Monday, April 27, 2015

                   दान मे भी शान
मनवता  तो  ठीक  है भैया, पहले  अपना घर  भी देखो
जो घर में ही मरे जा रहे ,कुछ  टुकडे  उन  पर भी फेंको
तिब्बत,बंग्ला  और नैपाली, इनको  तो  हम पाल रहे हेैं
अन्न,धन,व्यवसाय सभी हम इन पर ही तो डाल रहे है

दया दिखाना  ठीक  है  भैया, गर्दन पर  फन्दा ना डालो
सब  को  अपने  घर में भेजो, जो  देना है वंही से पालो
हम  पहले से  ही  डेढ  अरब हैं, आधे  भूखे  ही सोते हैं
मंहगायी  का  ये  आलम  है ,सारे  घुट -घुट  के रोते हैं

उपर से  बे - मौसम  वर्षा  ने  भी  तो  चौपट कर डाला
हमने  भूखे  रहकर फिर भी हर शरणा गत को ही पाला
इज्जत पाने  के चक्कर में पहले  घर में नजर घुमाओ
नेता जी को क्या चिन्ता हेै,दया दिखा कर घर मे लाओ

मानवता  का  धर्म  निभाकर  हमने अपना ही खोया है
नेता जी  की  राजनीति  से   केवल  भारत  ही  रोया है
अमितशाह  तो  बगला-देशी को  भी  घर  में बुला रहे है
मेरा   भारत   सिकुड   रहा  है, ये  गुब्बारे  फुला  रहे है

पहले  घर  के  झगडे  देखो, फिर  पडोस के  निपटाओ
सत्ता की मालिक जनता है  अपना राष्ट्र गीत मत गाओ
नमक,तेल और लकडी का तो  नेताओं को ज्ञान नही है
घर में भूख-प्यास  से  मरने वालो  का अनुमान नही है

कालेधन  वालों के पहले  संचित धन को धवल बनालो
ऐसा  मौका  कंहा  मिलेगा,  सारे  पापी  पुण्य  कमालो
इस  संकट  को  भोगने  वाले  सारे  तुमको ही ध्यायेगे
इज्जत शोहरत केआलावा, अवगुण  के  भी गुण गायेंगे

पहले अपनी चादर देखो,चरण कमल  को  फिर फैलाओ
बेनाम मजदूर,किसान के शव पर भी तो  कफन चढाओ
कवि  आग  के  कर्कस शब्दो  से थोडा ,चमडी को सेंको
मनवता  तो ठीक है भैया, पहले  अपना  घर  भी देखो।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  मो0 9897399815
         rajendrakikalam.blogspot.com












Sunday, April 26, 2015

                       पर्यावरण
आदमी  अभिशाप  बनता  जा   रहा  है  श्रृष्टि में
जगपिता  भी  रो  रहा  है  आज  अपनी  दृष्टि में
जल,जीव,जन सुन्दर प्रकृति श्रृष्टि का  आधार है
पर्यावरण  की   लुप्तता  ही   जीव   का   संहार है

जगल जमी,जनजीव, जीवन लुप्त होता जारहा है
देख लो ये आदमी , विज्ञान , कुदरत  खा रहा है
युद्ध   है  आकाश  में  ओजोन  मंडल  फट गया
द्वन्द की दुनिया में देखो जल,जमी,नभ बंटगया

स्वास्थ  की सम्पन्नता को जंगलो से तोलते थे
कैसा खजाना कुदरती मेरे  वतन  को  बोलते थे
दिन रात  जंगल कट रहा  है आदमी के  हाथ से
ये राष्ट्र ही  मर  जायेगा आकाल  के आघात  से

कितनी जडी और बूटियां जंगलो में पल रही थी
संजीवनी उपचार की हर  युगो  से मिल रही थी
बनगयी इतिहासऔषध जंगल ही गायब होगये
देख  लो  गंजे  शिखर  कैसा  अजायब  हो  गये

भू-चाल  है भू-कम्प  है ज्वालामुखी  का ग्रास है
जानें  कितने रोग हैं जन-जन में  जीवन त्रास है
जगल,जमीं अवलम्बथा इस श्रृष्टि के सोपान में
विज्ञान  बनता जा रहा है काल  हिन्दुस्तान  में

लुप्त था जो  जल जमीं  में  खो गया  पाताल में
विज्ञान  भी  है बे-खबर आकाल के इस काल में
हर  नदी  में  डाम  हैं बिजली  बनाने  के  लिये
मजबूर  है विज्ञान  भी  श्रृष्टि  चलाने  के  लिये

जल से बिजली ठीक बिजली से जल ना पाओगे
हर जीव  का  आधार जल,बोलो कहां से लाओगे
रोकते  थे  वृक्ष  जल  को , कट गये  बे-भाव  से
हर जीव ‘चातक’ बन गया विज्ञान के प्रभाव  से

छोटे - छोटे  डाम   हों  जंगल  जमीं  बचती  रहे
श्रृष्टि भी   तकनीक  से  कुछ  नया  रचती  रहे
विद्युत भी  हो,जलवायु तो बात बनती  जायेगी
अन्यथा इस आदमी  को आवश्यकता  खायेगी

भाष्कर  की पुन्ज को ओजोन  कैसे शोकता था
उसभयंकर लौकिरण कोशून्य में  ही रोकता था
मांगती जितनी धरा,उतनी तपस को छेाडता है
ओजोन की इस पर्त को विज्ञान कैसे तोड.ता है

कारण बना है हर तरफ से श्रृष्टि  को संहार कर
खेा गया ऋतु का नियम पर्यावरण से हार कर
अब भी समय हैश्रृष्टि में पर्यावरण बच पायेगा
विज्ञान  से  तो  आदमी बे -मौत मारा जायेगा

रोग  हैं अकाल  हैं  कहीं  बाड. जीवन  खायेगी
श्रृष्टि में  प्रलय भयंकर बे - समय  आ जायेगी
फिर कहां विज्ञान हम तुम ना धरा रह जायेगी
अस्मिता ब्रह्माण्ड की  विज्ञान  से बह  जायेगी

विज्ञान भी  हो  और प्रकृति आदमी आधार हो
एेसी ना हो  प्रतिकूलता सोंन्दर्य  का  संहार हो
पर्यावरण, विज्ञान  से श्रृष्टि नयी  बन  जायेगी
इस धरा की  दिव्यता  ब्रह्माण्ड की  हो जायेगी ।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, April 25, 2015

                  कुदरत की आवाज
वर्षातों   में   सारी    नदियाॅं,   बडे़  वेग  से   बहती हैं
तूफानों   के  उफानो   को    वशुन्धरा    ही    सहती है
उजड़ गया  है चमन,  प्रकृति  मौन  सदा  से  रहती है
परिभांषा में, भूकम्पों की , धरती  सब  कुछ  कहती हैे

सूखी नदियाॅं,बंजर धरती, अभी से मातम  मना रही हैं
ये विकाश  की  परिभांषा विध्वंस  पथों को बना रही है
नियम ऋतु के बदल रहें  हैं आकालों की अभिलाशा में
मूरख  मानवता  जीती  है, आशा,  तृष्णा  की भांषा में

जंगल काटो, पानी  बाॅंटो,  अव्वल  दोयम ध रती छाॅंटो
खनिज सम्पदा के पोषण से,धरती के रग रग को चाटो
प्रहरी   के   प्रहारों   से   सोन्दर्य   धरा   का   खोता है
मौसम  भी  तो  धरती  की   मुर्दा   लाशों  को  ढोता है

कंहा  गयी  वो   शर्दी,  गर्मी,  बर्षातों   की   फुहर छटा
कंहा   गयी  वो  मेघों  के , गर्जाने   वाली  श्याम घटा
कंहा गयी वो तितली,चिडियाँ,कंहा गयी वो सुमन लटा
वो बसन्त  भी  कंहा  गया, द्रुम की डालों का पीत पटा

क्षत, विक्षत मानवता  के  शव,मृत  शैया पर लेट गये
आकाल,प्रलय प्रलापों  से, बे-समय मौत  की भेंट गये
इस कुदरत  के  संवेदन  में, ये  दीन दशा  जब होती है
तब-तब  भूत, पिचासों  के  मानव  को  धरती ढोती हैे

ये सूनामी,ये हुद-हुद है,कंही प्रलय  प्रताप प्रकट खुद है
जरा देख नजारा कुदरत का,ये संकट  भी तो अदभुत है
नंगे - भूखे ही  मरते  हैं,  कुदरत  की  कर्कस  आहों से
परिवर्तित होता है मौसम,  मानव  के  मरे  गुनाहों से

अस्तित्व बचाना है अपना,  संसाधन में घटतोल करो
जंगल और  जमीनों  में,ना  कुदरत  से  कल्लोल करो
श्रृंगार करो फिर से माॅं  का  अस्तित्व धरा में लाने को
मैं  आग  लगाने  बैठा  हूॅं , चिन्गारी  से  समझाने को ।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                मो0 9897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, April 24, 2015

      आत्माराम
आत्मा  राम  रंगे   हाथों   चोरी  में   पकडा  गया
पुलिस द्वारा  हथकडियों, बेडियों   सेे  जकडा गया
चारों  तरफ  थी  भीड़  और   पुलिस    का  साया
बडे़ धैर्य  से  आत्माराम  जज  के  सामने  आया

जज    ने    पुलिस    से    कहा    बेडियाॅ  खोलो
आत्माराम गीता   पर   हाथ    रखो   और  बोलो
आत्माराम  ने   कहा   सब   कुछ   सच  बोलूॅंगा
सतयुग  से  आज  तक   की  पूरी  पोल  खोलूॅंगा

एक छोटी  सी  चोरी  में  मुझे बेडियों से जकडा है
हर युग में  बडे़-बडे़   उत्पात   हुये  उन्हे पकडा है?
एक  देवता  ने  दूसरे  देवता   की   लुगाई चुरायी
क्या  वो   चोरी   नही   थी,  मेरे  न्यायाधीश भाई

लुगाइयों पर  तो  देवताओं  की   नजरें  रहती थी
हूकूमत क्यों मौन थी कुछ  क्यों   नही  कहती थी
इन्दर   गौतम   की  पत्नि   को  बर्बाद  कर आया
आपने  कौन  सा  बलात्कार  का  कानून लगाया

