Thursday, July 30, 2015

                  कानून-पथ
दाउद  भी  अब  घर आने की  सोच रहा हेै
कानून हमारा  गुनाह सभी के  पोंछ रहा है
बडे - बडे   अधिवक्ता   सीना   तान  रहे है
अपराध  भाई  के ,धाराओं  में छान  रहे हेै

समय आगया आत्म सर्मपण कर दे भाई
सलमान  खान की देखा  कैसे  बेल कराई
कानूनो   के  जोड-तोड  के  सब  माहिर हैं
गुण्डों  की   रक्षा  होती  है ,जग -जाहिर है

अधिवक्ता,जज, गवाह सभी  तैयार खडे हैं
लोकसभा और राज्य सभा केअलग धडे हेैं
कानूनो  में परिवर्तन  भी  हो  ही जाता हेै
इस राजनीति में खूनी कतली ही आता है

तू   छंटा-छंटाया  व्यभिचारी, मायाधारी है
इस फिल्मी दुनियां में तेरे  किस्से जारी है
नर - नारी  किरदार,तुझे सब  मान  रहे हैं
तेरी महफिल के भारत में  गुणगान रहे हैं

चूनाव जेल के अन्दर से भी लड सकता हेै
ये प्रजातन्त्र है, उपर  भी तू चढ सकता है
बोट-बैंक   की   राजनीति  हैे  माया  बाँटो
हिन्द,मुस्लिम दंगो  में  मन-मानव काटो

दुर्भाग्य  था  मेनन का , जो बच ना पाया
बडे - बडे  कानून  पिता  ने  जोर  लगाया
रात-रात भर सबने  अपने सिर को पटका
बचा  नही  पाये, आखिर  में फासी लटका

तेरे दर्शन को नेता और  जज  तरस रहे है
कुछ  अधिवक्ता  तेरे  नाम   से हरष रहे है
एक  मात्र  आतंक  वाद  का  तू ही बाप है
तू कोर्ट,कचहरी,पञ्चायत  है,तू ही खाप है

फांसी  कंहा  है, आजीवन  सोन्दर्य छटा है
राष्ट्र - पति   अनुमोदन  से ये पाप कटा है
भारत में कोई गवाह मिले औकात नही है
न्यायालय  में  सच्चायी  की जात नही है

अब कानूनो से भारत की इज्जत खोती हेै
आज  कचहरी  अधिवक्ता,जज  से रोती हेै
गुनाहगार,सर चढा है खुलकर बोल रहा है
कवि आगऔकात नियम की खोल रहा हेै।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
               मो0 9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com


Wednesday, July 29, 2015

है  खटकता  एक  सबकी  आँख  पर
शोभता   है   दूसरा   सुर   शीश  पर
कुल की बढाई किस तरह से काम दे
जो  जरा  भी  हो  बडप्पन की कसर


     कलाम सलाम-मेमन-बे-मन
क्यों एक मरता  है वतन के नाम पर
क्यों दूसरा  शूली  चढा   बदनाम पर
एक  ही  मन्जर,मजहब  के  फूल थे
ये फैसला  होता है बस,अन्जाम पर

एक  मरता   है  वतन  को  तोडकर
एक  मरता   है  वतन  को  जोडकर
काम से  ही  तो  कसौटी  बोलती है
इमान बनता  है, दगा को  मोडकर

एक ही दिन है मुकरर्र  भी दफन का
भेद है  केवल  शरीरो  के कफन का
एक को चाहती  है दुनिया  शौक से
देखते  हो  दूसरे  का   हस्र  फन का

मै आग  लिखता  हूँ तपाने  के लिये
ये गीत  है  माँ  को  सुनाने  के लिये
ये वतन  सबको  हृदय  में धारता है
बस,  आग  मेरी  है  जमाने के लिये।।
     राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
            मो09897399815
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Tuesday, July 28, 2015


               
                      कलाम को सलाम
हर हिन्दू देश  राम  बने, महावीर,  बुद्व  धनश्याम बने
मुशलमान अब्दुल हमीद,या  फिर अब्दुल  कलाम बने
सिक्ख गुरू गोविन्द बने,गुरूग्रन्थ का नानक नाम बने
इसाई  ईस  का  शीश   बने,  आशीश  बने  पैगाम बने

अब्दुल कलाम के जीवन से जीवन की सरिता को देखो
मजहब के कौम,कबीलो में,बहती उस त्वरिता को देखो
अपवाद  बना  जो  भारत   में   ब्रह्मचर्य  अपना  करके
मर्मस्थल में मन मानव के जो अमर हुआ हैे मर करके

मिशाईल  से  मिशाल  बना,कवच  बना ओैर ढाल बना
वो   सपूत  भी  मरकर  के, कैसे  भारत का, भाल बना
राष्ट्र भक्ति की परिभाषा  उस प्रतिभा  से  कुछ तो सीखो
राष्ट्र  सुरक्षित अभिलाषा उस  प्रतिभा से कुछ तो सीखो

जिन  बच्चों  को सहलाया था उन बच्चों  को  रोते देखा
राष्ट्र  - समर्पित  लोगों को  लगता   है  कुछ  खोते देखा
जो मरा  राष्ट्र की चर्चा में कुछ  उसका  गौरव  गान करो
भेद -भाव को छोडो  बस, इस  देश को  हिन्दुस्तान करो

जिसने कूरान को पी डाला,गीता के भाव  को चूस लिया
हर कौम  कबीलों  की  पीडा को  हृदय से महसूस किया
कूरान  की  आयत के कलमे फिर से इजात कलाम करे
कविआग के छन्द,मन्द  उस नन्द को शीश सलाम करे।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
                       मो09897399815
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Monday, July 27, 2015

              जलीलों की दलीले
सियासत   ने   हमारी   कौम   को   मुर्दा  बना डाला
मिलाकर हाथ दुश्मन से किया क्यो अपना मूॅह काला
कब  तक   दोस्ती   करके    घर    अपना   बिगाडोगे
सियासत में  सियासत   से   अब   कितना  दहाडोगे

जेलों  मे  पनाह   मिलती   है   हर   आतंकवादी  को
मुजरिम  के   लिबासों   में   तडफती, देख  खादी को
यहाॅं फाॅंसी   भी   रूकती   है  हूकूमत  की  अपीलों से
लफंगे  बच    निकलते    है  यहाॅं   महगे  वकीलों से

यहां  तो  एक   ही  रोना  है  बश,  बातें  ही  चलती हेै
हूकूमत  जब  बदलती  है,तो  ये  हरकत  मचलती है
कुचलते   हैं    सभी    आर्दश     हमारे   कारनामो से
यहाॅं   आतंक    झडते    हैं ,   नेता   के    पजामो से

हूकूमत  का   भरोशा    छोड़    कर    तैयार   होना है
तिरंगे को, सियासत की  फिजां  से  अब  ना  ढोना है
उठाओ  अस्त्र  अपने  अब  ,बस,  घुसते  चले  जाओ
वतन का एक ही फतवा हेै,बस,तुम  आग  बन जाओ

सपोलों  के    कपोलों    मे    कितना    दूध   डालोगे
इन  आतंक   की   नश्लों  को   कितना   और  पालोगे
उठाओ  अस्त्र  अपने  अब    जहाॅ   आतंक  दिखता है
नेता को  कुचल  डालो  जो  इनका  भाग्य  लिखता है

मेमन  की  सिफारिस  में  भी   नैतिकता  दिखाते हो
भारत   में   अमन   आतंक   से   होगा , ये  गाते हो
अभी  पंजाब   देखा   हेै,  अब    हिन्दुस्तान   बाकी है
मिलाया  हाथ   दुश्मन   से,  ये   तो   एक   झांकी है

जरा   पूछो    उबैसी    से     दरिन्दे    कारनामो  को
ये  हरकत  कौन  करता   है,  पूछो  इन  पजामो  को
गुनाहों   से   उजडते   हैं,   क्यों    घर  बे - गुनाहों के
क्या  कीमत    लगाओगे ,  उन  बे  -  दर्द    आहों के

अहिंसा  छोड़   कर,  ताण्डव  करो  कैलाश  बन जाओ
गाॅधी   का    करो   आदर ,  पर   सूभाष   को  गाओ
यहाॅ   संहार    करने    को   खुद    अवतार   आता है
ये  हिसा   भी   अहिसा   है  ये   मुरलीधर   बताता है।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
               मो09897399815
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Sunday, July 26, 2015

       कानूनो  के कान  में ठोक जिरह की कील
       हत्या करदे सत्य की उसका नाम वकील

                          उलझे धागे    
अरे  वकीलो,   न्यायाधीशों,  ये   तस्वीरें    साफ  करो
कोई   कहता   है   फांसी  दो, कोई  कहता   माफ करो
सभी मुकदमे बिगड  रहे  हैं बुनियादो की  कमजोरी से
मिल जाते हैं  अधिवक्ता  जज, मुजरिम, चोरी -चोरी से
कानून यंहा पर अन्धा है पर तुम तो कुछ इन्साफ करो
अरे   वकीलो,  न्यायाधीशों,   ये   तस्वीरें   साफ  करो

कौम, कबीले ,सम्प्रदाय, मजहब   में  आग  लगाओगे
सबके अपने-अपने स्वर हेै, किसको  न्याय  दिलाओगे
एक  उबेसी  संविधान  की  छााती  में  ही  नाच  रहा है
चौराहो  पर   कानूनो   के   पन्ने   लेकर   बाँच  रहा है
न्यायालय  बेकार  हो  गये, पञ्चायत  और,खाप करो
अरे   वकीलो,  न्यायाधीशों,   ये   तस्वीरें   साफ  करो

