Friday, February 13, 2015

             शपत में खपत
अब क्यों गोपनीयता की शपत चौराहों में
अब क्यों  कुचलते  हो  सियासत पाँवों मे
अब क्या   दिखाना   चाहते   हो  देश  को
अब क्यों  तोडते हो  राष्ट्र  के  परिवेष  को

ये  अदालत   क्यों   जलालत   हो  रही है
चौराहो  में   भी  अब  वकालत  हो रही है
ये  सियासत  राष्ट्र   को   क्यों  खो रही है
अब देख  लो  जनता  गधों  को ढो रही है

सब जानते हे इस शपत में क्या लिखा हेै
ये राष्ट्र  भी  तो इस शपत  से ही बिका है
कौेन  हैे  जो  इस  शपत   को  मानता हेै
अब  ये   जमाना   लोकशाही  जानता है

सिद्यान्त से इस भीड को क्यों नापते हो
क्यों वोट के  कारण  सडक में हापते हो
मिल गया जनमत कुछ करके दिखाओ
चौराहे  की सर्कस ,सदन को ना बनाओ

वही मदिरा पुरानी बोतलों में भर रही है
जनता नशे मे  चूर, अब  भी  मर रही है
लेवल बदल कर क्या हमे  दिखलाओगे
अब  गीत  तो  तुम  भी  पुराने  गाओगे

जनसर्मथन ही  तो सब कुछ कह रहा है
बे- भाव  के  क्यों  भावना मे बह रहा है
रिक्तता  तुम  को  मिली भरके दिखाओ
आग की मानो  तो कुछ करके दिखाओ।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                 9897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com




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