Friday, October 30, 2015

आज सरदार बल्लभ भाई पटेल की जयन्ती है और श्रीमति इन्दिरा गांधी का बलिदान दिवस है। इस अवसर पर दोनों को पुष्पाञ्जलि भेंट करते हुये एक राष्ट्रीय रचना आपकी सेवा में अर्पित।
अखण्ड कल्पना
आर्यखण्ड अब हो अखण्ड ,अवतार धरा में आजाये
बहुत हो गया घनानन्द, अब और धरा को ना खाये
जोड़ सके जो भारत को, समृद्व भेष वो माॅंग रहा हॅूं
मै तो बस भारत माता से,चाणक्य देश में मांग रहा हूं

वशुधैव कुटुम्बकम् की भांषा,हम दुनिया भर में गाते हैं
कल्याण जगत का करने को हम होम, यज्ञ करवाते हैं
सद्भाव जीव का हो दिल में ये धर्म सनातन नारा है
आज शास्त्र संवादों में क्यों मानवता से हारा है

धर्म-गुरू क्यों मौन खडे़, इस मायावी जंजालों में
शमशान शवों में ढूॅंढ रहे हैं, शास्त्र मरे कंकालों में
यहाॅं कण्वऋषि और वाल्मिकी भी रघुवंश को गातें हैं
उपनिषद, वेद का सार, व्यास,गीता में हमें सुनाते हैं

अखण्ड राष्ट्र की परिभांषा हम को इतिहास बताता है
भू-मण्डल भारत ही होगा,ये शास्त्र सदा से गाता है
धर्म शास्त्र भी कहते है ये जगत ब्रह्म सा नेक बने
उपनिषद, वेद की भाषा में बस, मानवता ही एक बने

राम , कृष्ण अवतारों का प्रमाण यहाॅं पर मिलता है
ये भरत -वंश का भारत है, भावों से सदा पिघलता है
ब्रह्मांडअखिल,अखिलेश्वर की ये स्वर्ग,मोक्ष फुलवारी है
इस महाकुम्भ में ,देवों से, दानवता हरदम हारी है

कंही बलि,कर्ण कंही परशूराम कंही हरीश्चंद्र से दानी थे
ना जाने कितने ऋषि,मुनि, चाणक्य,विदुर से ज्ञानी थे
शेखर,सूभाष और भगत सिंह मरते हैं यहाॅं जूनूनों में
क्यों उसी राष्ट्र में आज यहाॅं बहता है पानी खूनो में

सती अहिल्या,लक्ष्मी ,पुतली रण में संस्कार बताती हैं
यहाॅं परम्परायें नारी की भी ऋचा वेद की गााती हैं
दुर्भाग्य देश का आज यंहा व्यभिचार सियासत करती है
बलात्कार, कू - कर्मो से अबलायें , हरदम मरती हैं

मुझे बताओ भारत के अब कितने टुकडे़ काटोगे
सरदार पटेल के सपनो को किस्तों में कितना बाॅंटोगे
कंही छत्तीसगढ़ कही उत्तराखंड कंही झारखंड,बुंदेलखड
मैं आग धधकती देख रहा हॅूं हर प्रदेश में,महा प्रचण्ड

हम कैसे खटिक,कसाई हैं वक्षस्थल माॅं का काट दिया
क्षेत्र,मजहब की जाति ने कितना भारत को बाॅंट दिया
अंग्रेज हूकूमत भारत के दो टुकडे़ करके चली गयी
ये ,बे -शर्मो की औलादें क्यों करती हैं अब बात नयी

राजनीति की हरकत ही सम्मान राष्ट्र का खोती है
भारत की जनता शदियों से इस महाभारत को ढोती है
पहले भी सभी रियासत थी,हमने कुछ राज्य बनाये थे
कुछ दुश्मन थे इस भारत के जो हमसे से सदा पराये थे

मैं पुनरावृत्ति देख रहा हॅूं राजतंत्र फिर से आयेगा
क्या उजडे हुये कबीले का कोई राष्ट्रगीत भी गायेगा
कुल चार खण्ड हों भारत के सरकार मध्य में राज करे
लोक - तंत्र चौपाया हो, जो राजनीति से ना बिखरे

पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चर्तुमुखी हो देव धरा
ये चार-युगों के चार - खण्ड ,हो चतुर्वेद की वशुन्घरा
परिलक्षित होगा आर्यखण्ड भारत की चार दिशाओं से
मैं उस भारत को देख रहा हॅू, जन मानस के भावो से

पूरे भारत का जन - मत बश एक सूत्र में आ जाये
राष्ट्र-भक्ति की भांषा में भारत के पुत्र समाजायें
दिशा,निशा सब एक बने, दिनकर हो सोम,व्योम जैसा
एक जाति हो मानवता बश, यज्ञ ,होम हो कुछ ऐसा

कब तक हम औलादों को, इन झगडों से निपटायेंगें
खण्ड-खण्ड की चोंटों से अब कितने घाव लगायेगें
क्यों होती है धर्म,मजहब की वैमनस्यता,मुझे बताओ
जम्बूद्वीप पुनः विकसित हो कुछ तो ऐसा कर जाओ

कोई तो चन्द्रगुप्त ढॅूंढो,जो शल्य चिकित्सा कर जाये
एक सूत्र में भारत का ,ये मानचित्र फिर से आये
धर्म,मजहब की खेती में,माता की इज्जत पहचानो
जो शहीद हुये इस धरती पर,इतिहास पुनःउनका जानो

कौटिल्य,कुटिल,कर्कश वाणी हृदय में सरस सरलता हो
पंच-विकारों से हट कर बस, भारत अन्दर पलता हो
हो आर्यखण्ड ऐसा अखण्ड ,इस आशा से संघर्ष करे
जो मातृ-भूमि के चरणो में निज ईश,शीश को सदा धरे

ये चार युगों का चिन्तन हेै,बस,आर्य-खण्ड हो देव-धरा
ये मृत्यु-लोक से उपर है ,जहाॅं काल तपों से सदा मरा
अखण्डराष्ट्र के भावों की ये आग शिखर पर टाॅंग रहा हॅूं
मैं तो बस भारत माता से,चाणक्य देश में मांग रहा हॅं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com 

Thursday, October 29, 2015

                     
करवा-चौथ
पुरूषों  की हालत पतली है   करवा चौथ   मनाने को
चांद मांद  से  झांक रहा   है, सूरज  को  बहलाने को
पतिव्रता  सोन्दर्य   करण  का  पूरा  लाभ  उठाती है
तीज,चौथ  से  ज्यादा, वैलनटाइन डे  की  ख्याती है

एक पुरूष ना जाने  कितनी  करवा  चौथ  मनाता है
फिल्मों में तो  सुहाग रात  शादी  से  पहले  आता है
व्यवसायी  सौन्दर्य  प्रसाधन ,पति धर्म बतलाता है
कंही धर्म है कंही- कंही  ये  केवल  दिल  बहलाता है

रंडुवों का  त्यौहार  नही  है  भारत  के  इतिहासों में
क्यों फंसती  है  नारी,  बापू, नारायण  के  झांसों में
बापू  के  फारम - हाउस  में  करवा चौथ  मनाती है
एेसी खबरे टी0वी0 चैनल  से  ही  छनकर  आती हैं

त्यौहार  हमेशा  पतिव्रता  नारी  को  केवल भाता है
मेकप करने वालों का  तो  भारत  भाग्य  विघाता है
भ्रष्टाचारी,  व्यभिचारी  भी   करवा - चौथ  मनाते हैं
राजनीति  में  शोषण, पोषण, बलात्कार  आैकातें हैं

करवा चौथ,सौत, साडू  सब  खुलकर  खूब मनायेंगें
नारी छलनी झांक  रही  है  चांद  नजर  कब  आयेंगें
भूखी,प्यासी पतिव्रता  से  पतियों  का  मनारंजन है
ये नारी की ही हिम्मत है,जो पतिधर्म  दुख भंजन हेै

इस व्रत में संकल्प  करो,हम  भ्रूण गर्भ  नही तोडेगे
नारी व्रत में कन्या  धन  से,पुनः समाज  को जोडेगे
चन्दा सी बाला घर-घर में भारत  का  मान बढायेगी
पतियों  ने सम्मान  जो  खोया,पुनः धरा में लायेगी

करवाचौथ  कसौटी  हो, हर  पति, धर्म  को अपनाये
ये उत्सव भारत में भारत के कर्म मर्म को दिखलाये
संस्कारों से भटक  रही  है क्यों  ,पीढी   मेरे  देश की
कवि  आग  की लपटों  में जलती  है  होली भेष की।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       9897399815