राष्ट्रपति  को  वाणी - भूषण  बुद्वि - बल्लभ  पटा  रहे हेैं
संविधान  की  क्षमा - याचना  से  औकातें  घटा  रहे हैं
भारत  का  कानून  तो केवल हम गरीब से खेल रहा है
आज यातना, मध्य-वर्ग  और, भूखा ,नंगा झेल रहा है
कनूनो  में  वर्ग - भेद  की  सोच  समझ कर नाप करो
अरे   वकीलो,  न्यायाधीशों,  ये    तस्वीरें   साफ  करो

अधिवक्ता  तो  धन के खातिर,अन्यायों के साथ खडा हेै
न्यायालय में गवाह दलालो के जमघट का अलग धडा है
नई  उम्र  के  जजों  की  सीटें  हर  पीठो में विद्यमान है
न्यायालय में जिरह-विरह के चीर हरण का घमासान है
न्यायाधीश  की  न्याय  व्यवस्था, देखो, पश्चाताप करो
अरे   वकीलो,  न्यायाधीशों,   ये    तस्वीरें   साफ करो

कारागृह  में  फाँसी  वाले  बिना  मौत   के  मरे  पडे हैं
ईद  के  बकीरों   जैसे   कैदी ,हर  जेलों  में  भरे  पडे हैं
सब ईश्वर से राष्ट्रपति  की  क्षमा - याचना  मांग  रहे हैं
राष्ट्रपति  भी  आठ  छोड  कर  दो  को फाँसी टांग रहे हैं
अब राष्ट्रपति ही न्यायाधीश  है,उनसे  ही  सन्ताप करो
अरे   वकीलो,  न्यायाधीशों,   ये   तस्वीरें   साफ  करो

दुःख  होता  है  संविधान  के  पृष्ठ, धृष्ट  को छांट रहे हैं
भारत के कानून  न्याय  को  अन्यायों  मे  बाट  रहे है
अवधेश  फंसा  है  अपने  घर  में,  कानूनो ही हाथों से
हिन्दू, मुस्लिम  मजा  ले   रहे,  कानूनी  जज्बातों से
कवि  आग  कहता  है, न्यायालय  में ना ये पाप करो
अरे   वकीलो  ,न्यायाधीशों,   ये    तस्वीरें  साफ करो।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
                    मो09897399815
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Saturday, July 25, 2015

                    फांसी में उदाशी
मुशलमान  को  फांसी  दो,इस्लाम  उन्हें  उकसाता है
फांसी  हिन्दू  को  दे  दो  तो,भगत  सिंह  को गाता हेेै
अगर सिक्ख फांसी पर लटके,भीड़ सडक पर लाता हेै
ईशा, मूसा  भी   अपने  मजहब  को ,खूब  भुनाता है

मेमन की फांसी ने भारत के सम्प्रदाय सब जोड दिये
राजीव पी.एम. के  हत्यारे घर के लोगों  ने छोड़ दिये
आशा राम के अधिवक्ता, कंही   जेठमलानी, स्वामी है
सब छल, बल वाणी - भूषण  हैं, पैरोकारी  के दामी हैं

आतंक - वाद  को  कुर्बानी   की  परिभांषा  में लाते है
दहसत  गर्दी,  आतंकी    आदर्श   स्वयं  बन  जाते हैें
क्या मतलब  हैे, संविधान  की  धारा ओैर कानूनो का
अपराधी  कोई मजहब हो,क्या मुल्य  नही है खूनो का

अपराध  घिनौने   बढते   है, न्यायालय,मुर्दे  हाथों में
अधिवक्ता  उन्हें बचाते  हैं ,जो  घात  लगाये  घातों में
कानून  नपुंशक  बना दिया,इन तर्कों  और कु-तकों ने
अब  डान  शब्द इजाद किया,इन राजनीति के गुर्कों ने

क्यों राष्ट्र पति पर फांसी  की  अपील, दलीलें  जाती है
क्यों न्याय व्यवस्था,संविधान  की  धारा से शर्माती है
सरे आम गवाही बिकती हेै,हर कोर्ट,कचहरी परिसर में
कानूनों की  नौकाएं   क्यों   डूब  रही   सरिता  सर में

कानून  अगर  अन्धा  होगा ,ये  घटना  बढती जायेगी
न्याय तुला की आंखो  की पट्टी  ही,न्याय को खायेगी
धृतराष्ट्र  भी  अन्धा   था,महा - भारत   सबने  देखा हैे
गान्धारी   की  आंखो   में, पट्टी   की   सीमा  रेखा है

स्वयं कृष्ण  की  बातों का भी  अन्धों ने उपहास किया
उसी  कृष्ण  की गीता को  भी  संविधान ने पास किया
जो शपत उठातें गीता की,क्या  उन पर आज भरोसा हेै
आतंकवाद को जज, मुजरिम, कानून  ने,पाला पोसा है

अब  पैरोल   पर  अपराधी   छुटते   हैं, शहन  शाहों से
बे-गुनाह जेल  में मरते  हैं,इस  राजनीति  की आहों से
अब पांच  सितारा  होटल है, ये  राजनीति जल्लादों का
कानून  सहारा  बनता   है,  हर  सत्ता  के  सहजादों का

कुछ तो दहशत-गर्दी  हो,अपराध  जगत के जालिम को
जाे बैठी,गोद  गुनाहों  के,अब दूर करो  उस  तालीम को
जाति,मजहब से भारत के कानून  सडक पर  मत बाँटो
संसद  की  सर्कस  में बैठे, अब संविधान  को मत चाटो!!
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग )
                          मो0 9897399815
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Friday, July 24, 2015

                      लाश में आस
लोकसभा  और राज्यसभा  में  सारे जोकर लटक रहे हेैं
रिंग मास्टर अपनी  चाबुक  चिल्ला  करके  पटक रहे हेैं
शेर , भेडिये, भालू,  बन्दर   सब आवारा   घूम   रहे हैे
ये सराय भारत  का संसद ,मस्त कलन्दर  झूम  रहे हेै

तर्क-कूर्तक  के  अर्क  नर्क से,शब्द बाण सब छोड रहे हेै
अपना-अपना  घडा  पाप  का  संसद  मे  ही फोड रहे है
मनोरंजन  का  सीधा  प्रसारण  सब  जनता देख रही है
प्रजातन्त्र की इस सर्कस से, दुनिया  आँखे  सेंक रही है

सब संविधान  के पन्ने  लेकर  कानूनो  को  ढूँढ  रहे हेैं
ये  प्रजातन्त्र के  सारे   नव्वे, नव्वो  को  ही  मूँड रहे हैं
मैं सपा, बा.स.पा,बी.जे.पी ,मैं  जनता  दल ,मैं कांग्रेस
मैं ममता,समता,ललिता हूं,मैं समाजवाद में अखिलेष

मैं  पासवान  मैं  नासवान  हूँ ,मैं  लालू  का चमत्कार
मैं अन्ना द्रुमक मैं तृणमूल, मैं  प्रजातन्त्र में गधा भार
मैं निर्दलीय  मौका-परस्त, मैं  अस्त-व्यस्त  मैं लाचार
हम सब सर्कस  के  कलाकार  हैं ,सरकारो के मददगार

इन टूटे - फूटे  अपशिष्टों  की ये  संसद  गोदाम  हो गयी
बानप्रस्त में हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई धाम हो गयी
कूडे  करकट  की   खादों  से  गाजर  घासें  चमक रही है
प्रजातन्त्र  के  मन्दिर  ,संसद  में  ये लाशें दमक रही है

भूत,पिचास,और जिन्न,निशाचर,हर कोने में भाग रहे हैं
हम, तुम  जिन्दे   सुप्त   पडे  हैे,ये  मुर्दे  ही  जाग  रहे हैं
प्रजातन्त्र के इस सर्कस का आओ मिलकर लुफ्त  उठायें
कवि  आग  की  मजबूरी  है, गरूड  पुराण  मुर्दो का गायें।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग )
                      मो0 9897399815
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Thursday, July 23, 2015

                  सर्कस देखो      
प्रजातन्त्र का मन्दिर देखो,मन्दिर में  भी बन्दर देखो
पूरे देश  में  बाढ  तवाही, संसद   भरा  समन्दर देखो
लोक सभा में सर्कस देखो,तीर  नही  है  तरकस देखो
चाल,चरित्र और चेहरों में भी,शब्द विषैले कर्कस देखो

तोते   देखो,  तोती   देखो ,  खादी   कुर्ते, धोती  देखो
लोक सभा में चिल्लाते  हैें, इनकी  जरा  बपौती देखो
कबर से  मुर्दे  जाग  रहे  हेैं, पागल  होकर भाग रहे हैं
चील,गिद्व संग्राम सियासी,  प्रजातन्त्र  में  दाग रहे हैं

राष्ट्र  ध्वजा  फहराने  वाले   पूरा   वतन  चबाने वाले,
लूट - लूट   कर  खाने  वाले, खाकर  भी  गुर्राने वाले
लोकसभा  में  नाच  रहे  है, संविधान  को बाँच रहे हैं
चोर-चोर  की  शक्ति, भक्ति , आशक्ति  को  जाँच रहे हैं

वशुन्धरा ,सुषमा और मुण्डे,खडक रहे हैं सबके कुण्डे
शिवराज और अरूण जेतली, बोल रहे है सबको गुण्डे
अपना मोदी  मौन  पडा  है,लन्दन  वाला बोल रहा है
एक  दूसरे  की  चोरी  को, पक्ष, विपक्षी   खोल रहा हेै

