Thursday, June 30, 2016

वेतन से चेतन
सप्तम वेतन का आयोग, बना हेेै आज देश में रोग
करो सेवा में धन विनियोग,लगाओ सेवा में अभियोग
ये है बोट - बैंक उपभोग, सियासी सत्ता का उद्योग
यहा मुश्किल में हैसब लोग,मिली है सेवा मस्ती भोग

सबके वेतन में है भेद, नियम को ढूंढो, मिलेंगे छेद
जरा भी हमको नही है खेद, सेवक सत्ता में मुस्तैद
अघिकारी मस्ती में लाचार,सबकी अपनी अपनी कार
हैं सब राजनीति के यार, इनसे चलती है सरकार

यंहा सब पढे लिखे लाचार, हैल्पर बनने को तैयार
अब सब डीग्री हैं बेकार,मिला सबसे सस्ता औजार
कंही हैे घर में सर्विस चार,कंही हेै रोटी की दरकार
ये है प्रजातन्त्र सरकार,जंहा हडताल बना हथियार

अब तो डी. ए. ही हेै काफी ,ये आयोग बना हेै टाफी
नौकर में हेै आपा - धापी , सैना बनती है गददाफी
ये है राजनीति का खेल,यंहा पर अर्थ-व्यर्थ सब फेल
डीग्री बेच रही है तेल, ये सब सरकारी है खेल

सब के उंचे - उंचे वेतन, बच्चे प्राइवेट के चेतन
शिक्षा सरकारी हैअचेतन,मदरसा है परमार्थ निकेतन
सब बेरोजगारी धाम,यंहा पढ लिखकर करो आराम
करो सडकों पर चक्के जाम,मरो लावारिस हो बे-नाम

यंहा सरकार सभी है फेल, हमसे खेल रही हैं खेल
जनता बढती है ज्यों रेल,डाले इन पर कौन नकेल
नेता जी काट रहे हैं मस्ती,ये है बे - रोजगारी बस्ती
सबकी अपनी-अपनी हस्थी, भीडे चौराहों पर सस्ती

बांटो बे-रोजगारी भत्ता, अब तैय्यार खडा है जत्था
ये है उग्रवाद का खत्ता, छेडो मधु मक्खी का छत्ता
नौकरशाही बनी है घाघ ,देश में नेता नही ,अभाग
चेैनल छेड रहा है राग,कविता लिखता है कवि आग।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Sunday, June 26, 2016

इस कविता के माध्यम से मैं आपको आपके अतीत की और ले जाने का प्रयास कर रहा हूं,शायद यह कविता आप में जागृतिपैदा कर सके तो मेरी यह रचना सार्थक होगी।

भारत की आदर्शता
हवा में उडते देख तिरंगे को भी नही गॅंवारा है
शब्द हवा में गूॅंज रहा है पाकिस्तान हमारा है
महाभारत में कान्धार, काबुल तक राष्ट्र सहारा है
प्राचीन में चीन शिवालय वो कैलाश हमारा है
छोटे - मोटे देशों का दुनियाँ में कोई धाम नही था
भूमण्डल में अमरीका जैसा भी कोई नाम नही था
मानवता की हर भूमि पर दावा आज हमारा है
शब्द हवा में गूॅंज रहा है पाकिस्तान हमारा है

चन्द्रगुप्त, कौटिल्य काल से पूरा पश्चिम पलता था
चाणक्य गुरू की प्रतिभा के भय से ये राष्ट्र संभलता था
हिन्दू, मुश्लिम, सिक्ख,इसाई एेसी कोई जात नही थी
मानवता में भेद भाव की राजनीति जज्बात नही थी
व्यभिचार के घनानन्द का शूल मूल से काटा था
राष्ट्र -द्रोह में मृत्यु-दण्ड से जन जन में सन्नाटा था
सत्ता और सियासत में भी सत्य सनातन नारा है
शब्द हवा में गूॅंज रहा है पाकिस्तान हमारा है

जनकपुरी की माता सीता गान्धार की गान्धारी
अमरीका पाताल मकरध्वज की नगरी कैसी न्यारी
भानू का भक्षक बजरंगी पवन पुत्र कहलाता था
इतिहास गवाह है स्वर्ग मोक्ष का रधुवंश से नाता था
दुर्वाशा की सृष्टि संरचना शौर्य ,शास्त्र बतलाते हैं
भू-मण्डल के चक्रवर्ती को वेद पुराण भी गाते हैं
सारी दुनिया इस भारत का छोटा सा गलियारा है
शब्द हवा मे गूॅंज रहा है पाकिस्तान हमारा है

चारों युग ,नक्षत्र, वेद ,ग्रह, ज्योतिष शास्त्र हमारा है
स्वर्ग,मोक्ष की कठिन कल्पना ,आविष्कार हमारा हेै
नटराज के डमरू नाद से सिद्यान्त कौमुदी आती है
अभिव्यक्ति उस पार्णिनि की वेद ऋचा समझाती है
कालिदास और भतृहरि की अलंकार की भांषा है
सरल शब्द से तुलसी , मीरा और कबीर तरासा है
संस्कृत सब भांषा की जननी वेद, शास्त्र का नारा है
शब्द हवा में गूॅंज रहा है पाकिस्तान हमारा है