हिरण्यकष्यप   तो   प्रहलाद   को  सुधार  रहा था
अपनी   पूरी    हूकूमत   उसमे!    उतार   रहा था
नरसिंह  ने  कैसे  उसे  अपने  हाथों   से उसे फाडा
तब  कहाॅं  था  वकील   न्यायाधीशों   का  अखाडा

त्रेता   में    तो    सूर्य - वंशियों   ने   हद्द   कर दी
पूरी   कानून    की   व्यवस्था    ही   रद्द   कर दी
बेटों  के   कारण   लावारिस   बाप   मर  जाता है
बिना  क्रिया-करम  के  पुरूषोत्तम  जंगल जाता है

जंगल  में  निहत्ते   श्रवण    पर  कैसे  बाण  दागा
गरीब  ने   लावारिसी    में  अपना   प्राण  त्यागा
राम  ने  भी  सरे   आम   सोने   का   हिरन मारा
सलमान   उसी    केस   में   तो  फंसा  हेै  बेचारा

लक्ष्मण   ने  तो  सूपर्णखा  की  नाक  ही  उडा दी
सनातन  के  कानून   की   व्यवस्था  ही  सडा दी
राम ने  कैसे   बालि  को   छिप    कर  बाण मारा
उस  समय   कंहा    था   ये   कानून  का  पिटारा

रावण  ने  तो   अवधेश   की    सीता   ही उठाली
घटना  घटने  के    बाद    सब     देते  रहे  गाली
मेघनाथ  ने  भी  तो  लक्ष्मण को  सरेआम मारा
हनुमान  के  सामने  ही  हुआ  था  ये काण्ड सारा

राम  ने तो रावण  का   खानदान  ही  काट  दिया
कानून  तो  कानून  व्यवस्था  को  ही  चाट दिया
पत्नि   से   ज्यादा   धोबी    पर    विश्वास  आया
घर  पहुंचते  ही  माॅं   सीता   को  जंगल दिखाया

आज  के  युग  में  अगर सीता घर से बाहर होती
मुआवजे के  साथ  राम  को   घर - घाट से खोती
भक्त  ही  गवाही   देकर   राम को  जेल में डालता
आज  राम को   वि.  हि .प . नही  तिहाड़ पालता

हनुमान तो  जिन्दगी  भर  राम की गुलामी में था
हिन्दुस्तान  का  सिपाही  पूरी तरह सलामी में था
अपनी  पूरी  जवानी   ही   जी  हजूरी   में  गवाॅंदी
इस  धर्म - युद्ध   में   पूरी  कौम   ही   भेंट चढादी

आज  भी  राम   की   चर्चा   मे   हनुमान  खडा है
उसका  वंस  देश   में   रोटी   को  मुहताज  पडा है
धार्मिक  लोग शहर  से   बंदरों को जंगल भगाते हैं
लेकिन  मंगलवार  को  हनुमान   चालिसा गाते हैं

आज 80  प्रतिशत  आदमी  को  सूगर  का  रोग है
हनुमान  के  लिये   आज    भी   बूॅंदी  का  भोग है
भविष्य  मे  हनुमान  को भी   सूगर  हाने वाली हेै
देश की जनता बाहर  से  सफेद  भीतर  से काली है

द्वापर  में  भी  तो  कृष्ण  भगवान  ने  चोरी की थी
छूध , दही ,  मक्खन ,  मट्ठा    बाॅंट    के  पी थी
कंस  ने   भी    जीजा ,  बहन   को  जेल  दिखाया
तब  कौन  सा   वकील   पेैरवी    के   लिये  आया

कंस ने  भी  तो  बच्चों  को   तडफा-तडफा के मारा
तब  कॅंहा   थी   संविधान   की   ये  302  की धारा
कंस  ने  तो  अपने  बाप   को  भी  जेल  में  डाला
ये  भी   तो   द्वापर   युग   का   इतिहास  है काला

गोपाल ने जमुना  में  कालीनाग  की सांस घोट दी
जीव  संरक्षण   वालों   को   कैसी   करारी  चोट दी
भगवान  ने  तो   एक   और    स्कैण्डल  दिखाया
अपनी  बहन   को   ही  अर्जून  के  साथ भगवाया

दुर्योधन  ने  अब  तो  सच्चायी  की  ही  हद्द करदी
नटवरलाल   की    सारी    योजना   ही   रद्द करदी
उसकी  बात  में तो  कहानी   का   पूरा  ही सूत्र था
सिद्व करना   था  कौन  पाण्डू   का  असली पूत्र था

ताऊ को  तो  वैद्य  ने  फिजीकली  अनफिट बताया
इन पाॅंच  को  हस्तिनापुर  की धरती पे कौन लाया
इनसे सबसे ज्यादा  दावेदारी  तो  आज करण में है
जो  बदनाम  हो  कर  भी ,आज  मेरी  शरण  में हेै

इन  पाॅचो  आलावा   विदुर   भी   तो  ज्ञानवान था
जो  व्यास  जी  का  अंधेरे  में  दिया  हुआ  दान था
सच्चायी तो पाण्डु  औेर  धृतराष्ट्र  की  भी खलती है
क्यों कि  ये नश्ल  तो  बाबा  वेद  व्यास से चलती हेै

और वेद व्यास  भी  तो  सत्यवती  का  ही खून था
जो दादी  और  परासर  की तरूणाई का मजमून था
सारा सारा वंश  तो  कायदे  से  हवा में चल रहा था
भीष्म पितामाह  की  हूकूमत  थी   तो पल रहा था

मुरलीधर  तो   पूरा   इतिहास  ढंग  से  जानता था
मजबूरी  की   रिस्तेदारी   थी  ,लेकिन  मानता था
सरेआम  कानून   और  खून   पिटता  जा  रहा था
ताकत  के  बल  पर  समाज  घिसटता  जा रहा था

द्रोपदी  की साडी  सभा में  सरे  आम  खिंच रही थी
योद्याओं  के  बीच  में   अबला  कैसे  भिंच  रही थी
धर्मराज युधिष्ठिर  भी औरत  को  जूॅए  में  हारता है
गिरधारी  भी तो  अनैतिकता  को  कैसे  संवारता है

भाभी  ने  मजाक  में  अंधे  को अधे का ही तो बोला
इस छोटी  सी  मजाक   ने   पूरा   महाभारत  झेला
एक  द्रोपदी की हठ ने पूरा पूरे  वंश को  ही  मरवाया
गोर्वधन  गिरधारी   को  भी  त्रियाहठ  ही रास आया

बे-सिर पैर  का  महाभारत  पूरे समाज को खा गया
लेकिन   हमारे  राजनीतिज्ञों  को  ये  खेल भा गया
गीता ने तो जिन्दो  को  भी  मुर्दा  घोषित कर दिया
अर्जून की  रग-रग  में  बदले  का  जूनून  भर दिया

महोदय,इस कलियुग में  कौन  चोरी  नही  करता है
एक उदाहरण बताओ  जो आत्मा  से  नही  मरता है
राजनेता  तो  करोडों, अरबो  की  चोरी  रोज करते हैं
हिन्दुस्तान में नही विदेशो  में  भी  तिजारी  भरते हैं

नेता ,अधिकारियों   की   सम्पत्ति  की  जाॅच करालो
रिस्ते  नातेदारियों   में  भी इनके सारे खाते खंगालो
पता चलेगा   हिन्दुस्तान   किस  तिजोरी में बन्द हेै
हम तो छोटे-मोटे हैं , राजनीति  में बडी-बडी गन्द है

फिर बताना  जज   साहब  चोरी  कौन नही करता है
जर,जोरू,जमीन  के  पीछे, ये  हिन्दुस्तान मरता है
जमीनोंऔर  कमीनो   के  भाव  दिन-रात बढ़ रहे हैॅ
अब तो हमारे  योगी  बाबा  लोग  भी यही कर रहे हैं

धर्म का झण्डा  उठाओ, सरकार   से लीज कटवालो
ट्रस्ट  बनाओ  और  मिल बाॅंट  के  आपस में खालो
दवाइयाॅं  ओैर   आटा,  दाल ,  चावल  खुलकर बेचो
कालाधन  चिल्लाओ और   इज्जत   से  माल खेंचो

भ्रष्टाचारी, भ्रष्टाचार   के   खिलाप  आवाज  उठाते हैं
लवारिस, आवारागर्द   भी   इन्ही  के  पीछे  आते है
फिर इन संगठनो का  एक   पागलखाना बनजाता है
जिन पागलो! का  इलाज  नही  है वो  इसमें आता है

सतयुग  से आज तक  यंहा  व्यभिचार  ही चलते हैं
और  हमारे   नेता लोग  रोज  कानून  ही  बदलते हैं
मन्दिर,मस्जिद,चर्च,मदरसा क्या आदमी बनाता है
हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख ,ईसाइ  भी यंही का खाता है

ये  हिन्दुस्तान   भी  तो  एक   एैतिहासिक  चौक है
बे-वजह  की  पंगे - बाजी   करना   हमारा    शौक है
आज लोग  पहले  से  ज्यादा  पढे़  लिखे  हैं ज्ञानी है
फिर   भी   पागलपन    देखो ,  रोज  की  कहानी है

अगर  नेता और धर्म  गुरूओं को  आज हाथ जोड़दो
धर्म और समाज से इनका नाता दूर-दूर तक तोड़दो
ये सम्प्रदायिक आदमी आज ही धार्मिक बनजायेगा
ये हिन्दुस्तान पहले की तरह  पटरी  पर  आजायेगा

धर्म,मजहब  ने  तो आदमी - आदमी को बाॅंट दिया
इसी शदी में  देश  को कितने  टुकडों  में  काट दिया
मैं  पूछता  हूॅं कानून  के रक्षक और  भक्षक  कौन हैं
आत्माराम के तर्क  पर  वकील ,न्यायाधीश मौन हैं।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                      मो0 9897399815
             rajendrakikalam.blogspot.com  
       
  