दागी, बागी  और  अनुरागी  भी  मौके  को  देख रहे हैं
सभी विभीषण राम नाम के पत्थर जल में फेंक रहे हैं
कांग्रेस  के  सहयोगी  भी  जाँचो  से  भयभीत  खडे हैं
धार तेल की  देख  रहे  हैं  सबके अपने  अलग धडे हैं

हर खबरो  में  राहुल, मोदी  और  केजरी आम हो गये
तीन  तिलंगे, तीनो  पंगे,   राजनीति  पैगाम  हो गये
लोकसभा और राज्य सभा की कक्षांये भी भंग हो गयी
जनता के  वोटों  की  कीमत, बीहड में बदरंग हो गयी

डाकू -डाकू  के  कच्छो    को  बे-शर्मी  से  खोल  रहे हैं
मिली-जुली कुस्ती  के  माहिर,सभी केसरी बोल रहे हैं
अरब-खरब  के  खर्चे, संसद  के  सत्रो  में लुट जाते हेैं
कवि आग ये डाकू देखो मिल-जुल कर भारत खाते हैं।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग )
                मो0 9897399815
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Sunday, July 19, 2015

                 भारत की इबारत
अगर  देश   के   सारे  नेता,  वेतन, भत्ता,  पेन्शन छोडे
उद्योगपति  भी  लाभ  कमाएं, पर चोरी की  टेन्शन छोडे
मठ, मन्दिर  भी  माया  छोडे ,केवल राष्ट्रभक्ति अपनाये
बचे  खुचे  माया - धारी  भी  हर  गरीब  को  गले लगाये
सोने  की   चिडिया  को  छोडो, घर में   हीरे   दबे  पडे हेै
राजनीति के कारण हम सब कबर में  जिन्दे आज गडे हेै

भू - माफिया  अपनी   धरती  बे-घर  को  घर-घर मे बाटे
धन , माया  के  चोर,  लुटेर, निर्धन  को  भी दर-दर छाटे
खाद्यान  के  भण्डारों  को  नियम  बनाकर अमल में लाएं
जंहा जंहा जितनी  जरूरत  है, उतना  भर-भर  के पहुचाएं
सम्पन्न राष्ट्र की सूची  में  भी,आज  जगत मे हमी बडे है
राजनीति  के कारण हम सब कबर  में जिन्दे आज गडे हेै

इमान  धर्म  और सच्चाई  से  केवल  भारत माँ को पकडे
कौम कबीले,धर्म,मजहब भी,मन्दिर,मस्जिद में ना अकडे
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाइ, मानवता   बनकर दिखलाएं
सारे  भारत - वाशी, बच्चे   ,भारत  माँता    के  बन  जाएं
फिर देखना  खुद को खुद  में, हम  दुनिया  मे कहा खडे है
राजनीति के कारण हम सब  कबर  में  जिन्दे आज गडे हेै

देश के टुकडे -टूकडे   करने   की   ये  हरकत अब तो छोडो
एक राष्ट्र  हो  केवल  भारत, जोड  सको    तो   ऐसा  जोडो
जांति-पांति  और भांषाओं  की  सीमाओं को मिलकर पाटो
जंहा  कंही  भी  गांठ   पडी   है, गले  लगा कर  गांठे काटो
होने को  सब   कुछ  सम्भव है,पर थोडा सा नियम कडे है
राजनीति के कारण  हम  सब  कबर में जिन्दे आज गडे हेै

सोच समझ  कर   बच्चे  पैदा  करने  की  नीति अपनाओ
कामदेव  की  इज्जत  करना  सीखो, सडको  पर ना लाओ
व्यभिचार  और  बलात्कार  की  भांषा  से  भारत मरता हेेै
भ्रष्टाचारों  की    भांषा  से  स्वाभिमान  गिर  कर  डरता है
कवि  आग की  मानो, हम  तो   हर युग में परवान चढे है
राजनीति  के  कारण  हम सब कबर में जिन्दे आज गडे हेै।।
                   राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                         मो0 9897399815
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                     हरेला
हरियालियों   में   भी  हरेला  आ गया
देख   लो     कुदरत    करेला  आ गया
भू -  माफिया  चरने  चरेला  आ गया
ये   नया     धरती    धरेला    आ गया
बो दिया  नेता   ने   फोटो   खिंच गयी
फिर  प्रकृति   आदमी   से  भिंच गयी
माफियाओं   में   धरा   बिक  जायेगी
ये   हरेला     गीत     किसके   गायेगी
हर  वर्ष  पौधों  को  धरा  ही  ढो  रही है
कट गया  जिन्दा  ,जवानी   रो  रही हेै
जिसने लगाया,  वो  लगाकर मौन हेै
इस धरा का   आज    मालिक कौन है
खुद  लगाओ  खुद  उसी  को  काट दो
पीढीयोें    में     कुदरतों    को  बाँट दो
क्या  उम्र  पेडों   की   कभी  पूरी हुयी
मौत  भी    निर्मम   हुयी,  बूरी  हुयी
गाँव और   शहरों  में  मौते बोलती हेै
सरकार भी तो कुदरतों को तोलती है
सडके   बनेगी,  वृक्ष    कटते  जायेंगे
हरियालियों के गीत हम सब गायेंगे
कुदरतों  को  जानवर   ही  पालता है
आदमी     पर्यावरण     खंगालता है
प्रदूषणो  से  रोज   मरता  जा  रहा है
ये  मरेला,   फिर    हरेला  गा  रहा है
संकल्प लो   हरियालियाँ  बचती रहेें
ये कुदरतें  भी  कुछ  नया  रचती रहें
श्रृंगार  धरती  का  हरेला   हो गया हेै
वृक्ष तो अब  आग  में ही खो गया है।। 
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो09897399815
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Wednesday, July 15, 2015

                      जागो
इस  राजनीति  के  तराजू   में  हमें  मत  ताेलिये
सम्मान देना  है अगर  तो   बस  कवि ही बोलिये
हम हृदय के  हादसों   की  हर हदों   को  खोलते हैं
सत्यता  से  शब्द   को  निर्वस्त्र   करके  बोलते है

वास्तविकता भ्रष्टता की  हम  तुम्हें  दिखला रहे हैं
हर छन्द में  हम बीहडों  के   डाकुओ को ला रहे हेैं
ये  सियासी  लेखनी   की  नोक   से  घबरा  रहे हैं
मेरा वतन जिन्दा रहे, हम  गीत लिखते जा रहे हेेैं

ये  वतन, पैसा   हमारा,  किस  तरह  से फूँकते हैं
जनमतो  की  भीख  से, मूँह  पर  हमारे  थूकते हैं
इन डाकुओं  को आग से औकात में  मैं  ला रहा हूँ
इसलिये  कर्कस ध्वनि के गीत   हरदम गा रहा हूँ

सोते  हुये  मुर्छित  नरो  को , मैं  जगाता  जाउँगा
शब्द  में  लिपटा  हुआ, मैं  हर  जहन में  आउँगा
कौशिस में  हूँ  कि  फिर  लगादूं  आग  पूरे देश में
खुद खाक में मिल जायेगे  फिरका परस्ती भेष में

बस, होलियाँ  जलती  रहें,  प्रहलाद  बचने चाहिये
इस  देश  की  भटकी   जवानी   में  रवानी  लाइये
प्रतिकार को बस ठानलो खुलकर सडक पर आइये
इतिहास  की  इज्जत बचे, कुछ  गीत  ऐसे गाइये

सब   सियासी   राष्ट्र - हित नीलाम  करते  जायेंगे
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई  रोज मरते जायेंगे
कौमो,  कबीलों,  सम्प्रदायों   में  हमे  ये  बाँटते हैं
इस  राष्ट्र को  ये केक  की भाँति सडक में काटते है

किसान  के  घर  बोरियां  थी, अब कनस्तर हेै नही
दो - वक्त  की  रोटी  गरीबों   को  मयस्सर  है  नही
खाद्यान्न  की  कीमत  हमे  बे-वक्त शूली  टाँगती हेै
अब  देश  की सत्ता सियासत वक्त हमसे  माँगती है

झण्डे - डण्डे, इन  डाकुओं  के  अब  उठाना छोड दो
सब  पोस्टर,  बैनर  हटाओ,  हर  भ्रम  को  तोड दो
अब  राष्ट्र  के  हर  खर्च  का   हिसाब   भी  लेते रहो
कुछ  खौंप  भी  पैदा  करो, कुछ  चोट  भी  देते रहो

राष्ट्र  का उत्सव नही बस,अपना  मनाना  जानते है
लुट  रहा  है  धन  हमारा, ये भाँग अपनी  छानते हेै
इन  हरकतों  का  हर  तरफ  अवरोध  होना चाहिये
मैं  आग  हूँ, मुझ पर  भी  थोडा  शोघ होना चाहिये।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     मो0 9897399815
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                            आरक्षण
देश में फिर आरक्षण का जिन बोतल से बाहर आया
फिर से प्रजातन्त्र  में एस.सी,एस.टी  कोटा लहराया
अगडों,पिछडी  सैना   में  महाभारत  संग्राम मचा है
संविधान के  हर पन्ने में,  राजनीति,कोहराम रचा है

सभी सियासी अपना जनमत  आरक्षण में ढूॅंढ रहे हैं
खुंडे   चाकु ,छूरों  से नर - मुंड  झुण्ड  के मूॅंड  रहे हैं
कामुकता की वर्ण-शंकरीे नश्लों  ने क्या मोड़ लिया हेै
ब्राह्मण, ठाकुर,वैश्य,शूद्र का पैमाना  भी तोड़ दिया है

