Monday, June 29, 2015

                      वोट की खोट
हम भारत के गण नायक है राजनीति अभिशाप नही है
चोर  चकारों  की  पञ्चायत, चैपालों  की  खाप  नही है
खादी  कुर्ते, कफन   लिबासों   वाले   चौकीदार  नही हैं
वतन लूट कर  खाने  वाले  डाकू  और   गददार नही हैं

भीख मतो की हर खप्पर में,सात  दशक से डाल रहे हैं
असमंजस होता है हमको, क्यों  हम  डाकू  पाल रहे हैं
अच्छे-अच्छे शब्द सलौने,सुन  कर पागल बन जाते हैं
प्रजातन्त्र की  खेती, शब्दो  के  सौदागर  क्यो  खाते हैं

राष्ट्र-द्रोह  के  अभिशापों  से,कौन  सा नेता कंहा बचा हेै
जो भी सत्ता  में  आता  है  उसने  ही  इतिहास  रचा हेै
उनके  पग  चिह्नो  पर  चलने  वाले  चोरों  को भाते हैं
झण्डा  उँचा   रहे   हमारा   गीत   डाकुओं  के  गाते है

राजनीति के किसी भी दल का नंगा नेता  मुझे बतादो
करे  राष्ट्र  की  सेवा दिल से उस नेता का मुझे पता दो
वेतन,  भत्ते,  घूस,  लूटेरी,   पेन्शन   मुर्दे  चाट रहे हैं
जाति कौम,कबीले,मजहब ये जनमत  को  बाँट रहे हैं

हिन्दू,मुस्लिम ,सिक्ख, इसाई के ये सारे बाप हो गये
हम देश के मालिक है,हम भारत में अभिशाप हो गये
पांच  साल  में  डाकू  अपने  बीहड  ही  तो पाल रहे हैं
सात  दशक  से  भ्रष्टाचारी  भारत  को   खगाल  रहे हैं

कोई  ऐसी  जगह  बतादो  व्यभिचार  से  मुक्त पडी हो
कोई ऐसी  जगह  बतादो, नजर से  इनकी,लुप्त पडी हो
गिद्व दृष्टि आकाश मार्ग से,बस भारत  को झाँक रही है
डेढ अरब के मुर्दो में  भी  सडी  लाश  को  आँक रही है

कब तक  इन  मुर्दो  के  हाथों  से यू ही मरते जाओगे
बोट बैंक की राजनीति से भारत  को  कितना खाओगे
नही चाहिये  लोकतन्त्र  अब  वोट  डालना  बन्द करो
कवि  आग  की  मानो, पहले  नेता  का  प्रबन्ध करो
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         मौन में कौन
अपना  मोदी  मौन  खडा  है  लन्दन  वाला  बोल  रहा है
नमो मन्त्र की माला जपकर,नयेनये  चन्दन घोल रहा है
सुषमा  के भी स्वर गायब हैे,अरूण जेतली  गोल हो गये
शब्दो  के  सौदागर  सारे, ललित  कला  के  घोल हो गये

एक  ही  तोता  बचा  हुआ  हेेै,हर चैनल पर  चिल्लाता है
वो  बेचारा   मजबूरी   में,  रटे  शास्त्र  रट   कर  गाता है
हाँप  रहा   है   काँप  रहा  है, वार  सियासी   झेल रहा है
राजनीति  के  कू - कर्मो  से  गिरते - पडते   खेल रहा है

भीष्म पितामह,कृपा,द्रोण भी,अनुभव के सर छोड रहे हैं
चकव्यूह में फंसे,धंसे  सब, प्रारब्ध  शब्द से  तोड रहे हैं
अर्जुन  का  गाण्डीव  शिथिल हेै,शब्द भेद के ही बाणो से
यंहा  युद्व  याेद्वाओं से कम,रण लूले,लंगडे,और काणो से

घर  के  शकुनि  खेल  रहे  हैं  चौपड, सत्ता   के  पाशों से
मिलकर  हल  सब  ढूंढ  रहे  हैं, कांग्रेस  के इतिहासो से
भ्रष्टाचारी  कबर  के   मुर्दे,  ढूंढ - ढूंढ  कर   खोद  रहे  हैं
प्रजातन्त्र  के  खलियानो  में  अपने  ही  हल जोत रहे हैं

सत्यवती, गान्धारी, द्रोपदी, सत्ता का  सुख  भोग रही है
लालायित  सी  मौन  अदाओं  से इच्छा  को रोक रही हेै
भारी  भरकम  काया  लेकर, घटोत्कक्ष  भी  घूम रहा है
राजनीति  के  कूरूक्षेत्र में,हर प्रश्न  यक्ष  सा  झूम रहा हेै

सारी जनता लालायित है पी.एम.स्वर  संगम सुनने को
सच्चायीे के सत्य असत्य के शब्द अभंगम के चुनने को
बाणी-भूषण रण में  कूदो, कुछ  तो   क्रिया   कलाप करो
या  तो  करो  विरोधी   मर्दन,   या   फिर  पश्चाताप करो

चुप रहने से व्यभिचार को मौन  स्वीकृति  मिल जाती है
चाल,चरित्र और चेहरों की बुनियाद स्वंय ही हिल जाती हेै
ये  प्रजातन्त्र  की  सत्ता  तेरे  शब्दो  के  कारण  जिन्दा हेै
मेरे  मत  की  किमत  भी  तो  मौन  खडी है,शर्मिन्दा है

दुर्भाग्य  है,  प्रजातन्त्र   को   एक   भगोडा   काट  रहा हेै
सम्पभुता  की  राजनीति  को  अपने  ढंग  से बाँट रहा हेै
कुछ ना कुछ तो गड बड है जो सत्ता भी  भयभीत खडी है
कवि आग ये  घटना  छोटी  दिखती  है, पर बहुत बडी है।।
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Sunday, June 28, 2015

                         मन की बात
मन की  बाते  बोल  रहे  हो  कुछ  तो  जन की बाते बोलो
चुप रहना  अब  ठीक नही हेै,भैया थोडा  तो मूँह को खोलो
लालकृष्ण  और  गोविन्दा  भी  मन  की  बाते बोल रहे हैं
राजनीति की शल्य चिकित्सा,सब चिन्तन से खोल रहे हैं

आडवानी  ने  बी. जे. पी. को  खून  पिलाकर  के  पाला है
आर.एस.एस और शिवसैना को  परिवर्तित करके ढाला है
छोटे  -  मोटे   धर्म   दलो   के  संयोगो  से  आज  खडे हो
बूढों   के   आगे   लगता  है   आज  देश  में  तुम्ही बडे हो

जिसने तुम को हाथ पकड कर चलना ढलना सिखलाया है
राष्ट्र-धर्म  का  गीत  अटल  ने, गली-गली,घर-घर  गाया है
उनकी  बुनियादों  के  उपर  बी. जे. पी. का  भवन  खडा है
असमंजस   होता  है  मुझको   ये    कैसा   विरीत  धडा है

ललित मोदी  अब  राजनीति  की बुनियादों को खोद रहा है
राजनीति  के  खंजर  से  ही  सत्ता - दल  को   गोद  रहा है
गन्दी  परम्पराओ  से  तो   राष्ट्र - धर्म   भी   मर  जायेगा
राजनीति  का  कोई  दल  हो जनमत को क्या समझायेगा

ये  फोडा  नासूर  बने  ना ,उपचार  समय  से  हो  जाने दो
लिप्त  दोष  में  जो - जो  भी  हों, कुर्सि  जाये  तो   जाने दो
आने वाला समय कठिन  है  जनता  को  क्या समझाओगे
सारे   नेता  फँसे  पडे   है  किस - किस  का  गाना गाओगे

इस   कीडे   को   काँग्रेस   ने ,अपने   ढंग   से  पनपाया है
ज्यादा   चरित्रवान   लोगों  ने  गन्द  सियासत  में खाया है
अपने  और  पराये  जो  भी  है, उन  सब  को  नंगा  कर दो
लम्बी  राजनीति  चाहते  हो, समय  से  पहले पंगा  कर दो

सारी  जनता   लालाहित  है  इस   निर्णय   की  लाचारी में
कौन  कहा  तक  सहयोगी  है, ललित  कला के व्यापारी में
राजनीति  का  कोई  दल  हो ,गरिमा   भारत  की   खोती हेै
नालायक   पुत्रों   के   कारण,  भारत   माता   क्यों  रोती है

तर्क - कूतर्क  से  तोड-मरोड  कर , घी  आग में डाल रहे हो
जनता भी  ये  समझ  रही  है, तुम  डाकू  को  पाल  रहे हो
मेरा  चिन्तन ये  कहता  है समय  आ गया खुल कर बोलो
कवि आग  की  कविता  सुनलो,मन की बातो से मूँह खोलो।।
                   राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                          9897399815
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Saturday, June 27, 2015


                    दुर्भाग्य का सौभाग्य
एक  आदमी  लंदन  बैठा  सबके  मूँह  पर  थूक रहा है
ये  भारत  का  प्रजातन्त्र   हैे  जूते  खाकर   चूक रहा है
कानूनो के दाव - पेंच  और  मतभेदो  में  झगड  रहे हो
कांग्रेस, बी .जे. पी , मिलकर  मर्यादा  को  रगड रहे हो

एसा नेता  मुझे बताओ जो मोदी  से  अनजान  रहा हो
सत्ता में  भी कौन बचा  है  जो  माल  ना  छान  रहा हो
पहले  वालों  ने  भी  खाया  अब   वाले  भी  लूट रहे हेैं
अजगर हम ही पाल  रहे,जो  माल  श्वांस  से घूंट रहे हैं

जिनको जनता  ने  नकारा, वो  भी  मंत्री  बन  जाते हैं
अर्जी-फर्जी  शपत - पत्र  से,शपत राष्ट्र की  क्यों खाते हैं
कांग्रेस  हो  बी. जे. पी .हो  आओ  जनता  पंगा कर दो
अगर सपूत  हो  भारत माँ  के  चौराहों पर नंगा कर दो

