Wednesday, September 30, 2015

भावाभिव्क्ति से लालबहादुर शास्त्री जी के जन्म दिवस पर एक क्रान्ति का अभिवादन
अनादर
सीधे - साधे नेताओं की इस भारत में बात नही हेै
प्रजातन्त्र में बुनियादों की आज कहीं औकात नही है
चापलूस और चोर - डकैतों की ही तो भारत माता है
मुझे बताओ लाल बहादुर,हम तुम को कितना भाता है

गांधी,नेहरू, और पटेल के साथ कदम को रखने वाला
भगतसिंह,शेखर, सूभाष की, कुर्बाानी का था मतवाला
राजगुरू,सुखदेव सिंह और बिसमिल्ला का पथ अनुगामी
इस भारत की दीन दशा का चिन्तन,मन्थन अन्तर्यामी

इस उपग्रह को गांधी ग्रह की छाया से क्यों दबा रहे हो
महापुरूषों को राजनीति के उपकरणो से चबा रहे हो
छोटे - मोटे मेघ-वेग से दिनकर विचलित कब होता है
अपनी गरिमा, षडयन्त्रों से राष्ट्र हमेशा ही खोता है

माना गाँधी जाग रहे थे, और भी जिन्दे जगे हुये थे
अपने - अपने ढंग से भारत की मुक्ति मे लगे हुये थे
कौन अहिंसा से डरता है, एक उदाहरण मुझे बताओ
जो हम पर कुर्बान हुये हैं ,थोडा उन से भी शर्माओ

राजनीति से अब सूभाष और लाल बहादुर खोल रहे हो
किस मूंह से इन महापुरूषों की जय भारत में बोल रहे हो
बचे - खुचे इन महापुरूषों को राजनीति में बांट रहे हो
वोट-बैंक की शल्य चिकित्सा से लाशों को छांट रहे हो

कुछ बचे-खुचे बुनियादी भारत वाशी ही ये मान रहे हैं
जय जवान और जय किसान से भारत को पहचान रहे हैं
आज राष्ट्र के षडयन्त्रों से भारत माँ शर्मिन्दा है
लाल बहादुर कवि ‘आग’ की कलम अभी तक जिन्दा है ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

शहीदों का अपमान
हम तो बस मातम मनाना जानते हैं
कितने शहीदों को यहाॅं पहचानते हैं
तस्वीर के आॅंशू नजर आते नही
जो मर गये जिन्दों को वो भाते नही

उत्तराखण्ड के मुर्दे कफन में सो रहे हैं
जो मर गये वो लाश अपनी ढो रहे हैं
नींव के पत्थर नजर आते नही
रण बाॅंकुरे दब कर भी चिल्लाते नही
बिखरी हुयी चिन्गारियाॅं भी बुझ रही हैं
कुर्बानीयाॅं किसको यहाॅं पर सुझ रही हैं
आदर्श का उपहास घर -घर हो रहा है
अस्तित्व,अपनी अस्मिता को खो रहा है
संघर्श की वो भीड़ अब दिखती नही है
तस्वीर भी बाजार में बिकती नही है
हम सर्मपण को नही पहचानते हैं
ये शहीदों के सफर की लानते है

संघर्ष की कीमत से हम खुलकर खडे़ है
भटके हुओं को देख लो कितने धडे़ हैं
चैराहों में बे-शर्म बन कर लड़ रहे हैं
सिद्यान्त में सम्भ्रान्त कीडे़ पड रहे हैं
श्रद्वांजलि में जोश होना चाहिये
हर शख्सियत को ठोस होना चाहिये
आग हो तो हर जगह खुशामते हैं
हम तो बस मातम मनाना जानते हैं !!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

कुण्ठा
कुछ जले, बुझे अंगारों को मैं शब्दों से सुलगाता हूॅं
कफन,लिबासों में खादी के, शोले नित भडकाता हूॅं
आग लगाकर कपटों को लपटों से सदा जलाया है
राजनीति को शब्दों के अंगारों से समझाया है
भ्रष्टाचारों में रहने वालों को सबक सिखाता हूॅं
भारत का रहने वाला हॅॅूं ,भारत में आग लगाता हूॅं

