Monday, August 31, 2015

नकली पन
क्या असली है ,क्या नकली हेै कोई तो आभाश करा दो
भारत भाग्यविधाता सब कुछ नकली है तो नाश करा दो
शदियो से हम नकली वैभवता का जीवन जीते आये
देख रहा हूॅं नकली मानवता की ये कैसी आभाये
हद् हो गयी अब तो कोई , इसका पर्दाफास करा दो
भारत भाग्य विधाता सब कुछ नकली है तो नाश करा दो

टाटा नकली, आटा नकली, जूते, चप्पल बाटा नकली
देख मुनाफा खोरी नकली , उद्योगों में घाटा नकली
चलचित्रों में गाॅंधी, नेहरू, नेता और अभिनेता नकली
भारत की भव सागर नैया के क्रेता और खेता नकली
कोई आकर चौराहों में इनकी ऐसी रास करा दो
भारत भाग्य विधाता सब कुछ नकली है तो नाश करा दो

कोटू नकली, घोटू नकली पूजा में भी फोटू नकली
मन्दिर ,मस्जिद ,गिरजे नकली पूजा पाठी पुर्जे नकली
घी,तेल और हवन हवि में क्यों नकली सामान पडा है
आज पुजारी मन्दिर में है बाहर तो भगवान खडा हेै़
ढोंगी ,कपटी मन मन्दिर में ईश्वर का आभाश करा दो
भारत भाग्य विधाता सब कुछ नकली है तो नाश करा दो

खान,पान,सम्मान भी नकली,रिस्ते और मेहमान भी नकली
धर्म,कर्म,सब दान भी नकली, किये गये एहसान भी नकली
गीता और कुरानी तोते, हिन्दु, मुशलमान भी नकली
अर्न्तद्वंदी मानवता की बाहर से मुस्कान भी नकली
नकली पन में जीने वालों को कुछ तो एहसास करा दो
भारत भाग्य विधाता सब कुछ नकली है तो नाश करा दो

अपने अन्दर की ज्योति को ,घासलेट से जला रहे हो
अपने अन्दर की ज्योति को , घासलेट से जला रहे हो
भूल गये हो आदि काल से मन मन्दिर के भगवानों को
हर पत्थर के अन्दर मूरत ,खोद रहे हो क्यों खानों को
झलक मिले उस परमेश्वर की ऐसा भी उपवास करा दो
भारत भाग्य विधाता सब कुछ नकली है तो नाश करा दो
अहंकार के रथ पर बैठे स्वाभिमान को झलकाते हो
नकली मानवता के सन्मुख झूठे नयना पलकाते हो
साधू नकली, जोगी नकली ,योगी और दिगम्बर नकली
धर्म कर्म की इस दुनिया में परमेष्वर पैगम्बर नकली
हम उसको पहचान सकें बस कुछ ऐसी अरदास करा दो
भारत भाग्य विधाता सब कुछ नकली है तो नाश करा दो

शिक्षा नकली,भिक्षा नकली गुरूओं की भी दीक्षा नकली
ज्ञान,ध्यान,सम्मान भी नकली,इक्षा और तितिक्षा नकली
एक विदेश फर्जी प्रमाणों से भारत चला रहा है
आर्युवेदी परम्परा को स्वाभिमान से जला रहा है
देशद्रोह के इस नाटक को , कोई तो बिन्दास करा दो
भारत भाग्य विधाता सब कुछ नकली है तो नाश करा दो

फल भी नकली,फूल भी नकली भोले का त्रिषूल भी नकली
मठ,मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा, बुनियादों में मूल भी नकली
मन्दिर,मस्जिद, गिरजों के झगडे़ शदियों सेे देख रहा हूॅं
मैं भी अपने दिल की कुण्ठा को शब्दों से फेंक रहा हॅूं
सच्ची हज ,पूजा, पाठों से ,मेरा भी अवकास करा दो
भारत भाग्य विधाता सब कुछ नकली है तो नाश करा दो

रक्षा बन्धन और दशहरा, होली और दीवाली नकली
धर्म कर्म के सस्कारो मे पूजा की थाली भी नकली
चोर, उचक्के नेता नकली, डाकू और मवाली नकली
राजनीति मे कपडे फाडू नेताओ की गााली नकली
नकली असली की परिभांषा संसद में भी पास करा दो
भारत भाग्य विधाता सब कुछ नकली है तो नाश करा दो