ऐसा कर दो ये  भविष्य में फिर चुनाव  ना  लडने पायें
प्रजातन्त्र  में अय्यासी  के   कीडे  फिर  ना  पडने पायें
चोरों को  प्रमाणित  करने  वालो  के  भी  मूँह पर थूको
समय आ गया भारत  वालों, जूते  मारो अब मत चूको

दुनिया भर में  इनके  कारण  हम  बदनामी  झेल रहे हैं
हम भारत के जिन्दे  मालिक ,मुर्दे  हम  से  खेल रहे हैं
हम हनुमान है,अपनी ताकत शापित हो कर भूल गये हैं
इसिलिये  तो  सभी  निशाचर,व्यभिचार  से फूल गये है

चोर, उचक्का, डाकू  जिनको  सारी  दुनिया मान  रही है
मेरे  देश  में  उन  चोरों   की   नश्लें  सीना  तान  रही है
दुखः  होता  है  जनता  की  आँखो में राजनीति चस्मे हैेंं
यही कारण  है  प्रजातन्त्र  में  भष्टाचार  जनित र स्मे हैं

दुर्भागय   है,  मेरी   कविता  राजनीति  से  जोड  रहे हो
बिना  पढे  ही  कविताओ  के  छन्द, द्वन्द से तोड रहे हो
राजनीति  के  चस्मे  वालों   मेरी   कविता पढनी  छोडो
मेरा  कोई  शौक  नही  है  मुझको  राजनीति से ना जोडो

मेरी  तो  बस  यही  साधना, जागो जनता अब तो जागो
भारत  माँ  के  आँशू   पोंछो, चोरों   के  पीछे  मत भागो
राष्ट्र-द्रोह ,र्निलज्ज  डाकूओं  के  मूँह  पर  मैं नही थूकता
मैं कवि आग हूँ सच्चायी  को  लिखने में भी नही चूकता।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
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Friday, June 26, 2015

                       तर्क में नर्क
प्रजातन्त्र  में  फुल्लन  देवी लोकसभा  चुनकर आती है
राज्यसभा  को  फिल्मी नथनी ,नाच  नचैया ही भाती हैं
छविराम, मलखान, शेरसिंह, नेता  जी  के सब साथी है
अब लोकतन्त्र  के  हालातो  से  भारत माँ भी शर्माती है

ललित मोदी लन्दन में बैठा,कालिख मूँह में पोत रहा है
मेरे  देश  का  सासन  बंजर  धरती में हल  जोत रहा है
अपने  बीहड   की  रखवाली  में  सब  नेता लगे  हुये हैं
प्रजातन्त्र  जनमत  सोया  है, बस, नेता ही जगे  हुये हैं

चोर - चोर  होता  है भैय्या,कब तक तुम इन्कार करोगे
कोई  ना  काई  पकडेगा  कब  तक  उससे  प्यार करोगे
किसी  के पारिवारिक बन्धन ,कोई मानवता  दिखलाये
संविधान  की  धाराओं  से, ललित मोदी  के  गाने गायें

झूठ बोल कर संविधान की कसमों को  कब तक तोडोगे
सारे धागे  उलझ  रहे  हैं ,सुलझा कर  कब  तक जोडोगे
वाणी-भूषण तर्क विशारद, उछल  उछल कर भोैंक रहे है
नये -नये  निर्णय  से  सारे  बुद्वि - बल्लभ  चौंक  रहे है

बडा  अचम्भा  सिंह  मौन  है  इस  जंगल  के चैबारे में
ललित कला ही पनप रही है राजनीति  के  अंधियारे में
सारे अन्धे, नैनसुखों  की  धूल  आखँ  में  झोंक  रहे हैं
मोदी  भैय्या  लन्दन  बैठे  दाल  सियासी   छोंक रहे हैं

राम,कृष्ण  की  धरती  नेताओं  के  कारण  शर्मिन्दा है
सत्य न्याय का हथियारा,अन्याय अभी  तक जिन्दा है
धर्म  के  ठेकेदार  बने  हैं, सब की  आँखे  फुटी  हुयी हैं
धृष्ठराष्ट्र  की  औलादें  बस  तर्क  शास्त्र  में  जुटी हुयी हैं

राजनीति  का  कोई दल हो छल कपटों से  भरा हुआ है
संविधान जिन्दा  था ,नेताओं  के  कारण   मरा हुआ है
अब तो मैं भी सोच रहा हूं कब तक मैं  लिखता जाउँगा
जब तक दिल में आग लगी है चिन्गारी तो सुलगाउँगा।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
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Thursday, June 25, 2015

               परिणाम शुन्य घटना
ललित  मोदी  ही  कांग्रेस  की  पूरी  पोले  अब  खोलेगा
पी.एम, मोदी तर्क  छाँट  कर  धीरे - धीरे  अब   बोलेगा
ललित मोदी  की  गोद  में बैठे दोनो दल  ही  हाँप रहे है
कंहा -  कंहा   डाके   डाले  हैं  इसके   डर से  काँप रहे है

परिणाम शून्य होगा आखिर  मेें  भष्टाचारी  कू-कर्मो का
प्रजातन्त्र  में राज  रहा है , गुण्डो  का  और  बे-शर्मो का
अब दोनो  दल  ही  फँसे  पडे  है ,चोर - चोर मौसेरे भाई
लोकतन्त्र ,लावारिस  जनता  बनती  है सबकी भौजायी

माल  कमाने  वाले   माहिर  नेता  ये  सब  खेल  रहे हैं
हम तो  बस, अम्बानी, मोदी, टाटा, बिडला  झेल  रहे हैं
चिल्लाकर चैनल भी हारे,सुनकर  जनता शान्त हो गयी
सुषमा,शुक्ला,वषुन्धरा भी जनता में सम्भ्रान्त हो गयी

सात  दशक  से सबने  लूटा, नेता  ने  जनमत को कूटा
शब्दो  के  सौदागर  देखे, जो  कुछ बोला सब  कुछ झूठा
बोट  डालना  मजबूरी   है, डालो   और  डाकू  को  पालो
हाड,मांस ही शेष बचे हेैं, आओ  मिलकर ये  भी   खालो

मंहगायी  और  भ्रष्टाचारी  मध्य - वर्ग  को  चाट गयी है
मजदूर,किसान,गरीबों को तो सत्ता कब की  काट गयी है
भारत  को  तो  केवल  शब्दो  के  आश्वासन  पाल रहे हैं
सब डाकू, चोर,  लुटेरे  माया  अपने  घर  में  डाल रहे हैं

जाने  कितने  ललित  मोदी है राजनीति के सहवासो में
आई.पी.एल में देख लिया है, चोरों की  गिनती खासो में
सब की फोटो  खींची  हुयी  है, इस  डाकू   के संरक्षण में
सभी विरोधी  साथ-साथ  है,भारत  की   माया भक्षण में

सारे  डाकू  चरित्रवान  हैं,  न्यायालय   के   उदघोषो  में
सबकी  नजरें  टिकी  हुयी हैं, बस,माया के  ही कोषो  में
प्रजातन्त्र  में जनता  हारी, राजनीति   की   ही बलिहारी
कवि आग अब गोण हो गया असल  आग  सत्ता मे नारी।।
                 राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
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                     चार-लाचार
कितने सुन्दर  नाम  तुम्हारे, कर्मो से लाचार हो गयी
पहले चर्चा  में  दो  ही  थी,अब  चर्चा  में चार हो गयी
दो मोदी  पर  महरबान है, दो  मोदी  की  कदरदान हेै
अब तो  ये चारों  मातायें  भारत माँ  की लुटि शान है

अर्जी  डीग्री, फर्जी  डीग्री,  ये   कैसी   मनमर्जी  डीग्री
मानव  संसाधन  मंत्री  की  ये  कैसी  खुदगर्जी  डीग्री
बडी-बडी शिक्षण संस्थाओं  के  निर्णय को लेने वाली
संविधान की शपत को खाने वाले शपतपत्र भी जाली

सुषमा तुमको  भारत  माँ की  नारी शक्ति मान रहे थे
तेरे भाषण सुनकर, नारी  की अभिव्यक्ति जान रहे थे
डाकू  के चक्कर में तुम  भी  भारत माँ को लाँध गयी
संविधान की  कसम,रसम  की  खूटी में ही टाँग गयी

वशुन्धरा  की त्वरा देखकर,लैला,मंजनू याद आ गये
राणा,जयसिंह की धरती में अब मोदी उस्तादआ गये
पुत्र-मोह में राज - धर्म  के  कर्म, मर्म  सब भूल गयी
इस काले - पीले मोदी  की  गोदी  में  मैया झूल गयी

पंकजमुण्डा को चामुण्डा अब तक हम भी मान रहेथे
नयी  नवेली  इस बाला  को  बाला साहब जान रहे थे
अब  महाराष्ट्र   में  धृतराष्ट्र  के  वंश  दिखायी   देते हेै
राजनीति  में  कृष्ण  कंहा  अब, कंस दिखयी   देते है

चमत्कार है ये  भी अपनी गलती को नही मान रहे हैं
चोरी   सीना   जोरी  करके , कैसे  सीना  तान   रहे हैं
कृपाचार्य और द्रोण,भीष्म भी,लाचारी में मौन खडे हैं
धर्म - युद्व में धर्म दलों  के, घर में ही कई घाघ धडे हैं

काँग्रेस  तो  मामा  शकुनि बनकर चौपड खेल रही है
चार  देवियाँ  इस  जूँवे  में  दुर्योधन  को  झेल रही है
कांग्रेस  की पिच पर कैसा सत्ता दल का खेल निराला
दोनो ने ही ललित मोदी का अपनेअपने ढंग से पाला

सारी  दुनिया देख रही  है,मोदी भैय़्या  कुछ तो बोलो
अपने वादे याद करो, व्यभिचार  को  खुल कर खोलो
खुद को चौकीदार कहा,तुमअसमंजस मे मौन होगये
कवि आग कहता है,मोदी कुछ तो बोलो कंहा खो गये।।
                 राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
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Monday, June 22, 2015