Wednesday, April 22, 2015

                   पाठकों से निवेदन
साथियों इस समय देश का स्वाभिमान किसान किस अवस्था से गुजर रहा है,हम सभी भलिभांति  जानते हैं,किसान की सुरक्षा हमारे देश के राजनितिज्ञों के द्वारा की जानी संभव नही है,इसिलिये ये घटनाएं घट रही हैं,
      आपसे निवेदन है कि  देश के इस स्वाभिमान  को सुरक्षित करने के लिये अपने-अपने क्षेत्रो मे अर्थ संचय कर किसानों की  रक्षा करें, इस समय यही हमारा धर्म है,आप संस्था  बनाये जिसमें मैं  इस  हेतु मैं एक नगरपालिका  में कार्यरत लिपिक 5000रूपये की राशि  दे रहा हूं।
                     किसान की सुरक्षा
तुम भाषणो  में  लीन थे, वो  पेड  में गमगीन था
तुम  वेदना   से   हीन  थे,  वह  वेदना से दीन था
तुम  मंच  के  सरपंच  सब  प्रपंच  में  मदहोश थे
वो   सियासी   भावना   में  बह   गया  ये  दोष थे

दृष्टि  में  घटना  तुम्हारे  सामने  सब  हो  रही थी
चेतना सब की सियासी मद की हद में सो रही थी
चाहते  तो  जान  बच  सकती  थी उस नादान की
पर  राजनीति  में कंहा  है  आज  कीमत जान की

फिर  सियासी तंज  की  सतरंज चालें  चल रही है
वेेदना  के  इन  सुरों से  भी  सियासत  पल रही है
मौत के नाटक के फाटक,सब तरफ से खुल रहे हैें
शव, सियासी ,सल्तनत के शौक में ही झुल रहे हैं

वेदना  इस  के  कफन  से  लाश दबती  जा रही है
ये  खबर  अब  पत्र  में  भी खास छपती जा रही है
इस  मौत  में  भी जाँच   के  आदेश  होते  जायेंगे
अन्नदाता  सान्त्वना  के  शब्द  फिर  से  खायेगे

सत्ता सियासत से  अलग कुछ लोग उठने चाहिये
दान  के  अंकुर  धरा  में   फिर  से  फुटने  चाहिये
सामर्थ्यता  से कुछ  ना कुछ  धन जुटाना चाहिये
अब अन्नदाता  की  सुरक्षा  में  तो  आना चाहिये

धर्म, मजहब ,जातियों  सेे  आवाज  आनी चाहिये
अब  और  जाने  अन्नदाता  की  ना जानी चाहिये
बूँद - बूँदो  से   भरे   घट    से   पिपासा  बूझती है
आग  को  तो  बस  यही अब एक आशा सूझती है।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  मो0 9897399815

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Monday, April 20, 2015


                धरती का मालिक-सत्ता की कलिख              
हमको किसान से क्या लेना,तुमको किसान से क्या लेना
ये  बोट  बैंक  है  भारत  का,  मजबूरी   है  इनको  सहना
चन्दा - धन्धा  हम सबको भी उद्योग-पति  से   मिलता हेै
सत्ता  के  फटे  लिबासों   को  धनवान  हमेशा   सिलता हैे
ये  लावारिस   पतनाले  हैं, इनको   तो  हरदम  है  बहना
हमें  किसान  से  क्या लेना,तुमको किसान से क्या लेना

तुम भी कन्धे  पर  हल  रख लो, हम भी कन्धे पर ढोयेंगे
हम  विरह - वेदना  के  आंशू  संसद  में  मिल  कर रोयेंगे
इस पागल  जनता को  समझो ,इनको  कैसे  समझाना हेै
सत्ता  के   भोगी   हम  सब  हेैं , रोना  तो   एक  बहाना हैे
ये  भीड- तन्त्र  है भारत  का   अन्धो  के  आगे क्यो रोना
हमें किसान  से  क्या लेना, तुमको  किसान से क्या लेना

बे - भाव  के बादल  बरस रहे,हम इनको  रोक नही सकते
माहौल  बना  है  शोकाकुल, इसमें  भी  भौंक  नही सकते
ये  खेत  किसानी, मजदूरी, अब  सब  बेकार  की  बाते हैं
साठ   साल   तुमने   खाया,  मौका  है  हम  भी  खाते हैं
ये लोक-तन्त्र का बोट-बैंक , खण्डहर  में  दबा  वो सोना है
हमें   किसान  से  क्या लेना,तुमको किसान से क्या लेना

भूमि  का अधिग्रहण कर लो, गाँवो को सभी  वरण करलो
हम तो सब सत्ता भोगी हैं कुछ चरण, शरण  इनकी धरलो
उद्याोग - पति  से  हम  सब   की   इच्छाएं  पूरी   होती हेैे
ये  नंगे - भूखे  धरती  के  मालिक  को  सियासत ढोती हेै
जय - जवान और जय - किसान ,ये दो  ही  हैं अपने नैना
हमें  किसान  से  क्या  लेना,तुमको किसान से क्या लेना

अब  अगर  नही  गेंहू   घर  में  तो  बाहर  से  मँगवा लेंगे
नही   जलेगा   चुल्हा  तो  लंच - पैकेट हम  घर- घर  देगे
सब  देश  खडे   तैयारी  में ,भारत  में  आश  लगा  करके
अब  वही  करेंगे  खर्चा  सब, आराम   करेंगे   हम  घर के
इस डेढ  अरब की  भीडों का  मुश्किल  है बोझा  अब ढोना
हमें  किसान  से क्या  लेना, तुमको किसान से क्या लेना

हम  सब  सर्कस  के  बाजीगर, अपनी  ही सर्कस खेल रहे
हम  रावण,कंस,दुशासन  हेै,ये  जनमत  हमको  झेल रहे
इन  सुन्दर-सुन्दर  शब्दो से  हम ,कब से  भारत पाल रहे
हम  भीड जुटाकर  मुर्दों   की  ग्लूकोष  उदर   में  डाल रहे
कवि  आग  के  शब्दो  में, अब ये  अन्धकार  की  हेै  रैेना
हमें  किसान  से क्या लेना,तुमको  किसान  से क्या लेना।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       मो09897399815
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Sunday, April 19, 2015

                    भारत - पाक की वेदना
एक  जमीं  है  जंहा एक  है  दोनों  का  आकाश एक है
टूटे दिल के दो टुकडों में, आव - भाव और आश एक है
जतन एक है कथन एक  है,राजनीति का पतन एक है
धर्म मजहब की दोनों कौमें,भटक गयीं हैं वतन एक है

कोई  आकर  मुझे  बतादो  इस  धरती  में  कहाॅं हद है
छाती से छाती  मिलती हैं दीन इमान  का कैसा कद है
दरिया दिली,समन्दर जैसा,समरथ पथपर कैसा मद है
आन, बान और शान एक हैे,फिर परमादी  कैसा पद है

सत्ता और सियासत की समसीर  ने हमको  काट दिया
राजनीति की  जिल्लत  किल्लत  ने हम को बाॅट दिया
अमन - चैन  के   चुल्हों  से, चिन्गारी को  भडकाया है
सत्ता  और  शियासत  ने शदियों  से  हमको   खाया है

गीता और कुरान  की  भाषा, मानवता  को जोड रही है
नासमझी की  अभिव्यक्ति है हिन्दू,मुश्लिम मोड रही है
असमंजस में फंसी कौम, धर्म-मजहब को छोड  रही है
द्वन्द-गन्द  आतंकी  भांषा,  दोनो   के   घर तोड़ रही है

रोज   मर   रही   दोनो   कौमे   आतंकी  विस्फोटों  से
प्रजातन्त्र   भी   खेल  रहा  है  देख   सियासी  बोटों से
मिल जाती है पनाह यहाॅं पर हिजबुल को ओसामा को
दोनों   कौमें   खप्पर   लेकर   देख  रही  ओबामा  को

पाल  रहे   थे ओसामा, इस्लाम  मुकम्मल  करने को
छिपे   पडे़   हेैं  आतंकी    क्यों  कुत्तों  जैसे   मरने को
क्या  दिखलाना  चाहते हो  तुम  झूठे अमली जामो से
र्निदोशों   को    मार   रहे  हो  अल्लाह  के   पैगामों से

तरस  रहीं  हैं,दोनों कौमें टूटा दिल  फिर से मिल जाये
फटे लिबासों की जन्नत  कोई  फरिस्ता तो सिल जाये
मजहब की झूठी बुनियादें,मिले प्रेम तो खुद हिल जाये
नवअंकुर  सी  दोनों कौमों के हृदय के ,गुल खिल जांये

सीमा की विस्फोटक हरकत छोड,आत्म सर्मपण करदो
जो कुछ तुमने  हमसे  पाया, खुदी  हमारे अर्पण कर दो
नही  तो  भैया  जड  मूल से  मिटने को तैयार रहो तुम
हमने तो अब ठान लिया है,चाहे कितना प्यार कहो तुम

अलगाव -वाद  की  बाते  करने वाला ना अरमान रहेगा
अगर  पास  में  रहना  है  तो, तू भी हिन्दुस्तान कहेगा
लाहौर, कंराची, रावलपिण्डी, ये भी भारत का  हिस्सा है
भीख  माँग  कर  खाने  वाले  बता, तेरा क्या किस्सा है

अमरीका ,चीनी  से  मिलकर  क्या दिखलाना चाहता हेै
आतंक  मचाने  वाला   दुनिया  भर  में  जूते   खाता है
तुझ  को  पैदा  करने  वाले हम तरस  कौम पर खाते है
हम   जान  रहे   हैें  मेरे   घर   में   तेरे  रिस्ते  नाते है

सरिता ,सागर ,जंगल ,मंगल, डंडा ,  झंडा  एक बनाओ
आशा,भांषा,भाव - भंगिमा, एक  राष्ट्र   का  गाना  गाओ
कौम एक हो,व्योम  एक हो जहर  जहन   का दूर हटाओ
जम्बूद्वीप पुनःविकसित  हो  भारत  माता के  बन जाओ!!
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                          9897399815
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Saturday, April 18, 2015

            चित्र काशमीर समझौते का है        

                   उपहास का इतिहास
तुम्हे  जब  भीख  में  हमने  ये  पाकिस्तान दे डाला
तुम्हारे बाप जिन्ना ने किया  था  अपना  मूँह काला
हरि  सिंह  के  गुनाहो  से  इस   काशमीर  को टाला
ये  ऐसा  पाप   है   जिसको    नेहरू  ने  सदा पाला

ना   नेहरू   ने कभी चाहा,ना गाँधी  ही समझ पाया
कौशिश  की  थी बल्लभ ने,किसी को रास ना आया
अगर  थोडी  सी  समझदारी  ये  बूढे  होश  मे करते
ना पाकिस्तान  के  मरते, ना  हिन्दुस्तान  के मरते

