Tuesday, March 31, 2015

              बापू के सिद्यान्त
बापू अब सिद्यान्त  कंहा  है , प्रजातन्त्र में
जनमत ,कीडे़  रेंग  रहे  हैं, सढे़   यन्त्र में
सत्य ,अहिंसा  की  बातें,   हिंसा  जारी है
जितना  बडा  लफंगा, उतना  ही  भारी है

लोभ - लुभावन  नारे,  मुर्दों  को   भाते हैं
अब गढे़  कबर  के  मुर्दे,  सत्ता में आते हैं
सडक  में  मुर्दे ,झण्डा   लेकर  घूम रहे हैं
शंखनाद  भी  शमशानों   को  चूम   रहे हैं

अब मुन्ना  भाई  मुख्यमंत्री  बन जाते हैं
चारण भाट मंच  पर अब  कविता गाते है
आम आदमी बैलों से अब साण्ड हो गया
पर्दे का व्यभिचारी,खुल्ला  काण्ड हो गया

हडताले  और  सत्याग्रह   तेरी   शिक्षा हेै
भीख मांग कर जनमत,ये कैसी भिक्षा हेै
सभी भिखारी  अय्यासी  की मस्ती छाने
मोहताज पडे़ हैं मालिक दर दर दाने-दाने

पराधीन थे ,पर  रोटी तो मिल  जाती थी
व्यभि-चारिणी,नैतिकता  से  शर्माती थी
बलात्कार की बातें केवल स्वप्न दोष था
राष्ट्र-भाव, सम्भाव सभी में भरा ठोस था

कामुकता थी पर,कामुक इन्सान नही थे
मानव,दानव थे, पर  ऐसे  हैवान नही थे
चोर, चकारी , गुण्डा  गर्दी   यदा-कदा थी
भ्रष्टाचारी  की परिभांषा   ही  प्रियंवदा थी

बापू, बस  बाबा  ही  मस्ती  छान रहे  हैं
तुझको अपना परं-पिता  सब मान रहे है
आलीशान  भवन  अय्यासी  के अड्डे हैं
बापू,  ये   भी   तरे   ही  खोदे   खड्डे हैं

देश,  भेष  में  ये परिवर्तन  कैसे  आया
लालकिले से ऐसा झण्डा क्यों  फहराया
भारत में  हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख इसाई
हिन्दुस्तानी सम्प्रभुता में,हम सब भाई

काशमीर को अब तक भारत पाल रहा है
अलगाव वाद,आतंक पाक संभाल रहा है
ये तेरे किये  फैसले जनता  झेल  रही है
काशमीर का खेल सियासत  खेल रही है

जिसने अमर बनाया तुझको वो भारी है
नाथू राम  के  मन्दिर की भी तैय्यारी है
तू चौराहों पर गढा हुआ  चुपचाप खडा है
राजनीति में फिर भी तू ही आज बडा है

बापू ,तुम उपर भी  मस्ती  काट  रहे हो
मौन  बैठ कर सारी   खबरें, छांट रहे हो
आग उगलते  नेताओं  के  भाषण  देखो
कम से कम,दोशब्द प्रेम केअब तो फेंको

मैं मान रहा हूँं नयी नश्ल हेै बिगड़ गयी हैे
पर बापू तुमने  आदर्शों  की  बात कही है
आदर्श अगर थोथा  हैे ,तो हिंसा  होती है
कवि‘आग’की कलम,मौन  से ही रोती है!!
     राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
            मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Monday, March 30, 2015

                     बाढ की आड में ताढ
काश्मीर   की   बाढ  तवाही,  चिन्ता  मे  दिल्ली  डूबी है
मौत  किसानो  की  खेतों  में,ये  भी  दिल्ली  की खूबी हेै
उनका जीवन महत्वपूर्ण है, हवाई जहाज से धन बर्षाओ
अन्नदाता  की  मजबूरी  है,उसको  बस धीरज बंधवाओ

हवाई  जहाज  से नीचे झाँको ,देखो,परखो जाँच बिठाओ
एक - एक  गेंहू  की  बाली  हर  खेतों  से  दिल्ली  लाओ
काश्मीर  के   बोट - बैंक पर , सारे   नेता  सेंध  लगाओ
ऐसा  मौका कंहा  मिलेगा, जाओ मिलकर  लाभ उठाओ

आंशू  पोछो, मौके  बोचो, मुशलमान  को  गले  लगाओ
चन्दा  देखो, धन्दा  देखो, उनको   बाँटो, खुद   भी खाओ
ये  ईश्वर  की  बडी  कृपा  है,  कितने  मौके   भेज रहा हेेै
अब  मरने  वाले  मरे  जा रहे, हमको  वो  सहेज  रहा है

भारत  के  मजदूर,किसानो  को  तो  हम भी  देख रहे है
जंहा  चुनाव  होने  वाले  हैं, वंही  पर   टुकडे  फेंक रहे है
शब्दो के मरहम  की  पट्टी ,करने में हम  सब माहिर हेै
बहुमत की सरकार देश में,ये  किस्सा भी  जग जाहिर है

अच्छी-अच्छी  नसल  के  तोते  हर चैनल में डाल रहे है
हम   शब्दो   के   सौदागर  है, शब्दो  से  ही पाल  रहे है
अब अच्छे  दिन  आने  वाले  हेैं, हवा  में नंगे देख रहे हेैं
इस  प्रजा-तन्त्र  में  सारे  गंजे,  नेता   कंघे  फेंक  रहे हेैं

नेता  की  कुछ  खता  नही  हैे  प्रजातन्त्र  अन्धा होता है
नेता तो  वो  सघा  गधा  हेै जनमत  का   बोझा ढोता है
हम  शब्दो  के चकव्यूह  में, अभिमन्यु  है ,फंस जाते है
कवि  आग  तो  चिन्गारी  से  षडयन्त्रो  को समझाते है।।
                 राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                      मो0 9897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com

Sunday, March 29, 2015



 (यह कविता तीन माह पूर्व लिखी गयी थी जो अब चरितार्थ हो रही हेै)
               आपका भविष्य  
भानुमति  का  कुडमा  सडकों  पर  आयेगा
अब आम आदमी खास आदमी कहलायेगा
इस राजनीति  में  अहंकार   तो  टकराते हैं
क्यों सारे  पागल आम आदमी बन जाते हैं

अब धीरे - धीरे बडे - बडे़  भी  मुँह  खोलेगें
संजय और विस्वास अभी  खुलकर बोलेंगे
कविराज  भी  चुप  हैे,  हरकत भाँप  रहा है
अपने  घर  की  गहरायी   को  माप  रहा है

राजनीति  में  आने  का कुछ  तो कारण हेै
कवि, भाट  सब  आम  पार्टी  में  चारण है
घीरे - धीरे   भ्रूण   गर्भ   में  पनप  रहा हैे
आम आदमी किलस रहा  है, कलप रहा है

भूखे को  रोटी  मिल  जाये,  क्या  छोडेगा
अक्षम  था  जो  चलने में, वोे  अब दौडेगा
आम आदमी  प्रजातन्त्र सडको  पर लाया
बन्दर  के  हाथों में  चाकू  क्यों  पकडाया

एक माह से उथल-पुथल  में  फंसे  पडे थे
सभी एक दिखते थे  सबके  अलग धडे थे
सत्ता और संघर्ष अलग  है, अलग दिशा है
राजनीति की मृगतृष्णा  भी  एक निशा है

राजनीति के कोठे  पर  ये  सब  जायज है
चरित्र-हीन  सन्ताने भी ,सब नाजायज है
राजनीति  में  बाप  बदलना आम बात है
वर्ण-शंकरों  की  दुनिया   में  कंहा जात है

पागल फेस  बुकों  पर  लिखते  हैं,गाते हैं
आप  पार्टी  भाग्य - विधाता   बतलाते हैं
मैं लिखता  था, मुझको  भी गाली देते थे
तारीफ करो  झूठी  तो  सब  ताली देते थे

छोड़ मिडिया, आशूतोष, अब  हैे भीडों में
कच्चे  अण्डे  फूट  रहे   हैं, द्रुम  नीडो में
कविराज  तो  भाट बना  पागलखाने का
अच्छा  मौका   हेै,  अय्यासी  गर्माने का

जनता  कितनी  सस्ती  है ज्ञान हो गया
दिल्ली के  जनमत  से अनुमान हो गया
बोट-बैंक से  मेरा  भारत  भटक  गया है
कवि‘आग’का छन्द हवा में लटक गया है!!
      राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
           मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

                  शूल के फूल                
अन्ना   तेरी   नर्सरीयों   में   कीडे  पड  गये
राजनीति के  मुल्य  देख,दिल्ली में सढ गये
अब सबसे अच्छा  तोता  गोता  मार  रहा है
ये  राजनीति  विध्वंस   देश   को तार रहा है

तू स्वाभिमान  कम  अहंकार को पाल रहा हेै
ये  नये  किस्म  के  कीडे  देश में डाल रहा है
कल  के  जोगी, जटा-जूट  सब  सिद्व हो गये
सत्ता  का  थोडा  खून  लगा तो  गिद्व हो गये

अन्दर-बाहर  के  भावों  में  कुछ मेल नही है
ये  भारत  की , पैसेन्जर   कोई   रेल नही है
अब  सारे   टी.  टी.,  सीटी  लेकर घूम रहे है
ये  कविराज   श्रृंगार   रसों   में   झूम  रहे है

भानूमति  के   कुडमे   ने   औकात दिखायी
अब  कितने  गाँधी  पैदा करोगे अन्ना  भाई
क्या  राग  सुरों  को  बर्षाती   मेढक  गायेंगे
क्या अन्ना   तेरी   नर्सरी   से  नेता आयेगे

नर्सरीयो   में,  पौधे   कम,   गाजर  घासे हेैं
राजनीति   में    तोला,   रत्ती,  सब  मासे हैं
नये - नये  मुल्लों   से  मस्जिद  घबराती है
राजनीति   तो   केवल  अनुभव  से आती है

ये अल्प दृष्टि क्यो्ं कल्पश्रृष्टि को पनपाती हेै
गाजर  घासें  गीत  बसन्त के क्यों  गाती है
पतझड के अनुभव  को  तो  जीवन में झेलो
प्यारे  बच्चों  अभी  आग  से  तो मत खेलो

अन्ना   अपना  मूँह   खोलो  चेलो को डाटों
राजनीति  की  कच्ची फसलें और ना काटो
ये तुझ को ना माने,इनका भी बाप  तू ही है
इनके  कू - कर्मो  का भी  अभिशाप तू ही है

बेदखल  करो  जल्दी  से  अपना मूँह खोलो
राजनीति का  डी. एन.ऐ.,पथ  पर ना घोलो
मै कवि आग खबरो से सब सुनता जाता हूँ
राजनीति  की  घास  आग  से  सुलगाता हूँ।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
               मो0 9897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, March 28, 2015

