Saturday, February 28, 2015

                      मध्य - वर्ग
गजट-बजट  का  नंगो  के जीवन में असर नही होता
समपन्न हमेशा  भारत  में, लोकतन्त्र  का है न्यौता
स्वर्ग  धरा  में प्रजातन्त्र  समपन्न  घरों  में लाता है
मध्य - वर्ग  तो  शदियों  से,बे-मौत ही मारा जाता हैेे

उपर  चढना  तो  दूर  रहा, अब  नीचे गिरना दूभर है
पशू बना, ना देव बना, ये मध्य-वर्ग  क्यों किन्नर हेै
जी सकता ना मर सकता,अधमरा ही जीवन डोलेगा
अच्छे  दिन  की परिभांषा,अब मध्य-वर्ग ही बोलेगा

ये वर्ग त्रिशंकु सदा रहा, जो  हवा  में लटका रहता है
अर्थ-व्यर्थ  के  चक्कर  में कष्टों  का फटका सहता है
बच्चे  भी  दो  ही होते हैं,जीवन फिर  भी संघर्ष बना
ये मेरूदण्ड है भारत का जो सघर्षों का निष्कर्स बना

खुद  खडा  है  अपने  पैरों में,जीवन जीता है गैराें में
नदियों  से  मेल  नही  होता,बहता है सूखी नहरों में
अच्छे - अच्छे  सपने  भी  जीवन में देख नही पाता
मर कर समर समाजों से,जुडता है जबरन हर नाता

अच्छे दिन के चक्कर,क्यों मध्यवर्ग बलिदान हुआ
सम्पन्न वजट में मोदी के, वैभव का सम्मान हुआ
हर  बार  गरीबी  की  रेखा, नीचे ही गिरती जाती है
क्यों मध्य-वर्ग की रेखायें,वैभवता से भिंच जाती है

हे, शब्दो के सौदागर ,बाजार  में  घूम  के देख जरा
सीमा में बँधे  हुये  वेतन में, अपने सपने फेंक जरा
शर्म तुम्हें आजायेगी,  इस अच्छे दिन की भांषा से
याद  रहे, ये  सत्ता भी मिलती है इन्ही की आशा से

नून,तेल और लकडी का नेताओ को,कुछ ज्ञान नही
कष्टों में  जीवन  जीने  का, जोकर को अनुमान नही
अच्छे दिन के लच्छो से क्यों, मध्यवर्ग कुर्बान हुआ
कवि आग  की  भांषा में बस,मुर्दा ही बलिदान हुआ।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  मो09897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, February 27, 2015

                       दृष्टि-सृष्टी-वृष्टि
मोदी  भैया  ब्रह्मचारी,है, उन्हे गृहस्थ का ज्ञान नही हेै
किस चादर मे पाँव पसारें, इसका भी अनुमान नही हेै
अटल बिहरी ब्रह्मचारी  थे, इस चक्कर में फेल हो गये
राजनीति में,ये फक्कड,ही,आज सियासी खेल हो गये

माया, ममता, उमा,  ललिता, नारी  शक्ति ब्रह्मचारी है
आर. एस. एस. के  प्रचारक  हैं, उनकी आगे तैयारी है
बिन  नारी  के  राहुल  बाबा, गुप्त  घरों  में  डोल रहे है
ब्रह्मचारी,भारत में सारे, क्या बिन अनुभव बोल रहे हैं

आटा,चावल,मिर्च,मशाले का इनको कुछ ज्ञान नही है
बच्चे  पैदा  करने का  कुछ तकनीकी अनुमान नही है
डेढ अरब की जनसंख्या  को  भाषण  से ही पाल रहे हैं
बिन अनुभव के गृहस्थ आश्रम बाबा जी संभाल रहे है

बन्दर  के  हाथों में  चाकू,ये जनमत  क्यों डाल रहा हेेै
जादूगर  की  मजबूरी  है, खेल  दिखा  कर पाल रहा हेै
तमाशबीन हम सारे जनमत भीड लगा कर देख रहे हेैं
स्वप्नो  के  सौदागर  सारे, बस  सपने  ही  फेंक रहे हैं

हम सब स्वप्नदोष के आदि स्वप्नो में ही खो जाते हैं
राजनीति  के  अलग  धडे  हैं,वो  भी अपने हो जाते हैं
शब्दो  की  हेरा - फेरी  से  गलत सही को ढाँक रहा है
आटा काँटे में चिपका कर मछुआ,मच्छी फाँक रहा है

कुछ  बगुले  नैतिक-वादी  है, एक  टाँग में खडे हुये हैं
अब वो भी मौका देख  रहे हैं,आदर्शो   में  अडे  हुये हैं
शब्द - भेद  के तर्क-कुतर्की  हर चैनल में चिल्लाते हैं
इनकी  अपनी  मजबूरी  है, इसी  बात  की ये खाते हैं

राजनीति  के अनुभवहीनो से  ही  तो भारत लुटता हेै
जनमत भी तो सरल मार्गअपनाने वालों से घुटता है
आश्वासन  ही  एक  मात्र  हल हेै, सबको बहलाने का
कवि आग की  मजबूरी  है  नेता जी के गुण गाने का।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       मो09897399815
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Wednesday, February 25, 2015

                         बजट का गजट
दश रूपये में पूडी, सब्जी  हर  स्टेशन  में दिलवादेते
अच्छा  पानी  हर  गरीब  को  स्टेशन  में पिलवा देते
थर्डक्लास  के  वेटिंग  रूमो  में  भी  झाडू लगवा देते
जिन डिब्बों में फटी सीट है उनको  थोडा सिलवा देते
थोडा सा  चूना   पुतवाते  जंहा - जंहा  धब्बे  काले हैं
मोदी  जी  मै   कैसे   बोलूं  अच्छे  दिन आने वालें हैं
       
आरक्षण मांगो  तो  वेटिंग, कम्प्यूटर भी  बोल रहा है
टी.टी. सबकी औकातों को,ट्रेन के अन्दर   तोल रहा है
मुंह मांगा पैसा  फेंकोगे, तब  जुगाड कुछ  हो जाता है
मैं तो  ये  ही  देख  रहा  हूं, ट्रेनो  को  टी. टी. खाता है
बाहर  से  सब  श्वेताम्बर  हैं  भीतर  सब  पूरे काले हैं
मोदी  जी  मै   कैसे   बोलूं  अच्छे  दिन  आने वालें है

पूछ-ताछ  की खिडकी  खाली, बाबू  बाहर  घूम रहा है
टिकिट बाबू भी लगा जुगाड में,वेटिंग  वाले ढूंढ रहा है
पैसों में  आरक्षण  सुविधा, अब  दल्ले  ही  बांँट रहे हैं
एम.पी,एम.एल.ए. के  कोटे, ए.सी. डिब्बे  छाँट रहे हैं
भारत  की  रेलों  के  रण   में, नेता  ही, बर्छी, भालें हैं
मोदी जी  मै  कैसे  बोलूं  अच्छे   दिन   आने  वालें है
       
नंगे   भूखे   अगडे़   पिछडे  पैसेन्जर  सबको ढोती है
बलात्कार में मध्यवर्ग की जोरू भिंच भिंचकर रोती है
बुलेट  ट्रेन, सपनों   में  नंगे ,चांद  सितारे  देख रहे हैं
ट्रेनो  के  इन्जन  की  गर्मी  में  सब  रोटी  सेंक रहे हैं
अब तक जो भी जुडे रेल से, सबके  माले  पर माले हैं
मोदी  जी  मै  कैसे   बोलूं   अच्छे  दिन  आने वालें है

मंहगायी  कम  कैसे   होगी  जमाखोर   कैसे पकडोगे
चन्दा  देने   वाले  अपने   चेलों    को   कैसे  रगडोगे
लोकतन्त्र  के   मेरूदण्ड  में  ये   ही  कीडे  डाल रहे हैं
शदियों से ये चाल,चरित्र  ओर चेहरों को खंगाल रहे हैं
सत्ता  में   कोई   भी   बैठे,  इनके   गडबड  घोटालें हैं
मोदी  जी   मै   कैसे  बोलूं  अच्छे  दिन  आने वालें है
       
आटा,चावल,शब्जी,दाले,नमक तेल और मिर्च मशाले
आलू.लहशुन,प्याज ने  ही तो  हरदम नंगे, भूखे पाले
सत्तर  फीसदी  नंगे, भूखों  के  मूंह  पर  रोटी डलवाते
हम को कोई फिक्र नही थी,फिर चाहे तुम भारत खाते
कवि ‘आग’  के  छन्द  हमेशा  शोले  भडकाने वाले हैं
मोदी  जी  मै  कैसे  बोलूं   अच्छे   दिन  आने  वालें है।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       9897399815
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Tuesday, February 24, 2015

 यह रचना भूमि अधिग्रहण कानून के विरोध में अन्ना को समर्पित है।  
                अन्याय का सामराज्य  
जमीनों   के  कमीनों  के  बढ.ते   भाव  तो देखो
धरा गज,फुट में बिकती है उजडते गांव तो दखो
नारी, नर   के  आपस  में रगडते  पांव  तो देखो
भारत  मां  की  छाती में ये  सढते घाव तो देखो

