लंच-मंच-प्रपंच के सरपंच
प्रजातन्त्र में हर चुनाव अब काले-धन से ही होते हैं
भीड जूटाने, नंगी, भूखी जनता, क्यों नेता ढोते हैं
कौन खर्च करता है,क्या इसका कुछ लेखा-जोखा है
लोकतन्त्र में कालेधन की राजनीति ही तो धोखा है
पूरे भारत के जोकर क्यों इस दिल्ली में जुटे पडे है
बस्ती-बस्ती गली, मुहल्ले में नेताजी अटे पडे है
झण्डे, बैनर, विज्ञापन क्या, फ्री-फण्ड में छप जाते हैं
इन पर होने वाले खर्चे, किस नेता के घर से आते हैं
नेताओं के खुद के खर्चे, विज्ञापन में बोल रहे हैं
कालेधन की औकातों को नेता जी खुद खोल रहे हेेैं
कुछ चेैनल भी बिके पडें हैं,सत्ता के गाने गाते हेैं
इन पर जो खर्चे होते है, किस विभाग में दिखलाते हेैं
चोर-चोर मौसेरे भाई, क्यों जनता को लूट रहे हो
आरोपों से ,बुद्वि-बल्लभ अपनी मिट्टी कूट रहे हो
ये हैलीकाप्टर,सूट,बूट,सब कौन दान में बांँट रहा है
कौन हवा में तुम्हें उडाकर,नंगा जनमत छाँट रहा है
सुबह-सुबह तुम मेकप करके बस्ती में क्यों घूम हो
जिनका खुद तृष्कार किया,चरण उन्ही के चूम रहे हो
कामदेव की औषध खा कर,गली-गली में भाग रहे हो
मतदाता घर में सोया है, तुम क्यों नेता जाग रहे हो
अच्छे-अच्छे शब्दो से ये सत्य उभर कर खुद आता है
नेताओं की औकातों को अब चुनाव ही बतलाता है
अब जनता बेवकूफ नही है शब्दो से घोखा खायेगी
खुदका जूता,खुदके सिर पर,ये जनता ही दिखलायेगी
सब हमाम में नंगे नेता, किस-किस के कपडे खींचोगे
राजनीति के सूखे ठूँठ है,किसपर कितना जल सींचोगे
बिजली,पानी और चाकरी, पक्के घर अब बनवाओगे
माफ करो,इस नंगी-भूखी जनता को कितना खाओगे
आर्दशों की बातें छोडो, जनमत जनता जाग रही हेै
पुरा-तत्व की नेता पीढी, लोकतन्त्र से भाग रही है
काठ की हण्डी में ,ये खिचडी कितनी बार चढाआगे
कवि आग तो देख रहा है, नेता जी मूँह की खाओगे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
प्रजातन्त्र में हर चुनाव अब काले-धन से ही होते हैं
भीड जूटाने, नंगी, भूखी जनता, क्यों नेता ढोते हैं
कौन खर्च करता है,क्या इसका कुछ लेखा-जोखा है
लोकतन्त्र में कालेधन की राजनीति ही तो धोखा है
पूरे भारत के जोकर क्यों इस दिल्ली में जुटे पडे है
बस्ती-बस्ती गली, मुहल्ले में नेताजी अटे पडे है
झण्डे, बैनर, विज्ञापन क्या, फ्री-फण्ड में छप जाते हैं
इन पर होने वाले खर्चे, किस नेता के घर से आते हैं
नेताओं के खुद के खर्चे, विज्ञापन में बोल रहे हैं
कालेधन की औकातों को नेता जी खुद खोल रहे हेेैं
कुछ चेैनल भी बिके पडें हैं,सत्ता के गाने गाते हेैं
इन पर जो खर्चे होते है, किस विभाग में दिखलाते हेैं
चोर-चोर मौसेरे भाई, क्यों जनता को लूट रहे हो
आरोपों से ,बुद्वि-बल्लभ अपनी मिट्टी कूट रहे हो
ये हैलीकाप्टर,सूट,बूट,सब कौन दान में बांँट रहा है
कौन हवा में तुम्हें उडाकर,नंगा जनमत छाँट रहा है
सुबह-सुबह तुम मेकप करके बस्ती में क्यों घूम हो
जिनका खुद तृष्कार किया,चरण उन्ही के चूम रहे हो
कामदेव की औषध खा कर,गली-गली में भाग रहे हो
मतदाता घर में सोया है, तुम क्यों नेता जाग रहे हो
अच्छे-अच्छे शब्दो से ये सत्य उभर कर खुद आता है
नेताओं की औकातों को अब चुनाव ही बतलाता है
अब जनता बेवकूफ नही है शब्दो से घोखा खायेगी
खुदका जूता,खुदके सिर पर,ये जनता ही दिखलायेगी
सब हमाम में नंगे नेता, किस-किस के कपडे खींचोगे
राजनीति के सूखे ठूँठ है,किसपर कितना जल सींचोगे
बिजली,पानी और चाकरी, पक्के घर अब बनवाओगे
माफ करो,इस नंगी-भूखी जनता को कितना खाओगे
आर्दशों की बातें छोडो, जनमत जनता जाग रही हेै
पुरा-तत्व की नेता पीढी, लोकतन्त्र से भाग रही है
काठ की हण्डी में ,ये खिचडी कितनी बार चढाआगे
कवि आग तो देख रहा है, नेता जी मूँह की खाओगे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:
Post a Comment