                 दिल्ली के शेखचिल्ली
राजनीति  में  जूते  खाना  और  खिलाना  आम बात है
पाँच खसम की आप पार्टी गौर से  देखो  अभी अनाथ है
अहंकार की सारी कडियां जुडी हुयी, पर  अलग-थलग है
काठ की हण्डी फुंकी जा रही,ये तो  उसकी एक झलक है

ज्यादा   बुद्विमानी   होना   राजनीति    में  अभिशाप है
सत्ता  और  सियासी  पंचायत  में  गुण्डा अलग खाप हेै
योगेन्दर,प्रशान्त  और गाँधी, पुरातत्व  अवशेष हो गये
आशूतोश, गोपाल,सिसोदिया  चाण्क्यो  के  भेष हो गये

संजय और,विस्वास आम के इस झगडे में खास हो गये
खेतान  सरीखे   छोटे - छोटे   सारे   पप्पू  पास  हो गये
सढसठ   डलहौजी   के  खोजी,  फौजी,  रोजी  ढूँढ  रहे है
मठाधीस  अरविन्द  केजरी, सब  चेलो  को   मूँड  रहे है

काठ  की  हण्डी  राजनीति  के ताप,चाप को  झेल रही है
दिल्ली में  बच्चो  की  सैना  देख   कबडडी   खेल रही है
सारा  भारत  सोच  रहा  था,सर्कस में  कुछ नया खेल है
राजनीति  में  स्वाभिमान, सिद्यान्त  हमेशा  रहा फेल हेै

काँग्रेस  भी  सत्तर  साल   पुरानी,  मिटटी    चाट  रही है
सिद्यान्त स्वंय के तीस साल से बी.जे.पी.भी  बाँट रही है
स.पा.बा.स.पा.,ममता,समता,घुटनो के बल  दौड रही है
दो  साल  की  आप  पार्टी, स्वाँस  हांप  कर   छोड रही है

छल कपटों की राजनीति में मर कर भी  तो जीना सीखो
अपनो के ही  जूते खाकर, जहर  जहन  का  पीना सीखो
छोटे - मोटे  स्वार्थ  स्वंय  ही  अहंकार  से  गिर  जाते है
तेज  दौडने   वाले   शावक,  राजनीति  में  मर  जाते है

इतिहास गवाह है अपनाे का अपमान  हमेशा मरवाता है
पद  के  मद  में हद  से  कद भी,रद्द  होकर जूते खाता है
अपनो  के  मेहनत  के आँशू  से बुनियादे  हिल जाती है
सच्चायी  को  कवि आग की कविताएं खुल कर गाती है।।
                 राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                         मो0 9897399815
              rajendrakikalam.blogspot.com

               ज्वाला में बाला
राम  नवमी   आज    है,  पर  रावणों  का राज है
जिन  सिरों   पर  ताज है,ये उन सिरों की खाज है
सीता  यहां   मोहताज  है,  सूपर्णखां   पर नाज है
ये राजनीति  आज  है, बस,  धर्म  का  अन्दाज है

टूटती   हैं   डालियाँ,   फिर   फूटती   हैं  थालियाँ
बज   रही   हैं   बालियां,  अब  छूटती  हैं लालियां
कट  रही  हरियालियां, बस, बँट  रही  हैं नालियाँ
गूंजती  हैं  गालियाँ  क्यों,  बज   रही  हैं तालियाँ

पूजती  कन्या   घरों   में,  भ्रूण  हत्या  हो  रही है
देखकर इन  बालिका  को, आज   दुर्गा  रो रही है
आडम्बरों  से  दूर  हो,मां   के  प्रणय  को जानिये
ऱाष्ट्र  की  इन  पुत्रीयों  को  भी  तो  चण्डी मानिये

बलात्कारी  भी  यंहा   पर   देवियों   को  पूजते हैं
व्यभिचार भी देखो धर्म से किस तरह से जूझते हैं
आध्यात्म  भी बदनाम है क्यों,वाशना के खेल में
क्यों  कष्ट  में  अबला  पडी है,धर्म की इस जेल में

प्रण  करें  सब  बालिकायें, तन ढकें  सब  लाज से
अंग की  ये  नंग  छवियां,ना दिखे  फिर  आज से
संकल्प में हो,हर युवक अश्लील  के  इस  काज से
अब देवता  बनकर दिखें, सब  देव  के अन्दाज से।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                 मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, March 27, 2015

                  ज्वाला में बाला
राम  नवमी  आज  है, पर  रावणों  का  राज है
जिन सिरों पर ताज है,ये उन सिरों की खाज है
सीता  यहां  मोहताज  है, सूपर्णखां पर नाज है
ये  राजनीति  आज  है,बस,धर्म का अन्दाज है

टूटती   हैं   डालियाँ, फिर  फूटती   हैं  थालियाँ
बज  रही  हैं  बालियां, अब  छूटती  हैं लालियां
कट रही  हरियालियां, बस, बँट रही हैं नालियाँ
गूंजती  हैं  गालियाँ  क्यों, बज  रही हैं तालियाँ

पूजती  कन्या  घरों  में, भ्रूण  हत्या  हो रही है
देखकर इन  बालिका  को, आज दुर्गा रो रही है
आडम्बरों  से  दूर  हो,मां के प्रणय को जानिये
ऱाष्ट्र की इन पुत्रीयों को  भी  तो  चण्डी मानिये

प्रण करें सब बालिकायें, तन  ढकें सब लाज से
अंग की ये नंग  छवियां,ना  दिखे फिर आज से
संकल्प में हो,हर युवक अश्लील के इस काज से
अब देवता बनकर दिखें,सब देव के अन्दाज से।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                     मो0 9897399815
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                         आप का पाप
आप पार्टी आम  हो  गयी, चलती  गाडी  जाम हो गयी
जो दिल्ली पैगाम बनी थी,आज  केजरी -धाम हो गयी
आशूतोष, संजय, कुमार की  बातें  झण्डू-बाम हो गयी
अब तक ये हेयरड्रेसर थे,सडकछाप हज्जजाम हो गयी

योगेन्दर, प्रशान्त, प्रोफेसर बुनियादों  को  झाँक रहे है
आप पार्टी  के  बछडे  भी  खेत  की  मिट्टी आँक रहे है
भूमिधर  अरविन्द  केजरी,  पट्टा   लेकर  घूम  रहा है
हिटलर सढसठ  फौजी लेकर ,जंग सियासी चूम रहा है

एक नया  टेढा  पत्थर ,खेतान   नींव  को  हिला रहा हेै
विषमन्थन का झाग,घाघ ये  नेताओं  को पिला रहा हेै
छोटे - मोटे  रंग-रूट  भी  अपने  असलहे  झोंक  रहे हैं
स्टिंग आप्रेशन  को  सुन  कर  सारे  चैनल भौंक रहे हेैं

अन्ना  का  आदर्श  केजरी, स्वयं  ट्रेजरी  बन  जाता है
अहंकार  में  चूर,  शूर  ये  राष्ट्र - गीत  अपना  गाता है
उँट, अश्व, पैदल, प्यादे सब, इसकी  इज्जत बचा रहे हैं
नये  ढंग  की  राजनीति   में, चौपड - पासे  सजा रहे हैं

स्वाभिमान  की  राजनीति में  गाली देना एक कला है
गन्द  लपेटे  सुन्दर  शब्दों  वाला  नेता  आज भला है
नाप तोल  कर  बोल केजरी, राजनीति सौगात नही है
नये-नये  मुल्लों की बाँगे, मस्जिद की औकात नही है

बुनियादों के हिल जाने से  भवन स्वयं ही गिर जाते है
राजनीति  में हल्के  पन  ही,राजनीति  से घिर जाते है
अहंकारअस्तित्व स्वयं का,चढकर ही तो खुद खोता है
कवि  आग  बस,चलने  का प्रमाण पहुँचना ही होता है।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                      मो0 9897399815
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Thursday, March 26, 2015

                   खेल में नकेल
डेढ अरब  की  जनसंख्या में  ग्यारह ढंग  से  ढूंढे होते
हे  नालायक  क्रिकेट  गुरूओ, चेले  ढंग   से  मूँडे होते
अंग्रेजी दुनिया  के तोतों, गली  मुहल्लो में  भी झाँको
प्रतिभाएं सब दबी पडी हैं उनकी  कीमत को भी आँको

लगान फिल्म देखी हेैे तुमने उससे भी अनुमान लगाते
जिनके तन में कुछ ताकत हो,उनसे ही अभ्यास कराते
विज्ञापन  के  इन  कीडो में राष्ट्र- भक्ति को झाँक रहे हो
अब  अंग्रेजी  संस्कारो  में  ,भारत  माता  आँक रहे हो

अच्छी-अच्छी प्रतिभाओं  को राजनीति से मरते देखा
चयन  पक्ष  को  प्रतिभाओं  से गुण्डागर्दी  करते देखा
सट्टा,जूँआ,अय्यासी अब  इस  खेल में आम हो गया
सब  खेलों  के  उपर  क्रिकेट भारत का पैगाम हो गया

क्रिकेट में अब  सुन्दर नारी आँख मिचोली की क्रिडा हेै
अय्यासी  के  इस  खेल  में  काम - वाशना  ही पीडा हेै
काम - कला  की  माहिर  नारी इन पर डोरे डाल रही हेै
इस  खेल  को प्रतिभाएं कम, अय्यासी  ही पाल रही है

कुस्ती  और  कबड्डी, गिल्ली ,डण्डे  में येे बात नही है
इन  खेलों  में   प्रतिभाओं  के  आवारा जज्बात नही है
समय बद्व निर्णायक खेलों  की तो अब औकात नही है
क्रिकेट से  उँची ,खेलों  की  अब भारत में जात नही हेै

एक माह से आधा  भारत काम छोड कर जाग रहा था
मन्दिर,मस्जिद,गुरूद्वारे में सारी मन्नत माँग रहा था
पूजा, पाठ, हवन, यज्ञ  सब, हाव-भाव  बेकार  हो गये
भारत  ने  जो  सपने  देखे,पल भर मे सब तार हो गये

हर  चैनल   में   पुरातत्व  के  टूटे - फूटे  दिख  जाते हैं
उनका  कोई  काम  नही  है, क्रिकेट  का  गाना गाते हैं
अरब-खरब की माया अन्दर, बूढे  अब  भी कमा रहे हैं
अब जिन्दे सब बेकार हो गये, मुर्दे  भारत जगा  रहे हैं

इस खेल से देश की इज्जत मिट्टी  में क्यों मिलती है
भगवानों की बुनियादें भी इसी खेल से क्यों  हिलती है
खेलों को बस खेल समझकर खेलो तो कोई हर्ज नही है
कवि आग क्रिकेट की दुनिया भारत में खुदगर्ज नही है।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                        मो0 9897399815
            rajendrakikalam.blogspot.com

