Friday, February 6, 2015

अन्त में सन्त
चर्च,शिवालय, मन्दिर जाकर कोई माथा  टेक  रहा है
गुरूद्वारे  में  लंगर  खाकर   कोई   रोटी    सेक  रहा है
कोई पागल घर-घर  जाकर,चरण वोट  के चूम रहा है
कोई नौ-रत्नो में बैठा,बस,जीत मान  कर  झूम रहा है

परिणामों के  जीत- हार  में ,सारे  पागल  भाग  रहे है
सबसे ज्यादा, टी. वी. चैनल  वाले  पागल जाग रहे है
बी.जे.पी.का घटोत्कच्छ,भी गदा  भीम की देख रहा है
आप पार्टी का अभिमन्यु, लक्ष्य  यक्ष  पर फेक रहा है

कितने डाकू  इस बीहड  को  सेंध  लगाकर  भाप रहे है
कुछ  बाबा भी  नेताओ  की  औकातो   को  नाप रहे है
उद्योग जगत के लावारिस भी,बाप इन्ही मे छाँट रहे है
गुमनाम बधायी,मोबाइल में एसएमएस से बाँट रहे है

चार  दिनों   तक  सभी  मौन है,शोकाकुल परिवारो में
चर्चायें  होती  है  गुमशुम  अब ,सत्ता   के गलियारो में
अपने-अपने भगवानो के  चरणो  में सिर  रगड  रहे है
सडको  मे  भी  नंगे-भूखों के जतघट  को  जकड रहे है

मतदानो  के बूथ-केन्द्र  में कातर  जनता  खडी हुयी है
नेताओं  की  सन्ताने  भी, लावारिस  सी   अडी हुयी है
घर-घर  से  वोटर  को  लाकर मतदान  में खीच रही है
जनता  भी भयभीत भीड  में, मजबूरी  मे  भींच रही है

नेता जी  भी हाथ   हिलाकर,  बोटर  को  ही  पटा रहे हेै
अपनी इज्जत बूथ-केन्द्र मे,अंतिम क्षण  में घटा रहे है
पकड  कैमरा टी. वी. चैनल  वाले  चक्कर   काट  रहे है
ये भी  अपने-अपने ढग   से  प्रजातन्त्र   को  बाँट रहे है

अन्तिम क्षण में ये चुनाव है,सबका चेहरा दिखजाता है
तत्क्षण,क्षण मे भाग काग, जनमत कैसे लिखजाता है
चार दिनो  में  नये  ढग का  प्रजातन्त्र  चुनकर आयेगा
कवि आग की मजबूरी है,कुछ ना कुछ लिखता जायेगा।।
                   राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       मो0 9897399815
            rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:

Post a Comment