बशीयत ऐसी  लिख डाली जो हमको  भी अखरती है
उसी  गफलत में लावारिस ,अब  काशमीर  धरती है
सभी   सुविधा   हमारी   हेै,   हूकूमत  भी  हमारी है
मेरे  घर  का  ही  खा  करके   सियासी  जंग जारी हेै

अगर  सुविधा  हटादो  तो  ये  कब्रिस्तान  बन जाये
पल  भर  में ये जन्नत  भी जहन्नुम में समा जाये
हमें क्या  लाभ  है  इनसे ,जो अब तक पालते आये
पलते  हैं  मेरे  घर  में , और कव्वाली पाक की गाएं

कंही  जिन्ना ,कंही  जिया,  मुर्सरफ  अब  नवाजी है
ये  कैसा  बीज है  इनका,जो  दुनिया भर मे पाजी है
ना  खाना  है ,ना   दाना  है  बस,  विस्फोट  खाते हैं
इनके  सब   संपोले   भी  गजल   खूनी  ही  गाते हैं

अमरीका  से कुछ  समझो  जो  ओसामा मिटा डाला
हिम्मत  हो  तो   ऐसी  हो  जो  पाकिस्तान खंगाला
मेरेे  घर  के  संपोलों  को  पनाह   क्यों  पाक देता है
दाउद  की   दहशत   को, क्यों  हिन्दुस्तान  सहता हेै

फौेजों को खुला छोडो, जो  चुन - चुन  कर  इन्हे मारे
इन  अलगाव  और  आतंक   की   नश्लों   को  संहारे
सियासत मौन  हो जाये, मेरी  फौजों  में दम खम है
मेरी  इस  आग  में  पानी  पडा, मुझको  यही गम है।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                    9897399815
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            चित्र काशमीर समझौते का है        

                   उपहास का इतिहास
तुम्हे  जब  भीख  में  हमने  ये  पाकिस्तान दे डाला
तुम्हारे बाप जिन्ना ने किया  था  अपना  मूँह काला
हरि  सिंह  के  गुनाहो  से  इस   काशमीर  को टाला
ये  ऐसा  पाप   है   जिसको    नेहरू  ने  सदा पाला

ना   नेहरू   ने कभी चाहा,ना गाँधी  ही समझ पाया
कौशिश  की  थी बल्लभ ने,किसी को रास ना आया
अगर  थोडी  सी  समझदारी  ये  बूढे  होश  मे करते
ना पाकिस्तान  के  मरते, ना  हिन्दुस्तान  के मरते

बशीयत ऐसी  लिख डाली जो हमको  भी अखरती है
उसी  गफलत में लावारिस ,अब  काशमीर  धरती है
सभी   सुविधा   हमारी   हेै,   हूकूमत  भी  हमारी है
मेरे  घर  का  ही  खा  करके   सियासी  जंग जारी हेै

अगर  सुविधा  हटादो  तो  ये  कब्रिस्तान  बन जाये
पल  भर  में ये जन्नत  भी जहन्नुम में समा जाये
हमें क्या  लाभ  है  इनसे ,जो अब तक पालते आये
पलते  हैं  मेरे  घर  में , और कव्वाली पाक की गाएं

कंही  जिन्ना ,कंही  जिया,  मुर्सरफ  अब  नवाजी है
ये  कैसा  बीज है  इनका,जो  दुनिया भर मे पाजी है
ना  खाना  है ,ना   दाना  है  बस,  विस्फोट  खाते हैं
इनके  सब   संपोले   भी  गजल   खूनी  ही  गाते हैं

अमरीका  से कुछ  समझो  जो  ओसामा मिटा डाला
हिम्मत  हो  तो   ऐसी  हो  जो  पाकिस्तान खंगाला
मेरेे  घर  के  संपोलों  को  पनाह   क्यों  पाक देता है
दाउद  की   दहशत   को, क्यों  हिन्दुस्तान  सहता हेै

फौेजों को खुला छोडो, जो  चुन - चुन  कर  इन्हे मारे
इन  अलगाव  और  आतंक   की   नश्लों   को  संहारे
सियासत मौन  हो जाये, मेरी  फौजों  में दम खम है
मेरी  इस  आग  में  पानी  पडा, मुझको  यही गम है।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
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                       कश्मीर की तस्वीर        
तुम्हें  लडना  नही  आता  तो क्यों बैठे सियासत में
तुम्हें अडना नही आता तो क्यों फंसते हो आफत में
तुम्हारी   लालसाओं   से,  वतन   में   जंग  होती हेेै
सियासत  से  शक्ल  भारत की क्यों बदरंग होती हेै

क्या  जरूरत  थी कश्मीरी सियासत को सँवरने की
क्या जरूरत थी  मुफ्ती  से  सियासी बात करने की
क्या  जरूसत  थी  चौपड  के पासों  को  पलटने की
क्या जरूरत थी पागल से गले मिलकर लिपटने की

सियासत  में   जिसे  देखा  वही  मादा  निकलता है
जिन्हे  हम  भीख  देते  हैें , वही   दादा  निकलता हेै
सभी  की  देन  दारी  का  तकादा   ही   निकलता है
नेता  से  तो   भारत   का   लवादा  ही  निकलता है

ये  मुर्दे  भी  अलग  होने  की  हरदम  बात  करते हैं
अब   कब्रिस्तान   के   मुर्दे   गढे   आघात  करते हैं
ये  गलती   से   उगी  फसलें   कितनी  और  काटेंगे
भारत  को  ये  लावारिस अब  कितना  और  चाटेंगे

इनका  एक  ही  हल  है ,बस खदेडो  पाक में इनको
जो  ज्यादा  करे  हल्ला  तो  रक्खो  ताक में इनको
ये  वो  सांप  हैे  जो   दूध   पीकर   जहर  उगलते हेैं
ये  भी  हम  नही  कहते, पूरी  दुनिया  को  खलते हैं

अभी  तो  दो  चार पागल  हैं  इनका  हल  जरूरी है
इन्हे  जड  से  मिटाने  की  भी  ये हलचल जरूरी हैे
हिम्मत  से  करो  निर्णय  इन्हे  जड  से  हटाने का
बरसती  आग  कहती  है, ये   मौका  हेै  जलाने का।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     9897399815
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Friday, April 17, 2015

                      अलगाव का घाव
मेरे  ही  घर   में   कब्जा   है , ये   कैसे   बर्दाश्त करूं
ये  सभी   सियासी  एक  हो  गये  कैसे  पर्दाफास करूं
पोल  खोलकर  अपनो  की   मैं  कैसे  ये  उपहास करूं
मैं स्वाभिमान  हूँ  भारत  का,  फिर कैसे अरदास करूं
खाना   सारा   मेरे  घर  का, मैं  क्या  बैठा   घास चरूं
मेरे  ही  घर  में   कब्जा    है , ये   कैसे   बर्दाश्त करूं

क्यों काशमीर में पाकिस्तानी,डण्डा, झण्डा झूम रहा है
क्यों मेरे देश का नेता दुश्मन के  घर-घर में घूम रहा है
क्यों घर की  पोलें खोल  रहा  है ,परदेशों  के चौराहों में
क्या भाग्य सुरक्षित है भारत  का  अंग्रेजो की  बाहों में
क्यों भविष्य देखकर भारत का,लावारिस बे-मौत मरूं
मेरे   ही   घर   में  कब्जा   है ,ये    कैसे  बर्दाश्त करूं

चूहे बिल को  खोद  रहे   हैं, हम काबिल सब देख रहे हैं
शब्दो  के  सौदागर सारे  ,अपशब्द   वाण से फेंक रहे हैं
समाचार  में आग लगी  हेै ,हम   सब   बैठे  सेंक रहे हैं
अब मुर्दे घर को लूट रहे हैं , हम  सब  माथा  टेक रहे हैं
तुम डरकर  चुपचाप खडे  हो ,क्या मैं भी  चुपचाप डरूं
मेरे  ही    घर   में   कब्जा  है,  ये   कैसे   बर्दाश्त करूं

मुफ्तखोर  मस्ती में  मुफ्ती, आतंको  को  पाल रहा हेै
राजनाथ  की गुर्राहट  को  हंस   हंस कर ही टाल रहा है
चैनल  में  पैनल के  तोते, पिंजरो   से  ही  चिल्लाते हेैं
काश्मीर के इस  मशान में राम-नाम सत् क्यों गाते हैं
क्या धरती के स्वर्ग में जाकर मैं भी अपना ध्यान धरूं
मेरे  ही  घर   में   कब्जा   है ,ये   कैसे   बर्दाश्त  करूं

बहुत हो गया ,अब  तो निर्णय लेने की कुछ बात करो
करो  हवाले सभी फौज  के,  ऐसी   ही  कुछ  घात करो
नासूर  पनपने  से पहले  इन   फोडों, का  उपचार करो
अलगाव - वाद की  बात करे जो,उन पर ऐसा वार करो
आर्यखण्ड  के  भारत  में,कुछ मैं भी अपनी आग भरूं
मेरे   ही   घर   में   कब्जा  है,  ये   कैसे  बर्दाश्त करूं।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                          9897399815 
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Thursday, April 16, 2015

                    जम्बू में तम्बू
भिखारी पाक  के साये  में कितना और खेलोगे
हे कब्रिस्तान के मुर्दों, तुम कितना और फैलोगे
पाकिस्तान में  जाओ,जिन्हे तुम बाप कहते हो
ये कश्मीर  मेरा  है ,मेरे  घर  में  क्यों रहते हो

लानत है मेरे घर का ये  खाकर ही  तो पलते हैं
मेरे  घर  के  दिये से आसियाने रोज  जलते हैं
ये दहशत दिखाकर के  क्या  परिणाम चाहते हैं
यहाॅं आतंक मजहब  की  सुरक्षा से  ही आते हैं

हर मुजरिम की करते हैं हम दामाद सी खातिर
तभी  तो राजनीति  मे!  दरिेन्दे  हैं यहाॅं शातिर
जेलों  म पनाह  मिलती है हर आतंकवादी  को
मुजरिम के  लिबासो मे तडफती,देख खादी को

यहाॅं फाॅंसी भी रूकती  है हूकूमत की अपीलो से
लफंगे  बच  निकलते है यंहाॅं मंहगे  वकीलों से
कुचलते  है   सभी  आर्दश हमारे  कारनामो  से
यहाॅं  आतंक   झडते   है ,नेता  के  पजामो  से