रक्त-चाप का क्रन्दन, बन्धन  दौडेगा  हर  चौराहों में
वर्णशंकरी जनमत,जनता,राजनीति की गलबाॅंहों में
अब तो मुझे भी  शक  होता  है बच्चों के संस्कारों में
काम - वाशना  बना  रही   है परम्परायें  सरकारों में

मेरे  घर  की  आॅंगन - बाडी , बीज  पडा परदेशी का
संस्कार  स्वयं ही बोल रहा है,पौधा किसी कुरैसी का
ठाकुर, पण्डित, वैश्य, शुद्र के  बीज पडे़ अय्यासी से
अपने  घर  की   खेती   बंजर, हरियाली  है दासी से

कंहा - कंहा  ढूॅंढो आरक्षण ,इन  खूनों के मजमूनो में
कैसी - कैसी   हरकत  है  नश्लों  के  नब्ज  नमूनो में
कैसे   पहचानोगे     कोटे ,   खोटे   और   लंगोटे को
प्रजा-तन्त्र  की  अय्यासी  में  ढूॅंढो   उस  परकोटे को

आरक्षण  क्याें  माॅंग रहे  हो जन्म - जात  पैमाने से
शदियों   से   प्रमाण  कर्म  है ,खाने  और कमाने से
शिक्षा ,दीक्षा  और समीक्षा को जीवन आधार बनाओ
नयी कौम को आरक्षण की राजनीति से ना भटकाओे

हर गरीब  को आरक्षण  की उस परिधी में लाना होगा
हर तपके की शिक्षा सम हो,ऐसा नियम बनाना होगा
उंच-नीच  की राजनीति  को दिल से दूर भगाना होगा
भारत  माता  के  बच्चों  का सबका एक घराना होगा

ये मापदण्ड स्वीकार करो  बस  सबसे सस्ता नुक्ता है
हास्य-व्यंग की कविता में हर षब्द यहाॅं पर पुख्ता हेै
आरक्षण  आधार   बनाओ डी. एन. ए , की  जाॅंचो से
असर ‘आग ’का  होता  है, जलते शब्दों  की आॅंचो से!!
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                              ऋशिकेष
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Tuesday, July 14, 2015

                    दृष्टि-सृष्टी-वृष्टि
मोदी  भैया  ब्रह्मचारी,है, उन्हे गृहस्थ का ज्ञान नही हेै
किस चादर मे पाँव पसारें, इसका भी अनुमान नही हेै
अटल बिहरी ब्रह्मचारी  थे, इस चक्कर में फेल हो गये
राजनीति में,ये फक्कड,ही,आज सियासी खेल हो गये

माया, ममता, उमा,  ललिता, नारी  शक्ति ब्रह्मचारी है
आर. एस. एस. के  प्रचारक  हैं, उनकी आगे तैयारी है
बिन  नारी  के  राहुल  बाबा, गुप्त  घरों  में  डोल रहे है
ब्रह्मचारी,भारत में सारे, क्या बिन अनुभव बोल रहे हैं

आटा,चावल,मिर्च,मशाले का इनको कुछ ज्ञान नही है
बच्चे  पैदा  करने का  कुछ तकनीकी अनुमान नही है
डेढ अरब की जनसंख्या  को  भाषण  से ही पाल रहे हैं
बिन अनुभव के गृहस्थ आश्रम बाबा जी संभाल रहे है

बन्दर  के  हाथों में  चाकू,ये जनमत  क्यों डाल रहा हेेै
जादूगर  की  मजबूरी  है, खेल  दिखा  कर पाल रहा हेै
तमाशबीन हम सारे जनमत भीड लगा कर देख रहे हेैं
स्वप्नो  के  सौदागर  सारे, बस  सपने  ही  फेंक रहे हैं

हम सब स्वप्नदोष के आदि स्वप्नो में ही खो जाते हैं
राजनीति  के  अलग  धडे  हैं,वो  भी अपने हो जाते हैं
शब्दो  की  हेरा - फेरी  से  गलत  सही को ढाँक रहा है
आटा काँटे में चिपका कर मछुआ, मच्छी फाँक रहा है

कुछ  बगुले  नैतिक-वादी  है, एक  टाँग में खडे हुये हैं
अब वो भी मौका देख  रहे हैं,आदर्शो   में  अडे  हुये हैं
शब्द - भेद  के तर्क-कुतर्की  हर चैनल में चिल्लाते हैं
इनकी  अपनी  मजबूरी  है, इसी  बात  की ये खाते हैं

राजनीति  के अनुभवहीनो से  ही  तो भारत लुटता हेै
जनमत भी तो सरल मार्गअपनाने वालों से घुटता है
आश्वासन  ही  एक  मात्र  हल हेै, सबको बहलाने का
कवि आग की  मजबूरी  है  नेता जी के गुण गाने का।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       मो09897399815
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Sunday, July 12, 2015

                       आदर्श का उपहास
भ्रष्टाचारी  और  व्यभिचारी   जीवन   के  जज्बात  नही हेैं
महापुरूषों  का   गौरव  गाना, अपनी  तो  ओकात नही हेेैं
जो मरे राष्ट्र  के  खातिर, उनकी  लाशों  से हम खेल रहे हेै
चन्द्र शेखर,सूभाष,भगत सिंह  मरकर  हमको झेल रहे हेै

हम  जैसे  मुर्दो  की  पुष्पों की  माला  से  वो ढक जाते हेै
फिर भी कुछ ना कुछ पत्थर वो  बुनियादों में रख जाते हेै
राजनीति  से वो  बुनियादें  हम सब  मिलकर खोद रहे हैं
उस  हरी  भरी धरती को  नेता  अपने  हल से जोत रहे हैं

सभी  सियासी  अपनी-अपनी  फसलें  उसमें  लगा रहे हैं
भाग्य राष्ट्र का  हंस  भेष  में  आज  काग  ही  जगा रहे हैं
शेरों  की   गाथाएं   गीदड,  अपने   ढंग   से   गा  जाते हेै
आजादी   के   बाद  देश   में   अब  शहीद   भी  शर्माते हेै

उनके  भाव - भंगिमा, जज्बा   केवल  पुस्तक ही ढोती है
भारत-माता  दुश्मन  से  कम, अपनो  से  ज्यादा रोती है
फिल्मी दुनिया  गीत शहीदों  के  अपनी  धुन  में गाती हेै
राष्ट्र - भक्ति  तो  राष्ट्र  सर्मपण  के  भावों  से  ही आती है

राष्ट्र - भक्त  को  अपने-अपने  क्षेत्र ,जाति  में   बाँट रहे हैं
हम शहीद की  लाश  सियासी ,हानि-लाभ  से  छांट रहे हेैं
जो मरे  देश  के  खातिर, अब  वो  सीमा  से  पट जाते हेै
बसे हुये थे  हर  दिल  में,अब जिले,प्रान्त  में बँट जाते हेै

भगत  सिंह  पंजाबी, बल्लभ  अब  गुजराती  हो जाता हेै
सूभाषचन्द्र की  महिमा  केवल  अब  बंगाली  ही गाता है
हर शहीद को  चौरहों  पर,अब  कब  तक  कितना गाढोगे
धूल फाँकती  प्रतिमाओं के कफन कंहा तक तुम  फाडोगे

राजनीति  को  छोडो, दिल  से  नमन  करो  उन वीरों को
जाति  मजहब  के  कंकड  में  भी  ढूँढो  फिर  से हीरो को
श्रद्वा  की   अंजलि    समर्पित   भावों   से   गुणगान करे
कवि  आग  के  छन्दों  से   हो  राष्ट्र - भक्ति  के  घाव हरे।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  9897399815
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Saturday, July 11, 2015

                        देश की इच्छा          
इस राजनीति  के  टुच्चेपन  से जग  में मान नही होगा
अब तक जो कुछ भी  झेला ,उसका  गुणगान नही होगा
दो  देश  के नेता  मिलने  से  भारत उत्थान  नही होगा
अस्तित्व मिटादो धरती से तब तक सम्मान नही होगा

फौजों की हिम्मत टूट चुकी ,इन  राजनीति फरमानो से
सरहद के सिपाही व्याकुल हेैं,बे-मतलब मरती जानो से
कितने  वीरों  की लाशों को  इस  राष्ट्र-ध्वजा  से ढोओगे
बे-मौत हमें  मरवा  करके  सरहद  पर कब तक रोओगे

या  तो आदेश करो  हमको, या  खुद  रस्ते से हठ जाओ
राष्ट्र - भक्ति  की  शक्ति  को  आसक्ति  से अब  ना खाओ
सुन्दर - सुन्दर शब्दो  से  दुश्मन  पर   वार  नही  होता
नासूरों   को  सहलाने   से  तन  का उपचार  नही  होता

सरहद  के  फौजी  वीरों   में  संग्राम   की  इच्छा  पूरी हेेै
जो  लुटा  दिया  था गलती  से, वो  पाकिस्तान जरूरी है
भारत  माँ  की   रोटी   का   अब   तृष्कार   नही   होगा
आतंकी, मजहब,मदरसो  का,धोखा   इस बार नही होगा

भारत का हिन्दू, मुस्लिम भी ,तैय्यार  खडा है लडने को
हर मजहब, कौम, कबीला भी, लाचार  खडा है अडने को
अब भारत माँ  के  बच्चों  का  फरमान  कहर बरपायेगा
अब  कूरान का  फतवा  ही,  आतंक - वाद   को  खायेगा

कब  तक  हाथ  मिलाओगे   इस  कूटनीति  के  साये में
अब कब   तक  लाशें फूकोगे  हर  गली - गली  चौराहे में
नेता   के   आने - जाने   से   भारत  विस्तार  नही होगा
सत्ता का  और  सियासत  का  धोखा  इस  बार नही होगा

