Monday, February 16, 2015

मै  पहाड  हूँ
उत्तराखण्ड के बियाबान में मौन  खडा हूँ क्यों उजाड हूँ
भारत की  दृष्टि-श्रृष्टि  में  जल  श्राेतों  से भरा कबाड हूँ
रोम -रोम जंगल  थे  मेरे, काट दिये, बस बचा झाड हूँ
किसके आगे व्यक्त करूं  दुखः, दीन-हीन हूँ मै पहाड हूँ

मैं गंगा,यमुना  का  उदगम  हूँ, मेरा  पानी  बाँट रहे हैं
सागर तक सरिता बहती है,जिल,प्रान्त ही काट रहा हेैं
मौन हुआ सब देख रहा हूँ,खण्ड-खण्ड भारत माता का
पूण्य किया  तो  पाप मिला है,ये हाल जीवन दाता का

मेरी तुमने  श्वांस  रोक  कर  ,  मेरे  उपर  डाम  बनाये
संसाधन   के  प्रसाधन  से, सबने  अपने  काम चलाये
मेरी नाडी, आंत,  आंतडिया, ये  सरितायें  सूख  रही हैं
मूझे  बताओ  भारत - माता, क्या ये  मेरी  चूक रही है

वही सोम है,वही व्योम हेै,इस  भारत  की  वही कौम है
मनवता  के  चंचल  तन  में,मांस,रूधिर है वही रोम है
अभिलाषा  से  सूख  रहा  हूँ, कर्म-मर्म  से  चूक  रहा हूँ
कुछ ना कुछ तो कारण  होगा, लगे घाव में मूक रहा हू

कितनो के मैं दोष गिनाउं,किस के मैं  उदघोष गिनाऊं
कितनो के आगोष गिनाउं,कितनो से अफसोस जताऊं
इस  धरती  की  मानवता ने ,मेरा  ही  संहार  किया है
सतयुग, द्वापर  या  त्रेता हो, सबने अत्याचार किया है

मेरे  नाम  से  खाने  वाले,पल-पल  मुझको मार रहे हैं
आडम्बर  में जीने  वाले, सब  कलियुग अवतार रहे हैं
मैं सरहद हूँ आर्यखण्ड की,आज विखण्डित ही रोता हूँ
दुर्बलता  मेंं  मौन  खडा  हूँ,मानव  से दण्डित होता हूूूूँ

येआग तो बस,लिखता है,जनता का कुछ चाव नही है
नासूर  भभकती  इस छाती में,छोटे-मोटे  घाव नही है
मैं जीवन  देने  वाला हूँ,  जीवन  में  भयभीत  मरा हूँ
जली  आग  की  बुझी राख में दबा हुआ अंगार डरा हूँ।।
               राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                        9897399815
           rajendrakikalam.blogspot.com

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