यहाॅं  हर  तर्क  में कूतर्क, ये  चैनल  दिखाता हैैै
बे-सिर  पैर की  बाते, यहाॅं  हर  शख्स  गाता है
इन्हें सुविधा दिलाने की शियासत बात करती है
ये  कैसी  राजनीति  है  जो  सबको  अखरती है

सुनो दिल्ली, सुनो मुम्बई हम से रोज कहता है
यहाॅं तो न्याय के मन्दिर में भी आतंक रहता है
यहाॅं हर शख्स विस्फोटों के साये  में ही जीता है
आलम है सभी घर का निकलना भी फजीता हेै

मुटठी  भर  मुगल आये ये  इतिहास  गाता  है
यहाॅं  सस्कार अंगेजी, सभी कौमो को  भाता है
यहाॅं  दुश्मन   नहीं   कोई ,अपने  ही  बनाते हैं
मेरे घर में  ही रहकर के  यवन के गीत गाते हैं

हम  तो  हर पडोसी  की  नवाजी रोज  करते हैं
सियासत में पले पागल मेरे घर मे ही मरते हैं
पाकिस्तान से कह दो, हिजबुल कितने पालोगे
कबतक मौत के मुॅह सेे वतन अपना सॅभालोगे

यहाॅं  आदर्श    गाॅंधी   के   गाॅंधीवाद   गाता  है
बापू   की   हकीकत  को  मेरा  नेता  बताता है
यहाॅं   उपवास  होता  है तो  भ्रष्टाचार  चलते हैं,
खादी के  लिबाशों  में  ही नक्सलवाद  पलते हैं

अमरीका की कठपुतली बन के कब तक नाचोगे
महाभारत की औलादो गाॅधी को कितना बाॅचोगे
अहिंसा छोड़ कर,ताण्डव करो कैलाश बन जाओ
गाॅंधी  का   करो आदर, पर  सूभाष   को  गाओ

राखों   में   दबे  अंगार  को  फिर  से  सुलगाओ
पढो  चाणक्य नीति की व्यवस्था को पुनः लाओ
बने फिर से वही  भारत, मिटादो हर निशानी को
अब ऐसी ‘आग’ बरसादो,तरस जायें ये पानी को।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       9897399815
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Wednesday, April 15, 2015

                          हकीकत
सियासत  ने   हमारी   कौम   को  मुर्दा  बना   डाला
सिर खोकर  जवानो  का किया क्यों अपना मूॅंह काला
ये   मुर्दे  हैं मेरे  घर   के  जिन्हे   हमने  सदा   पाला
मेरे  घर  को  मेरे   घर  के  दरिन्दो  ने, ही   खंगाला

यहाॅं  तो ,मौेत  के   मंजर   को   मुर्दे   रोज   ढोते  हैं
सियासत  के  शवों  से  क्यो  सदा   इतिहास खोते हैं
हमें  गीता   बताती    है , कि    कैसे  पेश  आना  है
अब  तो   लाश   को   ढोना   तिरंगे   का  फसाना  है

क्यों पाकिस्तान  का खण्डहर  मेरी  बुनियाद ढोती है
इन  कब्रिस्तान  के   मुर्दो से  ,क्यों   जेहाद   होती हेै
कंही  तो   हल  छिपा  होगा  इन्हे जड़ से  हटाने  का
अजब   कैसा   तरीका   है  सियासत  को  बचाने का

यंहा  तो  एक   ही  रोना  है  बस, बातें  ही  चलती हेै
हूकूमत  जब  बदलती  है,तो  ये हरकत  मचलती है
हम  भी  गीत  लिखते हैं ,मिटा  दो उनकी हस्ती को
कलम   कर  दो  हूकूमत से  इस  फिरकापरस्ती को

इन्हे सुविधा   दिलाने  की  शियासत  बात  करती है
अब  ये  कैसी  राजनीति  है ,जो  सबको  अखरती है
कुचलते    है    सभी    आर्दश   हमारे  कारनामो से
यहाॅं    आतक    झडते  है ,  नेता    के  पजामो  से

नंगो  और   मतंगो   के  ये  पंगे  हम   ही  सहते  हैं
ये  घुस-पैठ  करके   भी   मेरे   घर  में  ही  रहते  हैं
गरीबी  और   मंहगायी ,  का  ये  भी  एक  कारण है
पाकिस्तान   का   आतंक  , दुनिया   में उदाहरण  है

ये पाकिस्तान का दरिया  मेरे घर  में  क्यों  बहता है
फितरत  है  मेरे  घर  की,जो  हरकत  रोज  सहता है
अगर  हम  भी  करे पंगा, तू  नक्शे  में  ना  रह पाये
सरहद  पर  अगर  मूतें   तो   पाकिस्तान  बह  जाये

सपोलों   के   कपोलों    मे     कितना   दूध   डालोगे
इन  आतंक   की   नश्लों  को    कितना  और  पालोगे
उठाओ   अस्त्र  अपने  अब  जहाॅ   आतंक  दिखता है
नेता को  कुचल  डालो जो  इनका   भाग्य  लिखता है

हूकूमत   का   भरोशा   छोड़   कर    तैयार   होना  है
तिरंंगे  को, सियासत  की  फिजां  से  अब ना ढोना है
उठाओ  अस्त्र   अपने  अब ,बस,  घुसते  चले  जाओ
वतन  का  एक ही फतवा हेै,बस,तुम  आग बनजाओ

मुटठी  भर  दरिन्दो   का   क्यो   इतिहास   गाते  हो
महाभारत   को   पढकर  भी   इतना   खोंप  खाते हो
यहाॅ   संहार   करने    को   खुद    अवतार   आता  है
ये   हिंसा   भी   अहिंसा  है  ये    मुरलीधर  बताता है।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
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Tuesday, April 14, 2015


                  एक आैर क्रान्ती
अब संविधान  के  इन पन्नो  से भारत माँ शर्माती है
राजनीति  की  औलादें  भी  कसम  उसी  की खाती है
क्यों  कानूनो के  इन  पंजो में  राष्ट्र  फंसा  कहराता है
सम्प्रभुता  में हिन्दू, मुस्लिम,सिक्ख, इसाई भाता है
कौम,कबीले,मजहब,जातियाँ उभर-उभर कर आती है
अब  संविधान  के  इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है

सापेक्ष  धर्म  को, निर्पेक्ष  बनाकर सभी  दुहाई  देते है
सब  मूरख  नेता  सूखी  सरिताओं  में नौका  खेते है
मूल - भूत  अधिकार  मूल  में दबा हुआ मर जाता है
शोक  मनाता  संविधान   मुर्दो   का   गौरव  गाता है
समृद्व  राष्ट्र  को  चोर  चकारों  की   पीढी  ही  खाती है
अब  संविधान  के  इन पन्नो से भारत मा शर्माती है

खूनी, कतली, व्यभिचारी,  सम्मान  राष्ट्र  में  पाते हैं
राष्ट्र - भक्त   क्यों  लाचारी  में मौन  हुये  मर जाते हैं
संविधान  से भारत - भाग्य विधाता छँट कर आते हैं
इस  प्रजातन्त्र  में   राष्ट्र-गीत  बीहड  के डाकू गाते हैं
ये  छोटी - छोटी  राजनीति  के   डबरे  सब  बर्षाती है
अब  संविधान  के  इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है

संविधान  के  इसी ग्रन्थ  ने  देश के  टुकडे काट दिये
झोपड पट्टी, भाषा, बोली, खोली  में   सब बाँट दिये
पूरब,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण गली मुहल्ला  बन जाता है
ये राम,कृष्ण का आर्यखण्ड, भीख माँग कर खाता है
मन्दिर, मस्जिद  के  झगडे  हैं,ना दीपक,ना बाती है
अब  संविधान  के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है

जिसके मूँह में जो आता है अपशब्दो को बोल रहा है
गुरूकुल और मदरसा शिक्षा की औकातें खोल रहा है
भद्दे - भद्दे शब्द निरंकुश जनमत जनता को भाते हैं
जैसी  जनता  वैसे   नेता  बोटों  से चुनकर  आते हैं
सभ्य  राष्ट्र  में आज  सियासत संविधान संघाती है
अब संविधान के  इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है

जिस भारत  में  युवा देश के दर-दर  ठोकर खाते हों
भुखमरी, गरीबी, मंहगाई की घर-घर  में सौगातें हों
देश  की  पूंजी, काला-धन परदेश बैंक  में संचित हो
कराधान  की जनता ही जिस धन से  पूरी वंचित हो
मूल-भूत  अधिकार  सियासत संविधान से गाती है
अब संविधान  के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है

समय आ गया संविधान के जर्जर पृष्ठ  बदलने होंगे
संविधान  की  कसमे  खाने  वाले धृष्ट  बदलने होगे
ऐसा संविधान  बनवाओ  जो  भारत का मस्तक हो
व्यभिचार ना बलात्कार की गुंजाइस  की दस्तक हो
कवि आग भारत की ममता हर मजहब को भाती है
अब संविधान  के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     9897399815
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Monday, April 13, 2015

  संविधान बाबा का ढाबा
बाबा  साहेब  संविधान  में  भारत  वाली   बात  नही है
धर्म,मजहब  के भी तो कोई खास यंहा जज्बात नही है
निर्पेक्ष  कर्म  है, धर्म नही है, ये  विवाद  ही पनपाता हेै
अपना इससे क्या लेना है,अगलबगल का बहीखाता है
अखण्डराष्ट्र के भारत मे क्या कौम कबीले जात नही हेै
बाबा  साहेब  संविधान  में  भारत  वाली  बात  नही है

हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाइ,सब इसमें से  फूट रहे हैे
अगडे,पिछडे,उँचनीच सब वतन की मिटटी कूट रहे हेै
जातिवाद से छलकी,कलकल खरपतवारें पनप रही है
नंगी कौमे इस  कीचड में, लावारिस  सी कलप रही है
सम्पभुता के संविधान में जो मालिक , अनाथ वही हेै
बाबा  साहेब संविधान  में  भारत  वाली  बात  नही है