                प्रजातंत्र का पागल खाना      
हम कवियों की कलमें घिस गयी नेता के गुण गाने में
मेरी  प्रतिभा  फंसी  पढी  है भारत  के पागल खाने में
बडे़-बडे़  पागल  को  जनता  लोकसभा  में डाल रही है
प्रजांतत्र  में  जनता  सदियों से  पागल को पाल रही है

मिली - जुली  नूरानी   कुस्ती  होती  सदन  अखाडे़ में
इनको  तो  टी0  वी0 चैनल  भी  मिल जाते हैं भाडे़ में
कला जंग में  जनता  अपने पागल  सांसद देख रही है
अब  तो  सीधा  प्रसारण  है  दुनिया आॅंखे  सेंक रही है

कुछ बडे़ प्रतिष्ठित पागल  है, उनको ये आभाष नही है
हल्ला-गुल्ला, तोड़-फोड  में  उनकी रूची  खास नही है
ये सभ्य नसल   पागल  भी भीडों से छन कर आते हैं
चिंतन-मंथन  के ये पागल  राज्यसभा  के कहलाते हैं

प्रजातन्त्र का पागल खाना हर पागल को   पाल रहा है
परिपक्वता  का पागल पन पागल  को  संभाल रहा है
र्निजीव जगत के पूरातत्व को पागल सदन दिखाते हैं
फिल्मी  नथनी, नाच ,नचैया  राज्य-सभा  में आते हेैं  

गुण अवगुण आधार बनाकर पागल मंत्री  बन जाता है
धवलवस्त्र खादी में लिपटा ये पागल सब कुछ खाता है
प्रजातन्त्र में लाखो दल है किस्म-किस्म  के पागल के
पंजाब,सिन्ध,गुजरात,मराठा कुछ यू.पी. के भागल के

पागल पन  का  मिर्गी  दौरा कुछ बाबा भी  झेल  रहे हैं
आन बान  सम्मान दाॅंव पर स्वाभिमान से खेल रहे हैं
अलोम,विलोम की कपाल भारती अब संसद मेंआयेगी
नये  ढंग  का  पागल खाना ,  लोकसभा  बन  जायेगी

कुछ  समाज   सेवक  संपादक  जाने  कितनी नस्लें हैं
प्रजातत्र    की  धरती   में  ये  देख  उभरती   फसलें हैं
बिना  खाद-पानी   के  खेतों  में   खुद  ही उग जाती  हैं
पागल पन की  राजनीति  भी   प्रजातन्त्र  से  आती  है

विधानसभा और परिषद मे खुंकार,प्रांत पागल खाने हैं
ये पागल भी  लोक सभा और राज्य सभा के  दीवाने है
परेशान जनता  तो  हर  पागल  को प्रमोशन  दे देती हैे
प्रजातन्त्र  में  पागल   जनता  ही तो नेता की  खेती है

कुछ  पागल  तो लोकपाल से  अपनी अकड़  दिखाते हैं
ये  नये  किस्म  के पागल  है जो  प्रजातत्र  को भाते हैं
पुरातत्व  के  नौकर   शाहो  को बैसाकी  मिल जाती है
बर्षाती मौसम में लारवारिस कलियाॅं  भी खिलजाती हैं

सबसे छोटा नगर  पालिका, पंचायत  का पागल खाना
ये संराय है गली  मुहल्लो  के  पागल का पता ठिकाना
संसद के पागल  खाने  तक  जाने   का  ये पाय दान है
यौवनता  है जोश  भरा है, हरी -भरी   ये  खरी  खान है

व्यभिचार  और चोर,डकैती  प्रशिक्षण  मिल ही जाता है
लोकसभा और विधानसभा का  ये सबसे छोटा भ्राता है
पागल  पन   के   धरने  प्रदर्शन  में  इसका अंह रोल है
बिना ताल के जहाॅ बजालो लोक  तन्त्र  का नया ढोल है

अनपढ़,भोंदू  के चरणो  में भी  ये  पागल  गिर जाता है
सांसद और  विधायक  के  घर ,बे-खोंप  आता  जाता है
पागल जनता  पागल   नेता  प्रजा- तन्त्र  के  पैमाने में
हम पागल  कविता पढते  हैं पागल का दिल बहलाने में

आज   देश   के  सारे   पागलखाने    खाली   पढे़ हुये हेैं
सारे   पागल  राजनीति  में  आने     को  ही  अढे़ हुये हैं
लालकिले में हर  पागल  का  सपना  झण्डा  फहराता है
राजनीति  का सपना कनिमोझी,  कलमाडी बन जाता है

छल, बल ,कपटी, चोर ,चकारी,पागलपन ये के सपने हैं
गौर   करोगे  तो   पाओगे ,  ये   सारे  पागल   अपने हैं
प्रजातन्त्र  के  पाॅच साल में हर कोई पागल बन जाता है
पागल पन के इस  जन-मत से पागल  सत्ता में आता है

राजनीति  के गुण गाने में हम सब पागल  बन  जाते हैं
सत्ता  और  सियासी पागल  हम  सब  की रोटी  खाते हैं
अपने  मत  की  कीमत से ये जनमत  क्यों  घबराया है
ये कवि  ‘आग ’ है  पजातन्त्र  में  आग  लगाने आया है।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहु गुणा(आग)
                      मो0 9897399815
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Sunday, June 21, 2015

                         महा-योग
दो वक्त की रोटी हर गरीब को अगर योग से मिल जाये तो
फटे दिलों के फटे लिबास  को अगर योग ये सिल जाये तो
नींव मजहब की सम्प्रदाय की अगर योग से हिल जाये तो
मोटी खाले  वैमनस्य  की  अगर  योग  से  छिल जाये तो
विश्वगुरू क्या भारत खुद, बह्माण्ड  गुरू भी लिख सकता है
राजनीति का कफन हटा दो योग  सभी  को दिख सकता है

व्यभिचारी  और  भ्रष्टाचारी, खुदी  सर्मपण राष्ट्र  को कर दे
मठ,मन्दिर और  धर्म  ठिकाने, माया राष्ट्र कोष  में भर दे
आलीशान  भवन  में अपने बे - घर को  भी घर दिलवा दे
हर गरीब  की  मूल  समस्या, मेहनत के बदले मिलवा दे
भूखे  को  रोटी मिल जाये, क्या  योग  में  टिक सकता है
राजनीति का कफन हटादो योग सभी  को  दिख सकता है

सब जमाखोर और काले धन  के  मतवाले भी आगे आयें
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख, इसाई  अपना  राष्ट्र  गीत ना गायें
एक  कौम  हो, एक  व्योम  हो,सूरज ,तारे  एक  सोम हो
मानवता  के खिले  रोम  हो ,एक  धर्म  का  यज्ञ होम हो
आने वाला  हर  बच्चा  भी ,संस्कारो  को  सिख सकता हेै
राजनीति का कफन हटादो योग सभी को   दिख सकता है

भाव - भंगिमा, सब की  भांषा, भारत में  भारत माता हो
भेद - भाव सम्भाव  हृदय  का  गीत प्यार के ही गाता हो
मजहब  अपनी अकड छोड दे भारत मां की अभिलाषा में
हिन्दू सम्प्रदाय को छोडें,वशुधैव कुटुम्बकम्  की आशा में
फिर बसन्त की हरियाली में,येपतझड भी टिक सकता है
राजनीति का कफन हटादो योग सभी को  दिख सकता है

ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र भी  अपना-अपना  धर्म निभायें
जांति-पांति  के  बन्धन काटें, भेद  हटाकर  गले  लगायेें
केवल कर्म,धर्म बन जाये उपनिषद वेद की इस वाणी से
जनगणमनअधिनायक निकले भारतमां  के हर प्राणी से
कवि आग तो पातञ्जलि की विरहवेदना लिख सकता है
राजनीति का कफन हटादो योग सभी को दिख सकता है।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहु गुणा(आग)
                       मो0 9897399815
           rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, June 20, 2015

                  य़ोग का उपयोग
आनन्द विभोर हो करके मैने जब  मोदी  को योग  में देखा
पौराणिक विस्मृतियाँ जागी जिसकी अब तक दबी थी रेखा
इस आदिकाल  की  परम्परा  को घर-घर  में पहुचना होगा
नई  पीढी कुछ स्वस्थ बने  बस, यही राष्ट्र  का  गाना होगा

हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई  एक बने बस,यही कला हेै
सम्पभुत्व  हो  राष्ट्र  हमारा,सब कौमो  का   तभी  भला है
ये सभी  रोग  की  एक  दवा  है,व्यायामो  के आयामो  की
अभ्यासो से  लक्षित  होगी,  मानव  मंजिल  अन्जामो की

तन, मन सुन्दर बन  जाये  तो हरा  भरा मरूधान  बनेगा
राम कुष्ण महावीर, बुद्व  का  फिर  से  हिन्दुस्तान  बनेगा
सूभाष,भगत,शेखर,बिसमिल्लाह,फिर से धरती मे आयेंगे
सारी कौमे  राष्ट्र - भक्ति  के  गीत,  प्रीत  मिल कर  गायेंगे

बस योग,योग हो,राजनीति से विद्या  कलुषित  ना हो पाये
हो निर्विकार, निशुल्क  प्रेरणा, मानव, मानव तक पंहुचाये
स्कूल मदरसों, संस्थानो में, नियमित  सब  अभ्यास  करें
ये मिसाल बन  जाये   भारत, बस  भारत   की  आस करे

अब रूग्ण शरीरो  से  मुक्ति  हो  दुनियाँ  फिर से  ऐक  बने
ये वैमनस्यता  रगडे - झगडे  हटे, जगत   बस,  नेक  बने
पातञ्जलि  की  इस  विद्या   क  मुल्य  पेम है बंटता जाये
कवि  आग  इस  धर्म  धरा में, धर्म- धर्म  को  रचता जाये।।
                   राजेन्द्र प्रसाद बहु गुणा(आग)
                       मो0 9897399815
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Friday, June 19, 2015