Wednesday, March 25, 2015

                      सम्मान का अपमान
आजादी  को  देने  वालों  की   भारत    में   बात  नही है
चन्द्रशेखर,सूभाष,भगत क्या  ये  भारत की  जात नही है
इनके रण कौशल  को सारी  दुनिया  अब  भी मान रही हेै
बुनियादो के इन पत्थरों  से   भारत  की  पहचान  रही है
लगता है भारत  में  बुनियादों   की  भी  औकात  नही हैै
आजादी   को   देने  वालों   की   भारत  मे   बात नही है

आजादी के  सभी  सिपाही  मर - मर    सुख  भोग रहे हैं
ना जाने  कितने  अर्जी-फर्जी  आभिलेखों   में  रोग रहे हैं
जिनके कारण  सुख सुविधा  है,उनका  कोई नाम नही है
अब  चौराहो  की    प्रतिमाये  ,वीरो   का  पैगाम  नही है
ये  समुद्र   है, ताल,  तडागो   की   कोई  बर्षात   नही है
आजादी   को   देने   वालों   की   भारत  में  बात नही है

क्यों करते हो याद उन्हें तुम, खुल्ला  बोल नही सकते हो
क्या कीमत है उस शहीद की जिसको तोल नही सकते हो
क्यों  करते  हो   ऐसा   नाटक  अपमानो  के  एहशानो से
क्या मतलब  है राजनीति  का  भारत  के इन परवानो से
फाइल  में   उनको   ढूंढोगे,  ये   उनके   जज्बात  नही हेै
आजादी   को   देने   वालों   की   भारत  मे   बात नही है

सभी  सिपाही  पढे लिखे थे सुख का जीवन जी सकते थे
अपमानो  को धन-दौलत के कारण   भी तो पी सकते थे
हम  जैसे  कीडो  के कारण  वो हंसकर शूली  चढ जाते हैं
राजनीति   के  उलट-फेर  में  पतझड  जैसे  झड जाते हैं
गाँधी  और जवाहर  से  क्या  उनका  कोई  साथ  नही है
आजादी   को   देने   वालों   की  भारत  मे   बात नही है

वो  गर्म  दलों  के नेता  थे, ये   शीतल  थे  अभिनेता थे
वो  खून, जोश  के  क्रेता  थे, ये  सूखी  सरिता  खेता थे
उनके  जूनून  में   आजादी, इनके  जूनून  में  दास प्रथा
उनको ये हूकूमत खलती थी,इनकी थी  सत्ता मात्र व्यथा
अपमान शहीदों  का  होता  हेै, छोटी - मोटी  घात नही है
आजादी   को   देने   वालों  की   भारत मे   बात नही है

दुखः होता हेै जिनके कारण अब तक हम सब जिन्दा हेै
क्यों  भारत  हम जैसे  नालायक  पुत्रों  से   शर्मिन्दा हेै
अब  भी  थोडी  इज्जत  हो  तो  ढूंढो  उन  अवशेषों को
हृदय  सेे  सब  करो  नमन  उन  परं  राष्ट्र के  भेषों काे
ये कवि आग की पीडा है,कोई  हल्का सा संघात नही हेै
आजादी   को   देने  वालो  की  भारत  मे  बात नही है।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                    मो0 9897399815
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Tuesday, March 24, 2015

                    क्रिकेट और भारत
देखो  अेग्रेजों  की  माया   क्रिकेट  कैसा  खेल  बनाया
एक नया अवतार देश में  कफन ओढकर भारत आया
सारी दुनिया काम छोड  कर  टी.वी. चैनल  देख रही है
अपने दिल की भाव भंगिमा को  शब्दों  से फेंक रही है

क्रिकेट  की   दुनिया  में  देखो   नये  ढंग  का जेहाद है
आन,बान,सम्मान दाॅंव  पर  लगा  हुआ आतंकवाद है
हथ-गोले   सी  घातक  गेंदे  मैदानों  पर   घूम  रही हैं
खून टपकती  आॅंखे  देखो कफन ओढ कर झूम रही हैं

फेंक   रहे    हैं  गेंदें  जैसे  तोपे ,  गोला   दाग  रही हैं
पागल  होकर   सारी  दुनिया  चैराहों  पर  भाग रही है
कुछ  पागल तो  झण्डे  लेकर  मैदानों  पर  दौड रहे हैं
चौके -छक्के तमाश बीन  के  हाथ, पैर,सर फोड रहे हैं

अहंकार को मनोविनोद का द्योतक दुनिया मान रही है
देख निकम्मी दुनिया पागल हो कर सीना तान रही है
जिसे  देख लो  वही पूछता है  कितना  स्कोर  हुआ है
पागलपन की इस क्रिडा से हास्य,व्यंग भी बोर हुआ है

भारत,पाकिस्तानी  खेलों से हरदम सरहद  हिलती है
आतंकों को  इस खेल में  पनाह भीड से ही मिलती है
फिर  होता  है खून  खेल  का , गौरव राष्ट्र  दिलायेगा
भारत   में  आतंकवाद  अब  क्रिकेट  से  ही  आयेगा

गिल्ली, डंडा  और   कबड्डी  को   इतिहास बनाते हो
हाकी, बालीबाल   छोड   कर   पाश्चात्य  अपनाते हो
ईश्वर  ,अल्ला भूल गये अब, क्रिकेट  नया विघाता है
हिन्दुस्तानी   भ्रूण  गर्भ  में, अंग्रेजी  गाना   गाता है

बिन पैसे  के,सबसे मंहगी सुख सुविधा को ये पाते है
चौके,छक्के शतक लगाकर कई  करोड ये खा जाते है
रंग - रंगीला   विज्ञापन  भीे   इनका  ढंग दिखाता है
क्रिकेट  का भगवान  देश  में  अय्यासी  से  खाता है

सुन्दर - सुन्दर,रंग - बिरंगी   नारी   जान  लुटाती है
कामदेव   की   सारी  घटना ,हर  चैनल  में आती है
किसको पकडा  किसको छोडा  ये  कैसी  अय्यासी है
अंग्रेजी   संस्कार  यहाॅं  पर,  असली  भारत वाशी है

राजनीति  से प्रतिभाओं को, मैने यहाॅं कुचलते देखा
सट्टेबाजों से मोदी  और  कलमाडी  को  पलते देखा
मैच फिक्स के माहिर खेलखिलाडी भी इसमें होते हैं
कई राष्ट्र तो इस क्रिकेट से अपनी गरिमा को खोते हैं

डेढ अरब की आबादी को क्या  क्रिकेट अब रोटी देगा
क्या भारत में फिर से अंग्रेजों का हिन्दुस्तान बनेगा
धर्म्,कर्म् की वशुन्धरा की  क्यों  दुनिया में निन्दा है
सत्य सनातन की  धरती  में राष्ट्र  भक्त  शर्मिन्दा है

ये  खेल तो माया से  सम्पन्न  राष्ट्र की  ही  क्रिडा है
रोटी  कपडा और मकान की आधे   भारत में पीडा है
प्रतिष्प्रधायें किसी   राष्ट्र   को ,उॅंचा  नही  बनाती है
कुरूक्षेत्र   से  गीता  हमको   बार -बार  समझाती है

ये  खेल  कोई शोध नही है क्रिकेट का विरोध नही है
रंग - रंगीली अय्यासी  से  मेरा भी प्रतिशोध नही है
इस खेल  मे क्षेत्रवाद  की आग धधकती देख रहा हॅूं
में तो भारत की कुण्ठा को शब्द बाण से फेंक रहा हॅूं

संस्कार हमारे  कच्चे हैं जो जगह जगह ढल जाते हैं
स्वाभिमान, अस्तित्व  नही  आडम्बर दिखलाते हैं
स्वालम्बन ,स्पन्दन जैसा जीवन  खेल  हमारा  हो
खेल -भावना की मानवता  ये  भारत का  नारा  हो।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                     मो0 9897399815
         rajendrakikalam.blogspot.com

                   आदर्श का उपहास

भ्रष्टाचारी  और  व्यभिचारी  जीवन   के  जज्बात  नही हेैं
महापुरूषों  का  गौरव  गाना, अपनी  तो ओकात  नही हेेैं
जो मरे राष्ट्र के खातिर, उनकी  लाशों  से  हम खेल रहे हेै
चन्द्रशेखर,सूभाष,भगत सिंह  मरकर  हमको झेल रहे हेै

हम जैसे  मुर्दो  की  पुष्पों   की   माला से वो ढक जाते हेै
फिर भी कुछ ना कुछ पत्थर वो बुनियादों में रख जाते हेै
राजनीति से  वो  बुनियादें  हम सब  मिलकर खोद रहे हैं
उस हरी भरी  धरती  को  नेता  अपने हल से जोत रहे हैं

सभी  सियासी  अपनी-अपनी  फसलें  उसमें  लगा रहे हैं
भाग्य राष्ट्र का हंस भेष  में  आज  काग  ही  जगा रहे हैं
शेरों  की  गाथाएं  गीदड,  अपने   ढंग   से  गा  जाते हेै
आजादी  के  बाद  देश  में   अब   शहीद   भी  शर्माते हेै

उनके भाव - भंगिमा, जज्बा  केवल  पुस्तक ही ढोती है
भारत-माता  दुश्मन  से  कम, अपनो से ज्यादा रोती है
फिल्मी दुनिया गीत  शहीदों  के  अपनी धुन में गाती हेै
राष्ट्र - भक्ति  तो  राष्ट्र  सर्मपण  के  भावों  से ही आती है

राष्ट्र - भक्त को अपने-अपने  क्षेत्र , जाति  में  बाँट रहे हैं
हम शहीद की लाश सियासी , हानि-लाभ से चाट रहे हेैं
जो मरे देश  के  खातिर, अब  वो  सीमा  से पट जाते हेै
बसे हुये थे  हर  दिल  में,अब जिले,प्रान्त में बँट जाते हेै

भगत सिंह  पंजाबी, बल्लभ  अब  गुजराती हो जाता हेै
सूभाषचन्द्र की महिमा केवल  अब  बंगाली  ही गाता है
हर शहीद को चौरहों पर,अब कब  तक  कितना गाढोगे
धूल फाँकती प्रतिमाओं के कफन  कंहा  कितने फाडोगे

राजनीति  को  छोडो, दिल  से  नमन करो उन वीरों को
जाति  मजहब  के  कंकड  में  भी ढूँढो फिर से हीरो को
श्रद्वा  की   अंजलि   समर्पित  भावों   से   गुणगान  करे
राष्ट्र - भक्ति  के  कवि  आग  के  छन्दों  में  हो  घाव हरे।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com

                आदर्श का उपहास
भ्रष्टाचारी  और  व्यभिचारी   जीवन   के  जज्बात  नही हेैं
महापुरूषों  का   गौरव  गाना, अपनी  तो  ओकात नही हेेैं
जो मरे राष्ट्र  के  खातिर, उनकी  लाशों  से हम खेल रहे हेै
चन्द्र शेखर,सूभाष,भगत सिंह  मरकर हमको झेल रहे हेै

हम  जैसे  मुर्दो  की  पुष्पों की  माला से  वो ढक जाते हेै
फिर भी कुछ ना कुछ पत्थर वो बुनियादों में रख जाते हेै
राजनीति  से वो  बुनियादें  हम सब मिलकर खोद रहे हैं
उस  हरी  भरी धरती को नेता  अपने  हल से जोत रहे हैं

