Wednesday, March 30, 2016

लाश में आस
हे बद्री भगवान उठो अब जागो प्यारे
क्यों घूम रहे हैे उत्तराखण्डी मारे - मारे
उत्तराखण्ड बनाने वालो के घर फूंको
राज्य बनाने वालो के मुँह पर भी थूको
बज्रपात कर बरसादो, शोले - अंगारे
हे बद्री भगवान उठो अब जागो प्यारे

सब नंगे - भूखे, थोकदार तूने पनपाये
सारे डाकू शरण में तेरी भोग लगायें
उत्तराखण्ड में तेरे नाम की लूट मची हेै
राजनीति में तेरी इज्जत कंहा बची है
करते हैं फिक्वाल सभी अब वारे -न्यारे
हे बद्री भगवान उठो अब जागो प्यारे

कफन आपदा का नेता ने बेचा खाया
लाशों में भी ढूंढ रहे थे नेता माया
उडन खटोले, लेकर टोले घूम रहे थे
गिद्व सियासी कंकालो को चूम रहे थे
नेताओं की शक्ल देख कर मुर्दे हारे
हे बद्री भगवान उठो अब जागो प्यारे

राजनीति का संकट घर में गहराता हेै
न्यायालय की शरण में नेता चिल्लाता है
अब सारे डाकू न्याय कार्ट से मांग रहे हैं
अधिवक्ता भी अपनी सीमा लांघ रहे हैं
न्यायाधीश भी घूम रहे हैं मारे-मारे
हे बद्री भगवान उठो अब जागो प्यारे

रघुनन्दन भी भालू, बन्दर पनपाते हेैं
सब कांग्रेस के बीहड से डाकू आते हैं
कुछ जेब कतरने वाले माया के चेले हेैं
यू0 के0 डी0 के लावारिस भी अलबेले है
उत्तराखण्ड में चमक रहे हैं चाँद सितारे
हे बद्री भगवान उठो अब जागो प्यारे

जागो हे केदार पुनः ताण्डव दिखलाओ
हम को छोडो ,केवल नेताओं को खाओ
ये जैसे पहले थे, वैसा नंगा कर दो
एक बार फिर से कुछ ऐसा पंगा कर दो
अग्निवृष्टि की करो प्रभू इन पर बौछारें
हे बद्री भगवान उठो अब जागो प्यारे

मैं आग वेदना की छन्दो से नित गाता हूँ
शब्द लपट से मुर्दो को नित समझाता हूँ
ग्लूकाेष चढाकर शवो में आशा पाल रहा हूँ
मैं श्वांस नली से हवा कफन में डाल रहा हूँ
अब कवि आग भी मुर्दो की बस्ती से हारे
हे बद्री भगवान उठो अब जागो प्यारे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Tuesday, March 29, 2016

पहाड की दहाड
सत्ताइस नक्षत्र, ग्रह नौ उत्तराखण्ड को चाट रहे हैं
पञ्च महाभूत निर्दलीय माल सियासी काट रहे है
और 29 बी.जे.पी. के शिखर में सत्ता छांट रहे हैं
36 व्यञ्जन देव-भूमि को दानवता में बांट रहे हैं

हवन हवि को सारे डाकू, हवन कुण्ड में डाल रहे हैं
चोर मण्डली में चोरों को चोर,चोर खंगाल रहे हैं
उत्तराखण्ड में, उत्तराखण्डी ही बीहड को पनपाते हैं
दशको से इस देव-भूमि में डाकू ही चुनकर आते है

16साल के भरे यौन में,आठ खसम करके छोडे हैं
उत्तराखण्ड की राजनीति में अय्यासी के ये घोडे हैं
दो साल में खसम छोड कर सत्ता, विधवा जाती हेै
नगरवधू भी राजनीति में देव-भूमि का सहलाती है

टिकट सियासी,हानीमून के न्यायालय से मांग रहे हैं
उत्तराखण्ड में सारे नंगे ,वस्त्र सियासी टांग रहे हैं
टी.वी. चैनल इन नंगो के अंग-भंग को दिखलाते हेैं
कुछ चैनल तो इन नंगो के कारण ही रोटी खाते हैं

देव-भूमि भी देवदास और देव - दासीयों को ढोती है
बलात्कार से लुटि पिटि पर्वत की जनता क्यों रोती है
राजनीति के वैश्यालय में रमण-भ्रमण ही तो होता है
उत्तराखण्ड तू,बलात्कार की घटनाओं से क्यों रोता है

राजनीति में कौव्वे भी तो हंस भेष में दिखते हैं
उत्तराखण्ड में,ठाकुर,पण्डित, वैश्य,शुद्र सब बिकते हैं
राजनीति के सारे कुत्ते खडे हुये नीलामी में
डुब रहे हैं शवान सभी, इस सागर समर सुनामी में

सतीत्व बचाना है अपना तो केन्द्र समर्पित हो जाओ
नासूर बने इन घावो के,भावो को अब ना सहलाओ
जो भी नेता जंहा दिखे, बस जूते मारो सालों के
बस, कवि आग कंकाल फूंकने बैठा यंहा दलालो के।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Monday, March 28, 2016