                      मोदी की गोदी
गूजरमल  मोदी  का  पोता  भारत  को  उपहार मिला है
काँग्रेस  हो  बी.जे.पी.  हो  सबसे  इसको प्यार मिला है
वशुन्धरा और सुषमा दोनो,दुनिया भर मे खास हो गयी
माया  की  भक्ति, शक्ति  में राजनीति  उपहास  हो गयी

दुषयन्त  की  काया, माया  व्यवसायों  में  फैल  रही है
सारी  सत्ता  ललित मोदी  के  इर्द - गिर्द  ही खेल रही हेै
सभी  सियासी, काशी वाशी चरण  धूलि  को चाट रहे हैं
बुद्वि - बल्लभ, वाणी - भूषण तर्क  सियासी  छाट रहे हैं

पक्ष, विपक्षी  सारे  नेता  ललित मोदी के खास हो गये
पोल खुली तो  चरित्रवान भी  भारत में उपहास हो गये
सब  नेता, चमचे लगे  हुये  है  अपनी  जान बचाने में
ललित  लगा  है  अय्यासी  की  लन्दन  रास रचाने में

ये  कटु सत्य  है, राजनीति  में  भ्रष्टाचार पनपते आये
राजनीति  ने  टाटा, बिडला ,अम्बानी,   मोदी  पनपाये
सभी  सियासी  नंगे  नेता, अरब-खरब  में  खेल रहे हैं
ये रोग  भी  ला - इलाज  है,  भारत  में  ही  फैल रहे हैं

और  ना  जाने  कितने  डाकू  इन खेलों को खेल रहे हैं
भारत  माता  हम  गरीब है, हमी इन्ही  को झेल रहे हैं
राजनीति  में  चरित्रवान  के  संरक्षण  से  ये  पलते हैं
भारत - भाग्य-विधाताओं के कू-कर्मो  से घर जलते हेैं

पारिवारिक  समबन्धों  में, राजनीति  के तटबन्धो में
लूले लगडों के  कन्धो में ,इस  भारत के जयचन्दो में
सत्ता  की  इन  दुर्गन्धों  में, काली  माया के धन्धो में
चोरों में भी  चतुर सुजान है, मोदी  मेरे  इन छन्दो में

कुछ  ही  तोते  बचे  हुये  है, जो चैनल में चहक रहे हैं
जितनी चाबी भरी  राम  ने  उतना  ही वो बहक रहे हैं
दुखः होता  है  भ्रष्टाचारी  चरित्र  वान जब बन जाते हैं
अंगारो में जले - भूने  बस, कवि आग कविता गाते हैं।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहु गुणा(आग)
                   मो0 9897399815
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                      योग का विनियोग
योग शास्त्र  को  भारत  में  मजदूर  किसानो ने पाला हेै
भूख से जिसका उदर धँसा है वही  योग  का रखवाला हेै
मोटे  पेटों   वाले, मोटी  चमडी  का   यह  काम  नही है
योगों में भी छल,बल,कपटी  पातञ्जलि पैगाम  नही है

काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह की मुक्ति , योगा  की  सीढी है
पाँच साल से पन्द्रह साल तक,केवल  योगा  की पीढी है
पहले तन,मन शुद्व  होता है,फिर  योग  प्रारम्भ कला है
रस, स्पर्स, गन्ध, शब्द, से  रूप   विकारी  सदा पला है

इन सबसे  विरक्त  हुआ  मन योगी  की  पहली कक्षा है
इस क्रिया की  सक्षम  गुरू के  मिलने  से  होती रक्षा है
व्यायामों के करने से तो ,व्याधि - मुक्त तन हो जाता है
आनन्द भाव  तो  पंच विकारो  के  हटने से ही आता है

पातञ्जलि की इस क्रिया में,पात्र चयन भी एक कला है
कू - पात्र  के  उपयोगों से, योग - भोग  से सदा जला है
शून्य -गमन की योग क्रियाएं इतिहासो में  भरी पढी है
खुद  को  चाहे  जैसा  करलो, ये योगी की  खास कढी हेै

व्यायामो  से  आगे  बढकर, चलते  हो तो योग सही है
पातंजलि ने योगशास्त्र में कसरत की कब  बात कही है
सात चक्र निर्भेद, भेद  कर,ब्रह्म  बने  बस योग वही है
योगा में  भी  पंच  विकारी  आ जाये   तो  योग नही है

विज्ञापन  में  योग  चलेगा,शास्त्र स्वयं  ही मर जायेगा
संस्कारो  की  बुनियादो  में, कूडा  करकट  भर जायेगा
छोटे - छोटे  बच्चो  को  बस, मर्यादा  का  पाठ पढाओ
योगा को व्यवसाय बना कर,हाट-बाट में तो  ना लाओ

अखण्ड योग की भारत में ,शदियों से  बुनियाद पढी है
संस्कारो   की  गहरायी  मेें  ब्रह्मचर्य   की  खाद पढी है
पातञ्जलि  की  गुप्त धरोहर,  विज्ञापन  से दूर हटाओ
कवि आग रसपान  करो  बस,  अंगारे ना राख बनाओ।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहु गुणा(आग)
                     मो0 9897399815
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Thursday, June 18, 2015

                    योग-दिवस या योग विवस
हे,पातञ्जलि योग दिवस में कुछ ना कुछ तो ऐसा करदो
व्यभिचारी, व्यवसायी, नेताओ  में  राष्ट्र-भक्ति को भरदो
काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह के आसन,सासन साफ करादो
बस,तेरे  नाम  से खाने वाले  आडम्बर  को  हाफ करादो

अष्टांग योग की पहली सीढी,कसरत में हसरथ दिखती है
योग बहाना  बन  जाता है ,राजनीति  नफरत  दिखती हेै
दुनियां  में  बीमार  बहुत  हैं  तभी  योग को  मान रहे हैं
चैनल   में  व्यवसायी   बाबा,  अहंकार  की   शान रहे हैं

छल, कपटी, व्यभिचार शवो में,जीवन का  संचार करादो
कौम,कबीले,जाँति-पाँति में,इस  योगा  से   प्यार करादो
राष्ट्र-द्रोह  के   नेताओ  मे  राष्ट्र - भक्ति  गलूकोष  चढादो
नई  पीढी, मुर्दा  भारत  में,उनमें  भी  कुछ  जोश बढादो

तन,मन,बुद्वि शुद्व  करो,वशुधैव  कुटुम्बकम् की भांषा से
ये भारत,फिर से भारत हो  योग-दृष्टि  की  अभिलाशा से
आसन,सासन  और भाषण से योग-भोग ना बनने पाये
योग दिवश  के  बाद  देश  में, वैेमनस्य ना  जनने पाये

ये  भारत   की   गुप्त   धरोहर, चौराहों की  हाट  बने ना
ये  भारत   की   गुप्त   धरोहर राजनीति की बाट बने ना
ये भारत  की  गुप्त  धरोहर, वेद, शास्त्र   की काट बने ना
ये भारत  की  गुप्त  धरोहर, कामी  जन  की ठाठ बने ना

अच्छा है तुम योगदिवस मे कुछ अच्छा करना चाहते हो
सत्य,निष्ठ, निष्काम भावना, मानव में भरना चाहते हो
पातञ्जलि  की  त्याग  तपस्या, वशुन्धरा में लहरायेगी
कवि  आग  की  कवितायें भी संयोग योग से ही गायेगी।।
                 राजेन्द्र प्रसाद बहु गुणा(आग)
                       मो0 9897399815
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Wednesday, June 17, 2015

                   पक्ष-विपक्ष-और यक्ष
अब सारे  नेता  चोर  डाकुओं  की  सेवा में लगे हुये है
भाषण से तो ये लगता है, बस  भारत के  यही सगे है
मेरी कविता  बी.जे.पी  और कांग्रेस  की  बन जाती है
देश लूटने  वालो  को  तो  फिर  भी शर्म नही आती है

व्यभिचार की खुली वकालत, सत्ता में अब भी जारी है
प्रजातन्त्र में छल,बल,कपटी डाकू ही अब तक भारी है
बुद्वि - बल्लभ,वाणी - भूषण, इनकी सेवा में अर्पण है
ये  चौथा  स्तम्भ  देश  का दिखा रहा  हमको दर्पण है

पाँच  साल  से  एक  लुटेरा सबको पागल बना रहा है
राजनीति  के  सारे  दिग्गज को कीचड में सना रहा है
जो  लगता  विपरीत खडे  है,वही  संरक्षण डाल रहे हैं
आज  देश  में  नेताओं  को  गुण्डे  ही  तो पाल रहे हैं

साथ - साथ  फोटो  खिंचती  है  ये कैसी  रिस्तेदारी है
डाकू  मस्ती  काट  रहे  हैं, खर्चे   भी  सब सरकारी है
पीएम,सीएम.से मिलने की अपनी तो औकात नही है
गलबाहों  की  तस्वीरे  हैं, फिर  भी  कोई  बात नही है

क्रिकेट का और राजनीति का तालमेल ही घालमेल है
प्रतिभायें कम,व्यभिचार का सबसेअच्छा यही खेल है
आईपीएल  में मोदी है तो,कामनवैल्थ में कलमाडी है
सारे  डाकू  पनप  रहे है ,ये  प्रजातन्त्र  खेती - बाडी है

क्रिकेट तो जूँवे,सट्टे का फिक्सिंग आविष्कार हो गया
राम,कृष्ण की  धरती में ,क्रिकेट  ही अवतार  हो गया
नेता क्यों रूची लेते है,अब ये मेरी  भी समझ आगया
धवल कफन जो  मुर्दा  है,समझो वो  ही माल खागया

