Monday, November 30, 2015

बर्निंग ग्लोबल के कारण जलवायु परिवर्तन विनाश का सूचक

पर्यावरण
आदमी अभिशाप बनता जा रहा है श्रृष्टि में
पर्यावरण भी रो रहा है आज अपनी दृष्टि में
जन,जीव,जीवन और प्रकृति श्रृष्टि का आधार है
पर्यावरण की लुप्तता इस श्रृष्टि का संहार है

जंगल,जमी,जीवन धरा से लुप्त होता जा रहा है
देख लो ये आदमी, विज्ञान , कुदरत खा रहा है
युद्व है आकाश में , ओजोन मंडल फट गया
कुदरती दुनिया में कैसे जल,जमी, नभ बंट गया

स्वास्थ की सम्पन्ता को जंगलो से तोलते थे
कैसा खजाना कुदरती मेरे वतन को बोलते थे
दिन रात जंगल कट रहा है आदमी के हाथ से
ये राष्ट्र ही मर जायेगा आकाल के आघात से

कितनी जडी और बूटियां जंगलों में पल रही थी
संजीवनी उपचार की हमको युगों से मिल रहीथी
इतिहास औषध बनगयी जंगल ही गायब होगया
अब देख लो गंजा शिखर कैसा अजायब होगया

भूचाल है भूकम्प है ज्वालामुखी का ग्रास है
जाने कितने रोग हैं जन - जन में जीवन त्रास है
जगल जमीं अवलम्ब था श्रृष्टि के सोपान में
विज्ञान बनता जा रहा है काल हिन्दुस्तान में

गुप्त था जो जल जमीं में खो गया पाताल में
विज्ञान भी है बे-खबर आकाल के इस काल में
हर नदी में डाम हैं बिजली बनाने के लिये
मजबूर है विज्ञान भी श्रृष्टि चलाने के लिये

जल से बिजली ठीक है बिजली से जल ना पाओगे
हर जीव का आधार जल, बोलो कहां से लाओगे
जो रोकते थे वृक्ष , जल को कट गये बे-भाव से
हर जीव ‘चातक’ बन गया विज्ञान के प्रभाव से

छोटे - छोटे डाम हों जंगल जमीं बचती रहे
श्रृष्टि भी तकनीक से कुछ नया रचती रहे
विद्युत भी हो, जलवायु हो ,बात बनती जायेगी
अन्यथा इस आदमी को आवश्यकता खायेगी

भाष्कर की पुञ्ज को ओजोन कैसे शोकता था
लौ -किरण उसकी भयंकर,शून्य में ही रोकता था
मांग है जितनी धरा, उतनी तपिस को छेाडता है
ओजोन की इस पर्त को विज्ञान कैसे तोड.ता है

कारण बना है हर तरफ से श्रृष्टि के संहार का
प्रदूषणों से खेा गया ऋतु का नियम लाचार का
अब भी समय है श्रृष्टि में पर्यावरण बच पायेगा
विज्ञान से तो आदमी बे - मौत मारा जायेगा

रोग हैं अकाल हैं कहीं बाड. जीवन खायेगी
श्रृष्टि में प्रलय भयंकर बे - समय आ जायेगी
फिर कहां विज्ञान हम तुम ना धरा रह जायेगी
अस्मिता ब्रहमाण्ड की विज्ञान से बह जायेगी

विज्ञान भी हो और प्रकृति आदमी आधार हो
एसी ना हो प्रतिकूलता सोंन्दर्य का संहार हो
पर्यावरण, विज्ञान से श्रृष्टि नयी बन जायेगी
ये आग, कहता है, धरा ब्रहमाण्ड की हो जायेगी ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Sunday, November 29, 2015

सियासत
मुद्दतों से आदमी को अब हंसी आती नहीं है
वेदना में प्यार की बातें कभी भाती नहीं है
क्या दिखावे की हंसी से आदमी बच पायेगा
रुग्णता का आदमी अपनी नशल को खायेगा