दुनिया भर के सभी राष्ट्र की नजरें हम पर गढी हुयी हैं
भोग,विलासों की दुनिया भी भारत में क्यों पडी हुयी हेै
अवतारों की श्रेष्ठ श्रृंखला भारत में ही क्यों होती है
हिजबुल,नक्सल,माओवादी, भारत माता क्यों ढोती है
चोर,लुटेरों से भी लुटकर भी भारत सबको पाल रहा है
सरहद के टुच्चे स्वर सुनकर देख रहा है टाल रहा है
मौन शब्द सब चीर रहा था, कैसा अस्त्र करारा है
शब्द हवा में गूॅंज रहा है पाकिस्तान हमारा है

समय आ गया,भारत वालों, फिर से वो तकरार करो
जो सीमा पर आंख उठाये, निसंकोच संहार करो
क्यों घुसते हैं भूखे - नंगे, सीमाएं सब बन्द करो
राजनीति से राष्ट्र - धर्म के उपर ना दुर्गन्द करो
करे खिलाफत भारत की उस पर कुछ एेसा वार करो
चौराहों पर खडा करो और चीर के टुकडे चार करो
कवि आग ने कविताओं से दुश्मन को ललकारा है
शब्द हवा में गूॅंज रहा है पाकिस्तान हमारा है।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com 

Saturday, June 25, 2016

चीन की दुरबीन
बस जूते खाकर हंसते रहना अपनी तो औकात यही हेेै
स्वाभिमान के हिन्दुस्तानी में भी तो वो बात नही है
आजादी से लेकर अब तक हम चीन को झेल रहे हैं
नेताओ की हिम्मत देखो अपमानो में खेल रहे हेैं
ऋण खाकर घी पीने वाली चार्वाक की बात सही है
बस जूते खाकर हंसते रहना अपनी तो औकात यही हेेै

खाता भी है, गुर्राता है, छूरा पीठ पर घोंप रहा है
सढा हुआ सामान चीन अब, भारत पर ही थोंप रहा है
भारत के भगवान चीन की धरती से बन कर आते हेैं
भगवानो के आडम्बर से हम केवल रोटी खाते हेैं
स्वाभिमान को बेच चुके हैं, हममे अब वो घात नही है
बस जूते खाकर हंसते रहना अपनी तो औकात यही हेेै

कम्प्यूटर, टी. वी. मोबाइल, साडी, कच्छे और बनियाने
चूडी, कंगन, मांग सिंदूरी, चस्मे पहने अन्धे, काने
जूते चप्पल, पेन्ट, कोट और टाई, साडी सभी चीन का
चालू मण्डी भीड लगी है, देख तमाशा तमाशबीन का
कम लागत में माल कमाना अपनी तो बस जात वही है
बस जूते खाकर हसते रहना अपनी तो औकात यही हेेै

उद्योग जगत में 80 प्रतिशत,चीन देश, में घुसा पडा है
भारत वाशी आज देश मे मंहगायी से चुसा पडा है
इसीलिये तो सस्तायी को देख रहे हैं मजबूरी है
हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख, इसाई, कौमो में दिल की दूरी है
अगर एकता हो जाये तो हम इतने अनाथ नही है
बस जूते खाकर हंसते रहना अपनी तो औकात यही हेेै

मोदी जी ने भ्रमण किया पर दुनिया से कुछ सीखा होता
चाण्क्यनीति को पढ लेते तो,अनुभव भी कुछ तीखा होता
आदिकाल से दया प्रेम के कारण ही तो लुटे पडे हैं
वशुधैव कुटुम्बकम् की परिभांषा के कारण हम टुटे पडे हैं
वो सतयुग था,ये कलियुग है, दुनिया में जज्बात नही है
बस जूते खाकर हंसते रहना अपनी तो औकात यही हेेै

अगल बगल के सभी पडोसी चीनी चटनी चाट रहे हैं
जिन पर भी हम दया दिखाएं, वही हमी को काट रहे हैं
हिम्मत हो तो व्यवसायों की दूनियादारी बन्द करा दो
कूटनीति से प्रेम करो,चाणक्य - नीति से द्वन्द करा दो
कवि आग ने समय-समय पर सच्चायी की बात कही है
बस जूते खाकर हंसते रहना अपनी तो औकात यही हेेै।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो098973998
rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, June 24, 2016

सत्यता को कर्कशता से लिखने का प्रयास किया है

शब्द सम्भाल कर बोलिये, शब्द के हाथ ना पांव
एक शब्द करे औषधी, एक शब्द करे घाव
भांषा का तमाशा
पी.एम.के भाषण में अब वो पी.एम.वाली बात नही है
सब को लेकर साथ चलेंगे ऐसे भी जज्बात नही हेै
मर्यादा की सीमाओं को शब्द स्वयं ही लांघ रहे हैं
नुक्कड नाटक के ये भाषण,स्वाभिमान को टाँग रहे हैं