इस प्रजातन्त्र के उपन्यास का पैर नही है हाथ नही है
सारे भारत  के मालिक है, फिर भी तो औकात नही है
ये ग्रन्थ तो गिने,चुने  कुछ  वैभव-शाली  को भाता हेै
एक  अरब  इस  भीड  का , बाप  नही, भारत माता है
राजनीति,उद्योगपति और  बाबा भी जन-जात नही है
बाबा  साहेब  संविधान में  भारत  वाली  बात  नही है

ये व्यभिचारी चोर उचक्के,संविधान के गुण ग्राहक हैं
रहते  हम  भी  हैं,लेकिन,जीवन के क्षण,सब नाहक है
अपराधों  के  उत्पादो  को   राजनीति  ही  पनपाती हेै
सबसे  उँची  चोर, लफंगाे, की  पीढी चुन कर आती हेै
संविधान  के  हर  पन्ने  में  लावारिस हैं ,नाथ नही हैं
बाबा  साहेब संविधान  मे  भारत  वाली  बात  नही है

चार दिनो के शरणागत भी अभ्यागत बन ही जाते हैं
मेरे घर का संचित भोजन लावारिस जनमत खाते हैं
घुंस-पैठिये, अगल - बगल  के  पूरा   संरक्षण पाते हैं
ये  लावारिस वोटर हम  से  ज्यादा   नेता को भाते हैं
अब तो  ये  खिचडी  भारत है,दाल ही है, भात नही है
बाबा  साहेब  संविधान में  भारत  वाली  बात नही है

सात  दशक  की  आजादी में,रहने को घरबार नही है
गली,मुहल्ले,शहर,गांव में मानव हैं पर प्यार नही है
राम,कृष्ण की इस धरती में धर्मकर्म सम्भाव नही है
डेढ अरब की इस गिनती में भेद बहुत हैं भाव नही है
इन झगडों में अल्लाह,ईश्वर का भी कोइ हाथ नही है
बाबा  साहेब संविधान  में  भारत  वाली बात नही है

पूरी  दुनिया  को  नेता जी, फिर से घर में बसा रहे हैं
लड मर कर अंग्रेज से छूटे,फिर से हमको फंसा रहे हैं
जर्मन,चीन,जापान,अमेरिका,अपने में घर बुलारहे हैं
राष्ट्र -भक्त अब देश  गुलामी  का  गुब्बारा,फूला रहे हैं
कवि आग के शब्दो मेंं  भी  माँ तो है,पर तात नही है
बाबा  साहेब  संविधान  में  भारत  वाली बात नही है।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                   9897399815
           rajendrakikalam.blogspot.com

               संविधान बाबा का ढाबा
बाबा  साहेब  संविधान  में  भारत  वाली   बात  नही है
धर्म,मजहब  के भी तो कोई खास यंहा  जज्बात नही है
निर्पेक्ष  कर्म  है, धर्म नही है, ये  विवाद  ही पनपाता हेै
अपना इससे क्या लेना  है, अगल - बगल  का खाता है
अखण्डराष्ट्र के भारत मे क्या कौम कबीले  जात नही हेै
बाबा  साहेब  संविधान  में  भारत  वाली  बात  नही है

हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाइ,सब इसमें से  फूट रहे हैे
अगडे,पिछडे,उँचनीच सब वतन की  मिटटी कूट रहे हेै
जातिवाद से छलकी,कलकल खरपतवारें  पनप रही है
नंगी कौमे इस  कीचड में, लावारिस  सी कलप रही है
सम्पभुता के संविधान में जो मालिक , अनाथ वही हेै
बाबा  साहेब संविधान  में  भारत  वाली  बात  नही है

इस प्रजातन्त्र के उपन्यास का पैर नही है हाथ नही है
सारे भारत  के मालिक है, फिर भी तो औकात नही है
ये ग्रन्थ तो गिने,चुने  कुछ  वैभव-शाली  को भाता हेै
एक  अरब  इस  भीड  का , बाप नही, भारत माता है
राजनीति,उद्योगपति और  बाबा भी  जन-जात नही है
बाबा  साहेब  संविधान में  भारत वाली  बात  नही है

ये व्यभिचारी चोर उचक्के,संविधान के गुण ग्राहक हैं
रहते  हम भी हैं,लेकिन,जीवन के क्षण,सब नाहक है
अपराधों  के  उत्पादो  को  राजनीति  ही  पनपाती हेै
सबसे  उँची  चोर,लफंगाे, की  पीढी चुन कर आती हेै
संविधान  के  हर पन्ने  में लावारिस हैं ,नाथ नही हैं
बाबा  साहेब संविधान मे भारत  वाली  बात  नही है

चार दिनो के शरणागत भी अभ्यागत बन ही जाते हैं
मेरे घर का संचित भोजन लावारिस जनमत खाते हैं
घुंस-पैठिये, अगल - बगल  के  पूरा  संरक्षण पाते हैं
ये  लावारिस वोटर हम  से  ज्यादा  नेता को भाते हैं
अब तो  ये  खिचडी  भारत है,दाल ही है,भात नही है
बाबा  साहेब  संविधान में  भारत वाली  बात नही है

सात  दशक  की  आजादी में,रहने को घरबार नही है
गली,मुहल्ले,शहर,गांव में मानव हैं पर प्यार नही है
राम,कृष्ण की इस धरती में धर्मकर्म सम्भाव नही है
डेढ अरब की इस गिनती में भेद बहुत हैं भाव नही है
इन झगडों में अल्लाह,ईश्वर का भी  कोइ हाथ नही है
बाबा  साहेब संविधान  में  भारत  वाली बात नही है

पूरी  दुनिया  को  नेता जी, फिर से घर में बसा रहे हैं
लड मर कर अंग्रेज से छूटे,फिर से हमको फंसा रहे हैं
जर्मन,चीन,जापान,अमेरिका,अपने में घर बुलारहे हैं
राष्ट्र -भक्त अब देश  गुलामी  का  गुब्बारा,फूला रहे हैं
कवि आग के शब्दो मेंं  भी  माँ तो है,पर तात नही है
बाबा  साहेब  संविधान  में  भारत  वाली बात नही है।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                   9897399815
           rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, April 10, 2015

       बीस वर्ष पूर्व लिखी गयी इस रचना को पढ कर शायद आपकी आँखों में आँशू आ जायें।      

                    गाॅधी,नेहरू,सूभाष
रात को गाॅधी , नेहरू, सूभाष  सपने  में आये
ये  भी  चमत्कार  था   तीनो  एक  साथ पाये
तीनो  का  प्रकाशित  दिव्य   चेहरा  अनूप था
क्रान्ति,भ्रान्ति,और शान्ति  का  कैसा रूप था

मैने पहले अहिंसा के पूजारी बापू के पैर पकडे़
अर्धनग्न  गाॅधी   ने  देखा  ,तो   थोडा  अकडे़
बोले  बेटा  तू  क्यों  अपनी   जवानी  खोता हेै
मेरे चरणो पर तो केवल गाॅधी वादी ही होता है

नेता बनना है तो साथ में खडा  होना  काफी है
भ्रष्टाचार   की   तो    हिन्दुस्तान   में माफी है
2अक्टूॅबर को राजघाट में  मेरा  चरखा चलाना
हर  चौराहों  पर  मेरे   दो - चार  भजन  गाना

देश  विदेश  के  मीडिया   से  तू  घिर  जायेगा
तेरे जेैसा घनचक्कर  मेरे चरखे से तर जायेगा
मेरे  चेले  तो  आज  भी हिन्दुस्तान में भारी हैं
खादी   के   नीचे   एेतिहासिक   खेल   जारी है

मेरा  स्टाईल  था   मैं जीवन   भर  नंगा  घूमा
युवक , युवतियों   को   जॅहा   भी   देखा  चूमा
मैं तो विश्व  को अपना  ही  आश्रम  मानता था
जीवन रोमांटिक होना  चाहिये  यही जानता था

बापू के  बाद  मैने  चाचा  के  चरणो को दबाया
नेहरू  उछल  पडे,  ये  जिन्ना  कहाॅ  से  आया
मैं बोला चाचा भारत पाक का  बॅटवारा हो गया
नाम   गाॅधी   का  और  देश  तुम्हारा  हो गया

मेरी बात  सुनकर  चाचा नेहरू  थोडा सा अकडे़
एक बार पुनःझुककर परंपिता बापू के पैर पकडे़
बोले  बापू  मेरा  नाम तुम्हारा काम चल रहा हेै
हमारे  नाम  से  ही  तो हिन्दुस्तान पल  रहा हेै

नेहरू  की  बात  सुन कर सूभाष बाबू चिढ़ गये
लाल,पीली  आॅंख   किये   दोनो   से  भिड़ गये
तुम्हारी महत्वाकाँछा से देश खण्डों में खो गया
नेहरू भारत का,जिन्ना पाकिस्तान का हो गया

मैं  तो  पूरे  विश्व  को  हिन्दुस्तान बना  रहा था
सब मान गये बस तुमको  रास नही आ रहा था
तुम्हारी अहिंसा से तो ये देश कभी का मर गया
राजनीति में  चापलूसी का  जहर  पूरा भर गया

मेरी  मानते तो हम1947 से पहले आजाद होते
ये पाकिस्तान  और  बंगला  देश हम क्यों खोते
आपने तो आर्यखण्ड की मल्कियत ही लुटवा दी
दुनियां में हिन्दुस्तान की हैसियत  ही  पिटवादी

घर लुटवाकर आज आजादी  का   गाना गाते हो
बर्बाद मैं मेरे साथी हुये  दुनियां को तुम भाते हो
मेरे  साथी  इस  आजादी के लिये फाॅंसी चढ़ गये
तुम्हारे  चेले,चिमटे  सियासत के पीछे  पड़ गये

नोटों में  तुम्हारा फोटो होना  भी तो  एक चाल है
देख  लो   भारत  माॅं  के लाल  का  क्या  हाल है
अमर  कैसे   हों  आपने   हर  तरीका   अपनाया
लेकिन  देश  को  तुम  नही क्रान्तिकारी ही भाया

हमारी लडाई तो  वतन की आजादी की लडाई थी
देश बंटवारे  की  बात बीच में  कहाॅ  से आयी थी
तुम्हारे  चेलो  में  तो  केवल सत्ता का ही सुख था
क्रान्ति  कारियो को  हमेशा इसी बात का दुख था