खादी और उपाधी नकली, दुल्हा दुल्हन , शादी नकली
काम ,वाशना के घर्षण से बढती ये आबादी नकली
प्यार मुहब्बत नकली बुनियादो पर कैसे खडा हुआ है
हम सब नकली देख रहे है, नकली पर्दा पढा हुआ है
केवल कवि आग असली है, छन्दो सेे आभाश करा दो
भारत भाग्य विधाता सब कुछ नकली है तो नाश करा दो
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, August 29, 2015

 आरक्षण  के भेद का खेद
मैं हूँ हिन्दू,मैं हूँ मुूस्लिम , पिछडा  सिक्ख इसाई
भारत  का  मुर्गा, बकरा,  हूँ  काटें  खटिक कसाई
कोई   काटे    ईद   मनाकर,  कोई   माँ   के आगे
हम बकरे इस देश  के  मालिक  कटते रहे अभागे
सात  दशक  से   नेता   हमको   मूँड  रहे  हैं नाई
मैं हूँ हिन्दू,मैं हूँ मुूस्लिम , पिछडा  सिक्ख इसाई

आरक्षण  की  कास्ट, फास्ट  है  दौड  रहे  हैं  घोडेे
नेता  सबको  हाँक  रहे   हैं  मार - मार  कर कोडे
सबके  अपने - अपने  प्रतिशत  ठोक  रहे  हैं दावे
संविधान  के  राष्ट्रगीत  को  सभी  सियासी  गावें
सारी   जनता   बंटी   हुयी  है, चारों  ओर  तवाही
मैं हूँ हिन्दू,मैं हूँ मुूस्लिम , पिछडा  सिक्ख इसाई

छोटे - मोटे  इन  डबरो  में  सडा   राष्ट्र  का  पानी
हर  मजहब  में  पडे  हैं  कीडे, धर्म,कर्म के ज्ञानी
कंही  मौलवी, पण्डित, बाबा चीख-चीख चिल्लावें
सब अपने-अपने त्यौहारो  में  अपना  गाना गावें
इस  राजनीति  में  सारे  दुश्मन बन जाते है भाई
मैं हूँ हिन्दू,मैं हूँ मुूस्लिम , पिछडा  सिक्ख इसाई

आरएसएस की हिन्दी शिक्षा,मुस्लिम पढें मदरसे
इसाई  की  अंग्रेजी  है, संस्कृत  सडक  में  तरसे
जगह - जगह  भांषा बोली की खिंची पढी तलवारें
मैं आग  बरसती  देख  रहा हूँ, चटक  रहे  अंगारे
नीचे सबके  एक  ही   पानी,  बस, उपर  है  काई
मैं हूँ हिन्दू,मैं हूँ मुूस्लिम , पिछडा  सिक्ख इसाई

आरक्षण  मठ, मन्दिर, शंकराचार्यों  में  भी  ढूंढो
अगडे,पिछडे, कौम, कबीलों  के  चेले  नित मूंडो
ग्रन्थी, मौलवी  और  पादरी  आरक्षण  से लाओ
बस,धर्म बचा है,आरक्षण से,उसमे आग लगाओ
गीता, ग्रन्थ, कूरान, बाईबिल  प्रेम के अक्षर ढाई
मैं हूँ हिन्दू,मैं हूँ मुूस्लिम , पिछडा  सिक्ख इसाई

अब आरक्षण भगवान में  ढूंढाे, यदुवंशी गोपाला
शिव शंकर  के  सांप गले में,जटा-जूट रंग काला
आरक्षण  के  हर  कोटे  मे, ये  सारे  देव  समाये
डी.एन.ए की जांच करो ये   किस  कोटे  से आये
सूरज, चांद, सितारों  पर  हेै , राहु-केतु परछायी
मैं हूँ हिन्दू,मैं हूँ मुूस्लिम , पिछडा  सिक्ख इसाई

कूंआ एक  है, एक  ही  पानी, भाण्डे  करे  लडाई
न्यारी - न्यारी  सूरत में भी,कुदरत एक समायी
जांति - पांति  और कौम कबीले खोद रहे है खाई
हर  झगडे  की  जड  में  सत्ता ,नेता  है  हरजायी
कवि  आग  ये  देश  गरीबो का,जनता  भौजायी
मैं हूँ हिन्दू,मैं हूँ मुूस्लिम , पिछडा  सिक्ख इसाई    ।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                मो0 9897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