लुटती  हैं सियासत में  किसानों  की जमीने भी
कमाते  हैं  दलालों  से   ये  सत्ता  के  कमीने भी
मॅंडराती   हैं    क्यों   चीलें  पुस्तैनी   धरोहर  में
यहाॅं  खेतों  से  चित्कारें उगलती  हैं सभी घर में

ये  मुर्दे  भी ,शरीरों  से  कफन को  खींच लाते हैं
यहाॅं  सत्ता , विरोधी  भी , सियासी गीत  गाते हैं
ये  नाटक  रोज  चलता  है  वजीरों में दलालों में
सियारों  को  छिपे  देखो यहाॅं  शेरों  की खालों में

जहाॅं  राजस्व की  भूमि ,कब्जा  है  रियासत  का
जमीने भी बदलती  हैं ये जज्बा है सियासत  का
मंत्री   के  इशारों  से   यहाॅं   राजस्व    चलता  है  
कमीनों  के  करारों  से   ये   कारोबार   फलता है

कहीं दाखिल कहीं खारिज  भी होता हैं विरक्तों का
कॅंहा  दिखता  है घोटाला यहाॅं पर ताज तख्तों का
यहाॅं  तो  धन कुबेरों की  ही  लीजें रोज  कटती हैं
विरक्तोंऔर कमीनो से ये धरती  क्यों सिमटती है

कंही  अव्वल  ,कंही दोयम, ये  पटवारी बताता है
यंहा   गुमनाम  खातों   में  नेता जी  का खाता है
नौकर-शाहों के  खातों  में  बी0 बी0  दर्ज होती है
सियासत में रियासत में  ये टी0वी0 मर्ज होती है

बिना   घरबार   के  डीलर  जमीनो को दिखाते हैं
सारा   माल   चौराहो के ,ये  दफ्तर   ही  खाते हैं
पूरे   देश   के   खसरे,  खतौनी   इनके   हाथो में
फाइल  भी  खिसकती  है दलालो की ही बातो में

दो  परसेन्ट  के   धन्धे  मे  लाखो  वारे - न्यारे हैं
दल्लों  और  पुछल्लों   के   हूकूमत   मे  नजारे हैं
सियासत भी जमीनो और कमीनो से ही चलती है
नेता   की   गृहस्थी  भी  कमीनो  से  ही पलती है

यहाॅं  भूमिधरी   काबिज  के  हाथों में  ही जाती है
कमीनों  को  तो कब्जे  की  जमीने रास  आती हैं
कफन,खादी के कुर्तोे से अमन और चैन  खोता है
ये  कैसी  राष्ट्र - भक्ति  है ,जो हिन्दुस्तान  रोता है

गृहस्ती  का  खुले  आकाश  के  नीचे  ठिकाना है
महलों  में   विरक्तों   का  ये  कैसा  आशियाना है
अब  तो नारियो  में भी दिगम्बर  का  जमाना है
यहाॅ  शहरो  में  अय्यासी का,ये नक्कार खाना है

लेकर   आड.   धर्मो   की  अधर्मी   घूमते   देखो
चरित  बिकता  है  चौराहे में  नंगे  झूमते   देखो
भरे   बाजार   में   नारी ,   लफंगे    चूमते  देखो
कमीने    राज    नेता  की   जरा   हूकूमते  देखो

कंही खूनी, कंही  कतली, भरे  खद्दर  लिबाशों में
वतन  जीता  है  बूढे  राज  नेताओं के  झांसो  में
शकुनि ही  छिपा  बैठा  है  हर  चैपड़ के  पासों में
वतन की आबरु  अब  भी  पढी  है मुर्दा लाशों में

जमीनो  को  कमीनो  से  क्या  अन्ना  बचायेगा
क्या संसद से  जमीनो  का  नया कानून आयेगा
सभी  दहशत  में  हैं  डाकू , अन्ना की अदाओं से
कविता आग  लिखता  है, इस धरती की गांवो से।।                                                                                    
        राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
             मो09897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com



Monday, February 23, 2015

                   अच्छे  दिन आने वाले हैं
दश लाख में सूट सिला हैै,पाँच कराेड में बिक जाता है
अच्छे  दिन  की  शूरूआतों  में भैया ये भी तो आता है
स्मृति, उमा, सुषमा  देवी, बडे  पदों  पर  डोल्  रही हैं
अच्छे  दिन  की  परिभांषा को नारी शक्ति बोल रही है

राजनाथ  अब  गृह  मत्री हैं, वित्त  जेतली  देख रहा है
अमितशाह अध्यक्ष बना ,खुल कर जुमले फेंक रहा है
अच्छी-अच्छी नस्ल के तोते हर चैनल में चिल्लाते हैं
चाय  बेचने  वाला  पी.एम.,अच्छे दिन की सौगाते है

मंहगायी के होने पर भी मध्य-वर्ग सब कुछ खाता है
मेरे भाषण  को  सुन कर तो नंगा भी खुश होजाता है
बी.जे.पी,आर.एस.एस देखो,खुशी से  नंगे नाच रहे हैं
अच्छे दिन  आने  वाले हैं, दुनिया  में  सब बाँच रहे हैं

भारत में मँहगायी होना राष्ट्र -उदय का शुभ लक्षण है
मठ, मन्दिर, उद्योग - पति  को  मेरा  पूरा संरक्षण है
ब्रह्म सत्य ,जग मिथ्या है,फिर नंगो की क्या आशा है
भूखा, नंगा  जीवन जीना,अच्छे  दिन की परिभांषा है

पन्द्रह-पन्द्रह  लाख  रूपैया  फिर से खातो में डालूंगां
भारत  के  हर भूखे - नंगे  को  भाषण  से  ही पालूंंगा
भारत में तो  नंगा  होना  आध्यात्म  का चमत्कार है
सारे  नेता  फेल  हो  गये, ये  मोदी  का  आविष्कार है

अभी  ताे  कुर्तों, पायजामो, कच्छो  के अम्बार लगे हैं
चौराहों पर  बोली  होगी,भारत  के  अब भाग्य जगे हैं
बस चलता  तो  पुरातत्व  के  बूढो की भी बोली होती
कुण्ठित प्रतिभा बहुत पडी है,ये सब दर्शन टोली होती

इतनी जल्दी क्या है भाई बिना बात क्यों चिल्लाते हो
हम  चाहै  जो  कुछ  भी पहने, गाना  नंगो का गाते है
कई करोड में  सूट  बिकेंगे, ये  सब  मेरी  नई  चालें है
थोडा  सा  तो  धीरज  रक्खो अच्छे  दिन आने वाले हैं

अच्छे  दिन  आने  वाले  है ,सच्चे  दिन जल्दी आयेंगे
सारे माया मोह छोड कर,कन्द-मूल  फल अब खायेगे
भारत-वाशी राष्ट्र - गीत  अब  मेरा  ही घर-घर गायेंगे
कवि आग लिखते ही जाओ,अच्छे दिन जल्दी आयेंगे।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       मो09897399815
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                        पोलिटिकल-प्रोडक्सन 
अब राजनीति के  उद्योगों  में,  नेता  जी  विज्ञापन में
टी.वी. चैनल  बेच  रहे  हैं, सत्ता,  घर - घर आंगन में
टूथ पेस्ट कच्छा, बनियाने, कुछ  ना कुछ उपयोगी है
काम,क्रोध, मद, लोभ के नेता सब  संक्रामक रोगी हैं
टाफी, बिस्कुट, च्वनप्रास  और विगोरस  है चैनल में
बीच- बीच  में  नेताजी  दिख  जाते  हैं  हर  पैनल में
पता  नही  चलता  टी. वी. में,  विज्ञापन   है, नेता हैं
इस भारत का जनमत भी  तो   इस  कुडे़का  क्रेता हैं
सारे  चैनल   बिके   पडे़   हैं  राजनीति   की  हाटों में
कुचल रहे  हैं,  विज्ञापन  औेर नेता,  सबको, बाटों में
अब डिटर्जेन्ट, खादी के कुर्ते, हर  चैनल  चमकाता है
रिवाइटल  और  च्वनप्रास,  खादी   का मुर्दा खाता है
तकनीकी  के  नये - दौर में  नेता जोकर बन जाते हैं
रूकी हुयी  नदियों  के  जैसे, क्रेता पोखर बन जाते हैं
तर्को  और  कुतर्कों  से  बस, सामान  बेचना जारी है
प्रजातन्त्र  का  पत्थर,  विज्ञापन में  कितना भारी है
कांग्रेस  का  प्रोडक्सन, चर्चा  में  कोई  खास  नही है
बी.जे.पी  कुछ  माल  है,  जनता  को आभाश नही है
अब आप पार्टी, परमानेन्ट,ऐजेन्ट देश में ढूंढ रही है
कम्पटीशन में माल बेचकर,जनता को ही मूंड रही है
स.पा.बा.स.पा. का कबाड़ तो, यू.पी.में बिक जाता है
और बिहार का कुडा,लालू,नितीस, स्वयं बँट जाता है
ममता,समता,ललिता भी विज्ञापन में टिकी हुयी है
कुटीर उद्योग भी लोकल  जनमत से ही बिकी हुयी है
पूरब,पशचिम,उत्तर, दक्षिण के प्रोडक्सन भी जारी है
लोक - तन्त्र  के  शेयर  बाजारों  में ये सबसे भारी है
लोकसभा,राज्ससभा में मुंहमांगी कीमत मिलती है
इस प्रोडक्सन  से  प्रजातन्त्र  की बुनियादें हिलती हैं
टी. वी. चेैनल नये  किस्म  का  वालमार्ट है भारत में
रामायण में मोदी  रथ हैं ,लाल  कृश्ण  महाभारत में
कम्युनिष्टऔरशोशलिष्ट सबअपने घुटने छिलवाते हैं
कवि ‘आग ’ के छन्दों में, नेता विज्ञापन बन जाते है! !!
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                 मो09897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