Wednesday, October 28, 2015

सब्सीडी
वेतन, भत्ते, पेन्शन छोडो मैं भी सब्सीडी छोडूंगा
मैं गरीब हूँ,पर गरीब के साथ स्वंय को भी जोडूंगा
सरकारी सुविधाएं सारी तुम सब मिलकर चाट रहे हो
अरे सियासी अन्धो रेवडियां अपने में बाँट रहे हो

मंहगायी और भ्रष्टाचारी का तुमको कुछ ज्ञान नही है
देश की हालत बिगड रहीहै तुमको ये अनुमान नही हेै
ठाट-बाट में जीने वालों हमको मत उपदेश सुनाओ
खून राष्ट्र का पीने वालों अब तो राष्ट्र - गीत मत गाओ

तुम्हे देश से क्या लेना है, बस, अहंकार में फूल रहे हो
पद के मद में कद को लेकर,हद से उपर झूल रहे हो
बडे - बडे प्रतापी जनमत की ताकत से गिर जाते हैं
यही वोट तो धूल सडक की नेताओं को चटवाते हैं

व्यवसायी के गोदामों में दालों के अम्बार लगे हैं
चन्दा देने वाले डाकू, सब नेता के खास सगे हैं
भारत माता के कूपूत ही ,खून गरीब का चाट रहे हैं
चोर चकारी की माया को राजनीति में बाँट रहे है

नेता और अधिकारी सारे, इस धन्धे में सहयोगी हैं
मरी हुयी जनता और जनमत,भारत में ही क्यों रोगी हैं
मत मारो ये झूठे छापे, जनता को बस, खुला छोड दो
भ्रष्टाचारों के विराध में जनता को कुछ नया मोड दो

कानूनो से ज्यादा सक्षम जनता सब कुछ जान रही है
चोरों के गोदाम कंहा है,ये सब कुछ पहचान रही है
थोडी सी भी हिम्मत हो तो जनता पर ये भार डाल दो
भ्रष्टाचारों के विरोध में, जनमत को ये धार, चाल दो

सरकारी सुख, सुविधा सारी राजनीति में कैद पडी है
चोर डाकुओं की रक्षा में सरकारे मुस्तैद खडी है
मुझे बताओ ये सब्सीडी के नाटक कब तक खेलोगे
हे बे-शर्मो कवि आग की लपटों को कितना झेलोगे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Monday, October 26, 2015

भेद का खेद
मैं हूँ हिन्दू,मैं हूँ मुूस्लिम, पिछडा सिक्ख इसाई
भारत का मुर्गा, बकरा, हूँ काटें खटिक कसाई
कोई काटे ईद मनाकर, कोई नव-रात्र मनाके
हम बकरे इस देश के मालिक कटते रहे अभागे
सात दशक से नेता हमको मूँड रहे हैं नाई
मैं हूँ हिन्दू, मैं हूँ मुूस्लिम,पिछडा सिक्ख इसाई

आरक्षण की कास्ट, फास्ट है दौड रहे हैं घोडेे
नेता सबको हाँक रहे हैं मार - मार कर कोडे
सबके अपने - अपने प्रतिशत ठोक रहे हैं दावे
संविधान के राष्ट्रगीत को सभी सियासी गावें
सारी जनता बंटी हुयी है, चारों ओर तवाही
मैं हूँ हिन्दू, मैं हूँ मुूस्लिम,पिछडा सिक्ख इसाई

छोटे - मोटे इन डबरो में सडा राष्ट्र का पानी
हर मजहब में पडे हैं कीडे, धर्म,कर्म के ज्ञानी
कंही मौलवी, पण्डित बाबा चीख-चीख चिल्लावें
सब अपने-अपने त्यौहारो में अपना गाना गावें
इस राजनीति में सारे दुश्मन बन जाते है भाई
मैं हूँ हिन्दू, मैं हूँ मुूस्लिम,पिछडा सिक्ख इसाई

आरएसएस की हिन्दी शिक्षा,मुस्लिम पढें मदरसे
इसाई की अंग्रेजी है, संस्कृत सडक में तरसे
जगह -जगह भांषा बोली की खिंची पढी तलवारें
मैं आग बरसती देख रहा हूँ,चटक रहे अंगारे
नीचे सबके एक ही पानी, बस, उपर है काई
मैं हूँ हिन्दू,मैं हूँ मुूस्लिम ,पिछडा सिक्ख इसाई