सभी  सियासी  अपनी-अपनी  फसलें  उसमें लगा रहे हैं
भाग्य राष्ट्र का  हंस  भेष में  आज  काग  ही  जगा रहे हैं
शेरों  की   गाथाएं   गीदड,  अपने   ढंग  से  गा  जाते हेै
आजादी   के   बाद  देश  में  अब  शहीद   भी  शर्माते हेै

उनके  भाव - भंगिमा,जज्बा  केवल  पुस्तक ही ढोती है
भारत-माता दुश्मन  से  कम, अपनो  से ज्यादा रोती है
फिल्मी दुनिया  गीत शहीदों  के  अपनी धुन में गाती हेै
राष्ट्र - भक्ति तो  राष्ट्र  सर्मपण  के  भावों  से ही आती है

राष्ट्र - भक्त को  अपने-अपने  क्षेत्र ,जाति  में  बाँट रहे हैं
हम शहीद की  लाश  सियासी ,हानि-लाभ से चाट रहे हेैं
जो मरे देश  के  खातिर, अब  वो  सीमा से पट जाते हेै
बसे हुये थे हर दिल में,अब जिले,प्रान्त  में बँट जाते हेै

भगत सिंह पंजाबी, बल्लभ अब  गुजराती  हो जाता हेै
सूभाषचन्द्र की महिमा केवल अब  बंगाली  ही गाता है
हर शहीद को चौरहों पर,अब कब  तक  कितना गाढोगे
धूल फाँकती प्रतिमाओं के कफन  कंहा  कितने फाडोगे

राजनीति  को  छोडो,दिल से नमन  करो  उन वीरों को
जाति  मजहब  के  कंकड में भी ढूँढो  फिर  से हीरो को
श्रद्वा  की  अंजलि   समर्पित  भावों   से   गुणगान करे
राष्ट्र - भक्ति  के  कवि आग  के  छन्दों  में हो  घाव हरे।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  9897399815
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Saturday, March 21, 2015

                       दुर्गा-स्तुति
हे माँ दुर्गा अब सरहद  पर  त्रिशूलों  का जाल बिछादे
षडयन्त्रो से फौज मरी है,जा  माँ जीवन जोत जगादे
सब राजनीति  तू  देख  रही हैे  चोर-चोर मौसेरे भाई
बे-गुनाहो ने तो अब तक इनके  कारण जान गवाँयी
ऐसी कूटनीति भारत की,माँ  इस पर तू आग लगादे
हे माँ दुर्गा  अब सरहद पर  त्रिशूलों का जाल बिछादे

सत्ता के  कारण  माँ  देखो,दुश्मन  के भी गले लगे हैं
भाषण सुनकर समझे थे,अब भारत के भाग्य जगे हैं
चौबीस घण्टे के भीतर ही जहर दिल का बाहर आया
मेरे घर की  रोटी  खाकर, पाकिस्तानी  फतवा गाया
कुछ तो ऐसा करदे मैय्या, इनको  सरहद पार भगादे
हे माँ दुर्गा  अब सरहद पर  त्रिशूलों  का जाल बिछादे

अरब-खरब की बाढ त्रासदी, ये भारत ही  झेल रहा हेै
बे-शर्मी  और हिम्मत देखो, आतंको  से  खेल रहा है
रामनाम की माला जपकर मौन  हुये हम  देख रहे है
ये अल्लाह  के  गन्दे, बन्दे  अपनी  रोटी  सेंक रहे हेै
बहुत होगया माँचामुण्डा इनको अब औकात दिखादे
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर  त्रिशूलों  का जाल बिछादे

पाकस्तिानी  कुछ  औलादें, मेरा  घर भी पाल रहा हेै
राष्ट्र-द्रोह को  फुसला करके राष्ट्र-भक्ति में ढाल रहा है
इन सर्पों को दूध पिलाकर  नाग -पंचमी मना रहा हेै
चिडियाघर के आतंको से अपनी  इज्जत बना रहा है
हे रणचण्डी,नर-मुण्डो की कण्ठी - माला पुनःसजादे
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर  त्रिशूलों  का जाल बिछादे

माओ-वादी, नक्सल-वादी  हा-हा  कार मचाकर घूमें
शान्तीदूत बने नेता जी,नतमस्तक,मस्तक को चूमे
बलात्कार और व्यभिचारों के चैराहो  पर हाट लगे हैं
राजनीति  की  भांषा देखो, सभी  पराये  यही सगे है
कविआग की विनती सुनले,वो रणभेरी फिर से गादे
हे माँ  दुर्गा  अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                   9897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, March 20, 2015

                     दुर्गा-स्तूति
नवरात्र  है,  हे  माँ  दुर्गा   दुष्टों   का   संहार   करो ना
कूपात्र,मालिक बन बैठे,इन पर कुछ तो  मार करो ना
महिसासुर  से  बडे़ - बडे़  ये असुर  देश में घूम रहे हैं
चोर, उचक्के, डाकू  सारे, सन्त  भेष   मे झूम  रहे हैं
हे,रणचण्डी,नष्ट करो  ना, इनको  सीमा  पार करो ना
नवरात्र  है,  हे  माँ  दुर्गा   दुष्टों   का   संहार  करो ना

तुम भी ये सब देख रही  हो, कोैन देश को लूट रहा है
जांति-पांति के कौम,कबीलो से भारत को कूट रहा है
सम्प्रदाय  के  सारे  मजहब  इन दुष्टों को पाल रहे हैं
डेढ़ अरब के जनमत भी  तो सच्चायी को टाल रहे हैं
हे,महिसासुर मर्दनी काटो, इनके  टुकडे़ चार करो ना
नवरात्र  है,  हे  माँ  दुर्गा   दुष्टों   का   संहार  करो ना

चौराहों  पर  भाषण  देखो, अप -शब्दों  की  बौछारें हैं
आग  बरसते  हर  लब्जों  में,  अंगारे   ही  अंगारें हैं
सारे  डाकू  एक  दूसरे   की  पोलों  को   खोल  रहे हैं
भारतभाग्यविधाता  भी तो ये खुद को ही बोल रहे हैं
हे कामाख्या,हे कात्यायिनी,इनके उपर  वार करो ना
नवरात्र  है,  हे  माँ  दुर्गा   दुष्टों   का   संहार  करो ना

कुछ पागल भी तो  इनको, अल्लाह, ईश्वर मान रहे हैं
गणनायक,शंकरगण बनकर, भी तो सीना तान रहे हैें
यति,सति का रूप लिये भी  व्यभिचारीणी नाचरही हैं
बनी हुयी  हैं, सब  रणचण्डी,सप्तसती  को बांच रही हैं
इनको  भी  सद्-बुद्वि  देकर  नारी  का  श्रृंगार करो ना
नवरात्र  है,  हे   माँ   दुर्गा   दुष्टों   का  संहार  करो ना

सब के  सब आवारा  भटके,राजनीति में क्यों आते हैं
हे राजेश्वरी ,तेरी महिमा, गा - गा  कर  भारत खाते हैं
ये व्यभिचारी, कीर्तन  और जगरातों  में ही मिलते हैं
झुण्ड देख  कर, मुण्ड पिचासों  के  भीडों  में हिलते हैं
लेकर खडग  हाथ  में माता,इन पर भी प्रहार करो ना
नवरात्र  है,   हे  माँ   दुर्गा    दुष्टों  का  संहार  करो ना

कुछ बाबा भी सत्य  सनातन छोड़ के नंगे नाच रहे हैं
राजनीति के  अहंकार  में, स्वाभिमान  को बांच रहे हैं
ऋषि, मुनियों  की  मर्यादा  को  चौराहे  में  बेच रहे हैं
खुद को त्यागी और विरक्ती  कहकर माया  खेैंच रहे हैं
ऐसे कालनीमि को माता ,फाड़के  टुकडे़  चार  करो ना
नवरात्र   है,  हे  माँ   दुर्गा    दुष्टों  का  संहार  करो ना

जाति,मजहब,के कौम कबीले,संप्रदाय भी सबके काटो
ये भारत  के  रक्त -बीज  हैं,  खून  सभी  का पूरा चाटो
बीज नष्ट  करदो  माँ इनका ये धरती पर फिर ना आयें
मनवता  में भेद  बढा  कर  फिर से ना मानवता खांये
कवि‘आग’के शब्दों  में  माँ, थोडी  सी  वो धार धरो ना
नवरात्र  है,  हे  माँ  दुर्गा    दुष्टों   का    संहार  करो ना।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                      9897399815
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Thursday, March 19, 2015

                 जय जवान-जय किसान                  
अब तो  कृषक भी  मर  रहा  है आपदा  के साये में
बस, रैलियाँ  ही  चल रही  है  हर  जगह  चौराहे में
गिर गयी  फसलें जमी पर, जिस तरह से हम गिरे
अन्न - दाता  के कफन  से  भी सियासी दिन फिरे

परदेश  में  इस  देश  का  धन  बंट  रहा बे-भाव से
देखिये   किलकारियाँ   जो   उठ   रही   हैं  घाव से
ये बोट भी  है, चोट भी  है,और  कंही  रिमोट भी है
हर सियासी की छिपी, बुनियाद  की  ये ओट भी है

तुम गरीबों के मशीहा  बन  रहे  थे अब  क्या हुआ
तुम जमीनो  के मशीहा  बन रहे थे अब क्या हुआ
तुम गरीबी  से  उठे थे, अब कंहा गयी   वो  वेदना
कुछ  तो  देखो  खेत  में  जो  गिर  गया गेंहूँ घना

खाद्यान  तो  लुट  ही  गया,बागान भी तो लुट गये
अब सब सियासी जाँच  के सर्वेक्षणो  में  जुट गये
इन अभागो  का  गुणा - भागो  से होगा  आँकलन
घर लुटा किसका,किसी का घर बनेगा  अब चमन

गौ-धन  हुआ  बर्बाद  अब  तो  दूघ के लाले पडेंगे
ये  सियासी  अब  सदन  में  कौन  से जाले गढेगे
जय किसानो की बुलन्दी फिर से सीढी बन रही है
देश  में  केवल  सियासत  की ही पीढी तन रही है

छोड  दो  वेतन  और  भत्ते  इन  किसानो के लिये
सहूलियत भी कम करो,कुछ तो किसानो के लिये
रैलियों  के  खर्च  को   झोंको   किसानो  के  लिये
कम  करो  अय्यासियाँ, रोको  किसानो  के  लिये

अब राष्ट्र में समता,समन्वय की ही भांशा बोलिये
आँशुओ  को  देख कर  दिल  से  दिलाशा खोलिये
शब्द  के  इन  सर - तूरीणो  से  भला  होता  नही
कवि आग शब्दो को सियासत की तरह ढोता नही।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     9897399815
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Wednesday, March 18, 2015