       

Saturday, February 21, 2015

                     भगवान का अपमान
राजनीति ने  भगवानो  को  सडक  में  लाकर  छोड दिया
सब  धर्म  के  ठेकेदारों  ने   ही   मर्यादा   को   तोड दिया
कोई  धनुष-बाण  खुद  लेकर के, राम  लला  को  ढोता है
कोई  कृष्ण,बाँसुरी  ले रथ पर, गिरधारी  को  ही खोता हेै

कोई शब्द  विषैले लेकर  के  शंकर  बनकर  के  घूम रहा
कोई गणपति बाबा बनकरके फिल्मी दुनिया मे झूम रहा
कंही  दुर्गा माँ  के जगराते, चौराहों  की धूल  को  चाट रहे
कंही अखण्ड  पाठ रामायण  के सुख  समृद्वि  को बाँट रहे

कंही  राम  लीलाये   होती  हेै, मर्याादा   की   नीलामी से
कंही कृष्ण बनाये  जाते  है, यमुना के  तट  पर कामी से
कंही  राधा  कुंज  लताआें  से, काम   कला  झलकाती हेै
कंही गोपी  नग्न सरिता  की  लहरो  में ही  बल खाती है

कही नारद काम के कारण ही विष्णु को शापित करता है
बे-गुनाह श्रवण भी दशरथ के बाणों से तडफकर मरता हेै
निजी  स्वार्थ के कारण  ही कंही ,बालि-वध  हो  जाता है
कंही इन्द्र,अहिल्या की क्रिडा को, प्रथम प्रहर बतलाता है

कंही  प्रहलाद को  होली  में, अपनो  से  जलाया जाता है
कंही हिरण्याक्ष भी शापित हेै,नरसिंह से चिराया जाता हेै
कंही रावण ताण्डव करता  हेै शंकर  को स्वंय लुभाने को
कंही लालाहित है इन्द्र-परी,हर भोग विलाश में जाने को

कंही धनुष राम के हाथो में,कंही सुदर्शन कृष्ण चलाते हैं
कंही  खडग  हाथ  में  दुर्गा  के  काली का रूप दिखाते हैं
कंही  परशूराम  क्षत्रिय  भंजन,,खूनो की  नदी  बहाते है
कंही दीन दरिद्र सूदामा  है,जो, भीख माँग  कर  खातें हैे

भगवान को फिल्मी दुनियाँ भी  चौराहे  में नंगा करती हेै
कुछ राजनीति की  भीडें भी  ना  समझ है पंगा करती है
कानून बने अब कुछ ऐसा,भगवान से भक्त ना खेल सके
उपनिषद ,वेद   की   पूंजी   को  ना चौराहों  में ठेल सके

मेरी रचना  में  तर्क  करो,  पर  चिन्तन  बहुत जरूरी है
संसार   में   जीने  वालों  की  भगवान  नही  मजबूरी है
आध्यात्म धर्म को समझोगे तब कुछ समझ में आयेगा
ये कवि आग की  आदत हेै, हर शब्द सत्य दिखलायेगा।।
                 राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       मो09897399815
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                       भारत का महाभारत
राजनीति के हर विरोध  को  कौरव  सेना  क्यों कहते हैं
राजनीति  के  चक्रव्यूह  में अभिमन्यु  ही  क्यों रहते हैं
अर्जून के गाण्डीव  धनुष  क्यों  पुत्रमोह  को ही सहते हेै
कर्ण,भीष्म और द्रोण हमेशा, अपवादो  में क्यो बहते हैं

वंहा धर्म - युद्व,  यंहा  कर्म - युद्व, दोनो  में  हेरा  फेरी है
वंहा निर्णय  जल्दी  होता है ,यंंहा  हर  निर्णय में देरी है
वहा हिंसक दण्ड का भागी था,यंहा खादी नैतिकवादी हेै
यंहा  राजनीति  ही  वैश्या है, जो  नगर-वधू सहजादी है

वंहा द्रोपदी पाण्डव सेना को प्रण से  रण में उकसाती है
यंहा आज लंगोटी  नेता  के  गुण-गान सभा में गाती है
वंहा अर्जुन किन्नर बनता है ,अपनी ही जान बचाने को
यंहा नेता किन्नर बनता हेै,छल,कपट से रोटी खाने को

वंहा शकुनि चौपड  के पासे बस,खेल रहा  प्रतिशोधों से
यंहा सतरंज  की  चालें  भी चलती विरोध गतिरोधों से
वंहा लक्षागृह  भी  बनता  है शत्रु  अस्तित्व मिटाने को
यंहा आग  लगाते  हैं  नेता  भारत  में  युध्द जुटाने को

वंहा भीष्म प्रतिज्ञा करता है,सर- सैया  पर सो जाता हेै
यंहा नेता करता धरता हेै,जो खसम स्वंय बन जाता हेै
वंहा धृतराष्ट्र को संजय ही ,रण का सब हाल सुनाता है
यंहा  सारे  संजय  अन्धे  है, सब   धृतराष्ट्र  के भ्राता हैं

यंहा राजनीति  में नेता  के भगवान उदाहरण बनते है
वंहा कुरूक्षेत्र  में  गिरधारी, सबके भव-तारण बनते है
यंहा मन्दिर,मस्जिद के झगडे, अल्लाह, ईश्वर ढोते हेै
वंहा आत्मग्लानि से मानव भी जन्मो  तक ही रोते है

ये भारत की  महाभारत  की उपमा हैे आज जमाने में
हर शख्स यंहा  पर  उत्सुक  है,भारत को पूरा खाने में
गीता,कूरान और रामायण से ,राजनीति क्यों होती है
कवि आग  की  कविताएं  क्यों  सत्यवती सी रोती है।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                       मो09897399815
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Friday, February 20, 2015

                        सीता राम-फजीता राम
राजनीति  में  आज  विभिषण होने से नही काम चलेगा
अब हनुमान  भी नैतिकता  के  आदर्शों  से  नही पलेगा
लंका पति  और  रामलला  में  अब  त्रेता  का बैर नही है
राम राज  और  रावण युग  में  सभी  एक हैं, गैर नही है

रावण की  नाभी  में  विष है, अब अमृत का पान नही हेै
श्री लंका  भी  अलग  देश है ,अब वो  हिन्दुस्तान नही है
मेघनाथ  के  शक्ति - बाण में  अब  वो  वैसी धार नही है
सुषैन वैद्य की औषधीयों  में  भी  अब वो उपचार नही है

मन्दोदरी  तो  अब  तलाक  खुद  रावण  से  मांग रही है
आज सुलोचना  मेघनाथ  को  भी  शूली पर  टांग रही है
मारीच ,सूबाहू अब  सोने  का मृग बनने  से  कतराते हैं
नाक कान  कटवाने  लक्ष्मण, सूपर्ण खा के  घर जाते है

सीता माता  स्वयं  राम  को  कोर्ट  कचहरी  दिखा रही है
अश्वमेध की  पीडा  जंगल  में लव-कुश  को सीखा रही है
आज राम की  अग्नि - परीक्षा  लेने  की  औकात नही है
सुख में ये मुमकिन है लेकिन दुख में सीता साथ नही है

अहिरावण भी आज  राम को कूटनीति  ही  सिखलाता हेै
हनूमान और मकरध्वजों का राजनीति  से  क्या नाता है
मकरध्वज  तो हनुमान का डी.एन.ए. खुद  बन  जाता है
ब्रह्मचारी हनुमान  कंहा  अब  पूत्र - मोह  से  बच पाता है

अब  तुलसी  भी शव-साधन से सरिता  पार  नही करता
कामातुर  भी  आसक्ति   से , यती-सती  पर  नही मरता
कितने  तुलसी, वाल्मीकी  की  रामायण  को झाँक रहे हेैं
चरित्र सभी का अपने-अपने  मुल्यांकन   से  आँक रहे हैं

राजनीति  ने  रामचरित  को   जब-जब  भी  अपनाया है
अवधेशों  का  पता  नही  है, पर  रावण  खुलकर आया है
कलियुग  में  अवतारों   की   राजनीति  अभिशाप रही है
कवि  आग  ने  हास्य-व्यंग  में,  होने  वाली बात कही है।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                    मो09897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com
 भरम में धरम
मैं  तो  बस   कुछ   मुर्दों  में  ग्लूकोष  चढाने  आया हूँ
जो  स्वस्थ  दिखायी  देते  हैं,बस,उन्हें जगाने आया हूँ
चाणक्य,विदुर को पढ करके मन ही मन में मुर्झाता हॅू
विरह - वेदना   भारत   की  लिखता  हूँ, रोता  जाता हूँ