कुरू-क्षेत्र   महाभारत  का  अब  सरहद   के  पार बनायेंगे
राष्ट्र - गीत  हम  भारत  का , काबुल, कान्धार  में गायेंगे
बस  राजनीति  की   बाधाएं, थोडा  सा  पथ  से हठ जाये
कवि आग  की   लपटों  में, बस  पाकिस्तान सिमट जाये।।
                 राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
                         मो09897399815
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Friday, July 10, 2015


                       भूल के शूल
गले मिले और हाथ मिले पर अब  तक  ना जज्बात मिले
जले  भूने  इन   चेहरों  के, बस  फुंके  हुये  दो  गात मिले
ये हृदय-शून्य ना गीत बने ,भयभीत  कभी  ना  मीत बने
इस  कपट,लपट  की  अग्नि  से,ना फटे  दूध नवनीत बने

जितने भी अब तक आये गये सब खेल सियासी खेल गये
बस,वही  समस्या  पहले  थी, जिसको  ये  आगे  ठेल गये
जो-जो  भी  नुक्ते  अपनाये,सब  उलझ-उलझ  कर टूट गये
ना यार  मिला  ना प्यार  मिला,उलझन के अंकुर फूट गये

कल तक का भारत  पाक बना, अपने कर्मो  से खाक बना
अब  भीख  मांगने  वालो मे  बे -शर्म  हया  बे - बाक बना
घरबार   गया,  दरबार   गया,  दुनिया   से  कारोबार गया
आतंकवाद   के   चक्कर   में , ये   फर्जी  इज्जतदार गया

कश्मीर  समस्या  की  गुत्थी  बातों  से  बिगडती  जाती हेै
कमजोर  पक्ष  की  कौमे  ही  बस, गीत  सियासी  गाती हेै
इसका  हल  केवल   फौजों  के   हाथों  में  दिखायी देता हेै
कमजोर   सियासत    दर्पण  है, जिसकी  परछायी नेता है

या तो  अब, युद्व  करो  इस  पर, या  मुर्दों को ही दान करो
बे-मौत  मरे  इन  वीरों  का ,कुछ  तो  सोचो, उत्थान करो
अगल - बगल  के  मुर्दों  को, ये  भारत  कब  तक ढोयेगा    
सत्ता  के  सियासी  कीचढ  में, भारत  कितनो को खोयेगा

बस,बन्द करो  ये सममेलन, अब समय चक्र  दोहराता हेेै
कुरूबान  वतन  पर  जो  होगा, इतिहास  उसी को गाता है
भगत  सिह,  शेखर,  सूभाष  की   कुर्बानी  को  याद करो
कवि  आग  की  लपटो  में,तप  कर  बस,अब जेहाद करो।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                       मो09897399815
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Thursday, July 9, 2015

                       देश मे दरवेष
जिन्ना  से  लेकर  नवाज  तक  कितनी  बातें और करोगे
नेहरू  से  लेकर  मोदी  तक  किससे  कितना  और डरोगे
इस भारत के स्वाभिमान को कब तक कितना और चरोगे
सरहद  की  मौतों  सेे  भारत  में  कितने  शमशान भरोगे

कूट नीति  से  तो  भारत  में तो लूट नीति परवान चढी है
नासूरों  को   पनपाने   में   राजनीति  ही   अहम्  कढी है
सरकारें  आती  जाती   हैं   वही   ढाक   के   तीन  पात हेैं
सरहद  पर  सैना  मरती  है  सक्षम  होकर क्यों अनाथ हैं

दुनिया  भर  से  हाथ  मिलाकर राष्ट्रगीत किसका गाआगे
घर  मे  भ्रष्टाचार   व्याप्त   है,  उसको   कैसे  निपटाओगे
सरहद  में  कम , घर  में ज्यादा नागपंञ्चमी मना रहे हैं
सारे  जोकर  राजनीति  में   अपनी   सर्कस  चला  रहे हैं

लंदन  वाला  मोदी  सबके  मूँह   पर   जूते   मार  रहा है
दाउद  इब्राहिम  से  जिसका  जुडा  हुआ  हर  तार  रहा है
रोज  नया  आतंकवाद  तो  हम  घर  में  ही  पाल  रहे हैं
राजनीति  के  विस्फोटों   में   नई   पीढी   को ढाल रहे हैं

व्यापम  के  घोटाले  भारत  की  प्रतिभा को कुचल रहे हैं
जंहा  भी  देखो  अनपढ, भौंदू  नौकर  शाही  उछल रहे हैं
बडे - बडे  नायक,  नालायक  इस  धन्धे  में  फसे पडे हैं
चाल, चरित्र  के  चेहरों  वाले  सब  कीचड  मेें धंसे पडे हैं

राष्ट्र भक्त  आसक्त  बने   अब  राजनीति  में  घूम  रहे हैेंं
सारे  नेता  और    सियासी   सत्ता   मद  में झूम  रहे हैं
एक  दूसरे   के   उपर   सब   दोषा    रोपण  डाल  रहे हैं
जान बूझ  कर  हम  सापों  को  दूध पिलाकर पाल रहे हेै

सात  दशक  के  इस नाटक से सारी जनता पकी हुयी हेै
डेढ अरब  की  जनता  नेताओ को सुन कर थकी हुयी है
नेता खुद भी  भाग  रहा  है  जनमत को भी भगा रहा है
कवि आग तो कविता लिख  कर मुर्दो को ही जगा रहा है।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                    मो09897399815
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Wednesday, July 8, 2015

                भारत में महारत
मैं   भारत  हूँ  दुनियाँ भर  के  चोर, लुटेरे  झेल रहा हूूूूँ
आजादी  से  लेकर अब  तक, बीहड  में ही खेल रहा हूँ
इतिहासों  के  जनवासों में  उपहासों   को  छाँट  रहा हूँ
राजनीति से  लुटा-पिटा हूँ,फिर भी  इज्जत बाँट रहा हूँ

इस  भारत  की राजनीति में मुन्ना  भाई आम हो गये
प्रजातन्त्र  के  बोट - बैंक  से  सारे  रावण  राम हो गये
बापू  तेरी  इस  खादी  में  गुनाहगार  सब चरित्रवान हैं
इन चोरोंं  पर   संविधान  की  धाराएं   भी  मेहरबान हैं

लाखों  पप्पू  व्यापम  घोटालों  में फर्जी    पास हो गये
सबसे  ज्यादा   नंग,लंफगे  सत्ता  दल में खास हो गये
लीचड,कीचड और कमीने ही चुनाव अब लड  सकते हैं
डाकू, गुण्डे  और  मवाली  ही  गुण्डो से  भिड सकते है

सभी दलों  में  व्यभिचारों  के  डी.एन.ए. ही  फूट रहे हैं
अपनी-अपनी  सीमा में  सब माल  श्वांस  से घूंट रहे हैं
सब  चोर-चोर  को  चौबारे  में चतुरायी   से पकड रहे हैं
अब सत्य,अहिंसा  के चोले  में  सारे  डाकू अकड रहे है

चोर - चोर   मौसेरे   भाई,  प्रजातन्त्र   की    सौगाते हैं
क्या भारत के  संविधान  से  हरिश्चन्द्र  चुनकर आते हैं
प्रजातन्त्र  की  पांञ्चाली  को  अब  रक्षक  ही लूट रहे है
गिरधारी  के  हाथ  से  पल्लू   द्रोपदीयों   के  छूट रहे है

राजनीति  की  स्वर्ण - चर्म को सीता माता  भाँप रही है
चरित्रवान  लक्ष्मण  की  नजरें  देख रही है  काँप रही है
नाक, कान  कटवा कर  सूपर्णखाँये  खुल्ली  घूम रही है
भारत माँ भी  देख-देख  कर,मौन  खडी  है  झूम रही है

अब घनानन्द  से  चन्द्रगुप्त,चाण्क्य  सुरक्षा माँग रहे हैं
यवन भेष में सभी सिकन्दर,भारत को शूली टाँग रहे हैं
मुगल और अंग्रेज भी घर में खुल्लमखुल्ला नाच रहे हैं
सभी  विदेशी  आज  हमारी   औकातों   को  बाँच रहे है

बे-मौत  मरे  व्यापम घोटाले में लावारिस लाश हो गये
ललित मोदी लंदन  में  बैठे, राजनीति के खास हो गये
अब  हेमा मालिनी  मरने वाले को ही दोषी मान रही है
आरएसएस.रमजान मनाकर  संस्कृति को छान रही है

प्रजातन्त्र के इस सर्कस में हर कोई खुलकर खेल रहा है
भारत  बरबस  बाजीगर  को, बे - रहमी  से झेल रहा है
राजनीति   के   तोते, चैनल  की  चर्चा  में  चिल्लाते हैं
शब्दों   के   सौदागर  शब्दों   से  चुनकर  रोटी  खाते हैं

सारे  नंगे  अगल - बगल  की  सीमाओं  में विद्यमान है
हम  नंगो   के  बीच  खडे  है, नंगो पर  ही  मेहरबान है
राम,कृष्ण,महावीर,बुद्व की,धरती  का अब नास हो गया
कवि आग की रचना में  ये व्यभिचारी  ही खास हो गया।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                     मो09897399815
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Tuesday, July 7, 2015

                  फर्जी-अवतरण
फर्जी प्रमाण सियासत में अब भारत भाग्य विधाता है
फर्जी हथकण्डों  से  नेता  जनमत से चुनकर आता है
फर्जी शब्दों   के  सौदागर,  शब्दों  में   शब्द गढाते है
ये राजयोग है  भारत  के,  फर्जी   प्रारब्ध  से  आते है