ये लुफ्त उठाने वाले ही क्यों राजनीति में आते हैं
भूखी,नंगी जनता के जनमत का लाभ उठाते हैं
बोटों के भिखमंगों की ये कैसी ठेकेदारी है
इनके कारण दुनिया में,क्यों भारत आज भिखारी है
हास्य- व्यंग की कविता की लपटो से इन्हे जलाता हूॅं
भारत का रहने वाला हूं भारत में आग लगाता हूॅं
भ्रष्टाचारी चुनने को हम जन - मत से मजबूर हुये
आजादी के दीवानों के कैसे सपने चूर हुये
गाॅंधी, लाल बहादुर के नामों से नाटक होता है
क्यों भारत का संविधान चरणो में घुट कर रोता है
भरत-वंश के भारत की , तस्वीर तुम्हें दिखलाता हूॅं
भारत का रहने वाला हॅॅूं, भारत में आग लगाता हूॅं

ये आग हृदय की अभिव्यक्ति है शब्दों में ढल जाती है
दीन -हीन भारत की कुण्ठा राष्ट्र-गीत क्यों गाती है
आडी, तिरछी आजादी की बुनियादे दिखलाउॅंगा
दो-चार बने जो मतवाले ये कहर वहीं बरपाउॅंगा
पराधीनता आजादी की जनता को सिखलाता हूॅं
भारत का रहने वाला हॅॅूं भारत में आग लगाता हूॅं

एक दिशा है दशा एक है जम-घट, धडे़ हजारों में
भारत की इज्जत लुटती है आज भरे बजारों में
अखण्ड-राष्ट्र के सपनो को टुकडों-टुकडों में तोड़ दिया
रामराज्य के भारत को भ्रष्टाचारों ने मोड़ दिया
छन्दो में जयचन्दो की मैं औकातें दिखलाता हूॅं
भारत का रहने वाला हॅॅूं, भारत में आग लगाता हूॅ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Tuesday, September 29, 2015

जब मुगलों ने आक्रमण किया उनकी संख्या मात्र 6000 थी और हम तैंतिस करोड थे,जब अंग्रेजों ने आक्रमण किया उनकी संख्या साठ हजार थी,और हम साठ करोड थे, आज राजनीति हम पर आक्रमण कर रही है हम125 करोड हैं, क्या यही भारत है।

सन्देह
साठ हजारी अंग्रेजो ने साठ करोड़ पर राज किया
अमर शहीदों को उकसा कर मरने पर मोहताज किया
राम,कृष्ण की कूटनीति और परणीती को याद करो
चाणक्यों के मूल्यों पर, ना कायरता फरियाद करो

आर्य - खण्ड को मुट्ठी भर अंग्रेज लूटकर चले गये
अनुपातों में जनसंख्या के, हमें कूट कर चले गये
जिनमें था जज्बा भारत का,मर्दो की मौत मरे हम पर
देश अभी तक जिन्दा है, उन अमर शहीदों के दम पर

हम भगतसिंह,शेखर,सूभाष और राजगुरू को गाते हैं
याद शहीदों की लेकर , व्यभिचार ध्वजा फहराते हैं
बंग्ला , पाकिस्तान कटा,क्यों आधा हिन्दुस्तान छंटा
धर्म,मजहब की जाति से क्यों घर-घर में इन्सान बॅंटा

अपनी ही झूठन आज हमें सरहद से आॅंख दिखाती हेै
राष्ट्र- गीत को किस मुॅंह से,ये मरी हूकूमत गाती है
आजादी के स्वाभिमान का जज्बा नजर नही आता
व्यभिचारी धवल लिबासों में जनता को कभी नही भाता