ये राम,कृष्ण  की  धरती  हैे जंहा पुरूष ब्रह्म बनजाते हेै
यंहा रावण,कंस उदाहरण है,बह्माण्ड  से जिनके नाते हेै
यंहा महाभारत  भी  होता हेै  तो लक्ष्य धर्म का होता हेै
यंहा कर्ण,भीष्म सा योद्या भी, घुटता  है रण में रोता हेै

सतीअहिल्या,अनुसुइया,यम को भी नियम सिखाती है
यंहा सीता,द्रोपदी,लक्ष्मी भी,पावन  प्रमाण बनजाती हेै
यंहा राष्ट्र धर्म की  रक्षा  में हंस-हंस  कर शीश नवाते हेै
इस आर्यखण्ड  की  महिमा  के, अखण्ड ब्रह्म से नाते है

उपनिषद,शास्त्र  और  वेदों में,इस गुप्त-भेद की गाथा है
हर श्लोक यंहा पर गीता  में, जीवन  का  मर्म बताता है
दानव  भी  धर्म  दिशाओं में ,बस ,यज्ञ-होम से जीते हेैं
यंहा सागर मन्थन  का  अमृत, राहू - केतू  भी  पीते हैं

इस  आर्यखण्ड  की  धरती  में अब बैर पनपते जाते हैं
दुर्भाग्य धर्म  को  पढकर भी,हिंसा  को  गले  लगाते है
सन्यस्त,विरक्ती भेषों  में,यंहा आग  शब्द से जलती है
योग-भोग  की  दुनिया भी यंहा  आडम्बर से पलती है

विस्वास  नही  है, धर्मो  पर,बस सम्प्रदाय पनपाना हेै
मनुष्य कंहा  है  भारत में,मजहब  का  ताना - बाना है
हिन्दू है,कोई मुस्लिम हैे कोई  सिक्ख, ईसाइ कहता है
ये कौम कबीलों  का डबरा,कंही कीचड दरिया बहता हेै

यंहा राजनीति  की  चिन्गारी से आग लगायी जाती हेै
यंहा हिंसा  धर्म  लिबाशों  के  गीतो  से  गायी जाती हेै
राम, कुष्ण, महावीर, बुद्व  के  नाम  से  लीला  होती हेै
यंहा खून के  धब्बे  मानव के,धर्मो की सरिता धोती है

ये शौक  नही  है,  पीडा  है, जो  रोज  छन्द  से गाता हूॅ
आग शब्द  की कविता से,कुछ जिन्दो को सुलगाता हूँ
दुर्भाग्य, खून की गर्मी में,क्यों,हलचल कभी नही होती
आजआग की व्याकुलता,विचलित होकर भी नही रोती।।

                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                    मो09897399815
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Thursday, February 19, 2015

                       आराधना
मै  तो  बस  विनती  करता  हूॅं,भारत  में  भगवानो से
लूट रहे  हैं  तेरी   दुनिया,   निपटो   इन   मेहमानो से
खादी  में   बढती    आबादी , देखो   धर्म   लिबाशों में
फंसा  पडा  है  आज  गेरूआ,  चौपड  के   हर  पासे में
अश्लीलता  झलक  रही    है   अब   तो   तेरे  गानो से
मै  तो  बस  विनती  करता  हूॅं, भारत में भगवानो से

हर मजहब में  देख  रहा हूॅं,  राजनीति  प्रवेश  हो गया
आज दरिन्दा,शातिर दुनिया में दानव, दरवेष  हो गया
धन, दौलत,अय्यासी वाला ,बाबाजी  का भेष  हो गया
दुनिया भर के व्यभिचारों का,मेरा भारत  देश  हो गया
क्यों युवक देश  के  बूढे  हो गये ,पूछो जरा  जवानो से
मै  तो  बस, विनती  करता  हूॅं, भारत में भगवानो से

राजनीति  में  खद्दर  धारी  बूढे  भी  अब   बाप हो गये
भरी उम्र  में  डी. एन. ए. होते  हैं,  कैसे   पाप  हो गये
अरबो,खरबों की  माया है,मालिक का  भी  पता नही है
तुलसी कहें राम  रचि राखा,मानवता  की  खता नही है
ये चोर,उच्चक्के दुनिया में  जीते  हैं,  शौकत, शानो से
मै  तो  बस, विनती  करता  हूॅं, भारत में भगवानो से

कंही मथुरा है,कंही काशी है, घर-घर  में  भरी उदासी है
अब हिन्दू,मुस्लिम झगडों  में, ये सत्ता सत्यानासी हेै
सिक्खो में दंंगे भडक रहे कंही अगडे़ पिछडे़  कडक रहे
घर-घर में बर्तन खडक रहे,शोले शबनम  भीतडक रहे
यंहा भूखी नंगी, कौमें भी मोहताज हैं दानो  - दानो से
मै तो  बस ,विनती  करता  हूॅं, भारत में भगवानो से

कंही सूटों की नीलामी है,कंही  फ्री  में  बिजली पानी है
अब  नेता  सारे  कामी  हैं,  मुर्दों  में   भरी  जवानी है
कंही रामराज के सपने हैं,कंही कंस, दुसाशन अपने हैं
अब  ये  राजनीति  मजबूरी  है, सत्ता में सारे खपने है
हम जैसे  दीपक  बुझते  हैं, इस  हवा और तूफानों से
मै  तो  बस, विनती  करता  हूॅं, भारत में भगवानो से

कनिमोझी , कलमाडी  हैं, बे - नाम,  नाम  के धारी है
चाल, चरित्र  और  चेहरों  में, गाॅधी  के  बन्दर भारी हैं
कंही आठ हजार में थाली है,कंही  भूखे  पडे़ भिखारी हैं
डेढ़ अरब  की  आबादी  में  शिशू  -  निकेतन  जारी है
ये कवि आग की कविता है,जो  भरी  पडी फरमानो से
मै  तो  बस,विनती  करता  हूॅं, भारत में भगवानो से!!
                   राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                          मो09897399815
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Wednesday, February 18, 2015


                कोट-पेन्ट का टैन्ट
मोदी  की  टोपी से महगी  गाँधी जी  की  एक लंगोटी
गंगा  मैया   तेरे  नाम   से   सेंक  रहे  हैं , नेता रोटी
शब्दों   के   सौदागर   देखो,  फेंक  रहे  हैं  कैसे गोटी
पागल बोली  बोल  रहे  हैं,काले  धन  की माया मोटी

कच्छे  बेचो, लच्छे  बेचो,शब्द  छाँट   कर अच्छे बेचो
सरितायें  सूखी  हैं सारी,मगर मच्छ और मच्छे बेचो
शहर गाँव भी बिका  हुआ  है,बचे-खुचे  परखच्चे बेचो
हे शब्दों  के  सौदागर अब  शब्दो  के  भी  लच्छे बेचो

टोपी बेचो घडियाँ  बेचो,अब सुन्दर  फुलझडियाँ बेचो
संविधान की  कोपी  बेचो, गुप्त  बनाओ फिलोपी बेचो
राजनीति  की  काली, पीली, जोकर शक्ले  भद्दी बेचो
रद्दी  बेचो,  सद्दी  बेचो, अब  पी. एम. की  गद्दी  बेचो

कोट  पैन्ट  और   टाई  बेचो,बची है  भारत माई बेचो
दाडी,मूँछ  की  डाई   बेचो, राष्ट्र - भक्त   परछायी बेचो
लोकसभा   के   नाई  बेचो, भाषण  षब्द   हवाई बेचो
काले  धनी   जंवाई  बेचो, मोदी   तुम  मंहगायी बेचो

आरएसएस  चुपचाप  खडी हेै, बीजेपी. परवान चढी हैे
सभी समस्या गले पडी हेै,शब्द बाण  की लगी झडी है
ये  जादू  की  कौन छडी है, स्मृति,सुषमा कौन बडी है
अमितशाह की अलग तडी हेै,ये मोदी की सभी कडी है

भारत माता  तेरी  आड  मैं, नेता क्या-क्या बेच रहे हैं
मामा शकुनि, कंस, दूशासन, सारे इज्जत  खैंच रहे हैं
चाय,पकोडी की  किमत  को, स्वर्णाभूषण तोल रहा है
कपडों की कीमत को भारत, हर चैनल पर बोल रहा है

लाल बहादुर  की  धोती  का,राजनीति में मोल नही है
आघा भारत नंगा - भूखा,उनका कोई  भी तोल नही है
मोदी कच्छा  मुझे भी दे दो, मेरा जीवन सुधर जायेगा
इस कच्छे से कवि आग भी अपनी कविता छपवायेगा।।
                   राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
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Tuesday, February 17, 2015

   रोडे. के घोडे.
सब कहते  है  कैसे  होगा,  अब   तो   कुछ  सहयोग करो
आज समस्या भारत की  है, कुछ बुद्वि  का  उपयोग करो
वैमनस्य की अभिलााशा से क्यो जनमत को तोड रहे हो
सारे मिल कर  आम  आदमी  को  ही क्यों निचोड रहे हो

जो - जो   वादे  तुमने  बोले, उसने  भी  तो  वही  बोले हैं
जिस लिबास में  तुम  बैठे हो, उनके  भी तो वही चोले हैं
सब मिलकर प्रयास करें  तो  इसका  हल  भी आजायेगा
वैमनस्य  की  राजनीति  को,वैमनस्य कब तक खायेगा