आरक्षण मठ, मन्दिर,शंकराचार्यों में भी ढूंढो
अगडे,पिछडे, कौम, कबीलों के चेले नित मूंडो
ग्रन्थी, मौलवी और पादरी आरक्षण से लाओ
बस,धर्म बचा है,आरक्षण से,उसमे आग लगाओ
गीता, ग्रन्थ, कूरान, बाईबिल प्रेम के अक्षर ढाई
मैं हूँ हिन्दू,मैं हूँ मुूस्लिम, पिछडा सिक्ख इसाई

अब लालू, मोदी दोनो मरने को तैय्यार खडे हैं
अौर बिहार में आरक्षण के थोडा भाव बड हैं
सबके मूंह में एक ही मुद्दा, अब आरक्षण बांटेगे
उंच - नीच के बचे हुये बकरों को हम काटेगें
राजनीति की तलवारों को लेकर खडे कसाई
मैं हूँ हिन्दू, मैं हूँ मुूस्लिम, पिछडा सिक्ख इसाई

कूंआ एक है, एक ही पानी, भाण्डे करे लडाई
न्यारी - न्यारी सूरत में भी, कुदरत एक समायी
जांति - पांति और कौम कबीले खोद रहे है खाई
हर झगडे की जड में सत्ता , नेता है हरजायी
कवि आग ये देश गरीबो का,जनता भौजायी
मैं हूँ हिन्दू, मैं हूँ मुूस्लिम, पिछडा सिक्ख इसाई ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Sunday, October 25, 2015

कवि और नेता
नेता में और कविता में बस फर्क यही है
आत्मसात् होता है कवि, मस्तिष्क नही है
जनता , नेता की सत्ता है , जोत बही है
कविता ने तो सतत् सत्य की बात कही है

कवि, नेता दोनो को भीडें ही भाती हैं
कवि सूक्ष्म जीव है, नेता तो तस्कर हाथी है
इनको तो बस लंच ,मंच , प्रपंच चाहिये
प्रजातंत्र की भीडों के सरपंच चाहियें

राजनीति और कविता जनता से पलती है
कवि श्रेष्ठ है ,नेता जनता की गलती है
जनता कविताओं से खुश है, खेल रही है
राजनीति के दंश दशक से झेल रही है

राजनीति के दल में दल-दल गन्ध भरा है
नेताओं में भ्रष्ट आचरण, आज खरा है
अलंकार,रस,छन्द चरण कवि अर्पण करता
श्रृष्टि संरचना कैसी हो, छवि दर्पण धरता

तुलसी सूर, कबीर राष्ट्र की अमुल्य निधि है
धर्म मजहब निर्पेक्ष बने, बस! एक विधि है
राजनीति मजहब के डबरे खोल रही है
जाति-पांति का जहर जगत में घोल रही है

आजादी का गीत कवि ने ही गाया था
स्वाभिमान का पथ भारत को दिखलाया था
भीडो में बस ! नेता शक्लें दिखलाते है
फसल हमारी, काट-काट कर ये खाते हैं

सूर्यकान्त त्रिपाठी , दिनकर और निराला
राष्ट्र-गीत को बकिंम, रविन्द्रनाथ ने पाला
श्रृंगार , रोद्र को, वीर रसों में ढाल रहे थे
आजाद हिन्द को,हम कविता से पाल रहे थे

अब तो ये वेतन भत्तों पर भी जीते हैं
हम सींचते लहु वतन पर , ये पीते हैं
आदर्श कवि है , मंचो पर मन भावन,सावन
ये राजनीति मारीच, कहीं लंकापति रावन

नेता जी! तुम राष्ट्र - गीत को भूल गये हो
सत्ता और शियासत , मद में फूल गये हो
आत्म ग्लानि की पीडा से , कविता रोती है
क्यों राजनीति और कविता मंचों से होती है?

जनता को कवि कविता में रस दिख जाता है
राजनीति में नेता बातों की खाता है
राष्ट्र सृजन श्रृंगार नियन्ता कवि होता है
इतिहास गवाह है नेता से भारत रोता है
  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com