मुटठी भर मुगल हूकूमत में,इस राम,कृष्ण की धरती में
इतिहास गवाह है,जयचन्दों की भीड़ यवन की भरती में
अंग्रेज हूकूमत की सैना , गद्दार पैरवी करते थे
हम भारतवाशी अपनो की निन्दा से जिन्दा मरते थे

जिनमें था जज्बा आजादी, बे - मौत मरे अंग्रेजों से
इस राजनीति में कायरता सजती फूलों की सेजों से
आत्म सर्मपण कर लेना , ये जज्बाती पैगाम नही
साठ करोड़ की जनता में,कुछ का मरना अन्जाम नही

वेद, शास्त्र, इतिहासों में, वीरों की गौरव-गाथा हो?
आर्य खण्ड की रचना का रचनाकर परं विधाता हो?
ये ऋषियों की तपस्थली, व्यभिचार, छलों को ढोती है
कवि ‘आग’ की कलम यहाॅं, चिन्गार, लपट से रोती है!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Monday, September 28, 2015

राष्ट्र संघ में जंग
राष्ट्र संघ में भीड लगी है शान्ती-दूत के अवधेशो की
वैमनस्यता खोल रही हेै, पोल सियासत के भेषों की
रूश, अमेरिका नर-संहारो के सामानो की मण्डी है
जर्मन और जापान, चीन भी महा-युद्व की रणचण्डी है

सारी दुनिया अस्त्र - शस्त्र की होडो में ही लगी हुयी है
तहस-नहस हो दुनियां सारी इसी तोड में जगी हुयी है
संयुक्त - राष्ट्र के सभी सहोदर, उंची-उंची छोड रहे हैं
फिर भाषण की भांषा देखो,शब्दो से सिर फोड रहे हैं

आतंक वाद की परिभांषा को खुद आतंकी बोल रहे हैं
नर- भक्षी, दुनियां की रक्षा की कक्षाएं खोल रहे हैं
विश्वशान्ती अभिनेता के घर खून खराबा मचा हुआ है
हिम्मत हो तो पूछो,झगडा किस कारण से रचा हुआ है

संयुक्त राष्ट्र भी हिन्दू, मुस्लिम, ईसा, मूसा का नाटक हेै
आतंक वाद की जल घाराओ के श्रोतों का ये फाटक है
अस्त्र-शस्त्र की इस मण्डी में हथियारों की हाट लगी है
नेता सारे मस्ती में है, बस, जनता की बाट लगी है

हम भी अपने घर के किस्से, चौराहों में खोल रहे हैं
राजनीति की औकातो को, संयुक्त राष्ट्र में बोल रहे हैं
शेखर,सूभाष और भगत सिंह के आदर्शों को ढूंढ रहे हैं
शकुनि और विभीषण बन कर,भारत माँ को मूंड रहे है

विश्व-शान्ती की हर भांषा में आतंकी विस्फोट भरा है
दुनिया में सरहद के झगडों से मानव ही रोज मरा है
फेसबुकों में घर का किस्सा सारी दुनियां देख रही है
कवि आग की कविता फिर भी शब्द निरर्थक फेंक रही है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
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(हास्य,व्यंग के साथ भविष्य में होने वाले खतरे के प्रति सचेत कर रहा हूं, अवशय पढें)

अमेरिका का सपना
अमेरिका हूॅं दुनिया - भर के भिखमंगों को पाल रहा हूॅं
समृद्व - राष्ट्र की कमजोरी और लाचारी खंगाल रहा हूॅं
छल,बल,कपटी राजनीति का कातिल,शातिर, माहिर हूॅं
अलसायी, व्यवसायी दुनिया के धन्धे में जग जाहिर हूॅं