प्रमाण  प्रतिभा  का  केवल, भारत   में  शिक्षा  देती है
भारत की शिक्षा -दीक्षा तो सत्ता की  सियासी  खेती है
ये प्रश्नचिह्न इतिहासों में  अब  कितना  और लगाओगे
फर्जी प्रमाण के पत्रों से,प्रतिभा  को  कब तक खाओगे

फर्जी प्रमाण  चिकित्सा के हर  शहर  गाँव में  जारी हैं
फर्जी निर्माण,नियन्ता के  भारत  में  अब तक भारी हैं
फर्जी नौर-शाह  भारत में  जगह - जगह  अधिकारी है
बाबू,   चपरासी   ढूँढोगे    तो    थोक  में  मारामारी है

फर्जी संस्थाए फाइल में ,जगह - जगह  मिल  जायेंगी
सडक,  गूल  और  नहरें  भी   ढूँढो  तो  फर्जी  आयेंगी
ट्रस्ट,  भ्रष्ट  भी  नकली  हैं, औकात  धर्म  की कहते हेैं
ये फर्जीवाडा  भारत  में   हम  सात  दशक  से सहते हैं

आधे  से  ज्यादा  नेता  भी   फर्जी  डीग्री   से  आते हेैं
ये भ्रष्ट  व्यवस्था भारत  की  सब  राजनीति सौगाते हैं
शिक्षा,शिक्षक,सत्ता, संस्था, सिद्यान्त सभी सरकारी हैं
ये चमत्कार  है  भारत  का, नकली,असली से भारी है

ये राजनीति  की फितरत है गलती महसूस नही करते
सभी  सियासी  मुर्दे हैं, किंञ्चित  अफसोस नही करते
हर  कोर्ट,  कचहरी मुर्दाें  के गुर्दों  में  खून   चढाती है
इस प्रज - तन्त्र में गन्ध हमेशा  सढे  शवों  से आती है

ललित मोदी, शिवराज फंसे, आप  खाप  सरताज फंसे
वशु्धरा, सुषमा,  शुक्ला,  कपिल, अरूण उस्ताज फंसे
कंही  राहुल  और प्रियंका है, भारत रावण  की लंका है
प्रतिभायें  अब  गुमनाम  हुयी, बस,  फर्जीवाडा डंका है

इन अर्जी - फर्जी  कर्मो  से  संदिग्ध  धर्म बन जाता है
झगडों में मन्दिर, मस्जिद  का  फर्जीवाडों  से नाता है
फर्जी खून,  जूजूनो   का  नस-नस  में  सबकी बहता है
मजबूर आग  भी शब्दो  से  फर्जी  कविता ही कहता है।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
               मो09897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

Monday, July 6, 2015

               पापम्-व्यापम
क्या  भारत  अब  घोटालो  का  देश हो गया
ये राजनीति  तो  चोरों  का  ही  भेष हो गया
अभियन्ता और एम.बी.बी.एस.ये सारे दर्जी
अधिकारी  बाबू, चपरासी  सब  अर्जी - फर्जी
पूरे  भारत  में  व्यापम  का  प्रवेश  हो गया
क्या  भारत  अब  घोटालों  का  देश हो गया

मध्यप्रदेश तो इस घटना का प्रथम चरण है
भारत  में  तो  इससे   भी  विराट  ग्रहण है
सत्ता   और  विरोधी    दोनों   फँसे   पक्ष हैं
भ्रष्टाचार   आज   देश    मे    प्रश्न   यक्ष है
शाशन, सत्ता  कालनिमी  का भेश  हो गया
क्या भारत  अब  घोटालों  का देश  हो गया

सभी चिकित्सक  अब  फर्जी उपचार करेंगे
अब  अर्जी - फर्जी  अभियन्ता  उद्वार करेंगे
अधिकारी, बाबू   व्यापम   से फर्जी आयेंगे
अब राष्ट्र-ध्वजाों को  चोर उचक्के फहरायेंगे
प्रजातन्त्र में  नेता  अब  अखिलेश हो गया
क्या भारत  अब  घोटालों  का देश हो गया

आधा  भारत   इसी   रोग  से तडफ रहा है
फर्जी  व्यापम  प्रतिभाओं  को हडप रहा है
नैतिकता  आदर्श   वाद   उपहास  हो गया
व्यापम का ये भूत  राष्ट्र  में  खास हो गया
आज  दरिन्दा  भारत  में   दरवेश हो गया
क्या भारत अब घोटालों  का  देश  हो गया

कितने  फर्जी   सेवा   से   निवृत्त   हो गये
मूल-भूत अधिकार भ्रष्ट  के  कृत्य  हो गये
भारत  में  प्रमाण  पत्र  की   जाँच  कराओ
अधिकारी बाबू,शिक्षक की बुनियाद हिलाओ
लोकतन्त्र  में  अब  किन्नर  नरेश हो गया
क्या  भारत  अब  घोटालो  का  देश होगया

लोकसभा   में   फर्जी    उँचे  अधिनायक हैं
व्यापम  के  प्रमाण  सियासी  फलदायक हैं
इस कल्प-वृक्ष  से  पूरा  भारत महक रहा है
ये शोला -शबनम्  संस्थानो  में दहक रहा है
संस्कारो  में   आज  कपट  आवेश  हो गया
क्या भारत  अब  घोटालों  का  देश  हो गया

ये व्यापम है या यम है जो अब काल बना है
मोतों का साया जगह-जगह विकराल घना है
जिसने भी इसको छेडा,स्वर्ग में वाश हो गय़ा
मूंह,आंख बन्द है जिसकी,सत्ता दास हो गया
कानून  मौन  है,  देखो   कैसा  केस हो गया
क्या  भारत  अब  घोटालों  का  देश  हो गया

आज भी  दुनिया  अनपढ मीरा  को पढती हेै
कबीरदास  के  अनुभव  जीवन  में  गढती है
रसखान, रैदास   और   दादू,  अमर  चिह्न हैै
वही राष्ट्र  है  जो  व्यापम  से आज खिन्न हेै
कवि  आग  इतिहास  यंहा  अवशेष हो गया
क्या  भारत  अब  घोटालों   का  देश हो गया
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                   9897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

                आचरण-हरण
नेता जी को नमस्कार ना करो तो समझो नास हो गया
कोइ चमचा चरण पकड़ ले तो समझो वो खास हो गया
सुबह - सुबह लगती  है  लाइन चरण पकडने वालों की
चरणों से  जो चूक  गये बस  खैर  नही  उन  सालों की
जिन चमचों की मरी आत्मा,उनको ये आभाश हो गया
नेता जी को नमस्कार ना करो तो समझो नास हो गया

आइएएस और आइपीएस अधिकारी इसके चरण दबाऐं
बुद्धि- बल्लभ,वाणी-भूषण, इनसे  भीख माॅंग कर खायें
लावारिस  उद्योगपति  भी , इन  पर   धन वर्षा करते है
चोर  उचक्के,  डाकू  इनके   दर्शन  को  तरसा  करते है
राष्ट्र-नियन्ता तस्क देखो, आज  परीक्षा  पास  हो गया
नेता जी को नमस्कार ना करो तो  समझो नास होगया

लहु -लूहान कर  भारत  माता  के  टुकडे़  ये काट रहे है
मांस ,मदिरा ,वैष्यागामी  शहर , गाॅंव  को  बांट  रहे है
ये  बने  सरगना ,  मंत्री , संत्री   छोटे - छोटे   भागों से
बुन  जाते   हैे  मकड़ी   जाले, सढे़   हुये  इन  धागों से
अब तो चेहरा,चाल,चरित, व्यभिचारी  अय्यास होगया
नेताजी को नमस्कार ना करो तो  समझो  नास होगया

इनके पग-चिन्हों पर बाबा , नंग, लंगोटी  भी चलती है
धर्म-कर्म और ध्यान,धारणा राजनीति  से  ही पलती है
सत्ता और  सियासी  रण  में  सन्यासी  को  देख रहा हॅूं
बाबा  जी  के  चौरासी  आसन  से   नजरें  सेंक  रहा हॅूं
दूरदृष्टि का चिन्तन - मन्थन, ‘ भारत’ सूरदास हो गया
नेताजी को नमस्कार ना करो तो  समझो  नास होगया

भारत माता  की  छाती  में  राजनीति  के  लाख धडे़ हैं
सबके  चरण  पकडने  वाले  व्यभिचारी  तैयार  खडे है
मात, पिता  के  तृष्कारी  को  इनके चरण दबाते पाया
प्रजातंत्र  में  व्यभिचार  ने  संस्कारों   को   कैसे खाया
इस राजनीति कीनगर-वधू  से  भारत  देवदास होगया
नेताजीको  नमस्कार  ना करो तो समझो नास होगया

चौबीस  घण्टे  चरने   वाला   बापू   के   गाने  गाता है
सदाचार के आॅंख,कान,मुॅंह बंद किये सब कुछ खाता है
इनके  हर  धन्धे  के   पीछे   नौकर  शाही  सहयोगी है
ये! साॅंड  फल  फूल  रहे  हैं  जनता  शदियों  से रोगी है
राजनीति का सबसे सस्ता धन्घा ये अब  खास होगया
नेता जी को नमस्कार ना करो तो समझो नास हो गया !!
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                 9897399815