आप ही ने तो  हिन्दू, मुस्लिम  का नारा दिया था
मैंने तो  उस वक्त  भी  खून का  ही  घूँट पिया था
तुम्हारे  इस  नारे  से  वतन के तीन टुकडे़ हो गये
तुम्हारे सारे चेले सत्ता  की  अय्यासी  मे  खो गये

छोटे-छोटे   खण्डो   में  हिन्दुस्तान   खो  जायेगा
कौन सा  कबीला  औेर  कौम   राष्ट्र -गीत गायेगा
लेकिन तुम्हारी क्षणिक आकाँछाये  पूरी हो रही हैं
मैं भविष्य  देखता हॅॅू , भारत की जनता रो रही है

तुम्हारे लोगो ने हमेशा  मौके  का  फायदा उठाया
अंग्रेजों को गाॅंधी, नेहरू  औेर  जिन्ना  क्यों भाया
अंग्रेज  तो  मेरी  दहसत  से पहले ही डर गया था
आजादी  के  बीस   साल  पहले  ही  मर गया था

आजादी   का   मोहरा   किसी   को तो बनाना था
अखण्ड  भारत  को  हिन्दुस्तान  तो  दिखाना था
ये  कैसा  सोैदा  था अंग्रजो  के चक्कर में आ गये
लडाई   का   फायदा   पाक  और बंगला उठा गये

आजादी   का  दिन   तो 3  जून  1958 लिखा था
10माह पहले आजाद होना मुझे  षडयंत्र दिखा था
अफरा-तफरी की आजादी मुझे  हमेशा खलती थी
मैं मजबूर था क्यों कि हूकूमत आपकी चलती थी

आपको  समझाओ  तो आप अनसन पर बैठते थे
तुम्हारे  चेले  तो  बश , तुम्हारी  आड़ में  ऐंठते थे
वो कभी नही चाहते थे कि  तुम्हारा  मेरा संवाद हो
नेहरू का वंश  ही  बस , इस  देश   में  अपवाद हो

मेरी  मौत  के  तो  हमेशा  फरमान   जारी होते थे
आप   दोनो  हमेशा  चैन   की   नींद  ही   सोते थे
मेरी लाश के सौदे पर ही  तो  देश  आजाद  होता है
देश गुमराह हो  गया,  जो   तुम   जैसों को ढोता है

आप तो  हमेशा अपने  चेलों  की ही बात मानते थे
हम विरोधी  थे जो, आपकी  असिलियत जानते थे
तुम्हारे  चेले  तो  हमें  आतंकवादी  तक  कहते थे
राष्ट्र -भक्ति  के  कारण   हम  भी  चुपचाप सहते थे

क्रान्ती की  बुनियाद पर  ही  तो  आजादी टिकी थी
आप लोगो को  हमेशा  हमारी   मौत  ही दिखी थी
मुझे मारने के तो हमेशा  गोपनीय  षडयत्र होते थे
आप  तो  हमेशा  ही  मेरे   रास्ते में  काॅटे  बोते थे

देश टूटा, तुम  इन  खण्डो  को  आजादी मानते हो
भीख  में मिले   इन   टुकडों  से  सीना  तानते हो
मेरी आजादहिन्दफौजआज भी  शेरो  की जमात है
महाभारत  को पढो ,अंहिसा   की  क्या  औकात है

अंग्रेजो  की  क्या  औकात   थी   हमसे  लडने की
आपकी  आदत  थी  हर  जगह  बीच  में अडने की
तुम लोगो के कारण ही तो मैआज  वतन से दूर हूॅं
ये हिन्दुस्तान तो मेरा भी घर है लेकिन मजबूर हूँ

बापू,क्रान्तिकारी समझौता नही  करते टूट जाते हैं
मरने  के  बाद भी  उनके  स्वाभिमान छूट जाते हैं
वतन  हमेशा  क्रान्ति-कारियों  को   याद  करता है
समझौते  में जीने  वाला ,वतन  में  रोज मरता हैे

आजादी  का  दीवाना  कभी  मुआवजे  पर जीता है
राष्ट्र - भक्त   क्या   कभी   राष्ट्र   का  खून  पीता हेै
स्वाभिमानी कभी  भी  मौके  फायदा  नही उठाता
क्रान्तीकारी  शेर  होता  है  कभी   घास नही खाता

मेरे  साथी  तो  आज  भी  जिन्दे हेैं पर  मजबूर हैं
लाचारी  से  कभी  डरते  नही  हैं   आज  भी शूर हैें
राष्ट्र का खून हमेशा वतन को  उॅचायी  पर धरता हेेै
क्या  सूभाष,चद्रशेखर,भगत  सिंह  कभी मरता है

सूभाष की क्रान्ति  को  देख मेरे  नेत्र गीले हो गये
पास  बेठे  गाॅधी  और  नेहरू शर्म  से पीले हो गये
स्वार्थ मे बडा आदमी हमेशा बडी  गलती करता है
एेसी  राजनीति  से  तो  हमेशा  राष्ट्र  ही  मरता है।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                      9897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com

Wednesday, April 8, 2015

                     एक कवि की सलाह
एक  जमीं   है  जंहा  एक  है  दोनों   का  आकाश एक है
टूटे दिल के  दो  टुकडों  में,आव  भाव  और आस एक है
जतन एक  है कथन  एक  है,राजनीति का पतन एक है
धर्म मजहब  की  दोनों कौमें,भटक  गयीं हैंवतन एक है

कोइ  आकर   मुझे  बतादो  इस  धरती  में  कहाॅं हद है
छाती से छाती मिलती हैं  दीन  इमान  का कैसा कद है
दरियादिली, समन्दर का, समरथ  पथ पर कैसा मद है
आन,बान और शान एक हैे, फिर  परमादी  कैसा पद है

सत्ता और सिायासत की समसीर ने हमको  काट दिया
राजनीति की जिल्लत किल्लत ने ही हमको बाॅंट दिया
अमन - चैन के  चुल्हों  से,  चिनगारी  को  भडकाया है
सत्ता  और  सियासत  ने  शदियों  से हमको   खाया है

गीता और  कुरान  की  भांषा,मानवता को जोड  रही है
ना समझी की अभिव्यक्ति है हिन्दू,मुश्लिम मोड रही है
असमंजस में फंसी कौम है धर्म मजहब को छोडरही है
द्वन्द - गन्द  आतंकी  भाषा, दोनो  के  घर तोड़ रही है

क्यों रोज  मर  रही  दोनो  कौमे  आतंकी  विस्फोटों से
अब प्रजातन्त्र  भी खेल रहा  है देख  सियासी  बोटों से
मिल जाती है पनाह यहाॅं पर  हिजबुल को ओसामा को
दोनों   कौमें   खप्पर  लेकर   देख   रही  ओबामा  को

पाल  रहे  थे  ओसामा,  इस्लाम मुकम्मल  करने को
छिपे पडे़ हेैं आतंकी  क्यों  लावारिस ही जैसे  मरने को
क्या  दिखलाना  चाहते  हो  तुम झूठे अमली जामो से
क्यों र्निदोषों   को   मार  रहे  हो अल्ला  के  पैगामों से

तरस  रहीं  हैं,दोनों कौमें टूटा दिल  फिर से मिल जाये
फटे लिबासों  की  जन्नत कोई फरिस्ता तो सिल जाये
मजहब की झूठी बुनियादें,मिले प्रेम तो खुद हिल जाये
नवअंकुर  सी दोनों  कौमों के हृदय के ,गुल खिल जांये

किस  मुंह  से  काशमीर  को अपना हिस्सा मान रहे हो
असल तुम्हे  भी  मालूम  है, फिर भी सीना तान रहे हो
तेरे  कुत्ते   पागल  होकर  सरहद  पर  क्यो  भौंक रहे हैं
आंगन  मेरा,  दाल  सियासी   पाकिस्तानी  छोंक रहे हैं

अब अमरीका के  अस्त्र  तूझे, निर्वस्त्र  बना  कर छोडेंगे
रोटी  को मोहताज  करेंगे, बस  त्रस्त बना  कर  छोडेंगे
तेरे भाग्य  में  मौत लिखी  है, सारी दुनिया जान गयी
आतंकवाद  के  उद्योगों  का  तस्कर  तुझको मान गयी

छोड के सीमा के सब पंगे, आत्म सर्मपण खुद  कर दो
हम से जो कुछ भी पाया है,भारत माँ  पर अर्पण कर दो
नही  तो  भैया  जड मूल  से  मिटने को तैयार रहो तुम
हमने तो  ये ठान लिया है,चाहे कितना  प्यार कहो तुम

अलगाव  वाद  की बातें करने वाला  ना  अरमान रहेगा
अगर  पास  में  रहना  है तो तू भी   हिन्दुस्तान कहेगा
लाहौर, करांची,रावलपिण्डी,ये  भारत  का  ही हिस्सा है
भीख माँग  कर  खाने  वाले  बता, तेरा  क्या किस्सा है

सरिता ,सागर ,जंगल ,मंगल, डंडा , झंडा  एक बनाओ
आशा,भांषा, भाव,  भंगिमा, एक  राष्ट्र  का गाना  गाओ
कौम एक हो,व्योम एक  हो  जहर  जहन का दूर हटाओ
जम्बूद्वीप पुनःविकसित  हो  भारत  माता के बन जाओ!!
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       9897399815
         rajendrakikalam.blogspot.com

Tuesday, April 7, 2015

                    किसान का सम्मान
मर  गया  किसान  मौसम    के  बिगडती  बाहों में
वर्षात  भी  तो  मौत  को  ही  है  छिडकती गाँवो में
ओले  नही ,गोले   नमक  के  पड  रहे  हैं  घावों में
बस मर  रहा  है अन्नदाता  इस राजनीति  राहों में

अब धन - दाता  तर  रहे  है, अन्नदाता  मर  रहे है
भगवान  भी तो  खेत  से  अब राजनीति कर रहे है
विक्षिप्त   होकर   बादलो  से  वज्र  गिरते  जा रहे है
इस आपदा  से  देश  के   नेता  निखरते  जा रहे है

फाईलों  की  जाँच  में  सर्वे  सिमट  कर  बोलता है
बोट की किमत कफन से,शव लिपट कर तोलता है
पटवारियों   के   हाथ  से  मुर्दो  के  सर्वे  हो  रहे हैं
शमशान से खलियान तक किसान  ही तो रो रहे हैं

