Friday, February 27, 2015

                       दृष्टि-सृष्टी-वृष्टि
मोदी  भैया  ब्रह्मचारी,है, उन्हे गृहस्थ का ज्ञान नही हेै
किस चादर मे पाँव पसारें, इसका भी अनुमान नही हेै
अटल बिहरी ब्रह्मचारी  थे, इस चक्कर में फेल हो गये
राजनीति में,ये फक्कड,ही,आज सियासी खेल हो गये

माया, ममता, उमा,  ललिता, नारी  शक्ति ब्रह्मचारी है
आर. एस. एस. के  प्रचारक  हैं, उनकी आगे तैयारी है
बिन  नारी  के  राहुल  बाबा, गुप्त  घरों  में  डोल रहे है
ब्रह्मचारी,भारत में सारे, क्या बिन अनुभव बोल रहे हैं

आटा,चावल,मिर्च,मशाले का इनको कुछ ज्ञान नही है
बच्चे  पैदा  करने का  कुछ तकनीकी अनुमान नही है
डेढ अरब की जनसंख्या  को  भाषण  से ही पाल रहे हैं
बिन अनुभव के गृहस्थ आश्रम बाबा जी संभाल रहे है

बन्दर  के  हाथों में  चाकू,ये जनमत  क्यों डाल रहा हेेै
जादूगर  की  मजबूरी  है, खेल  दिखा  कर पाल रहा हेै
तमाशबीन हम सारे जनमत भीड लगा कर देख रहे हेैं
स्वप्नो  के  सौदागर  सारे, बस  सपने  ही  फेंक रहे हैं

हम सब स्वप्नदोष के आदि स्वप्नो में ही खो जाते हैं
राजनीति  के  अलग  धडे  हैं,वो  भी अपने हो जाते हैं
शब्दो  की  हेरा - फेरी  से  गलत सही को ढाँक रहा है
आटा काँटे में चिपका कर मछुआ,मच्छी फाँक रहा है

कुछ  बगुले  नैतिक-वादी  है, एक  टाँग में खडे हुये हैं
अब वो भी मौका देख  रहे हैं,आदर्शो   में  अडे  हुये हैं
शब्द - भेद  के तर्क-कुतर्की  हर चैनल में चिल्लाते हैं
इनकी  अपनी  मजबूरी  है, इसी  बात  की ये खाते हैं

राजनीति  के अनुभवहीनो से  ही  तो भारत लुटता हेै
जनमत भी तो सरल मार्गअपनाने वालों से घुटता है
आश्वासन  ही  एक  मात्र  हल हेै, सबको बहलाने का
कवि आग की  मजबूरी  है  नेता जी के गुण गाने का।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       मो09897399815
            rajendrakikalam.blogspot.com

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