मैं विश्व कप का क्वार्टर फाइनल से पूर्व का दृष्य देख रहा था,मैच प्रारम्भ होने से पूर्व राष्ट्र गान चल रहा था,जिसमें हमारे भारतीय खिलाडी तो मजबूरी में राष्ट्र गान में खडे थे,जो उनकी मजबूरी भी हो सकती है, परन्तु हजारों की संख्या में उपस्थित भारतीयों में महज सौ-पचास ही राष्ट्र गान का सम्मान कर रहे थे, देख कर कष्ट हुआ,इसिलिये यह रचना आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूं।
      सम्मान का अपमान
अब मैं  नही  चाहता,  मुझे  सम्मान दो
अब  मैं  नही  चाहता  मुझे बलिदान दो
अब मैं  नही  चाहता  शहीदों  का  सफर
अब मैं तो बस चाहता हूं हिन्दुस्तान दो

अब  विश्व  कप  में  गान  मेरे  हो  रहे हैं
मैं मर  रहा  जिनके  लिये  वो सो  रहे हैं
बस, दो  चार  ही  थे, जो  खडे वो शान हैं
क्या राष्ट्र में अब ये  मेरी  की पहचान है
हैशियत   क्या   हेेै   मेरी   पहचानता हूं
आज   हिन्दुस्तान   को   मैं   जानता हूं
क्या - क्या  नही  होता  है  मेरे  नाम से
दुर्भाग्य है मैं फिर भी  सीना  तानता हूं
लुट गयी इज्जत ,  मिली  थी जो कभी
घुट गयी कलियां, खिली  थी  जो कभी
अब तो शवों पर  फूल  चढते  जा रहे हैं
छूट गयी  पोशाक,  सिली थी जो कभी
क्या कमी  थी ,मुझ  में , मेरी  शान में
क्या  फर्क  हैे  उपवाश  में  रमजान में
क्या  तर्क  है उस कृष्ण में रहमान में
क्या हो  रहा  हेै  आज  हिन्दुस्तान में
मैं   तिरंगा   ठूंठ   पर  लटका हुआ हूं
जज्बात पर जर्जर हुआ अटका हुआ हूं
देश  के  हर   भेश   को   पहचानता हूं
मैं  शहीदो   की   तरह  पटका  हुआ हूं
हर वर्ष  राशन   भाषणों   से  बांटते हैं
उसमें भी कुछ अपने, पराये छांटते हैं
शब्द में अतिश्योक्ति इतनी हो रही है
ये   धरा  केवल  ध्वजों  को  ढो रही है
मुझको नही नेता  को  सारे  देखते हैं
शब्द   से   चैनल  भी  रोटी  सेंकते हैं
विष्लेषणों   में  तर्क  को  ही  ढूंढते हैं
धार  से  ध्वज   को  धरा  में मूंडते हैं
चौराहों में कब तक मुझे तुम ढोओगे
सम्मान  मेरा  औेर कितना खोओगे
छल कपट  से  रोज  मरता जा रहा हॅूं
पथ में  मेरे  शूल   कब  तक  बोओगे
गणतन्त्र  को  कितने  मनाते  हैे यंहा
गिनती करो, कितने हैं, जो आते यंहा
मजबूर  नोैकर शाह  लाइन में खडे हैं
वो कोैन है  जो  राष्ट्र  स्वर  गाते  यंहा
गणतन्त्र ,ओबामा की शौकत शान में
हम झुक गये अमेरिका के सम्मान में
अब राष्ट्र  भी  उसकी  सुरक्षा  में खडा है
इस देश में  अब  मैं  नही,  नेता  बडा है
आग ही तो दर्द ध्वज  का  लिख र हा है
आग ही तो फर्द ध्वज  का  लिख रहा है
चिन्गारियां  हमको  नजर  आती नहीं
फिर भी ये हमदर्द ध्वज का लिख रहा है।।
    राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
             9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

  

Monday, March 16, 2015

                   फिल्म का इल्म
फिल्म भी अब नग्न नारी  के बिना बनती नही है
फिल्म  के  बिन दर्शकों  मे  वाशना जगती नही है
फिल्म  में  अश्लीलता  आदर्श   बनती  जा  रही हेै
फिल्म  ही  अंकुर  धरा  में   नग्नता से खा रही है

आतंक के ये नये तरीके  फिल्म से ही मिल रहे है
पुष्प भी  व्यभिचार के  फिल्म  से ही खिल रहे है
राजनीति फिल्म  के  कुछ  नये  नमूने पालती है
राष्ट्र  के मन्दिर सदन  को, हालीवुड  में ढालती है

अश्लीलता  के   हम   पुजारी   हो  गये  हैं  देश में
अश्लीलता  सब  देखते  हैं, हों  किसी  भी  भेष में
फिल्म का  अश्लीलता  के  बिन  मजा आता नही
जो पुत्र  करता  है, तो वो भी बाप  को भाता नही

नालियों  में  फिल्म की ,संस्कार  बहते जा रहे हेै
आचरण  भी  फिल्म के सत्कार  सहते जा रहे हेै
हम भी बच्चों में उसी  किरदार को  ही झांकते हैं
राष्ट्र की नई पीढीयों को  किस  तरह  से हांकते हैं

विज्ञापनो की नग्नता  को  सद् गृहस्थी झेलते हेैं
पुष्प जो विकसित हुये हैं,किस दिशा मे खेलते हैं
मजबूर हैं  मां-बाप  भी  इस  वाशना  के खेल में
स्वातन्त्रता की  हर गृहस्थी   पल रही  है जेल में

संस्कार के आदर्श की कुछ  फिल्म बननी चाहिये
शास्त्र - सम्मत  वाशना  हो, इल्म  बननी चाहिये
आने वाली  नश्ल  में ,विस्फोट  को   मैं  देखता हूँ
मै आग हूँ चिन्गारियाँ,बस  शब्द से ही फेंकता हूँ।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
              मो0 9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com

Sunday, March 15, 2015

              नारी का बिगडता स्वरुप
चलचित्रों  में  नंगी   नारी   हम  कहते  हैं  कलाकार है
पुरुष प्रेम  में  लिपट रहा  है  सच्चाई  है  बलात्कार है
निर्माता   भी   चूम   रहा  धन   से   यौवन  लाचार है
नंगे  नर  नारी  को  देखो  फिर  कहते  हैं व्यभिचार है

विज्ञापन  में  नंगा  पन  है  भारत  माता  लुटी पढी है
बात धरम् की करने वालों की  क्यों  आंखे फुटी पढी हैं
अब तो दुनिया  ही  नंगी  है शर्म हया  की कहां बात है
काम -वाशना की कौमौ में  मानवता  की  कहां जात है

श्रृंगार रसों  की  रचना  में  अंगार धधकते  देख रहा हूं
दुविधा  मेरी  मजबूरी  है  मैं  भी  आंखें   सेंक  रहा हूॅं
कटु सत्य  है  दुनिया  में जब नंगा  यौवन हो जाता है
संस्कार श्रृष्टि में दानवतापन ही  मानवता को खाता है

शास्त्र गवाह  है मर्यादा और इज्जत  नारी को कहते थे
मातृ-शक्ति की भाव-भक्ति में ईश्वर के  भी गुण रहते थे
आज वाशना कीअभिव्यक्ति नारी क्यों  बनती जाती है
राष्ट्र पतन  का  कारण  नारी,भारत  माता को खाती है

सारे चैनल बलात्कार की  चर्चा ,चुन-चुन  कर लाते हैं
व्यभिचार से पतिव्रता और यति-सति को,समझाते हैं
भावुकता के तर्क यंहा पर,इज्जत  को खुद खोल रहे हैं
कवि आग  जितना सुनते हैं,बस उतना ही बोल रहे हैं।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                 मो0 9897399815
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Friday, March 13, 2015

        हमारी हिन्दी की पुस्तकों में प्रार्थनाएं होती हैं,जिनका आशय देश की समृध्दि,व सम्मान था,परन्तु आज मुझे लगता है कि वे प्रार्थनाएं,हमारे कृत्यों से निष्फल सी हो गयी हैं।इसी वेदना से ग्रसित होकर एक प्रर्थना आज के समयानूकूल लिख रहा हूं,पाठकों से निवेदन है कि इस प्रार्थना को पाठ्यक्रम में लगवाने का प्रयास करें।      

                 वतन  पर  कफन
ऐ  मेरे  अहले  चमन , ऐ  मेरे  कौमी   कफन
इस तरह से तू ना अपने प्यार का  इजहार कर
सरहदों के हर शहीदों  के लिये   मुमकिन तो है
पर  वतन के लूटने वालों   का  ना  श्रृंगार  कर
अस्मिता मेरे वतन की  क्यों  धरा में  है दफन
ऐ  मेरे  अहले  चमन , ऐ  मेरे  कौमी   कफन

राम के और कृष्ण  के उपदेश  को  सबने सुना
बुद्व और महावीर  का  हर  वाकिया सबनेे गुना
गुरूग्रंथ के ईसा  के लब्जों को भी गीता में पढा
र्दुभाग्य है  ये देश  क्यों  बन गया मजहब धडा
मीरा कबीरा के भजन से होगया था गुल चमन
ऐ  मेरे  अहले  चमन , ऐ  मेरे  कौमी   कफन

जो  मजहब और  जातियों में बांटते हैं ये  धरा
हिंदू,मुश्लिम ,सिक्ख, ईसाइ  के बने हैं रहनुमा
खुद लिपट कर खादियों में वादियों में मस्त हैं
मेरे  वतन की  आबरु ,बे -आबरु  में  अस्त है
देवताओं की धरा  को आज  हम  करते  दमन
ऐ  मेरे  अहले  चमन , ऐ  मेरे  कौमी   कफन

स्वर्ण-पक्षी था  कभी  यह  देश ,क्यों  बेहाल है
मरघटों  की राजनीति  क्यों  यंहा  महाकाल है
बगुले   दरिंदों  से यंहा पर हंस बनकर  घूमते
रोंदते  हैं  क्यों  धरा , मद  के  नशे में  झूमते
हो   रहा   है राष्ट्र  के सम्मान  का  कैसा हवन
ऐ  मेरे  अहले चमन , ऐ  मेरे  कौमी   कफन

आड  में  तेरी  सियासी  लूटकर  सब  खा गये
मुल्क  के, मजहब लूटेरे   सल्तनत में छा गये
हर  तरह   की  भ्रष्टता अब राजनीति  हो  गयी
व्यभिचार से तेरी तिरंगे अस्मिता भी खो गयी
कौन करता  है तूझे इस देश  में दिल से नमन
ऐ  मेरे   अहले  चमन ,ऐ  मेरे  कौमी   कफन

हम पडोसी मुल्क की हरकत सरहद पर सह रहे
आतंक  की  हर  बाढ में भी हम  हमेशा बह रहे
नेता  हमारे  देश  के, बस कूटनीति  चल रहे हैं
सम्मान से घुसपैंठिये आधे वतन में पल रहे हैं
आग कहता है,उन्हे भी कम से कम देदो समन
ऐ  मेरे  अहले  चमन , ऐ   मेरे  कौमी   कफन।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                     मो0 9897399815
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Thursday, March 12, 2015