Sunday, August 23, 2015

प्याज में व्याज
मोदी भैया इस जनता को थोडी सी राहत दिलवादो
पन्द्रह लाख रूपैया छोडो हर खातो में प्याज भिजवादो
खाद्यान्न को तेरे चेले जमाखोर सब दबा रहे हैं
ये व्यवसायी हम गरीब की मांस, आंतडी चबा रहे हेैं
तेरे मंहगे सूट है भाई, कुछ सस्ते हमको सिलवादो
मोदी भैया इस जनता को थोडी सी राहत दिलवादो

डेढ सौ अब दाल की कीमत,सुनकर ही मन भर जाता है
किसी गरीब को दाम बताओ तो सुनकर ही मर जाता है
नेता सारे अब बिहार में खाज सियासी मिटा रहे हेैं
मंहगायी की धूल देश को क्यों मोदी जी चटा रहे है
थोडी सी सख्तायी करके इन चेलों को भी हिलवादो
मोदी भैया इस जनता को थोडी सी राहत दिलवादो

तुम तो परदेशी पकवानो की मस्ती ही लूट रहे हो
भारत में जब भी आते हो, लुटे - पिटे से टूट रहे हो
भाषण के जुमले सुन करके जनता जीवन काट रही है
शब्दो में कुछ स्वाद नही है,शब्द कषैले चाट रही है
चोर-चकारी करने वालो से भी तो हमको मिलवादो
मोदी भैया इस जनता को थोडी सी राहत दिलवादो

अटल बिहारी,मनमोहन अब तेरे राज में प्याज खडा है
व्यवसायी सरकार देश में,ये भी अचरज बहुत बडा है
भाषण की भांषा को सुन कर सीना छप्पन हो जाता है
मंहगायी का ख्याल करो तो छप्पन इंच ही रहजाता हेै
कमल खिलाने वालो,थोडा प्याज देश में भी खिलवादो
मोदी भैया इस जनता को थोडी सी राहत दिलवादो

नंगा-भूखा खाद्य मन्त्री, लावारिस तुम चुन कर लाये
तुमने भी तो हर भाषण में जनता को सपने पिलवाये
तुम आपस में लडो-मरो,पर प्याज कंहा है उसको ढूँढो
सारा धन बिहार मे बाँटो, जिसको चाहो उसको मूँडो
कवि आग को बस,थोडी सी राहत की घूटी,पिलवादो
मोदी भैया इस जनता को थोडी सी राहत दिलवादो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com



Saturday, August 22, 2015

इतिहास का उपहास
अब कृष्ण तुम्हारी गीता में वो द्वापर वाली धार नही
ये मरी कौम है भारत की इसमें जलते अंगार नही
हथियार बहुत है तकनीकी, खुद मरते हैे बस मार नही
अब भारत माँ शर्मिन्दा है, कौमे है, कौमी प्यार नही

गीता तो मात्र उदाहरण है, जिसमे अब वो आभाष नही
ये डेढ अरब के कीडे हैं, शेखर, बिसमिल्लाह, सूभाष नही
इतिहास नपुंसक रोता है, पढकर जिसमें अब जोश नही
शंकर की प्रतिमा खण्डित है,अब प्राण नही आशूतोष नही

अब राम - राम सब रटते है ना धनुष रहा ना बाण रहा
सत्ता में और सियासत में ना चिन्तन है ना प्राण रहा
अवतार धरा में क्यो आये, जब छल कपटी परित्राण रहा
घर-घर मे विभीषण होते है ,ये शदियों से प्रमाण रहा

कोई शिव सैना बजरंगी है, कोई दुर्गा - शक्ति जंगी है
कोई सम्प्रदाय का दंगी है, कोई राजनीति का पंगी है
कोई त्रिशूल त्रिभंगी है, कोई भूखा औेर मतंगी है
रंगरेज यंहा सब रंगी है , व्यभिचारी सारे संगी है

पांच हजार के मुगलो ने दो दशक हमीं पर राज किया
फिर साठ हजार अग्रेंजो ने सौ साल हमारा खून पिया
बस गिनती में दो चार मिले, जो भारत पर कुर्बान हुये
हम साठ करोड की भीडों में मुर्दे शव से शमशान हुये