सुषमा,शुक्ला,वशुन्धरा की  चर्चा  भी तो जगजाहिर हेै
काले धन्धे में भी देखो  ये श्वेताम्बर  कितने माहिर है
और  ना  जाने  कितने  नेता  इन पर्तो मे छिपे हुये है
कंहा - कंहा  कितने  ढूँढोगे  माया  में सब बिके हुये है

है कोई नेता जो मोदी  के  बाल पकड कर भारत लाये
है कोई नेता इनके  किस्से  खोले जनता  को बतलाये
कितना  भ्रष्टाचार  करोगे  ,मैं  तो  लिखता ही जाउँगा
कवि  आग  हूँ, व्यभिचार को  निर्भयता से ही गाउँगा।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहु गुणा(आग)
                    मो0 9897399815
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Tuesday, June 16, 2015

                   गुप्त-रोग
दुनियाभर में हलचल है तुम मौन खडी हो
प्रजातन्त्र  में लगता  है बस,तुम्ही बडी हो
राष्ट्र-द्रोह और राष्ट्र-भक्ति का अन्तर खोलो
मनमोहन तो  मौन रहा,पर तुम तो बोलो

गृह, वित्त  भी  तुमको  प्रमाणित करता है
अंग-अंग  में संघ  समर्थन   भी  भरता है
अब  सारे  तोते  इन्द्रजाल  में  फँसे पडे हैं
कमल  खिला  कीचड  में ,नेता धंसे पडे हैं

तर्को   से   कानून  यंहा  पर  मर  जाता है
संविधान को  साण्ड सियासी चर जाता है
न्यायालय से कब तक ये खिलवाड करोगे
अपराधों  की  और  कंहा  तक आड करोगे

ललित मोदी में दाउद में कोई फर्क नही है
मुजरिम,मुजरिम होता है बस,तर्क यही हैै
न्यायपालिका   की   नीलामी  चौराहों पर
खेल रहा  है  अपराधी  सत्ता  की  बाँहो पर

टी.वी. चैनल में  तोतो  से भी कष्ट  हुआ है
मर्यादा,  संस्कार   सियासी   नष्ट   हुआ है
संविधान  में मुजरिम मालिक बन जाते है
प्रजातन्त्र  को छल, बल, कपटी ही खाते है

रोज नये-नये  अपराध  पृष्ठ को खोल रहे हैं
इस भ्रष्ट वृक्ष के छिपी जडों को टटोल रहे हैं
शुक्ला और पँवार, वशुन्धरा  भी  सहयोगी
इस बीहड में  छिपे हुये हेै कितने महा रोगी

बिना  आग  के  धुँआ  कंहा   होता  है प्यारे
दुनियां  भर   में   चटक   रहे  हैं  ये  अंगारे
जब भ्रूण - गर्भ  में  होगा  तो बाहर आयेगा
सही गलत  को, समय स्वयं ही बतलायेगा

ये आग  लगी  है  जाने  कितने  घर फूंकेगी
जाग  रही  है  जनता  अब  मूँह  पर थूकेगी
षडयन्त्र  हमेशा  चलते  हैं, पर थक जाते हैं
ये  प्रजातन्त्र  है ,अच्छे - अच्छे बक जाते है

हे सासन  के  शहनशाहों  अब कुछ तो बोलो
असमंजस  में  आज  अस्मिता है मूँह खोलो
इस लोकतन्त्र  में अब  कितने  डाकू पालोगे
ये  आग  भभकती  है कब तक पानी डालोगे।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
               मो0 9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com


Monday, June 15, 2015

                      भ्रष्ट राष्ट्र में धृष्ट राष्ट्र
अब  तो बीहड  के  डाकू  भी राजनीति में खास हो गये
सुषमा माता  तेरे  फैसले  दुनिया  में  उपहास  हो गये
जिसको  भारत  ढूँढ  रहा  था, तेरे  चरणो  में  अर्पण हैे
चाल,चरित्र ,चेहरों  का  भी  अपना - अपना ही दर्पण है

गृह-मंत्रालय  ढूँढ  रहा   हेै, राष्ट्र - द्रोह  के  अपराधी को
झेल रहा  है  पी.एम. मोदी, मोदी   की  ही उस्तादी को
अच्छा  होता  सुषमा माता  पकड  उसको भारत लाती
मैं भी अपनी रचनाओं मे खुलकर लिखता तेरी ख्याति

पर  तेरी   इस  मानवता  से  दानव  मस्ती काट रहा हैे
असमंजस  मे पी.एम. मोदी  तर्क  सियासी छाँट रहा है
तेरे  पक्ष  में  सहयोगी  भी  बोल - बोल कर हार गये हैं
बुद्वि - बल्लभ, वाणी - भूषण, शब्दो  के  भी पार गये हैं

हर चैनल  पर  तर्को  और  कुतर्को  का  संग्राम मचा है
भ्रूण गर्भ में  पनप  रहा  है ,नजरों  से अब कंहा बचा है
स्वीकार  करो  जो भूल हुयी है तर्को  से  ज्यादा फैलेगी
हल्के पन की राजनीति की व्याधी तू कब  तक झेलेगी

जानी-मानी अधिवक्ता  भी,अपने फन  में फेल हो गयी
संविधान  की  धाराएं अब  राजनीति की खेल  हो गयी
मानवता की भाव-भंगिमा, अपराधों  पर  लिपट रही है
मुजरिम मोदी के आगे, न्याय  व्यवस्था सिमट रही है

राजनीति का यही  निचोड हैे डाकू, मुजरिम राज करेंगे
नेताओं  से  आदर्शो   के, बचे - खुचे   अल्फाज  मरेंगे
अपराधों पर राजनीति भी  अपनी  कीमत आँक रही हेै
राष्ट्रद्रोह को कवि आग की कलम,लपट  में झाँक रही है।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  मो0 9897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com

Sunday, June 14, 2015

                कवि जागृति
रोद्र  में  श्रृंगार  की   कविता  कवि  क्यों  गा रहा है
बस,आज  तो  श्रृंगार   ब्युटि - पार्लर  में  जा रहा है
देख  लो  सेान्दर्य    रचना   हो   रही   है  दूकान में
अब  प्लास्टिक  की  सर्जरी   है  श्रृष्टि  के सौपान में

श्रृंगार दुनिया में कंहा किस को नजर अब आ रहा है
विभत्स में श्रृंगार की  कविता  कवि  क्यों गा रहा है
वाशना  दिल  में  गरीबी  की  कवि  दिखला  रहा है
मन   कवि  श्रृंगाार  के  रस  पान  से  बहला  रहा है

राष्ट्र हित में  लिख सके,अब  वो कवि  दिखते नही हैं
बिक  रहे  हैं, भाट, चारण, पर  कवि  बिकते नही हैं
अब व्यंग  के  भी  रंग कविता  में   नजर आते नही
राष्ट्र -भक्ति के ,व्यथित कवि भी, भीड  को भाते नही

जल  गया  मेरा  वतन  श्रृंगार  में  कवि  खो रहा है
तेरी  कलम  में  आग  है  जाग अब क्यों सो रहा है
साहित्य  मुर्दा  हो  गया तू लाश को क्यों ढो रहा है
निर्भय  कलम  से  मार कर  देश  में  जो  हो रहा है

कवि  की  कलम  सम्पन्न  है  देश  के  सम्मान में
बेदाग   है   केवल   कवि  ही मान  में   अपमान में
संचार  करने  की  कला  है  केवल कवि के ज्ञान में
मेरा  वतन तो  एक  है  कविता  बने  जो  ध्यान में

अब वक्त  की तासीर  की कविता कि रचना चाहिये
भेद  को  जो  काट   दे, वो  शमशीर रचना  चाहिये
पाट  दे  जो  हर   मजहब   को   वीर रचना चाहिये
अब श्रृष्टि  में  साैन्दर्य  की   तस्वीर  रचना  चाहिये

कर  में  कलम कल्लोल कर करतार बनती जायेगी
हर  हदों   का   हाशिया   भी  पार   करती  जायेगी
कविता  कवि  की क्रान्ति में  मिशाल बनती जायेगी
सोंन्दर्य  श्रृष्टि   का   सृजन  श्रृंगार   कविता गायेगी ।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                    मो0 9897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, June 13, 2015

                      अभिशाप
राजनीति में चाणक्यों की  परिभांषा व्यभिचार हो गयी
भारत  में   तो   भ्रष्टाचारी  घनानन्द  सरकार  हो गयी
बुद्वि- बल्लभ मुद्रा - राक्षस छल , कपटो के साथ खडे है
प्रजातन्त्र  में वैमनस्य  की  राजनीति  के  लाख धडे है

अगडेपिछडे हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई के जमघट है
लोकतन्त्र  की  एक  नदी में सम्प्रदाय के कितने तट है
राजनीति  की  नौका  पर  सब  बैतरणी  में  डोल रहे है
हर  मजहब  भी  अपने-अपने ईश्वर की जय बोल रहे है

इसी  देश में  अल्लाह  ईश्वर, कोर्ट  कचहरी  भोग रहे हेेै
भारत  में  तो  धर्म  हमेशा    राजनीति   उद्योग  रहे है
पातञ्जलि का योग शास्त्र भी राजनीति  को झेल रहा है
योगी  तोता  पञ्चतत्व  के  पिंजरे  में खुश खेल रहा है

अभिराम  तो  आज भी भारत में जंगल को भोग रहे हैं
कोर्ट- कचहरी  कृष्ण  की  गीता, ये  कैसे  संयोग रहे है
हर  स्टेशन   में   बजरंगी,  भूखे    प्यासे  डोल  रहे है
शिव - सैना  के औघड ,सत्ता दल में  ही कल्लोल रहे है

महावीर और बुद्व की सैना ,फसल, नश्ल  की बढा रही है
बाबा ,माई धर्म  की  झण्डी,जंहा  भी  देखो  गढा रही है
डेढ अरब की आबादी  में  गवाल-बाल  भरमार मची हेै
प्रजातन्त्र की भीडो ने तो  अब तक सब सरकार रची हेै