            सियासत के चेहरे
राजनीति  के   कोठो    पर   चढना  आसान  नही होता
चढा तो  समझो,जीवन  में  उसका  सम्मान नही होता
चाल, चरित्र   और   चेहरो   से, स्पष्ट  दिखायी   देता हेै
हर  लंच , मंच ,प्रपंचो  पर   ये  कुष्ट  दिखायी   देता है

झूठ, कपट, छल,बल ,दल, से, सत्ता की सीढी बनती है
भश्ट  व्यवस्था   सासन  की, झूठे  भाषण से तनती है
अययास,निकम्मे पन से ही ये रूप निखर कर आता है
फिर पजातन्त्र  के जनमत से ,नेता  उत्पात मचाता है

कांग्रेस  हो, बी.जे.पी.  या स.पा., बा.स.पा. के  दल हो
ममता,समता,ललिता हो,लालू,नितीश के भी  छल हो
शिव सैना हो,बजरंगी हो या आर.एस.एस. की टोली हो
मुशलमान  के फतवे हो या  धर्म ,मजहब की बोली हो

कोई अन्ना हो या राम देव, ये जनमत से ही चलता हेेै
सब अहकार भी जनता  की भीडो से तनकर  पलता है
कही तामस है,कही सत,रज है,इतना हीअन्तर होता है
नेता , अभिनेता  जनता मे  सम्मोहन मन्तर बोता हेै

मेहनत  और मजदूरी का कही नाम  नही हेै दुनिया में
ईमान से  जीने  वालो  का  सम्मान नही है दुनिया में
गाँधी  बनना चाहते है,कोई  काम नही कोई धाम नही
ये छिपी हुयी अय्यासी है, जिसका जग मे पैगाम नही

हम  सब सम्प्रदाय के  कीडे  है जो रेंग रहे है कीचड में
अपने पर विस्वास नही,विस्वास है,जनमत लीचड पर
कितनो को बाप  बना  डाला, अब तक पनप नही पाये
कवि  आग   इस  बरगद  के  नीचे पौधे ही  कुम्हलाये।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                        मो0 9897399815
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Tuesday, March 10, 2015

                आम का झण्डूबाम
भानूमति  का  कुडमा  अब तो आम होगया
अब झाडू  और  जुगाडू   ये   पैगाम हो गया
बुनियादों  के  पत्थर  खुद  ही खिसक रहे हैं
खास  आदमी ,आम  बने अब सिसक रहे हेैं

दूर दृष्टि  और  अल्प  दृष्टि   में  जंग छिडी है
बछडा, बछडी  साण्डो  से  भी  खूब  भिडी है
भगवन्त मान कामेडी  सर्कस  सिखा रहा हैं
तरकस, तीर,   धनुष  केजरी   दिखा  रहा हेैं

सब  हल्के-हल्के  शब्द  बाण  से दाग  रहे हैं
बुद्वि - बल्लभ   शान्त  छिपे  है  भाग  रहे हैं
संजय और विस्वास  शिखण्डी  घात लगाये
अब  आशूतोष  भी  दबे  सुरों  से  गाना गाये

सियार,शशक  अब  शेरों को  भी  तोल रहे हैं
गाधी मंयक पंक, राजा  रंको  में  घोल रहे हैं
बे - लगाम   शब्दो   से  चैनल   खेल  रहा है
भानूमति  का  कूडमा,   दिल्ली  झेल  रहा है

ये  हाइब्रीड  के   पौधे  जल्दी    खडे   हो गये
माकूल मिला  मौसम तो जल्दी  बडे  हो गये
स्वस्थ बीज की फसल,समय पर  लहराती हेै
नंगो   के   सासन   से तो भत्  पिट  जाती है

चौराहे  पर  बूढे  बाप   को   छोड   कर  भागे
हम  सोच  रहे  थे  भारत  मे बस ,ये ही जागे
ये  ऐसे  जागे , अब  सारे  पागल  झूम रहे है
क्यों सत्ता   में  विक्षिप्त   सियासी  घूम रहे है

बन्दर  के  हाथों  में  चाकू  अब  खतरनाक हैे
ना समझी  का सासन  समझो  हुआ खाक है
सत्ता  और  सियासत   अनुभव  से  चलती है
ये हल्कापन और  अहंकार,  लालच गलती है

घिसपिट कर आये जो जमीन  से,फेल होगये
इस प्रजातन्त्र में जनमत के सब खेल हो गये
झूठे  अहंकार ,  सिद्यान्त   हमेशा  टकराते हैं
औकात सभी की कवि  आग  खुलकर गाते हैं।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                    मो0 9897399815
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Monday, March 9, 2015

         नौ दिन चले अढाई कोष
देश  ने  दिल  खोल  कर  औकात से  ज्यादा दिया
हे, सियासत  के  नमूनो, तुम  बताओ  क्या किया
भर दिया  घर . बार  सबका, जनमतों  की भीड़ ने
चील  और  कव्वे  सुरक्षित  भी  किये  इस नीड ने

भुखमरी  , बे - रोजगारी,  दीनता  मिट  ना  सकी
ये  सियासी  श्रृंखला  व्यभिचार  की पिट ना सकी
सम्पन्नता केवल सियासत को विरासत में मिली
दीनता  के  पुष्प की कलियां मरी ,फिर  ना खिली

इतिहास के सत्तर वर्ष अब  भी तरस कर बोलते हैं
हैसियत  सत्ता  सियासी  सल्तनत  की  खोलते हैं
क्या कमी थी देश में ,जो  दीनता  जिन्दी  खडी है
इस कदर बे-नाम हैं हम जिस कदर  हिन्दी पडी हेै

सब सियासी देश  के  अय्यास  बनकर  जी रहे हैं
हम गरीबों का लहु  सम-रस समझ  कर पी रहे है
कौमों ,कबीलों , जातियों   में   बांटते   हैं आदमी
क्यों  ईद  का  बकरा समझ कर काटते हैं आदमी

पद के मद में कद सभी  के हद से आगे बढ़ रहे हैं
सत्ता,सियासी भूत जनमत के गले  क्यों पढ़रहे हैं
आधा वतन तो आज भी बस  एक रोटी खोजता है
ये गिद्व  कैसे  बोटिया ,बोटों   की  देखो  नोचता है

सिद्धान्त, समझौतों  से  सत्ता,चल रही  है  देश में
काश्मीर  में  आतंक  पलता  है   सियासी  भेष में
राजनीति,  भेडियों    के   जमघटों   से  हो  रही है
ये सियासत  राष्ट्र  के  सम्मान को  क्यों खो रही है

मठ,मन्दिरों की शान शौकत भी  हमें ही मारती है
ये मस्जिदें शाही  इमामों  की   सुलगती आरती है
धर्म  का  हर   सामियाना,   आसियाना   ढूंढता है
धन्धा,यतीमो  से  हकीमों  के   सफर को मूंंडता है

अब कौन करता है हिफाजत दीन  की  इस  देश में
अब कौन करता है  हिफाजत धर्म   की   दरवेष में
शर्म  आनी   चाहिये    इस  दीनता   को  देख कर
आग  भी  मजबूर है  ये  शब्द  निष्फल  फेंक कर!!
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  मो0 9897399815
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Sunday, March 8, 2015

     इस एक पक्षीय भाव ने मेरे अन्तर हृदय को झकझोर दिया और नारी हृदय का भवनात्मक सुकोमल रुप उघड कर सामने आया ! साथ ही एक महत्व पूर्ण वैदिक मंत्र  मातृ देवो भव पित्री देवो भव ,गुरु देवो भव मंत्र में मातृ देवो भव सर्व प्रथम में आता है !इन सबके बावजूद भी शास्त्रों में नारी को निकृष्टता से वर्णित किया गया!और स्त्री मात्र भेाग्या बनकर रहगयी ! यदि युग-युगान्तर में कहीं  एक श्रुति या श्लोक नारी द्वारा रचा गया होता ओर उसका अन्य की भांति प्रचार-प्रसार होता तो निसन्देह ही नारी की यह दुर्दशा ना होती ! यही कारण है कि नारी मात्र भोग्य वस्तु बनकर रह गयी!
               इसके अतिरिक्त शास्त्र प्रमाण हेै कि सती अनुसुइया के पतिधर्म की शक्ति ने ब्रह्मा,विष्णु, शिव को बालक रूप में परिवर्तित कर दिया!सावित्री तो स्वयं यमराज से अपने पति को पुर्नजिवित करा लायी,आधुनिक युग में अहिल्या बाई ,लक्ष्मी बाई,सुल्ताना,जीजाबाई के अतिरिक्त बहुत सी वीरांगनाऐं हैं जो पुरूष  वर्ग से भी उत्कृष्ट अवस्था में हैं,चाहे वह सांसारिक जीवन हो या आध्यात्मिक जीवन हो! कुल मिलाकर मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि स्त्री में किसी भी क्षेत्र में पुरूष से कम क्षमता,प्रतिभा व सम्भावना नहीं है!

                     उदाहरणत
अभिशिप्त  हुयी  गौतम   पत्नि
अबला  को  शापित  कर डाला
घटना सतयुग  में घटित  हुयी
सोचो  कैसी   थी    वधु  बाला

त्रेता    सीता   द्वापर    द्रोपति
परमेश्वर   पुरुष   बना   डाला
सीता बन  में द्रोपदी  जन  में
देखो   अपमानित   वधुबाला

उत्थान पतन का अवलम्बन
वधु  ममता का कैसा बन्धन
यह दिव्य शक्ति  का आरोहण
संस्कार  श्रृष्टि  का  अन्वेषण

जल थल स्थल की वशुन्धरा
तपता यौवन ज्यों स्वर्ण खरा
अमुल्य  रत्न जग  जननी   है
हर  घाव  हृदय  का  करे हरा

ब्रह्माण्ड अखिल अखिलेश्रर की
वधु  शक्ति , भक्ति ,आशक्ति  है
ये रिम  झिम  वर्षा सावन की
वधु अनाशक्त अभि व्य क्ति  है

यह  आग  युगों की ज्वाला  है
विकराल  कराल    कराला   है
वधु   रंग   जमाती   हाला   है
वधु आग रचित  वधुशाला  है
               महान साहित्य कारो द्वारा महान कवियों की रचना में नारी मात्र श्रृंगार का माध्यम रही!चाहे वह संयोग  श्रृंगार हो या वियोग श्रृंगार,केन्द्र में नारी ही है!और  आधुनिक  युग में  तो कई  तथाकथित  कवि वर्ग  भी है, जो मात्र  नारी  को हास्य ओर व्ंयगात्मक  शैली से निम्न  स्तर तक पहुचाने  का कार्य निरन्तर करते रहते हैं !   कोई भी साहित्यकार कहीं या कभी  नारी से कुण्ठित या लज्जित हुआ हो तो उसने अपने कुण्ठित हृदय की  पीडा का प्रक्षेपण  अपने साहित्य में अवश्य वर्णित किया !
            प्रायः यह देखने में आया !इसका उदाहरण महा कवि कालिदास, तुलसी दास ,व भर्तृहरि इत्यादि हेैं ! जिनके संयोग व वियोग में नारी ही  केद्रित है!और आशेचर्य तो तब होता है कि कालिदास की प्रेरणादायिनी स्वयं विद्योत्तमा ,तुलसी दास की प्रेरणादायिनी रत्ना तथा सूरदास की प्रेरणादायी उनकी प्रेयसी कन्तो रही हो, इन सबके बावजूद भी इस आध्यात्मिक देश में दुर्गा,काली,उमा,पार्वती,लक्ष्मी, सरस्वति, सीता,राधा,अनुसुइया आदि कितनी नारियाॅं हें जो हमारे देवताओं ,भगवानों की प्रेरणा स्रोत रही हैं! ऐसा शास्त्र कहता है!

