साधो - आग लगादो
अगर देश में सब बाबा संकल्प उठालें
ये राष्ट्र - भक्ति की माई केवल बच्चे पालें
अच्छी नसल की फसलें फिर से लहरायेंगी
ऋषिकुल पीढी, फिर से भारत में आयेंगी
क्यों बाबा, माई को बच्चों की चिन्ता भारी
स्वस्थ, मस्त कितने हैें भारत में ब्रह्मचारी
अच्छी धरती हो तो पौेधे स्वस्थ फलेंगे
फिर तो हिन्दूस्तानी मिलकर साथ चलेंगे
काजू, किसमिस, खीर,मुनक्का तुम खाते हो
उपयोग करो इस तन का,तुम क्यों शर्माते हो
हम सब भी तो ऋषि-मुनि की सन्ताने हैं
अब गोत्र, सूत्र, संस्कार हमारी पहचाने हैं
औलाद , हमेशा गृहस्थ बैल से ही पलती हेै
नसल हमेशा साँडो से ही तो चलती है
बापू, बाबा इस कलियुग में सभी उदाहरण
ये इन्द्र देव अवतार सभी भव-सागर तारण
सब स्वस्थ शरीरों मस्त फकीरों की माया है
गीता में तो ये सब ही नश्वर काया है
बस, नश्वर माया ,नश्वर काया एक बनाओ
हे राष्ट्र-भक्त कुछ राष्ट्र-गीत तो तुम भी गाओ
उर्वशी, मेनका, रम्भा तुम को देख रही हैं
सब इन्द्रलोक में बैठी नजरें सेंक रही हैं
करो शकुन्तला पैदा, बाबा ,इस ऋषि भेष में
दुषयन्त पुनः, अवतार धरेगा, इसी देश में
अब कोई छः, कोई दश , कोई चालीस बोले
क्यों खोल रहे हैं, बाबा ,माई अपने चोले
ये भीख माँग कर, मधूकरी से खाने वाले
सब साँड हमेशा हमीं गृहस्थों ने ही पाले
अब लुफ्त, मुफ्त का लेने वाले देश चलायें
सब मेहनत मेरी, बैठ-बैठ कर बाबा खायें
कुछ तो संयम-नियम बैठकर मूँह में डालो
सन्यासी, वैरागय - धर्म को कुछ तो पालो
क्यों बच्चे पैदा करने की बाते कहते हो
काम- वाशना की दुनियां में क्यों बहते हो
भजन करो बस, योग- साधना को ही साधो
कवि आग की मानो बस, इतना मत पादो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
अगर देश में सब बाबा संकल्प उठालें
ये राष्ट्र - भक्ति की माई केवल बच्चे पालें
अच्छी नसल की फसलें फिर से लहरायेंगी
ऋषिकुल पीढी, फिर से भारत में आयेंगी
क्यों बाबा, माई को बच्चों की चिन्ता भारी
स्वस्थ, मस्त कितने हैें भारत में ब्रह्मचारी
अच्छी धरती हो तो पौेधे स्वस्थ फलेंगे
फिर तो हिन्दूस्तानी मिलकर साथ चलेंगे
काजू, किसमिस, खीर,मुनक्का तुम खाते हो
उपयोग करो इस तन का,तुम क्यों शर्माते हो
हम सब भी तो ऋषि-मुनि की सन्ताने हैं
अब गोत्र, सूत्र, संस्कार हमारी पहचाने हैं
औलाद , हमेशा गृहस्थ बैल से ही पलती हेै
नसल हमेशा साँडो से ही तो चलती है
बापू, बाबा इस कलियुग में सभी उदाहरण
ये इन्द्र देव अवतार सभी भव-सागर तारण
सब स्वस्थ शरीरों मस्त फकीरों की माया है
गीता में तो ये सब ही नश्वर काया है
बस, नश्वर माया ,नश्वर काया एक बनाओ
हे राष्ट्र-भक्त कुछ राष्ट्र-गीत तो तुम भी गाओ
उर्वशी, मेनका, रम्भा तुम को देख रही हैं
सब इन्द्रलोक में बैठी नजरें सेंक रही हैं
करो शकुन्तला पैदा, बाबा ,इस ऋषि भेष में
दुषयन्त पुनः, अवतार धरेगा, इसी देश में
अब कोई छः, कोई दश , कोई चालीस बोले
क्यों खोल रहे हैं, बाबा ,माई अपने चोले
ये भीख माँग कर, मधूकरी से खाने वाले
सब साँड हमेशा हमीं गृहस्थों ने ही पाले
अब लुफ्त, मुफ्त का लेने वाले देश चलायें
सब मेहनत मेरी, बैठ-बैठ कर बाबा खायें
कुछ तो संयम-नियम बैठकर मूँह में डालो
सन्यासी, वैरागय - धर्म को कुछ तो पालो
क्यों बच्चे पैदा करने की बाते कहते हो
काम- वाशना की दुनियां में क्यों बहते हो
भजन करो बस, योग- साधना को ही साधो
कवि आग की मानो बस, इतना मत पादो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
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