मन प्रफुल्लित हो हृदय हंसकर हसी को खोलता
यह भावना का भाव है जो मौन होकर बोलता
आदमी की हैसियत को बिन तराजू तोलता
प्रसन्नता का आदमी निश्चल धरा में डोलता

हंसना हंसाना खिल खिलाकर ये दिमागी खेल हेै
अब आदमी के सामने भगवान भी तो फेल है
मैं देखता हूॅं धर्म और मजहब यंहा बेमेल है
कैसे जलाउं द्वीप मैं ना जोत है ना तेल है

सरकटि लाशें सियासत की नुमाइस हो गयी हेै
राजनीति का अखाडा आजमाइस हो गयी हेै
कौन लूटेगा वतन को आज ख्वाइस हो गयी हेै
खादी लिवाशों में डकैती की गुंजाइस हो गयी हेै

देेख लो मेरे देश की संसद अखाडा हो गयी हेै
आज तो मेरे वोट की किमत कबाडा हो गयी हेै
द्वंद सांडो का सदन में खादियों की आड में हेै
ये सांड तो लडते रहेगें देश जाये भाड में हेै

वोट का प्रतिबिंब संसद मे झलकता जा रहा है
वोट से मेरेे वतन को राजनेता खा रहा है
ना समझ का वोट पढता है गधों की पीठ पर
शोभता है सांड सडकों का सदन की सीट पर

मर गयी जनता वतन की इन शवों के साये में
फिर भी मुर्दा बोलता है हर जगह चैराहे में
मरघटों से पाटते हैं हर शहर हर गाांव को
हम पालते हैं शौक से नासूर के इस घाव को

हम अगर चाहे तो ये औकात में आ जायेंगे
इस तरह से नोच कर फिर ना वतन को खायेंगे
मत हमारे हाथ में हिम्मत कहाॅं से पायेंगे
अंकुश लगाना आ गया ये देश के हो जायेंगे

अहिसुष्णता,मंहगायी,भ्रष्टाचार बढता जा रहा है
आदमियत आदमी की धर्म, मजहब खा रहा है
आश्वासन के भरोसे पर वतन ये चल रहा है
किस कदर ये आश्वासन आग को भी छल रहा है!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, November 28, 2015

तथाकथित-धर्म
वेद पुरान का छाता देखो, राम कृष्ण की गाथा देखो
भीड. भयंकर तांता देखो ,धरम् करम् का खाता देखो
वक्ता कैसा बोल रहा है, धनिक कौन है तोल रहा है
कथा में किस्से खोल रहा है,मन पागल है डोल रहा है
दीन दुखी की भीड. जमा है, सुनने वाले खूब रवां है
नर नारी का खूब संमा है फिर झगड नहीं थमा है
देखो राम कृष्ण की बातें, एक धरम् में कितनी जातें
देखो धन कितना हैं खाते, कैसे कटती इनकी रातें
मुल्ला के उपदेश भी देखे इस धरती में क्लेष भी देखे
धरम् करम् के द्वेष भी देखे, कैसे हैं दरवेष भी देखे
अब तो सिर्फ ईसाइ हस्ती, पैग हाथ में देखो मस्ती
मजहब कीमती कौमें सस्ती,कैसी देखो हालत खस्ती
एक जमीं जंहा एक है, अल्लाह ईश्वर सभी नेक है
जल में कैसी खींची रेख है,करम गति का अटल लेख है
भिक्षु नंगे चलते देखे, धर्मो से मठ पलते देखे
बन में जोगी गलते देखे, खाली हाथ मसलते देखे
राधास्वामि भीड. है भारी निरंकार की महिमा न्यारी
गुरुद्वारों में लंगर जारी,धरम का धन्धा है लाचारी
देखो सबका एक विधाता,फिर कैसे मजहब भटकाता
देखो धरम् करम का नाता, कैसी आग लगाई भ्राता
मजहब शान्त कहां होते हैं,अपने घर को क्यों खाते हैं
अब तो मुर्दे भी रोते हैं,धरम् मजहब को क्यों ढोते हैं
बैर मजहब में क्यों होता है, बन्दा घुटके क्यों रोता है
मूल्य धरम् का क्यों खोता है,सारा धन्धा ही थोता है
भगवानों की माया देखेा, चमक भक्त में काया देखो
महाकाल की छाया देखो, मुर्खो ने भरमाया देखो
हर शरीर में तत्व पांच हैं, फिर भी तन में लगी आंच है
धरम् धरा में बिछी कांच है,पडे. भरम् में कहां सांच है
पशुओं को कुछ सुन्दर पाया,सुन्दरता में भोली काया
नभ में देख परिन्दा छाया,सब के उपर रब की माया
अन्दर सबके एक खुदा है,फिर क्यों बन्दा जुदा जुदा है
भगवान भक्त तालाक शुदा है जिसमें ताक वही खुदा है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, November 27, 2015