                                         
कवि  भर्तृहरि की  कुण्ठा   ने
कितना  नारी तृष्कार  किया
कालीदास   ने  नारी       का
इस  श्रृष्टि  में सत्कार  किया

          नारी शक्ति के भावो से उद्वेलित हो कर,ममत्व, वात्सल्य पूर्ण समाज से प्रेरणा पाकर वधुशाला शतक  लिखने की हिम्मत जुटा पाया हूं! अपने पाठकों से यह आकांक्षा रखता हूं कि इस अबोध बुद्वि से परिलक्षित हुई इस वधुशाला के शब्दों के अन्तराल में जो विकृत समाज की भाव भंगिमा है उसकी जटिलता से उपर उठकर नारी वेदना को ध्यान से परिलक्षित करें तोयह स्पष्ट हो जायेगा कि समाज में नारी का क्या मुल्यांकन होना चाहिये था!और यदि यही रुढी.वादी परंपरा समाज में चलती रही तो आने वाले समाज  एक विकृत रुप ले लेगा इसमें संदेह नही है! नारी के  वास्तिविक सौन्दर्य एवं गौरव  को बचाना ही  वधुशाला का  एक  मात्र  उद्वेश्य  ह


            वधुशाला - शतक
                  1
कौशिश   है  अंग-तरगं   बने
आनन्दित   अंग  बना  डाला
सामंजस   भृंग   तरंगो   का
रचता   नवरंग   व धू शा ला
               2
जुल्फें चन्दन बन व्याल बनी
खुशबू    है   दंश  कराल बनी
हर शाख में लिपटी माला सी
घन-घेार घटा घनशाल  बनी
               3
मस्तक में गगन  समाया  है
क्या सोम व्योम का नाता  है
त्रिनेत्र  भेद  की   गुप्त    गुहा
लट  से ललाट बल खाता  है
              4
सर सन्धान सी भृकुटि  बनी
कैसी   हरि  हर  की  दृष्टि   है
नटखट हर हरकत  हाट बनी
ज्यों इन्द्र धनुष पर  वृष्टि  है
                 5
नयना   है  तीव्र  कटारों   से
निर्जन बन सरल सरोवर सी
स्नान ध्यान ऋषि  देवों  का
श्रृष्टि  सोन्दर्य   मनोहर   सी
                  6
भृकुटि  भयंकर  बन    जाये
जब बात हृदय को  ना  भाये
कहीं विधु वधु शोला बनती है
कहीं  प्रेम नयन  में  हरषाये
                   7
पलके   नयना  पलकाती  है
दृष्टि   से  द्वार   हटाती     है
कब बन्द करे कब खुलजाये
हरी,  हर  से  हाट  हटाती  है
                8
पलकों  पर  बाल  झरोंखें  से
उनका  अपना  ही  धोखा   है
कुंजों   से  यौवन  झांक  रहा
कुदरत  का  खेल अनोखा  है
               9
कन्दराह है कर्ण हिमालय से
जहां गमन शब्द का होता  है
सूक्ष्म  शब्द  योगी   बनकर
प्रियतम के हिय में खेाता  है
                    10
कैसे कपोल  हैं रवि शशि  से
स्वछन्द व्यवस्थित मधुर रमण
सन्ध्या  सोन्दर्य घटित   होता
ज्यों  नभ सागर में छवि दर्पण
              11
अधरों   की   लाली   मतवाली
हिलमिल  सोंदर्य  बखान  करे
सरस   श्रृष्टि  अधरा धर    की
मासूम  अधर  रसपान     करे
                 12
संचार   व्यवस्था  जिव्ह्या  की
ये   गुप्त  गेह   रसराज    बनी
कंहीं  चूम रही  कंही  झूम रही
संगीत  सूरों  की   राग    बनी
                13
वधु   कंठ    सुधा  संवर्धन   है
ये  सरिता   सरस   बहाती   है
संयोग    वियोग  श्रृंगार   मधुर
वधुशाला  कण्ठ  से  गाती   है
                 14
बुद्वि  हृदय   मध्यस्त     बनी
संयोग    योग   बनवाती    है
अवलम्बन  है   दो  द्वीपों  का
चिन्तन मन्थन  करवाती  है
             15
स्तन हैं शिखर हिमालय   से
हिममण्डित से आच्छादित हैं
रवि लौ से  थोडा  सा  पिघले
गम्भी  दृष्टि    संम्पादित   है
             16
गोलाकृति   है  महाद्विपों  की
आकर्षित श्रृष्टि  भ्रमण करती
हर  छैल  छबीला वधु यौवन
आसक्त  वक्ष  अर्पण   करती
              17
स्तन है परिचय मां शशू  का
पय पान वधू   से  होता    है
नर का  आकर्षण  वक्ष   बने
अतरंग  खोज  में  खोता   है
              18                              
वधु  का  परिचय स्तन ही है
ये   उम्र  का  भेद  बताता  है
मर्मस्थल प्रियतम गुप्त रमण
हर  वधु   की यौवन  गाथा  है
                19                                    
नाभी  है  भंवर  बहाओं     का
जहां  नर पतंग  ही  फंसता  है
संचार  केन्द्र   उर्जा    का    है
इन्द्री  केा  रसों से  कसता  है
               20
ये  काम   देव ज्वाला मुख  है
लावा  की लहरे   गुप्त    लपट
विशय   वाशना    की  लौ  से
ये शीतल  तन अंगार  विकट
               21
भग,जनम द्वार  है  जीवों  का
जहां  बीज  अंकुरित  होता  है
सहवाशं  से   बदनाम     हुआ
हर  जीव  प्रतिष्ठा    खोता   है
                22
ये  प्रथम  सदन है रचना  का
जहां रज,हज पुण्य कमाता है
नौ मास  समाधि सुरति चढी
नवजात  शिशू  घर  आता  है
                  23
हर जीव की गेह  गुफा घर  है
योगी,वधु कोक में भ्रमण करे
फिर काम वाशना  पुरुषो  की
वधुशाला,वधु मिल रमण करे
               24
जंघायें  दो   अवलम्ब    बनी
तन तस्कर इस पर डोल रहा
स्तम्भ है,अम्बर आच्छादित
तन के सोन्दर्य को खोल रहा
                25
इस कदली-कन्द  के छूने से
रोमांच  वधु   हो   जाती   है
धमनी से धडकन दिल तक की
अंग- अंग में  रगं जमाती  है
                    26
लालाहित  कर  स्पर्श    हुआ
मदहोश   वधु   हो  जाती  है
नर   को महारत  हासिल  है
वधु लपट ज्वाल बन जती है
                    27
वधु  का शरीर  है   वधुशाला
कैसा   होगा   रब  मतवाला
किस भाव पिण्ड  रचा  होगा
आनन्दित है कण-कण खाला
                  28
ये  गर्म  हुई  तो   गलती  है
शीतलता  में जल  जाती  है
कैसी  ये  रचना   रहबर की
हर फन में यें बल खाती  है
               29
श्रृष्टि से वधु का जन्म हुआ
या वधु ने  श्रृष्टि  को  पाला
ये  भावों  का अन्वेषण   है
जो स्वयं बोलती वधुशाला
              30
कुण्ठित पुरुषो की भाषा ने
नारी को  नरक बना  डाला
सम्पन्न  हुयी है आज  वधु
खुद लिखती है वधु,वधुशाला
               31
वधु  बाला है वधु  यौवन  है
वधु बृद्वा   है  समशीर  बनी
ये जगत की जीवन जननी  है
हर वक्त की  ये  ताशीर  बनी
                32
वेदों  ने  विस्मृति  में   देखेा
नारी को निष्क्रीय कर  डाला
अपमान  में  नारी  के  देखो
सब धर्म शास्त्र भी रच डाला
               33
ये समय की शीतल सरिता है
जो  आज भयंकर  है ज्वाला
मधु से सब दुनिया मस्त हुयी
वधु  की मस्ती   है, वधुशाला
                   34
सतयुग  के  सारे ग्रन्थों    में
सब  में  नारी का शोषण  था
कामदेव  का   रुप       लिये
नारी अवलम्बन पोषण  था
                35
तृप्ती     वाना   का   साधन
देवों  ने वधु को  बना  डाला
अतृप्त  हुआ मानव जग  में
अब  ढूंढ रहा वधु वधुशाला
           36
त्रेता  में  सीता  का  जीवन
अंगारों  की  लौ का पथ था
मर्यादा पुरुष  श्री  राम  बने
सीता तो  मात्र मनोरथ था
              37
संकल्प   किया  वैदेही   ने
आदर्ष  राम  हो   श्रृष्टि   में
जनक सुता  बुनियाद बनी
स्पष्ट  हुआ  जग  दृष्टि   में
             38
जंगल-जंगल में  भटकाया
सीता सी वधु ने क्या पाया
अब  भी सब राम पुजारी हैं
ना सीता  भाव हृदय आया
                  39
आज  राम  पुरुषोत्तम   है
सीडी सीता को बना डाला
सागर सम रुप हृदय वधु का
कष्टों  में  कौशल  वधुशाला
                40
द्वापर में  द्रोपदी  की  पीडा
घर की वधु का तृष्कार किया
ये  एेसे समय  की घटना   है
घनश्याम स्वयं थे बने  पिया
              41
इतिहास गवाह है  द्वापर  का
नारी  ने    पांचो  को    पाला
येाद्वा  पति भी  असहाय  हुये
वधु की इज्जत थी वधुशाला
                42
कहीं  लक्ष्मी  है कहीं  पार्वती
कहीं बनी सरस्वती वधुबाला
सतयुग,त्रेता, द्वापर,कलियुग
नारी है जग  की  मृग- छाला
              43
ना जाने  कितनी सतियां   है
जिसने मर्यादा   को     पाला
आज   हृदय  अवरुद्व    हुआ
मधु-मद में मस्त  वधुशाला
                 44
पुरुषों  में  इन्द्र  समाया    है
रम्भा   सी  सुन्दर  नारी   है
उर्वशी ,  मेनका    की   बातें
अब भी इतिहास में जारी  हैं
                 45
नारी  मनोरंजन  है  जग का
ये काव्य शास्त्र में  रच डाला
आज समय  विपरीत   हुआ
रण चण्डी  है वधु वधुशाला
                46
कवि भतृहरि की रचना  ने
कितना नारी अपमान किया
कालिदास  ने   नारी      को
इस श्रृष्टि  में सम्मान  दिया
               47
दुष्यन्त को प्रेम में नारी  ने
राजा  से  रंक  बना    डाला