कुछ ना कुछ तो मची है हलचल आम आदमी के आने से
व्यभिचारी  भयभीत  हुये है,  राष्ट्र- भक्ति के  इस गाने से
ये  जनता  जागीर  नही  है, सभी  तो  ये  भारत वाशी है
नेताओं  कुछ  शर्म  करो  ये  सत्ता, जनमत  की  दासी है

मुझे  बताओ कौन है ऐसा जो विकास को नही चाहता है
मुझे  बताओ  कौन  है  ऐसा, अभिव्यक्ति  से  मुर्झाता है
हम सात  दशक  तू-तू-मै-मैं  करके  ही  तो बर्बाद हुये है
इस राजनीति की  वैमनस्यता  से  ही  तो  जेहाद हुये है

राजनीति  से  सत्य-तथ्य, ईमान धर्म सब जुड जायेगा
सोने  की  चिडिया   भारत, फिर से सोम,व्योम जायेगा
निन्दा, चुगली  छोडो   नेता,  बस  थोडा  सा  नेक बनो
इन बच्चो  के  साथ  जुडो  बस ,इस भारत मे एक बनो

नये - नये   बच्चे   है  माना , भाव  राष्ट्र  भरपूर  भरा है
इस राजनीति में बे-दाग  हैं, लगता  है  ये स्वर्ण खरा है
चोरों को  तो  डर  लगता  है, तकनीकी  के  आयामो से
अब  बूढे  भय-भीत  हुये   है, अपने  ही  गिरते दामो से

युवा  देश के  एक  बने  सब , पत्थर  भी  पानी छोडेगा
नामुमकिन भी मुमकिन होगा भाव हृदय के ही जोडेगा
झण्डो - डण्डो  से  बच्चों  को  भटकाना अब बन्द करो
उल्टी - सीधी भांषा  से  अब  जनमत मे ना गन्द करो

सारे  नेता  अय्यासी  के  सब   धन्धों   पर   रोक  करें
वेतन - भत्ते, पेन्शन  और  कमीशन  को  भी चोक करें
केवल  सेवा- भाव  राष्ट्र  का  थामें, मिलकर  काम करें
अपनी  निष्ठा  देंखे  बस,  ना  दुसरे   को   बदनाम करें

अगर राष्ट्र- भक्ति की निष्ठा है  तो  सारे  काम  जरूरी है
तुमने  भी  जो  किये थे वादे उनमे भी क्या मजबूरी है
सब  कुछ  सम्भव हो सकता है राष्ट्र-धर्म को अपनाओ
कवि आग  की विनती है बस,अौर ना भारत को खाओ।।
                    राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
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Monday, February 16, 2015

मै  पहाड  हूँ
उत्तराखण्ड के बियाबान में मौन  खडा हूँ क्यों उजाड हूँ
भारत की  दृष्टि-श्रृष्टि  में  जल  श्राेतों  से भरा कबाड हूँ
रोम -रोम जंगल  थे  मेरे, काट दिये, बस बचा झाड हूँ
किसके आगे व्यक्त करूं  दुखः, दीन-हीन हूँ मै पहाड हूँ

मैं गंगा,यमुना  का  उदगम  हूँ, मेरा  पानी  बाँट रहे हैं
सागर तक सरिता बहती है,जिल,प्रान्त ही काट रहा हेैं
मौन हुआ सब देख रहा हूँ,खण्ड-खण्ड भारत माता का
पूण्य किया  तो  पाप मिला है,ये हाल जीवन दाता का

मेरी तुमने  श्वांस  रोक  कर  ,  मेरे  उपर  डाम  बनाये
संसाधन   के  प्रसाधन  से, सबने  अपने  काम चलाये
मेरी नाडी, आंत,  आंतडिया, ये  सरितायें  सूख  रही हैं
मूझे  बताओ  भारत - माता, क्या ये  मेरी  चूक रही है

वही सोम है,वही व्योम हेै,इस  भारत  की  वही कौम है
मनवता  के  चंचल  तन  में,मांस,रूधिर है वही रोम है
अभिलाषा  से  सूख  रहा  हूँ, कर्म-मर्म  से  चूक  रहा हूँ
कुछ ना कुछ तो कारण  होगा, लगे घाव में मूक रहा हू

कितनो के मैं दोष गिनाउं,किस के मैं  उदघोष गिनाऊं
कितनो के आगोष गिनाउं,कितनो से अफसोस जताऊं
इस  धरती  की  मानवता ने ,मेरा  ही  संहार  किया है
सतयुग, द्वापर  या  त्रेता हो, सबने अत्याचार किया है

मेरे  नाम  से  खाने  वाले,पल-पल  मुझको मार रहे हैं
आडम्बर  में जीने  वाले, सब  कलियुग अवतार रहे हैं
मैं सरहद हूँ आर्यखण्ड की,आज विखण्डित ही रोता हूँ
दुर्बलता  मेंं  मौन  खडा  हूँ,मानव  से दण्डित होता हूूूूँ

येआग तो बस,लिखता है,जनता का कुछ चाव नही है
नासूर  भभकती  इस छाती में,छोटे-मोटे  घाव नही है
मैं जीवन  देने  वाला हूँ,  जीवन  में  भयभीत  मरा हूँ
जली  आग  की  बुझी राख में दबा हुआ अंगार डरा हूँ।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
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Sunday, February 15, 2015


                  संकल्प और विकल्प
इस प्रजातन्त्र के मंन्दिर में कुछ अच्छीअच्छी मूरत हों
विभत्स-रोद्र  से  हट करके  कुछ अच्छीअच्छी सूरत हों
सब ज्ञान-वान  हों  निष्ठा से, ना व्यभिचारी ना धूरत हों
जो इस भारत को  देख  सकें, बस  ऐसी राष्ट्र जरूरत हों

खादी के कफन लिबाशों  ने  तो देश को पूरा चाट लिया
अखण्ड- राष्ट्र था दुनियां में  टुकडों-टुकडों  में बाट दिया
जाति मजहब  की  छूरी से हर घाव-भाव का काट दिया
हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख, इसाई से भारत  को छाँट दिया

अब  व्यभिचारों  की  चोटों  से  ये  राष्ट्र, कष्ट कहराता हेै
सर्जन भी  नया  नमूना  है ,जो  उपचार हमें बतलाता है
नया चिकित्सक, व्याधी में  भी  नया रोग दिखलाता है
आरोग्य-धाम चिकित्सालय ही भारत भाग्य विधाता है

अधमरे   मरीजों  के  उपर, अब  ग्लूकोष  चढाये जायेंगे
जनमत की  शल्य - चिकित्सा से, राष्ट्र-ध्वजा फहरायेंगे
अपने ही  घर  के  राष्ट्र - गीत, सब लालकिले  से गायेंगे
शमशान  शवों  को  नर-भक्षी,  अब पक्ष-विपक्षी खायेंगे

बलशाली वोट  की ताकत में, फिर  ये  कैसी कमजोरी हेै
इस लोकतन्त्र  षडयन्त्रों  में  क्यों  बैठा  मन्त्र अघोरी है
जनमत के  भीख, भिखारी  की  क्यों होती सीनाजोरी है
क्यों सातदशक से संविधान की पुस्तक अब भी कोरी है

जिस राष्ट्र   का यौवन,मुर्दाें की, कफन ध्वजा को ढोता है
जिस  राष्ट्र का नेता धृणा के बीजों को मजहब में बोता है
जिस राष्ट्र का चिंतन मंथन भी माकूल समय में सोता है
उस राष्ट्रका जीवन दुनिया में निष्क्रीय,निकृष्ट ही होता है

लिखता हूँ छन्द,दबंगो का,फिर से  मैं अलख जगाने को
स्वप्नो में भारत डाल रहा हूँ,जनमत झलक दिखाने को
व्याकुल भी हूँ  कई जन्मो से,मै राष्ट्र - गीत को गाने को
मैं  दिल  से  आग  उगलता हॅू,अंगार  बुझे  सुलगाने को।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                           9897399815
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Saturday, February 14, 2015


                भारत भाग्य विधाता
मेरे  बाप  का  क्या   जाता   हैे,  वादे  कर दो
ये  वादे पूरे कब होते  हैें, बस,  आधे  कर दो
मोदी ने  जो  किये  हैं , पहले    उनको  देखो
कीचड कमल अमल है पहले उस पर फेको

सात  दशक  से  कांग्रेस   ने  यही   किया हेै
चोर, उचक्को   ने  भारत   का खून पिया है
इसी   बात   का   छोटे - मोटे   दल  खाते हेै
झूठ, कपट, छल  प्रजातन्त्र  की औकाते हेै

झोपड  पट्टी   राजनीतिक   उद्योग खरा है
इतिहास  गवाह  है,नेता  ने ये खेत चरा है
ये नंगे - भूखे  राजनीति  की   हरियाली हेै
इस  बंजर  खेती  के ,  नेता    ही   माली है

प्रजातन्त्र  झोपड  पट्टी    से  ही जिन्दा हेै
सत्ता  पाओ, फिर  तो   नंगो   की निन्दा है
ये राजनीति की  नर्सरीयाँ  उत्तम बीजों की
प्रथम  पाठशाला    है,  सरकरी   लीजों की