मंहगायी  और  भ्रष्टाचारी   कौन  देश  में  झोंक रहा है
नेता   सब  कुछ  जान रहा  है,चौराहों  में  भोैंक रहा हेै
ईश्वर ,अल्लाह  के  सब तोते,व्यभिचार  में धंसे पडे हैं
चोर बाजारी राजनीति  में,  ढूढो  तो   सब  फंसे पडे हैं

आदर्षो  के  उपहासों   में  राजनीति  फल -फूल रही हेै
अवतारों  का  पैदा  होना   क्या  भारत  में भूल रही है
छल,कपटों  से अवतारों  के आदर्शों  को तो मत जोडो
कवि आग इस धर्मधाम को,राजनीति से भी ना तोडो।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                    मो09897399815
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Friday, June 12, 2015

                दिल में दिल्ली-बिल में बिल्ली
मैं  दिल्ली   हूँ  दुनियाँ भर  के  चोर, लुटेरे  झेल रही हूूूूँ
आजादी  से  लेकर  अब  तक, बीहड  में ही खेल रही हूँ
इतिहासों  के  जनवासों  में  उपहासों  को  छाँट  रही हूँ
राजनीति से  लुटि-पिटी हूँ,फिर भी इज्जत बाँट रही हूँ

इस  भारत  की राजनीति में मुन्ना  भाई आम हो गये
प्रजातन्त्र  के  बोट - बैंक  से  सारे  रावण  राम हो गये
बापू  तेरी  इस  खादी  में  गुनाहगार  सब चरित्रवान हैं
इन चोरोंं  पर   संविधान  की  धाराएं   भी  मेहरबान हैं

लाखों  पप्पू  बोट - बैंक  की  राजनीति में पास हो गये
सबसे  ज्यादा   नंग,लंफगे  सत्ता  दल में खास हो गये
लीचड,कीचड और कमीने ही चुनाव अब लड  सकते हैं
डाकू, गुण्डे  और  मवाली  ही  गुण्डो से  भिड  सकते है

सभी दलों  में  व्यभिचारों  के  डी.एन.ए. ही  फूट रहे हैं
अपनी-अपनी  सीमा में सब माल  श्वांस  से  घुंट रहे हैं
सब  चोर-चोर  को  चौबारे में चतुरायी  से  पकड रहे हैं
अब सत्य,अहिंसा  के चोले में  सारे  डाकू  अकड रहे है

चोर - चोर   मौसेरे   भाई, प्रजातन्त्र    की    सौगाते हैं
क्या भारत के संविधान  से  हरिश्चन्द्र चुनकर  आते हैं
प्रजातन्त्र  की  पांञ्चाली  को  अब  रक्षक ही लूट रहे है
गिरधारी  के  हाथ  से  पल्लू   द्रोपदीयों   के  छूट रहे है

राजनीति  की  स्वर्ण - चर्म को सीता माता भाँप रही है
चरित्रवान  लक्ष्मण  की  नजरें  देख  रही है काँप रही है
नाक, कान  कटवा कर  सूपर्णखाँये  खुल्ली घूम रही है
भारत माँ भी  देख-देख  कर,मौन  खडी  है  झूम रही है

अब घनानन्द  से  चन्द्रगुप्त,चाण्क्य सुरक्षा माँग रहे हैं
यवन भेष में सभी सिकन्दर,भारत को शूली टाँग रहे हैं
मुगल और अंग्रेज भी घर में खुल्लमखुल्ला नाच रहे हैं
सभी  विदेशी  आज  हमारी   औकातों   को  बाँच रहे है

सारे  नंगे  अगल - बगल  की  सीमाओं  में विद्यमान है
हम  नंगो   के  बीच  खडे  है, नंगो  पर  ही  मेहरबान है
राम,कृष्ण,महावीर,बुद्व की,धरती का अब नास हो गया
कवि आग की रचना में  ये व्यभिचारी ही खास हो गया।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                     मो09897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com

          दिल्ली के शेखचिल्ली
राजनीति  में  जूते  खाना  और   खिलाना  आम बात है
पाँच खसम की आप  पार्टी गौर से  देखो  अभी अनाथ है
अहंकार की सारी  कडियां  जुडी हुयी, पर अलग-थलग है
काठ की हण्डी फुंकी जा रही, ये  तो उसकी एक झलक है

ज्यादा    बुद्विमानी   होना   राजनीति    में  अभिशाप है
सत्ता  और  सियासी  पंचायत  में  गुण्डा  अलग खाप हेै
योगेन्दर,प्रशान्त  और गाँधी, पुरातत्व  अवशेष  हो गये
आशूतोश, गोपाल,सिसोदिया  चाण्क्यो  के  भेष  हो गये

संजय और,विस्वास आम के इस झगडे में खास हो गये
खेतान  सरीखे   छोटे - छोटे   सारे   पप्पू  पास  हो गये
सढसठ   डलहौजी    के  खोजी, फौजी,  रोजी  ढूँढ  रहे है
मठाधीस  अरविन्द  केजरी, सब  चेलो  को   मूँड  रहे है

काठ  की  हण्डी राजनीति  के ताप,चाप  को  झेल रही है
दिल्ली में  बच्चो  की  सैना  देख   कबडडी   खेल रही है
सारा  भारत  सोच  रहा  था,सर्कस में  कुछ नया खेल है
राजनीति  में  स्वाभिमान, सिद्यान्त  हमेशा  रहा फेल हेै

काँग्रेस  भी  सत्तर  साल    पुरानी,  मिटटी   चाट  रही है
सिद्यान्त स्वंय के तीस साल से बी.जे.पी.भी  बाँट रही है
स.पा.बा.स.पा.,ममता,समता,घुटनो के बल  दौड रही है
दो  साल  की  आप  पार्टी,  स्वाँस  हांप  कर  छोड रही है

छल कपटों की राजनीति में मर कर  भी तो जीना सीखो
अपनो के ही  जूते खाकर, जहर  जहन  का  पीना सीखो
छोटे - मोटे  स्वार्थ  स्वंय  ही  अहंकार  से  गिर  जाते है
तेज  दौडने   वाले   शावक,  राजनीति  में  मर  जाते है

इतिहास गवाह है अपनाे का अपमान  हमेशा मरवाता है
पद  के  मद  में हद से  कद भी,रद्द   होकर जूते खाता है
अपनो  के  मेहनत  के आँशू  से  बुनियादे हिल जाती है
सच्चायी  को  कवि आग की कविताएं खुल कर गाती है।।
                 राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                         मो0 9897399815
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Thursday, June 11, 2015

                     फर्जी-अवतरण
फर्जी प्रमाण सियासत  में अब भारत भाग्य विधाता है
फर्जी  हथकण्डों  से  नेता  जनमत से चुनकर आता है
फर्जी  शब्दो   के  सौदागर, शब्दों   में   शब्द  गढाते है
ये  राजयोग   है  भारत   के, फर्जी  प्रारब्ध  से आते है

प्रमाण  प्रतिभा  का   केवल,  भारत  में  शिक्षा देती है
भारत की  शिक्षा - दीक्षा तो सत्ता  की  सियासी खेती है
ये  प्रश्नचिह्न  इतिहासों  में अब कितना और लगाओगे
फर्जी प्रमाण  के  पत्रों से,प्रतिभा को  कब तक खाओगे

फर्जी प्रमाण  चिकित्सा  के  हर  शहर गाव  में जारी है
फर्जी निर्माण, नियन्ता  के  भारत में अब तक भारी है
फर्जी आई.ए.एस. भारत में  जगह-जगह  अधिकारी है
बाबू,  चपरासी   ढूँढोगे   तो   थोक    में   मारामारी है

फर्जी  संस्थाए  फाइल  में,जगह -जगह  मिल जायेगी
सडक,  गूल   और  नहरें  भी  ढूँढो  तो  फर्जी आयेंगी
ट्रस्ट, भ्रष्ट  भी  नकली  हैं, औकात  धर्म की  कहते हेैं
ये  फर्जीवाडा  भारत  में  हम  सात  दशक से सहते हैं

आधे  से  ज्यादा  नेता  भी   फर्जी   डीग्री  से  आते हेै
ये भ्रष्ट व्यवस्था  भारत  की सब राजनीति  सौगाते है
शिक्षा,शिक्षक,सत्ता, सस्था, सिद्याान्त सभी सरकारी हैं
ये चमत्कार  है  भारत  का, नकली,असली से भारी है

ये राजनीति की फितरत है  गलती महसूस नही करते
ये सभी सियासी मुर्दे है,किंञ्चित अफसोस नही करते
हर  कोर्ट, कचहरी  मुर्दाे   के  गुर्दो  में  खून  चढाती है
इस प्रजा - तन्त्र  में गन्ध हमेशा सढे शवो से आती है

इन  अर्जी - फर्जी  कर्मो  से संदिग्ध  धर्म बन जाता है
झगडों में  मन्दिर, मस्जिद  का  फर्जीवाडो से नाता है
फर्जी  खून, जूजूनो  का नस-नस  में  सबकी बहता है
मजबूर  आग  भी शब्दो  से फर्जी कविता ही कहता है।।
                   राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                         मो09897399815
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Monday, June 8, 2015

                 राम और आम
अब  मण्डियो  में  आम  है  मन्दिरो  में  राम हेै
हिन्दू, मुस्लिम  आढती  के  हाथ  में  ही दाम है
बस  दो  महीना  आम  का, दो  महीना  राम का
गोदाम   हेै  मेरा  वतन  राम का और  आम का

कूरान  मस्जिद  में  पडी, राम  मन्दिर  में  पडा
धर्म  के  व्यापारियों  का   बन गया   कैसा धडा
दोनो  ही  अपने  माल  को उँचा बताते जा रहे है
मजहबी  दल्ले  धर्म  को, नोच कर केे खा रहे है

पेटियों में बन्द  दोनो  किस  तरह  से सढ रहे है
राजनीति में खुदा  और  राम   कैसे   लड  रहे है
बे- वजह ही पागलों  के  पग धरम् में  बढ रहे है
आडम्बरो  की भीड  में अब खुदा  भी  अड रहे हैं

