदो के कारण पीढी क्यों मरती है
टूट रही है तरू से कलियां,राजनीति क्या-क्या करती है

जिनको शदियों से कुचला है,कुछ तो मान बढाना होगा
इस राजनीति से उपर उठकर ये परवान चढाना होगा
सभी सियासी बोट-बैंक से कब तक इन पर राज करेंगे
जनमत संग्रह की भांषा से,क्या ये पिछडे नाज करेंगे

कानूनो के बन जाने से जन उपकार नही होता है
वैश्या के साैन्दर्य - करण से भी श्रृंगार नही होता है
जो समाज में दबा हुआ हेै, उसको आगे लाना होगा
आरक्षण के विषम अस्त्र का सही ढंग अपनाना होगा

आरक्षित सम्पन्न जातियां लाभ अभी भी उठा रही हैं
अपनी ही पीढी को कौमे, चौराहों पर लुटा रही है
आरक्षण का लाभ उठाकर, इस पीरधी से हटना होगा
हर पिछडे की पात्र-कुशलता पर आरक्षण बंटना होगा

प्रतिभाओं को राजनीति की चक्की में कितना पीसोगे
प्रतिमाओं को चमकाने के चक्कर में कितना घीसोगे
आरक्षण की परिभांषा पर फिर से चिन्तन करना होगा
कवि आग वंचित वर्णो में भी आरक्षण भरना होगा।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
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Monday, January 18, 2016

धर्म के कर्म
मुस्लिम देशों में ही मुस्लिम,मिलकर मुस्लिम काट रहे हैं
पीर मुहम्मद की कुरान को, क्यों मुस्लिम ही बाट रहे हैं
मस्जिद में भी बम,विस्फोटो को ही मुस्लिम डाल रहे हैं
एक मजहब में कंही बन्दगी , कंही दरिन्दे पाल रहे हैं

ईशा,मूसा, पीर मुहम्मद में रंजिस की आग लगी है
धर्म, मजहब की थोथी बातों में कैसी जेहाद जगी है
सारे ठेकेदार धर्म के अमन - चैन फरियाद करेंगे
मानवता को मार रहे हैं, फिर अल्लाह को याद करेंगे

यही बीमारी हिन्दू-धर्मो में भी खुल कर पसर रही है
धर्मो की इस परम्परा में कुछ ना कुछ तो कसर रही है
राम कृष्ण,महावीर,बुद्व को पढकर भी हम भटक रहे हैं
सम्प्रदाय क्यों अजगर बनकर,मानवता को घटक रहे हैं

शान्ती-दूत के परिणेता भी रण-भेरी को जगा रहे हैं
बडे राष्ट्र भी विस्फोटों को इसी काम में लगा रहे है
सब देशं में मानवता की मौतों का सामान भरा है
बात अमन की करने वालों का कैसा मरूधान हरा है

मन्दिर,मस्जिद,चर्चों में तो धर्म-गुरू की लाश पडी है
दुनिया को शमशान बनाने में गुरूओं की खास कडी है
अपने-अपने पैगम्बर की बातों में ही फेल हो गये
भीडों में विस्फोट कराना, ये गुरूओं के खेल हो गये

हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख इसाई में केवल मानव मरता है
पढे-लिखे इन्शान को देखो, मरते-मरते क्या करता है
क्या यही धर्म है मानवता को इस धरती से दूर करो
कवि आग की मानो इन धर्मों को चकनाचूर करो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
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