अरविन्द केजरी,मोदी हो या अटल बिहारी
लालूऔर मुलायम,ममता,ललिता प्यारी
ये झोपड पट्टी  राजनीति  को पनपाती है
इस  गुरूकुल  से   नेता   की पीढी आती है

ये  नेताओं  की  भीड  जुटाने   ही  आते हैें
पहले मुफ्त  थे, अब तो ये  ध्याडी पाते है
लोकतन्त्र  की  बुनियादों  के  ये पत्थर है
आँखों  से  ओझल हैं,जीवन भी बद्तर है

ये कुटिर उद्योग  हर  प्रांत में बिछा  पडा है
हिन्दू,मुस्लिम,कौमों का ये अलग धडा है
नगर पालिका,पंचायत के शिशू निकेतन
ये राष्ट्र धरोहर संविधान के जन गण मन

भारत  में  नंगा   ही   सत्ता    दिलवाता हेै
वादे  करदो, मेरे  बाप   का   क्या जाता है
हर  नेता  नंगो पर  ही   डोरे   डाल  रहा है
कवि आग,भारत  को   नंगा  पाल रहा है।।
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                 9897399815
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Friday, February 13, 2015

           भूल के शूल
अब मुझे  देख कर मेरा कुत्ता भोक रहा हेै
मालिक भी नौकर से डर कर चोक रहा है
प्रजातन्त्र  में  पराधीनता  ही  मालिक है
डेढअरब की भीड देश में क्यो कालिख है

जनमत  भीख,भिखारी राजा बनजाते हेैं
मालिक  भूखे ,माल  भिखारी ही खाते है
चरण-वन्दना, चोर  डाकुओं  की जारी हैेे
मालिक तो  हल्का है अब सेवक भारी हेै

झोपड - पट्टी,नंग - मतंगो की माया हेै
भारी भरकम खादी  की निर्मम काया हेै
सर्वगुण  सम्पन्न चोर ही  क्यो भाता हेै
लोकतन्त्र  बीहड  से  डाकू क्यों आता है

हम पराधीन थे पराधीनता की है आदत
बस,बच्चे पैदा करो देश मे यही शहादत
फिर चिल्लाओ रोटी,कपडा और चाकरी
भारत का तो यही लक्ष्य है आज आखरी

सब सेवक सम्पन्न भिखारी मस्ती में हेै
असली मालिक भारत केअब बस्ती में है
तृप्त-वाशना, जनमत  का  ये परं धाम है
र्निपेक्ष-धर्म का संविधान में यही नाम है

हर वर्ष देश में नेता और बस्ती बढती हेै
गुप्त-दान से आज व्यवस्था ही सढती है
बस्ती, गस्ती, मस्ती, नेता खूब बढाओ
नंगीभूखी जनसंख्या की ध्वजा घुमाओ

ये वोट-बैंक की राजनीति ही पनपाती है
आज सियासत राष्ट्रगीत इनका गाती है
बिजली,पानी,भवन, चाकरी पा जायेगी
आज राष्ट्र  को  नेता की हरकत खायेगी

बन्द करो बकवास, सियासत ढोने वालो
मुशीबतो को देख मत,जनमत पर टालो
देश  के नेता  सभी  समस्या  टाल रहे है
ग्वाल-बाल  का  देश है  बच्चे पाल रहे है

हर मजहब को राष्ट्रहितों से जोड के देखो
मानवता  में  कौम-कबीले मोड के देखो
जनसख्या  बढने  से हिन्दुस्तान मरा हेै
हर  छन्दों में  कवि आग का घाव हरा है
      राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                9897399815
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             शपत में खपत
अब क्यों गोपनीयता की शपत चौराहों में
अब क्यों  कुचलते  हो  सियासत पाँवों मे
अब क्या   दिखाना   चाहते   हो  देश  को
अब क्यों  तोडते हो  राष्ट्र  के  परिवेष  को

ये  अदालत   क्यों   जलालत   हो  रही है
चौराहो  में   भी  अब  वकालत  हो रही है
ये  सियासत  राष्ट्र   को   क्यों  खो रही है
अब देख  लो  जनता  गधों  को ढो रही है

सब जानते हे इस शपत में क्या लिखा हेै
ये राष्ट्र  भी  तो इस शपत  से ही बिका है
कौेन  हैे  जो  इस  शपत   को  मानता हेै
अब  ये   जमाना   लोकशाही  जानता है

सिद्यान्त से इस भीड को क्यों नापते हो
क्यों वोट के  कारण  सडक में हापते हो
मिल गया जनमत कुछ करके दिखाओ
चौराहे  की सर्कस ,सदन को ना बनाओ

वही मदिरा पुरानी बोतलों में भर रही है
जनता नशे मे  चूर, अब  भी  मर रही है
लेवल बदल कर क्या हमे  दिखलाओगे
अब  गीत  तो  तुम  भी  पुराने  गाओगे

जनसर्मथन ही  तो सब कुछ कह रहा है
बे- भाव  के  क्यों  भावना मे बह रहा है
रिक्तता  तुम  को  मिली भरके दिखाओ
आग की मानो  तो कुछ करके दिखाओ।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                 9897399815
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          मनोज ध्यानी जी के आग्रह पर
                   टीचर और फ्यूचर
गुरू,अध्यापक,और टीचर  में  क्या फर्क है,मुझे बताओ
अतंरग चेतना,दिल,दिमाग में कंहा तर्क हेै मुझे बताओ
क्यों गुरूकुल की  शिक्षा, दीक्षा,  वर्तमान से तोल रहे हो
वेतन, भत्ते  वाले  टीचर  को  गुरूजी  क्यों  बोल  रहे हो

सरकारी   संसाधन    पाने   वालो   में   आदर्श  कंहा है
भटक रहे  हैं  युवा  देश  के  शिक्षा   में  निष्कर्श कंहा है
पौराणिक  शिक्षा की बुनियादों  पर  भारत आज खडा है
वर्तमान  की  शिक्षा  में  तो  वैमनस्य  अल्फाज बडा है

गुरूकुल  की  शिक्षा  में  शिक्षक  आदर्शों  में ही जीते थे
हर विकार को  मन-मन्थन के निष्कर्शो  से ही सीते थे
छात्र बने महापात्र जगत के,शिक्षक  की  अभिलाशा थी
कष्ट-हीन  हो  राष्ट्र - सुरक्षा, शिक्षा  की  ये परिभांषा थी

संस्कारहीन पर भी संस्कारो का प्रक्षेपण  एक कला थी
सत्य,धर्म पर जीना मरना गुरूकुल की नेक सलाह थी
हर मजहब  में प्रेम, प्यार  हो, समदृष्टि दर्शन होता था
शिक्षक  छोटी सी बगिया में,बीज ज्ञान के  ही बोता था

आज देश मे घर-घर शिक्षा से यौवन क्यों  भटक रहे हैं
बे - रोजगारी, भ्रष्टाचारी, शूली  पर  क्याें   लटक  रहे हैं
विश्वविद्यालय  राजनीति  की,संसद में तब्दील हो गये
आज  देश  के  चौराहों पर ,युवक देश की कील हो गये

इन परिणामो को सुन कर भी, आदर्शों की होड लगी है
ऐसी शिक्षा,आज देश में, मुझको तो बस,कोढ. लगी है
एल.आइ.सी.एजेण्ट गुरूजी,ट्यूशन परमानेण्ट गुरूजी
प्रापर्टी  डीलर   में  देखो, कंंहा - कंहा  सरवेैण्ट  गुरूजी

शिक्षाओं के इस विरोध में लिखने  का भी शौक नही है
शिक्षा  तो  आदर्श  जगत है राजनीति का चौक नही है
अच्छा   होता    प्राइवेट   स्कूलों  में  अवरोध  लगाते
एक  ही  शिक्षा  देश में  होती, सारे बच्चे लुफ्त उठाते

मैं  भी   कहता   भारत  माता, तेरे  बच्चे  समदर्शी हैं
भेद-भाव  का  घाव  नही  है,शैशवता  के  ममस्पर्शी हैं
कविआग का हाथ जोड कर,नेता,गुरू से यही सवाल है
अपने  अन्दर  झांको, देखो, यौवनता में कहा बवाल है।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     9897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, February 12, 2015

 दिल्ली की किल्ली
मरना   है   तो  पूर्ण - राज्य  का  दर्जा लेलो
मोदी  की  गोदी   में   बैठो   खुलकर   खेलो
राजा  बनकर  खुदी  भिखारी   बन  जाओगे
रोटी  भी  मोदी   के    टुकडो    की  खाओगे

अब तक जो भी  राज्य  बने  हैे  हालत देखी
पेट  भरा  जब   दिल्ली    ने   ही  रोटी फेंकी
सब  धनवानो  की  इच्छा   पूरी  हो  जायेगी
जो नंगी  जनता  साथ है  तेरेे   कंहा जायेगी

केन्द्र समर्पित  हो  करके  घर   तो बसवालो
जनता  के  जो - जो  वादे    है   उनको पालो
अलग खडे हो स्वाभिमान तब तक जिन्दा है
ये  स्वाधीनता,  पराधीनता    की   निन्दा हेै