क्रेता  हैं कलमी आम के, नेता है अमली राम के
शक्ल  दोनो  की बताती  ,भाव   क्या  बादाम के
इन पागलो  के द्वन्द  में ये  खेल  हैं  बे - काम के
भक्त  तो  बस  भक्त हैं, क्या  खुदा,  क्या  राम के

अतरंग  में  रस  एक  है ,आम  का क्या राम का
व्यापारियों  में  युद्व  है  अब  देख लो  गोदाम का
बे - खबर हैं रस  से दोना,  द्वन्द  है  बे - काम का
बस, आदमी  ही  मर  रहा  है  युद्व  मे बे-नाम का

आम  हो  या  राम  हो रस तो   परिन्दा जानता है
भेद मन्दिर,मस्जिदो में  वो  कभी नही मानता है
देख  लो   ईमान    कैसे   आदमी   को  खा  रहा है
धर्म की धरती का रस्ता किस दिशा को जा रहा है

अबआम के और राम के कोहराम से मत खेलिये
नई नश्ल  की छाती  में बोझा,मजहबी मत ठेलिये
रसायनो में राम और अल्लाह  को अब ना लाइये
आग  में  जो  गुप्त  है, बस  उस तपिस को गाइये।।
       राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                     मो09897399815
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Friday, June 5, 2015

                         गंगा स्वर्ग से नर्क में
हे माँ गगा इस कलियुग में कब तक तुझको साफ करेगे
राजनीति  में  तू  ही  बची है ,अब  सब तेरा  जाप करेगे
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख, इसाई के झगडो में  जान नही है
जाँति-पाँति  और  कौम कबीलो मे नेता का मान नही है

भव-सागर  तारण  माँ  गगा, इन  सबको  तू तार रही है
गंगा, जमुना   तहजीबों   की   सत्ता   मे  तू  धार   ही है
तेरे जल  में  बहने  वाला, मल  भी  नेता  बन  जाता है
तेरी  साफ - सफाई   करने   वाला  ही  तुझको  खाता है

तेरी   छाती   में  नौकाओं  के  क्रिडा  - दल  खेल  रहे है
गंगा  तट  पर  सभी  तामसी  माँस, मदिरा  पेल  रहे हेै
मच्छी, केकडे.  और जलमुर्गी, आखेटक से घिरी पडी है
गंगा  का  जल  बेचने  वालो  से  माँ  गंगा  चिरी पडी है

तेरे  नाम  से   संस्थाए   घाटो   पर चन्दा  काट  रही है
साधू, माई  और  पण्डो   की   पीढी  धन्धा   बाँट रही है
क्षत,विक्षत शव,हवन  धूलि और पत्र,पुष्प तू ही ढोती है
गंगा  मैली  पापी  से   कम , भक्तों  से  ज्यादा  होती है

अरब-खरब की  माया  तेरे  जल में समतल हो जाती है
तेरे  ही  कारण तो भारत  में  प्रदूषण की  भी ख्याति है
तेरे  जल  के  जाँच  परिक्षण से  संरक्षण मिल जाता है
प्रदूषण , जल - बोर्ड  नियन्त्रण  तेरे   नाम  ही खाता है

डाकू, चोर,  उचक्के,  पापी  के  पापो   को   काट  रही है
कही कंही  तो  जिला,गाव और पचायत  को  बाँट रही है
खनन  माफिया  तेरे  कारण अरब -खरब में खेल रहे हैं
जो  तेरे  अतरग  भक्त   है,  वो  तेरी  पीडा  झेल  रहे हैं

हे  माँ  गंगा ,आधे  भारत  को   तू  ही  तो पाल  रही है
गौ-मुख  से  गंगा  सागर तक, मूँह  में रोटी डाल रही है
जोगी,भोगी,व्यवसायी सब  तेरे  ही  गुण  क्यों  गाते है
तेरे  तट  पर  बसे  हुये  सब  तेरी   महिमा  से खाते है

व्यभिचारी,अत्याचारी  सब  तेरी  शरण, ग्रहण करते हैं
पाप, ताप, संताप तुझी  पर घो-धो  कर अर्पण करते हैं
कुम्भ लगाकर तेरे  नाम से ,कुम्भकरण  भी लूट रहे है
हर-हर  गंगे  के  नारे  से सब , मिटटी  तेरी  कूट रहे है

भागीरथ  के  पापों का  फल माँ  गगा  क्यों भोग रही है
जप,तप,पूजा,पाठ,तपस्या,इस कलियुग में  रोग रही है
हे माँ गंगा  इस  धरती  में  तेरा  अब  सम्मान  नही है
कवि आग  इस आडम्बर में ,माँ  गँगा  की शान नही है।।
                    राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                           मो09897399815
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                            सौहार्द
जज्बात में भी खुद फना होता हुआ क्यों  दिख रहा है
सम्प्रदायी  भाग्य  भारत वर्ष  का ,क्यों  लिख रहा है
हर कौम  की  भांषा  में  शमशीरें  चमकती देखता हूॅं
ये  कारवाँ तो  आज  भी  बाजार  में खुद बिक रहा है

छाछ  को  भी  फूॅंक   की  पीने  की  आदत  हो गयी
आज    हिन्दुस्तान     में   कैसी  इबादत   हो गयी
बन्दगी    में     गन्दगी    किस  कदर   फैली  यहाॅं
अब  तो   पूजा   और   नमाजी  भी शहादत हो गयी

मजहबों    के    ये   मदरसे   जालिमो  के  हो  गये
हम  तो  इस  फिरका  परस्ती , तालिमो के हो  गये
पूजा,  नमाजी ,   खाकसारी,   बुतपरस्ती,  ये  बला
इस   जंग   में   भगवान   भी   मवालियों  हो  गये

कौम  हिन्दुस्तान  की  दो-गज  जमी  को लड रही है
देख  लो  फिरका  परस्ती बे- वजह  क्यों  अड रही है
पागलों   की   पैरवी   ने  ये   सबक   सिखला दिया
पैगंबरों   की  नश्ल  कब्रिस्तान  में  क्यों   सढ रही है

ये  सियासी   लोग   भी    केवल    बहाना   ढूॅंढते हैं
कोहराम  की  खूनी  नदी   में, बस  नहाना   ढूॅंढते हैं
रोंदते  हैं   किस   कदर ,  इस   मजहबी   अंदाज से
हर  कफन  में  भी  दफन  का  शामियाना   ढूॅंढते हैं

वो  कौन  है  जो फर्क  करता  है  यहाॅं   पर कौम का
नुमाइन्दगी   का  तर्क  करता  है  यहाॅं  पर कौम का
बस, जालिमो  पर  गौर  करने  की  कला  को ढूॅंढिये
मिल  जायेगा  जो  नर्क  करता है यहाॅं पर  कौम का

हर   पत्थरों   पर   है  लिखी, फरियाद  मेरे  देश की
इन  पत्थरों   पर  है  टिकी , बुनियाद   मेरे  देश की
रंजिसों  में  भी  अमन  और   प्यार  की उम्मीद  से
बिखरी  पडी   है   हर   जगह  औलाद   मेरे  देश की

इतिहास  में  तो  हर  दरिन्दों  का   गवाह  मौजूद है
धर्म   के    इस   आसियाने    का   तवाह मौजूद है
हम  तो  गुलदस्ता  बनाते  हैं  यहाॅं    हर   कौम का
सिलसिला  हर   नश्ल  का   वो  आज  भी  मौजूद है

मन्दिरों   और   मस्जिदों   को    अब    ढहाना   दो
इस  कदर   खूनी   नदी   में   अब   नहाना छोड दो
बस, परिन्दों   से   खुले    आकाश    में  उडते  रहो
मान  लो   इस   आग   की ,बश, ये बहाना छोड दो।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                     मो09897399815
           rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, June 4, 2015

                   अभिशिप्त अवतरण
क्यों  होते   हो   पैदा   भगवन   भूखे नंगे  देशों में
करते   हैं   दिन  रात   लफंगे    देखो   दंगे देशों में
बन जाती   हैं  परंपरायें   कुछ   भिखमंगे   देशों में
बूरे - भले  भी   तेरे   नाम  से   होते  चंगे  देशों में

हम  शदियों  से  तेरे  नाम  की  ही रायल्टी खाते हैं
ग्रन्थ,  काव्य  में  तेरी  रचना के  ही  गाने  गाते हैं
फिर बनते,  ना जाने  कितने  मजहब तेरे नामों से
छिड. जाती  है  जंग  यंहा  पर, पूजा  के पैगामो से

कौमे देखो हिंदू, मुश्लिम, सिक्ख, ईसाइ  हो जाती हैं
मंडराती हैं, माैते  पूजा  घर में  मानव  को खाती हैं
तेरा  नाम सहारा  लेकर जनता  नेता  बन जाती है
रुढीवादी  मुर्दा  लाशें  हर मजहब  को  क्यों भाती हैं?