कालिदास की   रचना    में
उत्कृष्ट  बनी है  व धुशा ला
             48
कवि नारी से पिडित  हो तो
कविता  वियोग उगलती  है
प्रेम  पुष्प  विकसित  हो तो
वधु से ही कविता  फलती है
               49
कुमार  सम्भवम्   में   देखो
वधु  को  श्रृंगार  बना   डाला
कवि कालीदास की रचना में
वधु बनी श्रृष्टि का हमप्याला
               50
नारी  का  ये कौमार्य   बदन
बनता श्रृष्टि  सोंन्दर्य   पतन
कहीं योगी रुप  है  शंकर का
कहीं अंग-अंग रमता है मदन
               51
योग- भोग   समरुप   सरस
श्रृष्टि  ने  ऐसी   रची    बाला
ये विशय  वृष्टि  नारायण की
वधु  से बनती   है   वधुशला
               52
कुछ वधु विरोधी  मजहब  हैं
नारी  निकृष्ट    बना     डाली
हर  शब्द  पुरुष  प्रधान  बना
कैसी  नारी  की   छवि  काली
               53
नारी  है नशल - फसल रचना
जो  पुरुष  वृक्ष की    हैे   डाली
वधु  ने गुल चमन बना  डाला
सिंचन करता  है   नर   माली
          54
कहते   हैं  नारी   बे ग म   है
जो  गम का जीवन जीती  है
सहती  है  अत्याचार  विकट
निज  घूंट लहु  का  पीती   है
               55
क्या धर्म इजाजत नही  देता
खुश  हो जीवन  में मधुबाला
आज  मजहब कमजोर  हुआ
हृदय  विदीर्ण  है    वधुशाला
               56
मजहब  में नारी  दफन  हुयी
घूंघट  में  जीवन अस्त  हुआ
विक्षिप्त नरों  की  दुनिया  में
संस्कार श्रृष्टि  से  पस्त  हुआ
               57
जंहा नूर जन्मता  बेगम   से
गम  से  बेगम को भर  डाला
अबला अब सबला  बन  बैठी
कैसी   सिरकस्त    वधुशाला
               58
पश्चिम ने वधु को खोल दिया
हर  वधु  बनी   है   वधुशाला
नर   पर  नारी परभावी     है
श्रृष्टि   में   शंशय   कर डाला
       59
वहां मात्र  भोग  है  वधु बनी
जीवन में मदिरा  का प्याला
विक्षिप्त बना  नर  जीवन  में
नारी   है   मस्त   मधुशाला
               60
स्वालम्बी जीवन पश्चिम का
नारी   स्वयं    बना     डाला
वेद  - शास्त्र  से   वचिंत   थे
नर   कैस  बनता  मतवाला
      61
नारी को जननी   नही माना
नर - नारी में कोइ भेद  नही
रमणी खुद रमण-भ्रमण करती
नर  को  नारी से    खेद     नही
                62
दोनो  गाडी.  के     चाक    बने
स्वछन्द  साथ    में चलते   है
नारी की विकसित  क्षमता  से
सब  राष्ट्र  स्वयं में  पलते    हैं
               63
नारी   का   पूर्ण   मनोरथ   है
नर    अश्व  बना, नारी  रथ  है
तन से मन  से स्वातन्त्र  बने
नारी का  मत  ही सतपथ   है
              64
पश्चिम की   नारी  सबला  है
विकृत अब भोग का भाव बना
जो स्वंय में जीवन जीता    है
उसका जीवन  ना  घाव  बना
               65
मन मस्तिष्क की  नारी    ने
हृदय प्रवेश अब  कर    डाला
ये   समय  चक्र   बतलायेगा
वो  वीर   बेनेगी     वधुषाला
    66
मिस  मैरी  का बुत देख जरा
ईशा  को जिसने जन्म दिया
ये  चमत्कार  है   नारी   का
भटकी हुयी कौम को सनम दिया
                  67
आज जगत  में  नारी   बिना
कोई काम चलता- फलता  है
कौम , कबीला , राष्ट्र    जमी
सब  नारी से  ही चलता   है
 68
कंही भोग में नारी केा देखो
कहीं योग ब्रह्म में लीन बनी
कंहीं रचना श्रृष्टि  की करती
कंहीं राष्ट्रों की गमगीन बनी
                69
एवरेस्ट   पर    नारी     का
कैसा ये विजय पताका   है
अब   संघर्ष   प्रवीण   बनी
कैसी कुदरत की  आका  है
  70
नारी   नभ  में   उडन  भरे
कहीं तैर रही जलधि तल में
कहीे काम देव ज्वाला मुख है
कहीं प्रियतम  है तन शीतल में
               71
कहीं  करती  काम  करो.डो का
हर  अदा में  नर घायल   होता
श्रृंगार  श्रृष्टि   वरदान    मिला
हर  काम  प्रेम  का पल  होता
             72
अहंकार   नर   में        देखो
नारी स्वाभिमान की मूरत है
मां, भगनी, पत्नि  में    देखो
नारी  में रब   की  सूरत    है
               73
निकृष्ट  नरों की  रचना   में
नारी क्यों  नगर-वधू  होती
मजबूरी नाम है अबला  का
श्रृष्टि   मानवता   पर  रेाती
              74
वैष्यालय  हो या   देवालय
सोंन्दर्य श्रृष्टि का   देती   है
कहीं करुणा है कहीं तरुणा  है
भावों  में सबको भिगोती  है
  75
नर के कारण वधु,वधिक बनी
संहार श्रृष्टि    का   कर   डाला
विस्मय में आज समाज बना
वधु बनी  भंयकर   वधुशाला
                76
मन्दिर  में पूजा  मूरत   की
वधुशाला  में  है   सूरत  की
मन्दिर  में पत्थर की  मूरत
वधुशाला  प्रेम की  है  सूरत
              77
ये मरहम दिलों के घावों का
हृदय में प्रेम  के    भावों का
टूटे हुये  दिल  बहलाती    है
वधुशाला   प्रेम  लुटाती   है
                  78
वधु हाला है मधु  प्याला  है
वधु विकराल सी जवाला  है
वधु सुकुमार सी    बाला  है
वधु यौवन मुख पर ताला है
               79
कहीं  षडयन्त्र  का  जाला है
कहीं पर ये वतन की खाला है
कहीं हृदय प्रेम प्रफुल्लित  है
कहीं कृपाण,कहीं  भाला    है
             80
सहयोग  योग  मृगछाला  है
रजनी  में ज्योति उजाला   है
खबरों  में  मिर्च  मशाला   है
कहीं जाली  है कहीं जाला  है
    81
मनेारंजन  में  मधुबाला   है
रण में  विकराल कराला  है
सोंन्दर्य श्रृष्टि की जननी   है
ये   मेरी वधु ,वधुशाला   है
               82
आरक्षण करने  वालों    नें
नारी  कमजोर  बना डाली
स्थान  दूसरा  कर   डाला
जन-मन में बात समा डाली
           83
स्वाभिमान दृड   नारी    का
दया    से   दीन  बना  डाला
रचना में   मेरी  हिम्मत   है
ये सबल  भाव  है वधुशाला
               84
लिंग-भेद अब  खत्म  हुआ
मध्यस्त की कोइ बात नही
विज्ञान  ने  भेद मिटा डाला
नर, नारी की कोइ जात नही
               85
जब सारा  काम बराबर  का
अबला क्यों भिन्न व्यवस्था है
जो दया  दिखाते  नारी   पर
नारायण  उन पर  हंसता  है
               86
आरक्षण सबला   को  देकर
उसका बल क्षीण बना डाला
जो सिंह वाहिनी  रण चण्डी
रणछोड. बने क्यों?वधुबाला
                  87
आज  पुरुष  कमजोर   बना
आरक्षण    उसे    जरुरी   है
पूर्ण    सबल   अब  नारी  है
अब   नही  वधु  मजबूरी  है
             88
विकलांग बना जो जीवन में
आरक्षण   ने   उसको  पाला          
मेरी तो कलम ईलम वधु  है
वधु आत्मशक्ति है वधुशाला
                89
मधु  मधुशाला है ज्ञान  कुंज
श्रोता जिसका  रस  पीते   हैं
वधु   वधुशाला  है  प्रेम  पुंज
जहां  ब्रह्मभाव  ही  जीते   है
                 90
जड चेतन और ब्रह्माण्ड जंमी
जग में   ये श्रृष्टि शिवाला  है
बाहर से  प्रेम का भोग-भाव
अंतर  में  प्रभु वधुशाला  है
                 91
वधु दिव्यशक्ति है अब जग में
मन,मन्दि ,मस्जिद आलय हैं
यंहा प्रेम भक्ति का नियम नहीं
ये   विद्रोही     विद्यालय      है
                92
सतयुग ,  त्रेता , द्धापर   देखो
नारी    ने  प्रेम   लुटाया    था
बस भेद  यही था मनुष  नही,
ऋषि, मुनि, देव ने  पाया था
               93
वधु  तो सरिता है सागर की
मधुशाला है  मधु गागर की
वधु पथिक प्रेम के ब्रह्म निकट
मधुशाला मृत्यु अल्प विकट
               94
सब दुखो को क्षण में दूर करे
मानव - मानव  में भेद  नहीं
वधु हृदय   प्रेम  भरपूर   करे
वधुशाला को कोई  खेद  नही
               95
फिर  भी वधु  प्रेम लुटात  है
जन-जन के दिल बहलाती है
हर  फन के लोगों के दिल में
वधु - शाला प्रेम  जगाती  है
                96
काम ,क्रोध,मद,लोभ , मोह
विकट विषय की  ज्वाला है
अनुभव  से जीवन को देखो
ये ! जीवन ही वधुशाला  है
               97
संकल्प  किया मेरे दिल ने
वधु को वधु का स्थान मिले
नारायण की इस  रचना  में
प्रेम वृक्ष   की   शाख  हिले
                  98
मधु पाठक हो वधु रचना हो
पैग से  पैगम्बर झूम   उठे
साकार  बने वधु  वधुशाला
सोन्दर्य श्रृष्टि को चूम  उठे
              99
वधु,वशुन्धरा,बन जायेगी
नर,मणि रत्न , कहलायेगा
श्रृष्टि का अमिट खजाना है
सोंन्दर्य जगत में  आयेगा
              100
फिर नमन करेगी श्रृष्टि को
आदर्ष    वधु  वधु     होगी
वधुषाला से वधु निखरेगी
वधुशाला  मेरी वधु  हागी ।।

इति    वधुशाला    शतकम्
न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                       मो0 9897399815