बिजली,पानी,स्वास्थ,सुरक्षा,शिशू की शिक्षा
झोपड ,पट्टी,  टम-टम, गाडी, टेम्पू,रिक्शा
इतने में  ही  सब  खून, पसीना  बह जायेगा
स्वाभिमान सत्ता का, फिर  कब तक गायेगा

इस खण्ड-खण्ड  से  पूरा  भारत लुटा पडा हेै
हर पृथक  राज्य तो  चौराहे में आज खडा है
जब तक  दिल्ली  केन्द्र  संरक्षण में रहती हेै
ये विकाश  की  सरितायें  तब  तक बहती हैं

जो भाव मिले है उन भावों में  घाव ना डालो
जनमत की इच्छा से बस जनमत को पालो
शिक्षा,स्वास्थ सुरक्षा  पर ही ध्यान लगाओ
जितनी चादर  मिली  है उतने चरण बढाओ

अब  धीरे-धीरे  चलने  में  कुछ  हार  नही है
ये राजनीति है , पवन - व्योम संचार नही हेै
पृथक  राज्य  की  औकातो  को  देख रहा हूँ
कवि  आग  हूँ,  कुछ  चिन्गारी  फेक रहा हू।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                मो0 9897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

Wednesday, February 11, 2015


                  नीलामी में भगवान
श्री  राम ,अब  फ्री राम  हैं  जो चाहे उपयोग में लेले
धर्म यंहा फुटबाल बन गया जो भी चाहे आकर खेले
राम, कृष्ण का  ज्ञान  नही  हैे सारे तोते चिल्लाते हेैं
कुछ नेता तो राजनीति में राम,कृष्ण की ही खाते हैं

गुप्त नाम की सभी  नुमाइस  चौराहे में क्यों करते हेैं
परंतत्व के सागर में भी जहर सियासी क्यों भरते हैं
पत्थर  भी  तरते है,लेकिन यंहा तो  मूरख तैर रहे हैं
कालनेमि क्यों कर में माला,राम नाम की फेर रहे हैं

राजनीति के व्यभिचारी भी राम को कन्धे में ढोते हेै
अल्लाह के गन्दे,बन्दे भी मंदिर, मस्जिद को रोते हेै
चर्च- पर्च  और  गुरूद्वारे  में, धर्मो के  उन्मादी देखो
डेढअरब की इन भीडो से तुम भी आओ पत्थर फेंको

आडम्बर  के  अम्बर  सारे  पैगम्बर  बन  घूम रहे हेैं
राम - नाम की  चादर  ओढे, देखो  ढोंगी  झूम रहे है
हर चुनाव में भगवानो  की खुलकर नीलामी होती है
छोटे - मोटे  ढोंगी  छोडो, हस्ती  सब  नामी  होती है

कोई  सिंहल, तोगडिया  है, कोई   बाबा  नंग लंगोटी
काम - वाशना  के  कीडे भी ,सेंक  रहे है अपनी रोटी
आखिर कबतक भगवानो को ऐसे ही बदनाम करोगे
सीतामाता,अनुसुइया को कब तक झण्डू बाम करोगे

गुजराती  तो  हर-हर मोदी  को मन्दिर में डाल रहे है
अवतारों  में  गाड-गोड्से ,गांधी समझ के पाल रहे हैं
कुछ वर्षों में राम - कृष्ण और, शंकर  से आगे जायेगे
आने  वाली  राजनीति   में  नेता  ही  अवतार आयेगे

कितना ईश्वर इन मुर्दों को,और कंहा तक अब ढोयेगा
इस भारत  में  पैदा होकर और कंहा  तक अब रोयेगा
तुम  चाहे  देखो  ना देखो, मैं तो सब कुछ देख रहा हूँ
राम कृष्ण के सर-सन्धानो से शब्दों  को  फेंक रहा हूूूूँ

इन अभिशापो को पहचानो,भगवानो को उनपर छोडो
वेद,शास्त्र,गीता,रामायण  के  भावों  को और ना तोडो
राजनीति में भगवानो की,जब-जब जो भी बात करेगा
कवि आग के अमरशब्द मे अभिशापित संघात मरेगा।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     मो0 9897399815
         rajendrakikalam.blogspot.com

Tuesday, February 10, 2015

                 पप्पू पास हो गया
मेरा  पप्पू  पास  हो  गया, आम  आदमी खास हो गया
वाणी भूषण नास हो गया,बुद्धि - बल्लभ  लाश हो गया
नेता का उपहास हो गया,खेत  में  गाजर  घास हो गया
डाल में उल्लू  वास हो गया,जनमत मुर्दा मास हो गया
रस्तों का चौरास हो गया,मस्तों  का  मधुमास हो गया
मेरा पप्पू  पास  हो  गया, आम  आदमी  खास हो गया

योग,भोग उच्छ्वास  हो  गया,जोगी सत्ता दास हो गया
मन्थन  सूरदास  हो गया, तोता  तुलसी  दास हो गया
ब्रह्मचर्य  का  त्रास  हो  गया,बाबा  मेंं  उल्लास हो गया
धर्मो का मलमास हो गया,मजहब अब नखास हो गया
अल्लाह ,ईश्वर नाश हो गया, संप्रदाय विस्वास हो गया
मेरा पप्पू  पास  हो  गया, आम  आदमी  खास हो गया

देष का नेता न्यास हो गया,संविधान उपन्यास हो गया
धरती का  आकाश  हो  गया, बीहड़  में आवास हो गया
हडताल यंहा उपवास हो गया, गाली देना खास हो गया
राज सभा पटवास हो गया, लोकसभा  सण्डास हो गया
अब चुनाव चौमास हो गया,चमचा,चारण दास हो गया
मेरा  पप्पू  पास  हो  गया, आम  आदमी खास हो गया

हर दफ्तर जनवास होगया,अधिकारी शुकनाश हो गया
सबको भी एहसास होगया,हर धन्धा प्रतिमास हो गया
लेन-देन अब खास हो गया,देश का  सत्यानाश हो गया
इमान,धर्म बकवास हो गया, ये  कैसा  विकाश हो गया
सबका  ये प्रयास हो गया ,अब  खुल्ला उपहास हो गया
मेरा  पप्पू  पास  हो  गया, आम  आदमी खास हो गया

मोदी अब बकवास होगया,अमितशाह का हास हो गया
किरण पर्दाफास  हो  गया,अब सूरज राहू ग्रास हो गया
सबको ये अभ्यास हो गया,झूठ कपट अरदास हो गया
मन्थन में अवकास होगया,चितन भी इतिहास होगया
हम को भी आभास  हो गया, अहंकार का नास हो गया
मेरा  पप्पू  पास  हो  गया, आम आदमी खास हो गया

छोटू  नेता व्यास हो गया, संसद भोग विलास हो गया
अब जनमत चपरास हो गया,कुष्ट रोग पटवास होगया
जोकर अब बिन्दास हो गया,घर-घर में सूभाष हो गया
गिरगिट भी कुकलास होगया,भारत का प्रवास हो गया
ये,चारण विस्वास हो गया,कवि‘आग’बकवास हो गया
मेरा पप्पू पास हो गया, आम आदमी खास हो गया !!
नखास- घोडो! की हाट
पटवास-षिविर,केम्प
कुकलास-डायनासोर

            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
               मो0 9897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

Monday, February 9, 2015

              साधो - आग लगादो
अगर  देश  में   सब   बाबा   संकल्प  उठालें
ये राष्ट्र - भक्ति   की  माई  केवल  बच्चे पालें
अच्छी नसल की फसलें  फिर  से लहरायेंगी
ऋषिकुल  पीढी, फिर  से  भारत  में आयेंगी

क्यों बाबा, माई  को  बच्चों  की चिन्ता भारी
स्वस्थ, मस्त  कितने  हैें  भारत में ब्रह्मचारी
अच्छी   धरती   हो  तो   पौेधे  स्वस्थ फलेंगे
फिर  तो  हिन्दूस्तानी  मिलकर  साथ चलेंगे

काजू, किसमिस, खीर,मुनक्का तुम खाते हो
उपयोग करो इस तन का,तुम क्यों शर्माते हो
हम  सब  भी  तो  ऋषि-मुनि की सन्ताने हैं
अब  गोत्र,  सूत्र,  संस्कार  हमारी  पहचाने हैं

औलाद , हमेशा  गृहस्थ  बैल से ही पलती हेै
नसल   हमेशा   साँडो   से  ही  तो  चलती है
बापू, बाबा  इस  कलियुग  में सभी उदाहरण
ये इन्द्र देव  अवतार  सभी भव-सागर तारण

सब स्वस्थ शरीरों  मस्त  फकीरों की माया है
गीता  में  तो   ये   सब   ही   नश्वर  काया है
बस, नश्वर  माया ,नश्वर  काया  एक बनाओ
हे राष्ट्र-भक्त कुछ  राष्ट्र-गीत तो तुम भी गाओ

उर्वशी,  मेनका, रम्भा  तुम  को  देख  रही हैं
सब इन्द्रलोक  में  बैठी   नजरें   सेंक  रही हैं
करो शकुन्तला पैदा, बाबा ,इस ऋषि भेष में
दुषयन्त  पुनः, अवतार  धरेगा, इसी  देश में

