भरम में धरम
मैं तो बस कुछ मुर्दों में ग्लूकोष चढाने आया हूँ
जो स्वस्थ दिखायी देते हैं,बस,उन्हें जगाने आया हूँ
चाणक्य,विदुर को पढ करके मन ही मन में मुर्झाता हॅू
विरह - वेदना भारत की लिखता हूँ, रोता जाता हूँ
ये राम,कृष्ण की धरती हैे जंहा पुरूष ब्रह्म बनजाते हेै
यंहा रावण,कंस उदाहरण है,बह्माण्ड से जिनके नाते हेै
यंहा महाभारत भी होता हेै तो लक्ष्य धर्म का होता हेै
यंहा कर्ण,भीष्म सा योद्या भी, घुटता है रण में रोता हेै
सतीअहिल्या,अनुसुइया,यम को भी नियम सिखाती है
यंहा सीता,द्रोपदी,लक्ष्मी भी,पावन प्रमाण बनजाती हेै
यंहा राष्ट्र धर्म की रक्षा में हंस-हंस कर शीश नवाते हेै
इस आर्यखण्ड की महिमा के, अखण्ड ब्रह्म से नाते है
उपनिषद,शास्त्र और वेदों में,इस गुप्त-भेद की गाथा है
हर श्लोक यंहा पर गीता में, जीवन का मर्म बताता है
दानव भी धर्म दिशाओं में ,बस ,यज्ञ-होम से जीते हेैं
यंहा सागर मन्थन का अमृत, राहू - केतू भी पीते हैं
इस आर्यखण्ड की धरती में अब बैर पनपते जाते हैं
दुर्भाग्य धर्म को पढकर भी,हिंसा को गले लगाते है
सन्यस्त,विरक्ती भेषों में,यंहा आग शब्द से जलती है
योग-भोग की दुनिया भी यंहा आडम्बर से पलती है
विस्वास नही है, धर्मो पर,बस सम्प्रदाय पनपाना हेै
मनुष्य कंहा है भारत में,मजहब का ताना - बाना है
हिन्दू है,कोई मुस्लिम हैे कोई सिक्ख, ईसाइ कहता है
ये कौम कबीलों का डबरा,कंही कीचड दरिया बहता हेै
यंहा राजनीति की चिन्गारी से आग लगायी जाती हेै
यंहा हिंसा धर्म लिबाशों के गीतो से गायी जाती हेै
राम, कुष्ण, महावीर, बुद्व के नाम से लीला होती हेै
यंहा खून के धब्बे मानव के,धर्मो की सरिता धोती है
ये शौक नही है, पीडा है, जो रोज छन्द से गाता हूॅ
आग शब्द की कविता से,कुछ जिन्दो को सुलगाता हूँ
दुर्भाग्य, खून की गर्मी में,क्यों,हलचल कभी नही होती
आजआग की व्याकुलता,विचलित होकर भी नही रोती।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
मैं तो बस कुछ मुर्दों में ग्लूकोष चढाने आया हूँ
जो स्वस्थ दिखायी देते हैं,बस,उन्हें जगाने आया हूँ
चाणक्य,विदुर को पढ करके मन ही मन में मुर्झाता हॅू
विरह - वेदना भारत की लिखता हूँ, रोता जाता हूँ
ये राम,कृष्ण की धरती हैे जंहा पुरूष ब्रह्म बनजाते हेै
यंहा रावण,कंस उदाहरण है,बह्माण्ड से जिनके नाते हेै
यंहा महाभारत भी होता हेै तो लक्ष्य धर्म का होता हेै
यंहा कर्ण,भीष्म सा योद्या भी, घुटता है रण में रोता हेै
सतीअहिल्या,अनुसुइया,यम को भी नियम सिखाती है
यंहा सीता,द्रोपदी,लक्ष्मी भी,पावन प्रमाण बनजाती हेै
यंहा राष्ट्र धर्म की रक्षा में हंस-हंस कर शीश नवाते हेै
इस आर्यखण्ड की महिमा के, अखण्ड ब्रह्म से नाते है
उपनिषद,शास्त्र और वेदों में,इस गुप्त-भेद की गाथा है
हर श्लोक यंहा पर गीता में, जीवन का मर्म बताता है
दानव भी धर्म दिशाओं में ,बस ,यज्ञ-होम से जीते हेैं
यंहा सागर मन्थन का अमृत, राहू - केतू भी पीते हैं
इस आर्यखण्ड की धरती में अब बैर पनपते जाते हैं
दुर्भाग्य धर्म को पढकर भी,हिंसा को गले लगाते है
सन्यस्त,विरक्ती भेषों में,यंहा आग शब्द से जलती है
योग-भोग की दुनिया भी यंहा आडम्बर से पलती है
विस्वास नही है, धर्मो पर,बस सम्प्रदाय पनपाना हेै
मनुष्य कंहा है भारत में,मजहब का ताना - बाना है
हिन्दू है,कोई मुस्लिम हैे कोई सिक्ख, ईसाइ कहता है
ये कौम कबीलों का डबरा,कंही कीचड दरिया बहता हेै
यंहा राजनीति की चिन्गारी से आग लगायी जाती हेै
यंहा हिंसा धर्म लिबाशों के गीतो से गायी जाती हेै
राम, कुष्ण, महावीर, बुद्व के नाम से लीला होती हेै
यंहा खून के धब्बे मानव के,धर्मो की सरिता धोती है
ये शौक नही है, पीडा है, जो रोज छन्द से गाता हूॅ
आग शब्द की कविता से,कुछ जिन्दो को सुलगाता हूँ
दुर्भाग्य, खून की गर्मी में,क्यों,हलचल कभी नही होती
आजआग की व्याकुलता,विचलित होकर भी नही रोती।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो09897399815
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