लोकल चर्चा,और चुनाव से थोडा बचकर चलना होगा
अगर देश के मालिक हो , घाव में मरहम मलना होगा
डबरो में घुस कर सरितायें मर्यादा खोती जाती हैं
केवल हल्की - फुल्की जनता को ऐसी भांषा भाती है

गम्भीर स्वरों को सुनने वाले अभी राष्ट्र में बचे हुये हेैं
हर प्रान्त में चिन्तन मन्थन वाले अब भी रचे हुये हैं
राजनीति में व्यभिचार की ऐसी क्यों भरमार मची है
उँचे पद पर अप-शब्दो से देश की इज्जत कंहा बची है

तुमने जो कुछ भी बोला है, प्रतिद्वन्दी भी कुछ बोलेगा
तुमने उसके कपडे खोले, मौके पर वो भी खोलेगा
शब्द द्वन्द की इस क्रिडा से भारत माता ही रोती है
आज राष्ट्र को राजनीति की नालायक पीढी ढोती है

पी.एम.के भाषण को सारी दुनिया टी.वी.पर सुनती है
अच्छे - बूरे हर शब्दो की भाव-भंगिमा को चुनती हेै
जिस कुर्सि पर तुम बैठे हो ये भारत का स्वाभिमान है
तेरे मूँह से निकलने वाला शब्द नही हैे,राष्ट्र-गान है

एन.एस.जी की भाग दौड में आखिर तुमने क्या पाया है
हर चैनल पर चमक रहे थे, केवल वक्त हुआ जाया है
तेज दौडने से हर धावक अपनी ही शक्ति खोता है
कूटनिती में चलने का प्रमाण पहुंचना ही होता है

तेरे ही घर के सब बाबा, तेरी इज्जत चाट रहे हैं
संविधान के हर पन्ने पर चाट, पकौडी बांट रहे हैं
सुब्रमण्यम् स्वामी जी तो, खुले साण्ड से गुर्राते हैं
आदित्यनाथ और प्राची,साक्षी अपनी ही धुन में गाते हैं

मैं तो छोटा सा रचनाकर अपनी भांषा बोल रहा हूँ
तुम्हे राष्ट्र के संवादो के सम्भावों से तोल रहा हॅूं
कवि आग हूँ सच्चाई को कहने में परहेज नही है
अगर किरण में भेद-भाव है,तो भानू का तेज नही है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो098973998
rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, June 23, 2016

साधू और शैतान
इस देश की राजनीति में साधू भी बिक जाता है
धर्म सनसतन, सम्प्रदाय और मजहब को दर्शाता है
स.पा., बा.स.पा., बी.जे.पी. और कांग्रेस का बाबा हो
जो वर्ग धर्म को छोड रहा हो चौराहे का ढाबा हो
कालनीमि का भेष राष्ट्र में अहिसुष्ण लिख जाता है
इस देश की राजनीति में साधू भी बिक जाता है

जो राजनीति के कू-कर्मो से भाग्य देश का लिखता हो
कंचन , काया, माया, छाया में भी साधू बिकता हो
हर चैनल में राजनीति की चर्चाओं में होता हो
जो गेरूआ अपनी गरिमा चौराहो में खोता हो
धीरे-धीरे ऐसा आडम्बर जनता को दिख जाता है
इस देश की राजनीति में साधू भी बिक जाता है

हर चैनल पर विज्ञापन से साधू माल कमाता हो
योग शास्त्र को भी पातञ्जलि का उद्याोग बताता हो
वही गेरूआ अरब - खरब की काया माया ढोता हो
विरक्त मार्ग पर आसक्ति के बीज कशैले बोता हो
उस धन्धे को आने वाला हर बच्चा सिख जाता हेै
इस देश की राजनीति मे साधू भी बिक जाता है

अहिसुष्णता आर्ट लिविंग की परिभांषा से बढती हो
गृहस्थ - धर्म के उपर भी सन्तो की पीढी चढती हो
सन्यास मार्ग की परिभांषा को अपने ढंग से गाती हो
दशनाम की परम्परा भी आपस में लड जाती हो
धर्म-धाम बुनियाद बिना भी धरती में टिक जाता है
इस देश की राजनीति में साधू भी बिक जाता है

जंहा चोर, डाकूओं के धन्धे भी बाबाओ को भाते हों
गुफा छोड कर आज लंगोटे राजनीति में आते हों
राजनीति के दलो में लोटे और लंगोटे दिखते हों
आढ धर्म की लेकर साधू काले धन से बिकते हों
धर्म हमेशा आडम्बर के कारण ही डिग जाता है
इस देश की राजनीति में साधू भी बिक जाता है

अब बच्चे पैदा करने को भी बाबा ही उकसाता हो
जो ब्रह्मचारीणी माई के संग पूरा साथ निभाता हो
भीख मांगकर खाने वाला अय्यासी में जीता हो
रक्ताम्बर चोले का बाबा खून समाज का पीता हो
कवि आग भी ढोंगी बाबा पर कविता लिख जाता है
इस देश की राजनीति में साधू भी बिक जाता है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com