जो कभी हमारे टुकडे थे ,वो आज हमीं पर हावी है
ये सम्प्रभुता है भारत की, जो भारत पर प्रभावी हेै
कंही पाकिस्तानी पंगा है, नैपाली सिर पर नंगा है
कंही बंग्ला देषी छंगा है, कंही भूटान, चीन का दंगा है

अब अलगाव वाद कश्मीरी है, अमरीका दादा गिरी है
सत्ता है सियासी वोटों की, लावारिस यंहा वजीरी है
क्यों राम, कृष्ण की धरती में अब मुर्दे पैदा होते हैं
कवि आग भी कविता से बस, लाश वतन की ढोते है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, August 20, 2015

प्रजा-तन्त्र के यन्त्र
हर तरह के सांप इनके तन-वदन पर रेंगते हैं
हम ये कैसे मान लें इनका वदन चन्दन का है

चाल, चरित्र और चेहरों में, गीदड़ में शेर बघेरोंं में
चील, गिद्व के डेरों में, बीहड़ के चोर, लुटेरों में
ये कैसा परचम लहराया जो काम किसी के ना आया
हे,प्रजातन्त्र, ये क्या,कलंक,तू अपने घर में ले आया

कुछ बलात्कार के दरबारी,कुछ तेल,गैस के व्यभिचारी
सब कालेधन के व्यापारी, चोरी है जिनकी लाचारी
इन दरवेश दरिन्दों को ,क्यों तूने इतना सहलाया
हे,प्रजातन्त्र,ये क्या, कलंक,तू अपने घर में ले आया

ये अजब निराली जाति है,घर-घर में इनकी ख्याति है
ये गजब हमेशा ढाती है ये राजनीति को भाति है
प्रेम इन्ही से गहराया,क्यों मौन बना, कितना खाया
हे,प्रजातन्त्र, ये क्या ,कलंक ,तू अपने घर में ले आया

कंही सबाब कही सूरा है, अमली है,भांग,धतूरा है
कू - कर्मी लुच्चा पूरा है, खादी में जुर्म जमूरा है
ये राष्ट्र इन्ही से शर्माया, तू पकड उसी को हरसाया
हे,प्रजातन्त्र ,ये क्या, कलंक, तू अपने घर में ले आया

अरबों खरबों की माया है,क्यों राजनीति की छाया है
मुर्दे को क्यों पनपाया है तूमने ही इसे जमाया है
करो बैठकर भरपाया, किस किसने कब कितना खाया
हे,प्रजातन्त्र,ये क्या, कलंक,तू अपने घर में ले आया

करतूत करी कैसी काली, इज्जत भी अपनी धो डाली
क्यों राष्ट्र हुआ धन से खाली,तुम जैसे मरे हुये माली
जनमत से मुर्दा क्यों आया, मुर्दों से हमने क्या पाया
हे,प्रजातन्त्र ये क्या, कलंक,तू अपने घर में ले आया

सब चबा-चबा कर बोल रहे,औकात स्वयं की खोल रहे
क्यों जहर घरों में घोल रहे,अब सभी,हमी को तोल रहे
किसने तुझको भरमाया,किसकी है तुझ पर ये छाया
हे,प्रजातन्त्र ,ये क्या,कलंक, तू अपने घर में ले आया

अब कितने खद्दरधारी हैं, जो भारत आज भिखारी है
ये सत्ता के व्यापारी हैं, और प्रजातन्त्र पर भारी हैं
जाति-पांति और मजहब से बनती है,सब कोढी काया
हे,प्रजातन्त्र,ये क्या, कलंक,तू अपने घर में ले आया

नोटों की बोली बोल रहे, औकात स्वयं की खोल रहे
घर - घर में डाकू डोल रहे, हम मुर्दों को टटोल रहे
लालकिले की पञ्चायत से राष्ट्र - गीत सबने गाया
हे,प्रजातन्त्र,ये क्या, कलंक,तू अपने घर में ले आया

एक राष्ट्र हैे सभी खसम हेै, ये मुर्दों की हवि भस्म हेै
लोकतन्त्र की सही रसम हेै,दागी,बागी सभी जिस्म है
कवि ‘आग’ की लपटों में, चोरों ने झण्डा फहराया
हे,प्रजातन्त्र ये क्या,कलंक,तू अपने घर में ले आया!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com