धर्म-निर्पेक्ष
संविधान की चर्चा वालो अपने भीतर भी झाँको
धर्म,मजहब से मानवता के गिरे मुल्य को भी आँको
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाइ की रचना के रचनाकारों
सम्प्रदाय की चिन्गारी के शोले, शबनम से अंगारों

वध, जेहाद, फसादों की ये भांषा धर्म नही होती
मजहब कौम, कबीलो की अभिलाषा जुर्म नही होती
सम्प्रदाय का मतलब ही है समता के व्यवहारी हों
धर्म लक्ष्य हो चलने वाले मजहब आज्ञाकारी हों

राम, कृष्ण हो ईशा, मूसा, चाहे पीर मुहम्मद हो
धर्म-ग्रन्थ गीता, कूरान हो,महावीर हो,धम्म-पद हो
सत्य,अहिंसा,दया, प्रेम हो ,पन्थ स्वंय बन जाते हैं
हर मजहब के, सम्प्रदाय के सूत्र यही बतलाते हैं

निर्पेक्ष धर्म क्यो संसद के गलियारो में दोहराते हो
क्यों अपनी परिभाषाओं से मजहब को सहलाते हो
सम-विधान हो भारत में,बस, ये कर्तव्य जरूरी है
कर्तव्य परायण मजहब हो, बस,धर्म मध्य मे धूरी है

राजनीति में जनमत को अब वोट-बैंक से मत तोलो
मानवता में वैमनस्यता की परिभांषा अब मत बोलो
क्षेत्र,जाति की चिन्गारी से,अखण्ड-राष्ट्र को मत फूंको
खुले व्योम पर काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह से मत थूको

राजनीति में अपने - अपने धर्म -भाव को पहचानो
मन्दिर,मस्जिद,गुरूद्वारा,गिर्जा भी संसद को मानो
अपने-अपने धर्म, कर्म से राष्ट्र भक्ति को अपनाओ
कवि आग की विनती है बस,भारत को अब ना खाओ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, November 26, 2015

भारत के संविधान शब्द का सामान्यतः शाब्दिक अर्थ सम-विधान मतलब प्रत्येक कानून प्रत्येक व्यक्ति पर बराबर लागू हो, कोई छोटा,बडा,उंच,नीच,धनी,निर्धन जैसी मूल भूत व्यवस्थायें समान होनी चाहिये,परन्तु गरीब गरीब है, धनी धनी है,किसी के पास रहने को घर नही है कोई अथाह सम्पत्ति लेकर बैठा है। आदि बहुत सी अनियमिततायें हैं जो सम-विधान शब्द पर प्रश्न चिन्ह है।
एक आैर क्रान्ती
संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है
राजनीति की औलादें क्यों कसम उसी की खाती है
कानूनो के इन पंजो में राष्ट्र फंसा कहराता है
सम्प्रभुता में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख,इसाई भ्राता है
कौम,कबीले,मजहब,जातियाँ उभर-उभर करआती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है