दुनिया  के,हर धरम्, मजहब  में तेरी ओर इशारा है
भारत  में तो  हर  कब्जे  के  पीछे  तू  ही  सहारा है
लावारिस मन्दिर, मस्जिद  भी  तेरा  गाना गाता है
आज देश में जन - मत से,तू  ही, सरकार,बनाता है

आड  में  तेरी  धर्मों  के  भक्तों  ने  परचम लहराया
राजनीति में अल्लाह, ईश्वर कैसे  कुरूक्षेत्र  में आया
हो जाती है  शूरू  फजीहत ,इन पशुओं  की  डारों में
मुझे माफ  करना,मैं तो  बस, पढता हूॅं अखबारों में

ब्रह्माण्ड का  निर्णायक   भी  न्यायालय  में जाता है
पेशकार भी अल्लाह,  ईश्वर  की   आवाज लगाता है
कैसे  हिन्दु, मुस्लिम की, ये पैरोकारी  बन जाती है
बच्चों को बच्चा  कहने  में  भारत माॅं भी शर्माती है

बे-रोजगारी, मंहगायी  को , नेता  फिर  से भूल गये
मन्दिर,मस्जिद के सर्कस में नेता फिर से झूल गये
डेढ अरब के तमाश-बीन को, ये  ही जोकर भाजाते है
हिन्दू,मुस्लिम नेता,मन्दिर,मस्जिद से रोटी खाते हैं

हे अल्लाह, ईश्वर  ये  विनती  है  बख्शो  मेरे देश को
कैसे देखूं लडे  सडक  पर अल्लाह  को  अखिलेश को
मानव चरता धर्म  भूमि में ,क्या  पशुओं का बाडा है
इन  सब रगडों झगडों  का बस,हिंदुस्तान अखाडा है ।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                   मो09897399815
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Wednesday, June 3, 2015

           आडम्बर  में  फंसा  राम
गरिमा गिरायी राम की क्यों  भक्त ने इस  देश में
देख   लो  लंकेश   को  अब  राम  ही  के  भेष में
राजनितिक  द्वन्द  से  राम  कलुषित   हो   गया
रावणों   के   राज  में    रघुवंश   पूरा   खो  गया

राम  की  गति  देख कर  हनुमान  भी तो मौन है
स्तब्ध  है  बजरंग  भी, बजरंंग  दल   ये  कौन है
जंग  सड.कों पर नहीं हर दिल में  मन्दिर चाहिये
निष्कपट  मन  मन्दिरों  में   राम   रमते  पाइये

राजनिति   ना   करे  उपयोग  सीता    राम   का
उद्योग   में  तो  धर्म  भी   हो  गया  बे  काम का
धर्म  में  उंगली  उठी, ब्रह्माण्ड  भी   हिल जायेगा
श्रृष्टि में  प्रलय  भयंकर,खाक   में  मिल जायेगा

धर्म  के   धन्धे  कहां   निर्जन  जमीं  हो  जायेगी
मजहबों  के  जंग  से , श्रृष्टि   धरम्  को  खायेगी
महापुरुष   आतंक    के   पर्याय   बनते   जायेंगें
लगता नहीं  है  धर्म  में भगवान फिर  से आयेंगें

चौराहे  में  भगवान  की गाथा को   गाना छोड. दो
आड.  में  भगवान  की  सत्ता  को पाना   छेाड. दो
हर  जगह   भगवान  के मन्दिर  बनाना छोड. दो
मन्दिरों  और  मस्जिदों  का   ये  बहाना छोड. दो

राम  का  मन्दिर  बने  हर  मुस्लिमों  के हाथ से
मस्जिद बने, बजरंग दल और संघीयों के साथ से
राम  और  अल्लाह  की  कौमें एक हों इस देश में
बस, एक  हिन्दुस्तान  हो,  कौमी, कबीले भेष में

हर कौम को रोटी मिले, हर हाथ में बस, काम हो
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई के जहन में राम हो
मजहबों   और   सम्प्रदायों  के  गुरू ,सब  दूर हों
बस, आदमी  हो, आदमियत  से भरा  भरपूर हो
 
जो   हदों   से  पार   होगा   राम  बनता  जायेगा
द्वन्द  के  कोहराम   में  तो राम  भी  खो जायेगा                                                                                               श्री राम  के   आदर्श  को अपने  दिलों  में  लाइये                                                                                             मन्दिरों   में   मस्जिदों  में   राम   रमते   पाइये ।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                       मो09897399815
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Tuesday, June 2, 2015

                  वर्तमान भारत
सोने की चिडि.या था भारत, हम  क्यों मिट्टी बेचरहे हैं
भू  माफिया , नेता , त्यागी, वशुन्धरा  को  खेंच  रहे हैं
धरती काटी जंगल  काटा, मानव  को मजहब  में  बांटा
भ्रष्टाचारी    राजनीति   में  मजा  ले  रहे  बिडला  टाटा
निम्न कोटि की मानवता में मुझे  बतादो कंहा  ज्ञान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी  पे भारत ही महान है

नदियां  सूखी  नाले  सूखे  घर- घर  के  पतनाले  सूखे
अब तो पवन,वमन करती है,मन मानव,मतवाले सूखे
सूख रहा  है धरती अम्बर, जोगी, भोगी  और  पैगम्बर
कलियों का मुर्झाता  नम्बर, कैसा   परं पिता,आडम्बर
देख  रहा  हूॅं जर-जर दुनिया  मुझे  बतादो कंहा जान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है

विश्व सुन्दरी नंगी नारी,यति, सति घर - घर  में  भारी
बलात्कार  की  मारा  मारी, व्यभिचार से  लज्जा हारी
व्यर्थ वासना  जाग  रही  है  यौवनता क्यों भाग रही है
महज प्यार धोखा है तन का,विषय  वाशना जागरही है
बह्मचर्य  से  बानप्रस्त  तक, मानवता की लुटि शान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है

सेवक  बाबू  और अधिकारी पड. गये प्रजातंत्र में भारी
धनबल संकट मोचनहारी चरित्रहीन की महिमा न्यारी
तंत्र  यंही   से  लटक रहा  है,सत्ता सेवक सटक  रहा है
प्रजातंत्र  को  पटक रहा  है,भय से भारत भटक रहा है
अखवारों  में नित पढ.ता हूँ, मुझे बतादो  कंहा मान हैं
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है

न्याय व्यवस्था टूट रही है,तुला  न्याय  से  छूट रही है
इज्जत खुलकर  लूट रही है,मानवता  को  कूट रही  है
अधिवक्ता  भी  चिल्लाते  हैं, सारे  मिलकर ही खाते हैं
काया,माया,औखाते  हैं, मुजरिम  क्यों  गीता  गाते हैं
न्यायालय में देख रहे हो,न्यायाधीश का कंहा ध्यान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है

धनवानों का  धन  काला है,धन से क्यों लुटती बाला है
धनिक,देश में मतवाला है, भाग्य विधाता धन वाला है
ईश्वर  को  धन पाल रहा है,अपने  ढंग  में  ढाल  रहा है
सच्चाई  को  टाल  रहा  है, नरक में सबको डाल रहा है
चोर, उचक्के, भ्रष्टाचारी , सब  दुनिया  में चरितवान हैं
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है

झूठा नेता  चिल्लाता  हैं, भाषण  में  क्या-क्या गाता है
सरहद  पर  फौजी मरता है,कृषक खेत में मर जााता है
चोर बाजारी, काले धन  का  भारत  में  अम्बार लगा है
भूख,प्यास से मरने पर भी, भाई-भाई का कंहा सगा है
संस्कारों  के  लुट  जाने  से  कवि  आग  भी परेसान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  मो09897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

Monday, June 1, 2015

                   आश्वासन
आज  तो  नेता से जनता आश्वासन पा रही  है
राजनीति  हर  जगह पर आश्वासन  गा रही  है
आश्वासन किस तरह आधार बनता जा  रहा है
राष्ट्र को  तो  भ्रष्टता  का  आश्वासन  खा रहा है

गूंज  है  करतल ध्वनि की पागलों की  बात में
विश्वास हमको हो रहा  है पागलों  की जात  में
आश्वासन  देख  लो मन्दिर  कहीं  कश्मीर का
नेता जनाजा बन गया मेरे  वतन की  पीर का

अब  युवा  भी  आश्वासन से जवानी खो रहा है
आश्वासन  की जवानी  से वतन  भी  रो रहा हेै
आश्वासन   युद्व  में  और  बेरोजगारी   आड़ में
झोंकता है  किस  तरह नेता  वतन को भाड़ में

आश्वासन के लिये  दल  भी सियासी बन  गये
लाश पर भी आश्वासन के कफन क्यों तन गये  
विडंबना है आज जनता   आश्वासन पा  रही  है
बज रही हैं तालियाँ बस आश्वासन  खा  रही  है

नित हो  रहे पैदा शिशू बस आश्वासन के  लिये
र्निलक्ष्य जीवन हो गया है मात्र  जीने  के लिये
स्वप्न तो  साकार अपने भ्रष्ट नेता  कर  रहा है
आस्था में आश्वासन  की वतन क्यों मर रहा है

गेरूवा   भी   आश्वासन   दे   रहा   है  धर्म  का
बन  गया  उपहास   देखो   आश्वासन कर्म  का
पागलों की   भीड़  में  ये  आश्वासन   बोलता है
किस कदर मठ मन्दिरों में आश्वासन डोलता है

आंकडा जनता का अरबों  से भी उपर जा रहा है
सूसुप्त है  मेरा  वतन  बस आश्वासन खा रहा है
औखात हिन्दुस्तान की  ये  राजनीत जानतीे है                  
इसलिये  तो  आश्वासन  के  ही तम्बू तानती है

भ्रष्टता को  काटने  का  आश्वासन  मिल  रहा है
विपक्ष के  चेहरों में देखो नूर  कैसा खिल रहा है
आश्वासन  लड़  रहा   है   आश्वासन  के   लिये
दिख  रहा  है द्वन्द  में भी  फंद  सासन के लिये

परदेश भी पी.एम. को  पूरा  आश्वासन दे रहा है
आश्वासन  से  मजा  पी.एम. भी  पूरा ले रहा है
आश्वासन के ही कारण,सब  सियासी लड रहे हैं
इस देश  में  तो  आश्वासन  के  कीडे  पड रहे हैं

आश्वासन ही तो  हम कितने  युगों से पा  रहे हैं
जिन्दगानी  आश्वासन  की  ही  जीते  जा  रहे है
लम्बी उमर है  आस्था  और  आश्वासन   पाइये
राजनीति    की   सफलता    आश्वासन  खाइये

आश्वासन  राजनीति  भी  हमी   को   दे  रही है
भ्रष्ट   भारत -वर्ष   का पूरा  मजा  वो  ले रही है
मिल   रहा   है  आश्वासन आग  इस तूफान में
आश्वासन  बिक   रहा   है आज  हिन्दुस्तान में।।
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
             मो09897399815
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