अब  कोई  छः, कोई  दश , कोई चालीस बोले
क्यों  खोल  रहे  हैं,  बाबा ,माई  अपने  चोले
ये भीख माँग  कर,  मधूकरी  से  खाने  वाले
सब  साँड  हमेशा  हमीं  गृहस्थों  ने  ही पाले

अब  लुफ्त, मुफ्त  का  लेने वाले देश चलायें
सब  मेहनत  मेरी,  बैठ-बैठ  कर  बाबा खायें
कुछ  तो  संयम-नियम  बैठकर मूँह में डालो
सन्यासी,  वैरागय - धर्म  को  कुछ  तो पालो

क्यों  बच्चे  पैदा  करने   की   बाते  कहते हो
काम- वाशना  की  दुनियां  में  क्यों  बहते हो
भजन  करो  बस, योग- साधना  को ही साधो
कवि आग  की  मानो  बस, इतना  मत पादो।।
       राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
           मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

            साधो - आग लगादो
अगर   देश   में   सब  बाबा    संकल्प  उठालें
ये राष्ट्र - भक्ति   की   माई  केवल  बच्चे  पालें
अच्छी  नसल की  फसलें  फिर  से लहरायेंगी
ऋषिकुल  पीढी,  फिर  से  भारत  में  आयेंगी

क्यों  बाबा, माई  को  बच्चों  की चिन्ता भारी
स्वस्थ,  मस्त  कितने  हैें  भारत  में ब्रह्मचारी
अच्छी  धरती   हो  तो   पौेधे   स्वस्थ  फलेंगे
फिर  तो  हिन्दूस्तानी  मिलकर  साथ  चलेंगे

काजू, किसमिस,खीर, मुनक्का तुम खाते हो
उपयोग करो इस तन का,तुम क्यों शर्माते हो
हम  सब  भी  तो  ऋषि-मुनि  की सन्ताने हैं
अब  गोत्र,  सूत्र, संस्कार  हमारी  पहचाने  हैं

औलाद , हमेशा  गृहस्थ बैल से  ही पलती हेै
नसल  हमेशा  साँडो   से   ही   तो  चलती है
बापू,बाबा  इस  कलियुग  में  सभी उदाहरण
ये इन्द्रदेव  अवतार सभी  भव-सागर तारण

सब स्वस्थ शरीरों मस्त फकीरों की माया है
गीता   में   तो   ये   सब   ही  नश्वर काया है
बस,नश्वर  माया ,नश्वर  काया एक  बनाओ
हे राष्ट्र-भक्त कुछ राष्ट्र-गीत तो तुम भी गाओ

अब कोई छः,कोई  दश , कोई चालीस  बोले
क्यों  खोल  रहे  हैं, बाबा ,माई  अपने  चोले
ये भीख माँग   कर, मधूकरी  से  खाने वाले
सब  साँड  हमेशा  हमीं  गृहस्थों  ने ही पाले

अब लुफ्त,मुफ्त  का लेने  वाले  देश चलायें
सब  मेहनत  मेरी, बैठ-बैठ  कर  बाबा खायें
कुछ  तो संयम-नियम  बैठकर मूँह में डालो
सन्यासी, वैरागय - धर्म  को  कुछ तो पालो

क्यों  बच्चे  पैदा  करने  की  बाते  कहते  हो
काम-वाशना  की  दुनियां में  क्यों  बहते हो
भजन  करो  बस,योग- साधना को ही साधो
कवि आग  की  मानो  बस, इतना मत पादो।।
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
               मो0 9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com

Sunday, February 8, 2015

              भांषा का झांसा
मोदी   तेरे  शब्दो  में, अब   जान   नही है
जो  हमने  सोचा  था, वो  पहचान   नही हेै
भाषण में जो धार दिखी  थी कंहा  खो गयी
नेताओं की  लोकल - भांषा , वही  हो गयी
बूरा  ना  मानो ये  भारत की ,शान  नही है
मोदी   तेरे   शब्दो  में,  अब   जान नही है

शेर  सडक  में  घूमेगा   तो    कौन  डरेगा
चौराहों  में   तेरी   इज्जत    कौन   करेगा
चूहों  से  क्या  शेर  कभी   लडता   है भाई
विधानसभा में पीएम.ने भी  कविता गायी
भारत माँ  के   तुमसे  ये  अरमान  नही है
मोदी  तेरे  शब्दो   में,  अब   जान  नही है

तेरे  कारण अलुवे - ठलुवे सब पार हो गये
पहले  दुश्मन  कम  थे, अब हजार हो गये
आर.एस.एस. चाहती  है,मेरी भांषा  बोलो
शब्द संघ के मूंँह में डालो  फिर मूँह खोलो
क्या बिना संघ के तेरी भी  पहचान नही है
मोदी  तेरे  शब्दो  में,   अब   जान  नही है

जो हार गये थे,उन्हें  भी  कुर्सी  बांट रहे हो
अब  नौ-रत्नो में  सभी विरोधी  छांट रहे हो
ये  बाबा  बच्चे  पैदा  करने   को  कहते हैं
डेढ अरब  को  हम  पहले  से   ही सहते हैं
ये  तो  कोई  राष्ट्र - भक्त   फरमान  नही हैं
मोदी  तेरे  शब्दो  में,   अब   जान  नही है

अटल बिहारी  भी  लडते  थे   यही लडायी
पीएम.बने तो आरएसएस .ने खोदी खायी
तब  सारे जोगी  बने  विरोधी  एक हो गये
तोगडिया  से  अटल बिहारी,  खुदी रो गये
अब ये भारत है, मुर्दो का  शमशान नही है
मोदी  तेरे  शब्दो    में,  अब  जान  नही है

जिनके  मूह  मे  शब्द नही  ,अब गुर्राते है
हर  चैनल  में  जहरीले    भाषण   गाते है
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई  क्यों जारी है
अब  मोदी  हल्का, सत्ता  में   चेले  भारी है
सम्पदाय  का   भारत में  गुणगान नही हेै
मोदी  तेरे  शब्दो  में,  अब   जान   नही है

आज  तू  ही  मेरे भारत  का मुकुट-मोर है
पूरी  दुनियां   में   तेरा   ही   मचा  शोर है
ये  चूहे, बिल्ली गले  में घण्टी   टाँग रहे है
अपनी  आशा-तृष्णा  तुझ  से   मांग रहे है
अगर  आग  में तेज नही, पहचान  नही हेै
मोदी  तेरे  शब्दों  में,  अब    जान  नही है।।
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
              मो0 9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com

  खादी की व्याधी
अब राजनीति  के  हर  कूँवे में भांग पडी हेै
तभी  तो  भारत  में  खादी की मांग बढी है
हर  खद्दर - धारी, चूर  नशे  में  डोल रहा है
जो  भी  मूँह  में आता  र्हेेै ,बस,बोल रहा हेै
क्यो चौराहे  में भारत  माता  आज खडी है
अब  राजनीति  के  हर कूँवे मे भांग पडी हेै

काम - राज  को  राम - राज  से दरसाता है
ये  साँड  क्यों जनमत  की फसलें खाता है
मेहनत  और  मजदूरी केवल  हम करते है
हम  भूखे   हैं, पेट इन्ही  के  क्यों  भरते है
ये सारे  नेता  व्यभिचारों  की  एक  कडी है
अब  राजनीति  के हर कूँवे  में भांग पडी हेै

तेल,गैस का गणित सुना है कितना सस्ता
भाशण सुनो ,तो कहता  है हालत है खस्ता
मंहगायी  के  मुकुट  पहन कर  घूम रहा है
सत्ता  के  मद - मस्त नशे में   झूम रहा है
शब्द  सुनाे, जैसे  जादू  की   हाथ   छडी है
अब राजनीति के  हर  कूँवे में  भांग पडी हेै

बे-सूमार धन, हर  चुनाव  में  झोंक रहा है
अहंकार   में   चूर, सभा  में  भौंक  रहा है
सुन्दर - सुन्दर  शब्दो  से   गाली  देता हेै
लावारिस   जनमानस   हेै, ताली  देता हेै
जनता की लाशों  पर  देखो   नजर गढी है
अब राजनीति के हर  कूँवे में भांग पडी हेै

आतंक-वाद  कर्कस  शब्दो से पनपाता हेै
राष्ट्र - गीत  भी  राष्ट्र - द्रोह  कैसे  गाता है
लालकिले में  गढा   तिरंगा  झेल  रहा है
बद्किस्मत  है  झण्डा,फण्डा झेल रहा है
दुर्भाग्य, फिर  भी  नेता की  मांग बडी है
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै

ये राजनीति और ब्यूरोक्रेसी  एक जात है
एक पिता  और  एक  पुत्र, ये महातात हैं
भ्रष्टाचारी - व्यभिचार   के  दोनो   माहिर
दोनों के किस्से  हैं, भारत में जग-जाहिर
अमावस्या की पैदाइस, दोनो एक घडी हैं
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै

ये मैं  नही  भारत की जनता बोल रही है
नेता  जी  का  भांषा  कपडे  खोल  रही है
जनता  अमली, नेता अमली  चूर नसेडी
प्रजातन्त्र  की  चाल  देख  लो  टेढी-मेढी
कवि आग,बे-बाक शब्द की लगी झडी है
अब राजनीति के हर कूँवे में भांग पडी हेै।।
        राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
            मो0 9897399815
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