Friday, February 13, 2015

           भूल के शूल
अब मुझे  देख कर मेरा कुत्ता भोक रहा हेै
मालिक भी नौकर से डर कर चोक रहा है
प्रजातन्त्र  में  पराधीनता  ही  मालिक है
डेढअरब की भीड देश में क्यो कालिख है

जनमत  भीख,भिखारी राजा बनजाते हेैं
मालिक  भूखे ,माल  भिखारी ही खाते है
चरण-वन्दना, चोर  डाकुओं  की जारी हैेे
मालिक तो  हल्का है अब सेवक भारी हेै

झोपड - पट्टी,नंग - मतंगो की माया हेै
भारी भरकम खादी  की निर्मम काया हेै
सर्वगुण  सम्पन्न चोर ही  क्यो भाता हेै
लोकतन्त्र  बीहड  से  डाकू क्यों आता है

हम पराधीन थे पराधीनता की है आदत
बस,बच्चे पैदा करो देश मे यही शहादत
फिर चिल्लाओ रोटी,कपडा और चाकरी
भारत का तो यही लक्ष्य है आज आखरी

सब सेवक सम्पन्न भिखारी मस्ती में हेै
असली मालिक भारत केअब बस्ती में है
तृप्त-वाशना, जनमत  का  ये परं धाम है
र्निपेक्ष-धर्म का संविधान में यही नाम है

हर वर्ष देश में नेता और बस्ती बढती हेै
गुप्त-दान से आज व्यवस्था ही सढती है
बस्ती, गस्ती, मस्ती, नेता खूब बढाओ
नंगीभूखी जनसंख्या की ध्वजा घुमाओ

ये वोट-बैंक की राजनीति ही पनपाती है
आज सियासत राष्ट्रगीत इनका गाती है
बिजली,पानी,भवन, चाकरी पा जायेगी
आज राष्ट्र  को  नेता की हरकत खायेगी

बन्द करो बकवास, सियासत ढोने वालो
मुशीबतो को देख मत,जनमत पर टालो
देश  के नेता  सभी  समस्या  टाल रहे है
ग्वाल-बाल  का  देश है  बच्चे पाल रहे है

हर मजहब को राष्ट्रहितों से जोड के देखो
मानवता  में  कौम-कबीले मोड के देखो
जनसख्या  बढने  से हिन्दुस्तान मरा हेै
हर  छन्दों में  कवि आग का घाव हरा है
      राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com

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