Sunday, July 5, 2015

                नेता की नक्कासी
अगर किसी को  गाली देनी हो तो  बस ,नेताजी बोलो
एक शब्द काफी  है, चौराहों  पर  पूरी  पोल  ना खोलो
खादी कुर्ता और पायजामा,मफलर,टोपी,सब कहती है
प्रजातन्त्र में जनता, नेता जी को  शदियों  से सहती है
फिर चुनाव आने वाले हैं, जाओ  जोकर  के संग डोलो
अगर किसी को गाली देनी हो  तो  बस, नेताजी बोलो

सडक छाप  पर  मुहर लगाकर सभी  नमूने  चूने तूने
बोट माॅगने  घर - घर   जाकर  ये  झुनझूने  चूने तूने
जिसका कोई ठौर  ठिकाना  काम,धाम पैगाम नही था
शहर,गाॅव के गली,मुहल्लो  में  नक्कारा,नाम नही था
अब नंग,मतंगो और मलंगो में भूखा  हो  उसे  टटोलो
अगर किसी को गाली देनी  हो तो  बस,नेता जी बोलो

भ्रष्टाचार, बलात्कार   और  व्यभिचार  इनका  पेशा है
जूते, चप्पल, गाली  खाकर  शान्त खडा,कैसा भैंसा है
गाॅधी जी  के  आर्दशों  का  लालन-पालन  करने वालों
उपवाशों  के   जनवासो  में, चौबीस  घण्टे चरने वालों
लोकतंत्र  की  खुली तुला पर भूखी, नंगी जनता तोलो
अगर  किसी को गाली देनी हो तो बस, नेता जी बोलो

भाषण  की  भी  भांषा  देखो, रामराज की  आशा देखो
दाॅव लगे  तो  पाशा  फेंको, सारा  सदन,  तमाशा देखो
एक  टाॅंग  रेलों   मे   देखो, एक  टाॅंग जेलों   में  देखो
जूॅंआ, सट्टा  और  अय्यासी, लूटमार खेलों  में  देखो
हे,कु-कर्मो  के  बे - शर्मो,  मुस्टण्डो  के   झण्डो झोलों
अगर किसी  को  गाली  देनी हो तो बस, नेताजी बोलो

अब तो सडक छाप आवारा जनमत से चुनकर आते है
चाट ,पकोडी  बेचने  वाले   राष्ट्र- ध्वजों  को  फहराते हैं
रहने  को  घर-बार  नही  था,  फारम-हाउस  की बाते है
राजनीति  में  हिन्दुस्तानी   नेता  की कितनी  जाते है
प्रजातंत्र के विषमन्थन से,सागर में  तो विष ना घोलो
अगर  किसी  को  गाली  देनी हो तो  बष,नेताजी बोलो

रोटी  है  तो  दाल  नही  है,नेता को  कुछ ख्याल नही हेै
मंहगायी  मलाल  नही  है,बिखरे  स्वर  है ताल नही है
पल-पल में  परिधान   बदलने से तो  भारत शर्माता है
कुछ  तो  शर्म  करा बे-शर्मो, अब नंगी  भारत माता है
मां की सेवा  में अर्पित  हो  करके अपने पाप तो धोलो
अगर किसी  को  गाली  देनी हो तो बस, नेताजी बोलो

सभी लंगोटे, हाथ  में  लोटे ,लेकर  दिल्ली भाग रहे हैं
ईमाम बुखारी आयत पढकर,मुर्छा से अब  जाग रहे हैं
अगडे,पिछडे,झोपड पट्टी, सभी  को  चारा  डाल रहे हैं
भारत माता के  बच्चों  को सब, भाषण  से पाल रहे हैं
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाइ,की अग्नि के ठण्डे शोलों
अगर किसी  को गाली  देनी  हो तो बस ,नेताजी बोलो

डेढ़  अरब  में  भूखे - नंगे  इनके  कारण  ही  मरतें हैं
नेताओं  के  धन्धे  देखो,  धोती   कुर्ते   क्या  करते हैं
सोने की चिडिया का  भारत मिट्टी में कैसे मिलता है
संविधान का प्राविधान  भी, नेताओ से क्यों हिलता है
कवि‘आग’ के श्रोताओं  को क्यों डसते हो सर्प सपोलों
अगर किसी  को गाली  देनी  हो तो बस,नेताजी बोलो !!
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                    9897399815
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Saturday, July 4, 2015


                  एक आैर क्रान्ती
संविधान  के  इन  पन्नो  से   भारत    माँ  शर्माती है
राजनीति  की औलादें क्यों  कसम   उसी  की खाती है
कानूनो  के   इन   पंजो  में   राष्ट्र    फंसा   कहराता है
सम्प्रभुता  में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई भ्राता है
कौम,कबीले,मजहब,जातियाँ उभर-उभर कर  आती है
अब  संविधान  के  इन पन्नो से भारत  माँ शर्माती है

सापेक्ष  धर्म   , निर्पेक्ष  बना  कर सभी  दुहाई  देते है
मूरख  नेता   सूखी   सरिताओं    में   नौका   खेते है
मूल - भूत  अधिकार  मूल  में दबा हुआ मर जाता है
शोक  मनाता  संविधान   मुर्दो   की   गौरव  गाथा है
समृद्व  राष्ट्र  को  चोर   चकारों  की  पीढी  ही  खाती है
अब  संविधान  के  इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है

खूनी, कतली, व्यभिचारी,  सम्मान  राष्ट्र  में  पाते हैं
राष्ट्र - भक्त   क्यों  लाचारी  में मौन  हुये  मर जाते हैं
संविधान  से भारत - भाग्य विधाता  छँट कर आयेंगे
इस  प्रजातन्त्र  में   राष्ट्र-गीत बीहड   के  डाकू गायेंगे
छोटी  -  छोटी   राजनीति  के  डबरे    सब  बर्षाती है
अब  संविधान के  इन पन्नो से भारत माँ  शर्माती है

संविधान  के  इसी ग्रन्थ  ने  देश के  टुकडे काट दिये
झोपड पट्टी, भाषा, बोली, खोली  में   सब  बाँट दिये
पूरब,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण गली मुहल्ला  बन  जाता है
राम,कृष्ण का आर्यखण्ड भी,भीख  माँग कर खाता है
मन्दिर, मस्जिद  के  झगडे  हैं,ना  दीपक,ना बाती है
अब  संविधान  के इन पन्नो से  भारत माँ शर्माती है

जिसके मूँह में जो आता है अपशब्दो  को बोल रहा है
गुरूकुल और मदरसा शिक्षा की औकातें  खोल रहा है
भद्दे - भद्दे शब्द निरंकुश जनमत  जनता को भाते हैं
जैसी  जनता  वैसे   नेता  बोटों  से  चुनकर  आते हैं
सभ्य  राष्ट्र  में आज  सियासत  संविधान  संघाती है
अब संविधान के  इन पन्नो  से  भारत माँ शर्माती है

जिस भारत  में  युवा देश  के दर-दर  ठोकर खाते हों
भुखमरी, गरीबी, मंहगाई की  घर-घर  में सौगातें हों
देश  की  पूंजी, काला-धन परदेश बैंक  में  संचित हो
कराधान  की जनता ही जिस धन से  पूरी  वंचित हो
मूल-भूत  अधिकार  सियासत  संविधान  से गाती है
अब संविधान  के इन पन्नो से  भारत  माँ शर्माती है

समय आ गया संविधान के  जर्जर पृष्ठ   बदल  डालो
संविधान  की  कसमे  खाने  वाले  धृष्ट    बदल डालो
ऐसा संविधान  बनवाओ  जो  भारत  का  मस्तक हो
व्यभिचार ना बलात्कार की  गुंजाइस  की  दस्तक हो
कवि आग भारत की ममता हर मजहब   को भाती है
अब संविधान  के इन पन्नो से  भारत  माँ  शर्माती है।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     9897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

 यह रचना10मिनट पूर्व नरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी के जज्बात पर लिखी गयी है,तथा दूसरे मित्र ने कहा की थोडा भाव विस्तृत होने चाहिये इसलिये कविता पूर्ण कर प्रस्तुत कर रहा हूं।
                     भावना मर गयी
मर गयी बच्ची सियासत की  सडी इस भीड में
फिर फुटा गुमनाम अण्डा, सल्तनत के नीड में
बे-दर्द के ही दर्द को,अब  सब सियासी देखते हैं
घाव के सम्भाव में भी,बस,रोटियां ही सेंकते हैं

किस कदर कन्या बचाने के लिये सब भौंकते हैं
दर्द  में  हमदर्द  देखो ,सब  सियासत छोंकते हैं
थोडा सहारा ध्यान से नवजात को मिलता अगर
मौत को भी  हम  विधाता  की दया से रोकते हैं

किस  कदर  उपचार  में  भी भेद देखो हो रहा है
देश को  हम  तुम  नही  ये राज नेता खो रहा है
जान की किमत सडक पर फडफडा कर बोलती है
मर गयी नवजात पर,औकात सबकी खोलती है

नर- भक्षीयों  की भीड  हेमा  पर लुटाती जान है
ये देश  भारत था  कभी,पर आज हिन्दुस्तान है
क्या कोई भी ऐसा नही था,जो बे-जुबां को देख ले
मजहबों  में  ये  महीना, आज  भी  रमजान है

मुआवजों  में  मौत  को  कितना लुटाते जाओगे
तुम आदमी हो, आदमी को और कितना खाओगे
आदमी की मौत भी व्यवसाय बनती जा रही है
किस कदर अय्यासियां नव-अंकुरों को खा रही हैं।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                     मो0 9897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com