छोटे - छोटे टुकडे़ करके खेल खिलाना मेरा शौक है
आज मेरा घर दुनिया भर की नीलामी का नया चौक है
मेरे दर में भीख माॅंगते सभी राष्ट्र और देश खडे हैं
मेरे कारण दुनिया भर में राजनीति के लाख धडे़ हैं
तहस - नहस हो दुनिया सारी,मैं विस्फोटक फैलाता हूॅं
घर - घर में, मैं आग लगाकर ज्ञानी, दानी कहलाता हूॅं
मौतों का सामान बेचना , ये मेरी दुनियादारी है
चरण चूमना मेरे ,सब की मजबूरी है, लाचारी है

हर धन्धों में प्रतियोगिता, शदियों से मैं करवाता हूॅं
मजदूरों की इस दुनिया में बैठ-बैठ कर मैं खाता हूॅं
पहले मैं आतंकी पैदा करता हूॅं, फिर मरवाता हूॅं
मैं दुनिया में कपट कराकर शान्ती दूत बन कर आता हूॅं

कहा-कहाॅं, क्या-क्या होता है,निगरानी सबकी करता हूॅं
निर्बल की रक्षा करने की ,आडों में सैना भरता हूॅं
पूरब, पश्चिम ,उत्तर ,दक्षिण मेरी दहशत् से जीता है
मैं कलियुग का गिरधारी हूॅं, घर-घर में मेरी गीता है

हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी कठपुतली का सूत्र-धार हूॅं
दोनो आपस में लडते है, मैं दोनो का वफादार हूॅं
परम्परा और संस्कारो में जहर भयंकर डाल रहा हूॅं
ब्रह्म - जगत में जीने वाले भले भिखारी पाल रहा हूॅं

खाडी और पहाडी अरबी दुनिया को मैं मार रहा हॅूं
दुनिया भर के भूखे, नंगे, मुर्दों का अवतार रहा हूॅं
वेद,शास्त्र और उपनिषदों में धरती का पाताल लोक हूॅं
अधोगति में मरने वालों का भी तो, मैं महाशोक हूॅं

प्रतिष्प्रधा में जर्मन और जापन,चीन को भाॅप रहा हूॅं
विश्वजगत की अर्थव्यवस्था में भी,मैं अभिशाप रहा हूॅं
हर धन्धो मे अर्थ - व्यर्थ, चौपट करने का कलाकार हॅूं
दुनिया भर के सरपंचो की चैपालों का सलाहकार हूॅं

वालमार्ट की चमकधमक से राजनीति को समझाउंगा
खेती,बाडी और किसान को मैं ही सडकों पर लाउंगा
खुदरा ,मुद्रा, भी तोडूंगा़ अपने डालर की भाँषा से
अमरीका की मुहर लगेगी अमरीका की अभिलाषा से

रोजगार विहीन बनाकर मैं ही भारत को पालूॅगा
इस महाद्वीप के युद्व-पोत के अड्डो को मैं खगालूॅगा
जापान,चीनऔर रशिया को भी टुकडो-टुकडो मे तोडूंगा
मैं एशिया - महाद्वीप को, नैपाल बना कर ही छोडूॅगा

अब मोदी आने वाला है,मार्च नही, अप्रेल चलेगा
जापान की रेल चलेगी, मेरा भी कुछ खेल चलेगा
भारत के उद्योग - जगत को भीख मांगते देख रहा हूं
अच्छे दिन आने वालें हैं ,मैं भी टुकडे फैंक रहा हूं

इस कलियुग में छल,बल,कपटी,रंगमंच जंजाल रहा हूॅं
अमरीका हूॅ दुनिया-भर के भिखमंगों को पाल रहा हूॅं
इस रचना में हास्य - व्यंग है, चिन्तन की गहरायी है
अमरीका के उदार - वाद में, देखो कैसी चतुरायी है

शदी अन्त तक पूरा परचम इस दुनिया मे लहराउॅगा
मैं ही दुनिया पाल रहा हूॅ, मैं ही दुनिया को खाउॅगा
भीख मांगकर मरगें सारे,मुझको कोई समझ ना पाया
राष्ट्रभक्ति के इस खतरे को, कवि आग ने खुलकर गाया।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
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