मुआवजों की कीमतों से अब कफन सिलते नहीं है
मुआवजे  भी  मौत  से पहले  कभी मिलते नही है
कर्ज  के  इस  मर्ज  से किसान  दब की मर रहा हेेै
हर  सिपाही  सल्तनत   का  राजनीति  कर रहा है

अय्यासियों  में  कई  करोडाें  लुट  रहे बे - भाव से
बू  भी  नही  आती  है हमको  कृषकों  के  घाव से
इस  आपदा  में  दानियों  के   हाथ  बढने  चाहिये
अब हो  दया इस  दीन पर, धनवान अडने चाहिये

खोल  दो  अपनी  तिजोरी, इन  किसानो  के लिये
छोड  दो  ये  सब  छिछोरी, इन   दीवानो  के लिये
अब इस  धरा  के  पूत  पर  सामर्थता दिखलाइये
सान्त्वना के  इन  क्षणो में, गम्भीरता  को लाइये

जाँच  की  इस  आँच से तो मौत भी रूकती नही है
ये  आपदा  भी  तर्क के इस अर्क से झुकती नही हेै
तीव्रता  से  इस  क्षति  का   उपचार  होना  चाहिये
बस, आग  के  इस  यज्ञ  से,निर्दोष बचना चाहिये।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                    मो09897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com


                        श्रद्वांजलि
मुर्झा गया मेरा सुमन इन मालियों के हाथ से
बे-मौत  ही  मरता रहा आर्दश  के जज्बात से
कालिमा  मेरे कफन से, पोंछ  कर  उजले हुये
हम  मरे थे,जिन चिरागों के  लिये  धुंधले हुये
क्या भरोसा हम करें,बलिदान  की औकात से
मुर्झा गया मेरा सुमन इन मालियों के हाथ से

राजसाही की सियासत  का  सबब सबने सुना
आतंक के अवरोध का हर वाकिया सबने गुना
मैं  अकेला  ही  लडा  था   मौत   के  तूफान से
श्री-देव  का ये प्रश्न  है , आजाद  हिन्दुस्तान से
राजशाही  आज  भी  जिन्दा है अपनी  जात से
मुर्झा गया मेरा सुमन इन मालियों  के हाथ से

राजशाही  सल्तनत का मै बिगुल बनकर चला
अंकुरण औलाद  में  अस्तित्व के जनकर चला
अस्मिता आजाद हो,अवसाद सा तन कर चला
भीड़ की इन छलनीयों में मैं सदा छनकर चला
बे-मौत  मैं  मारा गया, इन  भेदियों के घात से
मुर्झा  गया मेरा सुमन  इन मालियों के हाथ से

लावारिसी  में ,मैं मरा अपने  ही घर की जेल में
मेरी लाश को भी बन्द बोरी में भरा इस खेल में
कौन  थे  उस  खोंप  में, जो   साथ  मेरे  थे खडे़
क्यों बन गये स्वातन्त्रता संग्राम   सैनानी  धडे़
निर्भीक हो कर  मैं लडा था उस  गुलामी रात से
मुर्झा  गया मेरा  सुमन इन  मालियों के हाथ से

बन गया ये राज्य उत्तराखण्ड ,लेकर क्या करोगे
बे-वजह लेकर,सियासी लाश को कब तक मरोगे
राजशाही   ने   पहाडों    को   निचोडा   खा  गये
डाकू, लुटेरे ,सूरमा , क्यों  सल्तनत  में  आ गये
आज  तो पर्वत  भी  रोता  है  सदा  जल-पात से
मुर्झा  गया  मेरा  सुमन इन मालियो  के हाथ से

सल्तनत में वो रियासत आज भी जिन्दा खडी है
दिलजलों में आज  भी, उस  खून की निंदा बडी है
अपमान को भी  ये सियासत सींचती सम्मान से
फिर  से  हीरा  हो  प्रकट  इन  पर्वतों  की खान से
आग  भी  लगती  है  शिखरों  मे   भरी  बर्शात से
मुर्झा गया मेरा सुमन  इन  मालियों   के  हाथ से!!
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                    मो09897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com
                        श्रद्वांजलि
मुर्झा गया मेरा सुमन इन मालियों के हाथ से
बे-मौत  ही  मरता रहा आर्दश  के जज्बात से
कालिमा  मेरे कफन से, पोंछ  कर  उजले हुये
हम  मरे थे,जिन चिरागों के  लिये  धुंधले हुये
क्या भरोसा हम करें,बलिदान  की औकात से
मुर्झा गया मेरा सुमन इन मालियों के हाथ से

राजसाही की सियासत  का  सबब सबने सुना
आतंक के अवरोध का हर वाकिया सबने गुना
मैं  अकेला  ही  लडा  था   मौत   के  तूफान से
श्री-देव  का ये प्रश्न  है , आजाद  हिन्दुस्तान से
राजशाही  आज  भी  जिन्दा है अपनी  जात से
मुर्झा गया मेरा सुमन इन मालियों  के हाथ से

राजशाही  सल्तनत का मै बिगुल बनकर चला
अंकुरण औलाद  में  अस्तित्व के जनकर चला
अस्मिता आजाद हो,अवसाद सा तन कर चला
भीड़ की इन छलनीयों में मैं सदा छनकर चला
बे-मौत  मैं  मारा गया, इन  भेदियों के घात से
मुर्झा  गया मेरा सुमन  इन मालियों के हाथ से

लावारिसी  में ,मैं मरा अपने  ही घर की जेल में
मेरी लाश को भी बन्द बोरी में भरा इस खेल में
कौन  थे  उस  खोंप  में, जो   साथ  मेरे  थे खडे़
क्यों बन गये स्वातन्त्रता संग्राम   सैनानी  धडे़
निर्भीक हो कर  मैं लडा था उस  गुलामी रात से
मुर्झा  गया मेरा  सुमन इन  मालियों के हाथ से

बन गया ये राज्य उत्तराखण्ड ,लेकर क्या करोगे
बे-वजह लेकर,सियासी लाश को कब तक मरोगे
राजशाही   ने   पहाडों    को   निचोडा   खा  गये
डाकू, लुटेरे ,सूरमा , क्यों  सल्तनत  में  आ गये
आज  तो पर्वत  भी  रोता  है  सदा  जल-पात से
मुर्झा  गया  मेरा  सुमन इन मालियो  के हाथ से

सल्तनत में वो रियासत आज भी जिन्दा खडी है
दिलजलों में आज  भी, उस  खून की निंदा बडी है
अपमान को भी  ये सियासत सींचती सम्मान से
फिर  से  हीरा  हो  प्रकट  इन  पर्वतों  की खान से
आग  भी  लगती  है  शिखरों  मे   भरी  बर्शात से
मुर्झा गया मेरा सुमन  इन  मालियों   के  हाथ से!!
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                    मो09897399815
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Monday, April 6, 2015

                    भारत की आदर्शता
हवा  में  उडते  देख   तिरंगे  को  भी  नही  गॅंवारा था
शब्द  हवा   में  गूॅंज  रहा   है  पाकिस्तान  हमारा था
महाभारत  में  कान्धार, काबुल  तक   राष्ट्र  सहारा है
प्राचीन  में  चीन   शिवालय   वो   कैलाश    हमारा है
छोटे - मोटे  देशों  का  दुनियाँ  में  कोई  धाम नही था
भूमण्डल  में  अमरीका  जैसा  भी कोई नाम नही था
मानवता  की  हर  भूमि  पर  कब्जा  कभी हमारा था
शब्द  हवा  में  गूॅंज   रहा  है   पाकिस्तान  हमारा था

चन्द्रगुप्त, कौटिल्य  काल  से  पूरा  पश्चिम पलता था
चाणक्य  की  प्रतिभा के, भय से ये राष्ट्र संभलता था
हिन्दू, मुश्लिम, सिक्ख,इसाई एेसी कोई जात नही थी
मानवता में  भेद भाव की राजनीति जज्बात नही थी
व्यभिचार  के  घनानन्द  का  शूल  मूल  से काटा था
राष्ट्र -द्रोह  में  मृत्यु-दण्ड से जन जन में सन्नाटा था
सत्ता और  सियासत  में  भी सत्य सनातन नारा था
शब्द  हवा  में  गूॅंज  रहा   है  पाकिस्तान   हमारा था

जनकपुरी   की  माता  सीता  गान्धार  की  गान्धारी
अमरीका पाताल मकरध्वज  की  नगरी कैसी न्यारी
भानू  का  भक्षक  बजरंगी  पवन  पुत्र   कहलाता था
इतिहास गवाह है स्वर्ग मोक्ष का रधुवंश  से नाता था
दुर्वाशा  की   सृष्टि   संरचना  शौर्य ,शास्त्र  बतलाते हैं
भू-मण्डल  के  चक्रवती  को   वेद  पुराण  भी गाते हैं
सारी  दुनिया  इस  भारत का छोटा सा  गलियारा था
शब्द  हवा   मे  गूॅंज  रहा  है  पाकिस्तान  हमारा  था

चारों युग ,नक्षत्र, वेद ,ग्रह, ज्योतिष  शास्त्र  हमारा है
स्वर्ग,मोक्ष की कठिन  कल्पना ,आविष्कार  हमारा हेै
नटराज के डमरू  नाद  से  सिद्यान्त  कौमुदी आती है
अभिव्यक्ति उस पार्णिनि की  वेद  ऋचा  समझाती है
कालिदास  और  भतृहरि  की   अलंकार  की  भांषा है
सरल  शब्द  से  तुलसी ,मीरा  और   कबीर तरासा है
संस्कृत सब भांषा की जननी   वेद, शास्त्र का नारा था
शब्द  हवा  में  गूॅंज  रहा  है   पाकिस्तान  हमारा  था

दुनिया भर के सभी राष्ट्र की नजरें हम पर गढी हुयी हैं
भोग,विलास की दुनिया भी भारत में क्यों पडी हुयी हेै
अवतारों  की  श्रेष्ठ  श्रृंखला  भारत  में ही  क्यों होती है
हिजबुल,नक्सल,माओवादी,भारत माता  क्यों ढोती है
चोर,लुटेरों से भी लुटकर भी भारत सबको पाल रहा है
सरहद के टुच्चे स्वर  सुनकर  देख रहा  है टाल रहा है
मौन  शब्द   सब  चीर  रहा था, कैसा अस्त्र  करारा था
शब्द   हवा   में  गूॅंज   रहा   है पाकिस्तान  हमारा था
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                      मो09897399815
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