 यह रचना10मिनट पूर्व नरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी के जज्बात पर लिखी गयी है,तथा दूसरे मित्र ने कहा की थोडा भाव विस्तृत होने चाहिये इसलिये कविता पूर्ण कर प्रस्तुत कर रहा हूं।
                     भावना मर गयी
मर गयी बच्ची सियासत की  सडी इस भीड में
फिर फुटा गुमनाम अण्डा, सल्तनत के नीड में
बे-दर्द के ही दर्द को,अब  सब सियासी देखते हैं
घाव के सम्भाव में भी,बस,रोटियां ही सेंकते हैं

किस कदर कन्या बचाने के लिये सब भौंकते हैं
दर्द  में  हमदर्द  देखो ,सब  सियासत छोंकते हैं
थोडा सहारा ध्यान से नवजात को मिलता अगर
मौत को भी  हम  विधाता  की दया से रोकते हैं

किस  कदर  उपचार  में  भी भेद देखो हो रहा है
देश को  हम  तुम  नही  ये राज नेता खो रहा है
जान की किमत सडक पर फडफडा कर बोलती है
मर गयी नवजात पर,औकात सबकी खोलती है

नर- भक्षीयों  की भीड  हेमा  पर लुटाती जान है
ये देश  भारत था  कभी,पर आज हिन्दुस्तान है
क्या कोई भी ऐसा नही था,जो बे-जुबां को देख ले
मजहबों  में  ये  महीना, आज  भी  रमजान है

मुआवजों  में  मौत  को  कितना लुटाते जाओगे
तुम आदमी हो, आदमी को और कितना खाओगे
आदमी की मौत भी व्यवसाय बनती जा रही है
किस कदर अय्यासियां नव-अंकुरों को खा रही हैं।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                     मो0 9897399815
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Friday, July 3, 2015

                   अच्छे दिन
राजनीति  मे  अच्छे  दिन  तो  राजनीति  के ही आते हैं
व्यापारी को छोड के  बाकी  हम सब  तो  धक्के खाते हैं
अच्छे दिन  की  परिभांषा  मे  वशुन्धरा सुषमा आती है
अरूण जेतली,शरद पवार और शुक्ला  की पीढी  खाती हैे

दिल्ली , महाराष्ट्र, गुजराती  अच्छे  दिन  ही  मान रहे है
यू.  पी.  ओैर   बिहारी,   राजस्थानी  सीना  तान  रहे है
उत्तराखण्ड और दक्षिण भारत  अच्छे दिन में डोल रहे हेैं
पूरब,  पश्चिम,  उत्तर,  दक्षिण  सब औकातें खोल रहे हैं

कोई  प्रान्त  बचा  है  ऐसा  जंहा  का  नेता दीन दुखी है
मध्यवर्ग,मजदूर,किसान को  ढूंढ के देखो कंही सुखी हो
राजनीति  में  जंहा  भी  देखो  नेता  की   चर्चा  जारी है
अच्छे दिन की  परिभांषा  में  नेता  जी  ही क्यों भारी हेै

अय्यासी  में  ए.सी  गाडी, फार्म - हाउस ,और बंगले हैं
प्रजातन्त्र  में  भीख  मांगने  वाले  नेता  सब  कंगले हेै
अरब खरब  के  विज्ञापन  मे  देश की माया  डाल रहे हैं
पूरे  देश  में   सारे   नेता   अपने   चमचे   पाल  रहे हैं

जनसंख्या, भुखमरी  गरीबी, मंहगायी  इनके कारण है
जनता  का  धन  लूट  रहे  हैं,ये भारत के भव तारण हैं
कनिमोझी,  कलमाडी,  मोदी  को  नेता  ही  पनपाते हेैं
डाकू  डाका  डाल   रहे  हैं,  नेता  जी  मिलकर  खाते हैं

फर्जी  डीग्री  के  गण नायक, लोकतन्त्र में खास हो गये
जो चूनाव  ही  हार  गये  हैं, राष्ट्र - भक्त नक्कास हो गये
पूरातत्व   के   गड  बड  बूढे,  राज्यपाल ,  सत्ताधारी हेै
महाभारत  के  कुरूक्षेत्र  में, रक्षक - भक्षक   गिरधारी हैं

देश  की  जनता  नेताओ  में  नैतिकता को झाँक रही है
अलग अलग  बीहड  के  डाकू  से भारत को आंक रही है
लोकसभा  में  आधे  सांसद  मायावी  है   अरब  पति हेै
फिर  भी  वेतन  लूट  रहे  है, प्रजातन्त्र   के  मूढमति है

कुछ  तो  खुद  को  नंगा  घोषित करके माया लूट रहे हैं
आँख मूद  कर ये  कंगले  भी, अजगर हैं सब घूंट रहे है
राजनीति  में  अच्छे  दिन  के  कारण  ही  नेता आते हैं
बूरे दिन में अच्छे  दिन  की  कवि  आग कविता गाते हैें।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                     मो0 9897399815
            rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, July 2, 2015

                वेतन के चेतन
भारत नंगा लोक  सभा  के  सेवक चंगे
ये अच्छे दिन हैं मोदी भैया हर हर गगे
खुदी खजाना हाथ में लेकर  नाच रहे हैं
गरूडपुराण मुर्दे अब खुद ही बाँच रहे हैं

अरब-खरब की माया   डाकू  चाट रहे हैं
ये अपने - अपने बीहड  डाकू बाँट रहे है
पूरा  हिन्दुस्तान  चाट  कर  खाने वाले
क्या मजदूरों  के  हाथों  में देखे है छाले

लाल बहादुर  और पटेल की बात करेंगे
ये खादी   के  कुर्ते  अब  आघात  करेंगे
गाँधी  ने  भारत  को  देखा, वस्त्र उतारे
हम जैसे  नंगे  देख रहे  है  दिन में तारे

शांशद हैं  या ललित मोदी के साडू भाई
भारत माता बनी सियासत में भौजायी
जिसको  देखो  बलात्कार की तैयारी में
पुत्र  बने   हैें  कामुक  सत्ता  सरकारी में

हम20,000 में अपने घर को चला रहे है
ये बडे भिखारी सभी देश को जला रहे है
मजदूरी, उपनल  आउट- शोर्स को देखो
घूम रहे  सडको  पर उन पर नजरे फेंको

पढे-लिखे बच्चे  सडकों पर भटक रहे हैं
भविष्य देश के शूली पर ही लटक रहे हैं
क्या नेता  के  बच्चे भी दुख भोग रहे हेैं
क्या राजयोग ही भारत मे संयोग रहे हैं

कुछ तो शर्म करो जन सेवक खद्दरधारी
क्यों  करते  हो  भारत  में  एेसी गद्दारी
वेतन ,भत्ते, पेन्शन  अब तो छोडो भाई
कवि आग  अब  चाट रहे हैं गधे मलाई।।
     राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
            मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com            

                    कानून-पथ
अब मेरी  मानले  घर में आजा  मोदी भैय्या
तू  ही  पार  लगायेगा   व्यभिचार   की नैया
आदर्श-वाद  को  तू  ही नंगा  कर   सकता है
चरित्रवान   से  तू   ही  पंगा  कर  सकता है

किस-किस ने कब कितना  खाया,तू बोलेगा
भारत  की  औकात  सियासी   तू   खोलेगा
इन चोर, डाकुओं  के  बीहड  में  कंहा धडे हैं
जज,मुजरिम,अधिवक्ता किसके साथ खडे हैं

किस  देवी  के  साथ  कंहा  पर  रास रचायी
किस  देवी  ने  कंहा  तुम्हारी  जान  बचायी
इस बहुमुल्य हीरे को,किस किस ने पहचाना
इस हीरे  ने किस - किस  को  डाला  है दाना

हर मुजरिम अब घर  आने  की  सोच रहा हेै
कानून  हमारा  गुनाह  सभी के   पोंछ रहा है
बडे - बडे    अधिवक्ता    सीना    तान  रहे है
अपराध  भ्रष्ट  के , संविधान  में छान  रहे हेै

समय आ गया  आत्म सर्मपण कर  दे भाई
सलमान  खान  की  देखा  कैसे   बेल कराई
कानूनो   के  जोड - तोड  के  सब   माहिर है
गुण्डों  की   रक्षा   होती   है ,जग - जाहिर है

अधिवक्ता, जज, गवाह  सभी   तैयार खडे हैं
लोकसभा  और राज्य सभा के अलग  धडे हेैं
कानूनो  में  परिवर्तन   भी   हो  ही  जाता हेै
इस  राजनीति   में   भ्रष्टाचारी   ही  आता है

तू  छंटा-छंटाया   व्यभिचारी,  माया  धारी है
आई.पी.एल  में  तेरे  किस्से  जग   जारी है
नर - नारी  किरदार, तुझे सब   मान  रहे हैं
तेरी महफिल में अय्यासी के गुणगान रहे हैं

चूनाव जेल  के अन्दर  से भी  लड सकता हेै
ये  प्रजातन्त्र  है, उपर  भी  तू चढ सकता है
बोट - बैंक   की   राजनीति  हैे   माया  बाँटो
इस प्रजातन्त्र  में  चोर  उचक्के   नेता छांटो

वशुन्धरा,जेतली,सुषमा  तीनों  शान्त खडे हैं
अब पी.एम मोदी असमंजस  में भ्रान्त पडे है
प्रियंका,सोनिया,ऱाहुल,शुक्ला गम झेल रहे हैं
चैनल  में  तोते, बस  मोदी-मोदी  खेल रहे हैं

अब  कानूनो  से भारत की इज्जत खोती हेै
आज  कचहरी  अधिवक्ता, जज  से  रोती हेै
गुनाहगार,सर चढा  है  खुलकर बोल रहा है
कवि आग   ये   मोदी  सबको  खोल रहा हेै।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
               मो0 9897399815
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