सापेक्ष धर्म , निर्पेक्ष बना कर सभी दुहाई देते है
सम्प्रदाय और मजहब,पन्थ सब अपनी नौका खेते है
मूल - भूत अधिकार मूल में दबा हुआ मर जाता है
शोक मनाता संविधान मुर्दो की गौरव गाथा है
समृद्व राष्ट्र को चोर चकारों की पीढी ही खाती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है

खूनी, कतली, व्यभिचारी, सम्मान राष्ट्र में पाते हैं
राष्ट्र - भक्त क्यों लाचारी में मौन हुये मर जाते हैं
संविधान से भारत - भाग्य विधाता छँट कर आयेंगे
इस प्रजातन्त्र में राष्ट्र-गीत बीहड के डाकू गायेंगे
छोटी - छोटी राजनीति के डबरे सब बर्षाती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है

संविधान के इसी ग्रन्थ ने देश के टुकडे काट दिये
झोपड पट्टी, भाषा, बोली, खोली में सब बाँट दिये
पूरब,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण गली मुहल्ला बन जाता है
राम,कृष्ण का आर्यखण्ड भी,भीख माँग कर खाता है
मन्दिर, मस्जिद के झगडे हैं,ना दीपक,ना बाती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है

जिसके मूँह में जो आता है अपशब्दो को बोल रहा है
गुरूकुल और मदरसा शिक्षा की औकातें खोल रहा है
भद्दे - भद्दे शब्द निरंकुश जनमत जनता को भाते हैं
जैसी जनता वैसे नेता बोटों से चुनकर आते हैं
सभ्य राष्ट्र में आज सियासत संविधान संघाती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है

जिस भारत में युवा देश के दर-दर ठोकर खाते हों
भुखमरी, गरीबी, मंहगाई की घर-घर में सौगातें हों
देश की पूंजी, काला-धन परदेश बैंक में संचित हो
कराधान की जनता ही जिस धन से पूरी वंचित हो
मूल-भूत अधिकार सियासत संविधान से गाती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है

समय आ गया संविधान के जर्जर पृष्ठ बदल डालो
संविधान की कसमे खाने वाले धृष्ट बदल डालो
ऐसा संविधान बनवाओ जो भारत का मस्तक हो
व्यभिचार ना बलात्कार की गुंजाइस की दस्तक हो
कवि आग भारत की ममता हर मजहब को भाती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Wednesday, November 25, 2015

मानव-धर्म
देश की चिन्ता किसे है राजनीतिक द्वन्द में
रोज झगडे हो रहे हैं, हर जगह मतिमन्द में
आयते शैतान की अपशब्द मुख से बोलती है
औकात हिन्दुस्तान की औलाद ही खुद खोलती है

हर लब्ज में कर्कस किटाणू,मजहबी लिपटे हुये है
सम्प्रदायोें के कबीले शख्स पर चिपटे हुये है
हर शब्द में भी अर्थ अपने हम विषैले छाँटते है
अब मजहबो में आदमी के लोथडे हम बाँटते है

छोडकर कोई वतन को भागने की सोचता है
र्निदयी भी रक्त-रंजित घाव को ही नोचता है
ना समझ इस आग में बस ,धर्म जलता जा रहा है
मानवों को मजहबी और सम्प्रदायी खा रहा है

बाइबिल ,गीता,कुरूआनी लब्ज फीके पड गये है
धर्म के तालाब में बस, आदमी ही सड गये है
क्या मजहबी तालीम से जालिम पनपते जायेंगे
क्या आदमी ही आदमी की आदमियत खायेंगे

अब कोई तो जागा हुआ बन्दा उठे इस भीड से
अब कोई तो अण्डा फुटे इन घोंसलो के नीड से
टूटी कडी सब जोड दे,जो धर्म से बिखरी पडी है
आज मजहब, सम्प्रदायो की परीक्षा की घडी है

जो जातियों, कौमो कबीलों के समय से पार हो
आदमी मजहब बने और धर्म ही हथियार हो
बस,पुष्प हो ऐसे चमन में, गन्ध हो मकरन्द हो
कवि आग हो, संवेदना हो , वेदना स्वछन्द हो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
मो09897399815
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