हर युवा इस देश का बे-वक्त बूढा हो गया
एक रात में पैदा हुआ और ईश्क करके मर गया
अब नर नही,किन्नर
हमें नेता बनादो तुम हम वो कर दिखायेगें
वतन की आबरू पर भी मिटेगे मर दिखायेगें
झाडू ही लगाना है तो सरहद पर लगायेगें
सुषमा ने कहा था हम दश नर - मुण्ड लायेगें

अब तुम चूडियाँ पहनो हूकूमत छोड दो हम पर
भरोसा करके देखो तो,इस किन्नर के दम-खम पर
ना आगे है ना पीछे है, वतन को हम बचायेगें
तिरंगा हाथ में दे दो, कंराची तक फहरायेगें

इस पाकिस्तान की हरकत से,कितने घर उजाडोगे
सियासत की सडक पर,अब कंहा तक तुम दहाडोगे
भरोसा खो चुकी जनता, इन खादी के नमूनो से
ये सरहद लाल होती है क्यों फौजो के खूनो से

तुम्हें अब है कंहा फुरसत,भारत माँ की छाती की
नेता को तो चिन्ता हेेै,वतन में और ख्याति की
वजीरों का चौराहो में चिल्लाना अखरता हैेे
सरहद का सिपाही क्यों ,यंहा बे-मौत मरता है

इधर बंग्ला, उधर चीनी भी,हमला रोज करते हैं
सियासी कारनामे तो, अब सबको अखरते हैं
ये नैपाल मण्डी है, बस, खुले बाजार में घूमों
क्या खाला का घर है ये, जंहा चाहो वंहा झूमो

हम नाचेगें भी गायेगें भी, पर भारत को बचायेगें
हमें मौेका मिलेगा तो ,हम पाकिस्तान जायेगें
जूते चार मारेगें, उन शरीफो के नवाजों को
कुचल कर आयेगें उनके तवायफ तख्त,ताजों को

तुम्हारी कूटनीति से यंहा आवाम मरता हेै
तुम्हारा ये तरीका भी हम सबको अखरता है
तुम्हारी बात सुन करके,यंहा कुछ आस जागी थी
ये इतिहास कहता है कि ये सत्ता ही अभागी थी

किन्नर हैं,ना हिन्दू हैें,ना मुस्लिम हेैं सियासत में
हमें तो नाच, गाना ही मिला हैे इस विरासत में
वतन की रोटियां खाकर हम जीवन चलाते हेैं
हम ना मर्द होकर भी वतन के गीत गाते है

हमें बस ,एक मौका दो कुछ करके दिखाने का
हमें बस एक मौका दो, माँ का दर्द गाने का
हम फौजों साये में ही ,वो कुछ कर दिखायेगें
जो तुम में बुझी है आग वो ,फिर से जगायेगे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Sunday, March 27, 2016

देव-दानव-द्वन्द
देव-भूमि में दिग्गज दानवखेल रहे हैं
संविधान के पन्ने सत्ता झेल रहे हैं
इन्द्र,कुबेर सब काया, माया बांट रहे हैं
पाले कुत्ते ही मालिक को काट रहे हैं

राम-भक्त रावण की नीति अपनाते हैं
सभी विभीषण सत्ता से रोटी खाते है
हनुमान भी पूंछ दबाकर खडा हुआ है
जामवन्त निर्जीव धरा में पडा हुआ है

लक्ष्मण,मेघनाथ भी गोली खेल रहे हैं
भरत,शत्रूघ्न अवध में होली खेल रहे हैं
त्रिजटा,ताडका,सीता माँ को बहलाती है
गीत सुमंगल,मन्दोदरी,कैकयी गाती है

दशाशीश, रघुनाथ सियासत देख रहे हैं
जामवन्त दुविधा में आंशू फेंक रहे हेैं
दानव - देव ,दलाली के दीदार हो गये
देव भूमि में दुश्मन सारे यार हो गये

नंगे - भूखे छप्पन भोगों की आशा में
राष्ट्र-भक्त भी राष्ट्र द्रोह की अभिलाशा में
असमंजस में चार धाम भी मौन खडे हेैं
सब पूछ रहे है ईश्वर से ये कौन धडे हैं

ठाकुर,पण्डित,वैश्य,शुद्र ही अवतारी हेैं
उर्वशी,मेनका,रम्भा जैसी कई नारी हैं
योग-भ्रष्ट सब इन्द्रासन की तैय्यारी में
यक्ष,देव, दानव,किन्नर सब तकरारी में

ये दानव संग्राम शिखर को तोड रहा हेै
भूत,प्रेत, जिन्न, देव-धरा में दौड रहा है
हम देवभूमि में निशाचरों को पाल रहे हेैं
कवि आग तो लपट में ईंधन डाल रहे हैं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, March 26, 2016

शिखरों के स्वर
मौन है अविचल हिमालय राष्ट्र-रक्षा के लिये
ग्लेशियर गलता है तो गंगा सुरक्षा के लिये
हम सींचते हेैं देश को बस आबोदाने के लिये
मजबूर हॅूं मैं अब सियासत् को डिगाने के लिये!!

हे ! पर्वत के परं वीर , तुम प्रहरी हो प्रमाण बनो
संकट हेै पथ कंटक का तूरीण, धनुष और बाण बनो
जन-जन की दृष्टि है तुम पर,तुम उठो पुनः परित्राण बनो
ये प्रखर वेदना पर्वत की कहती हैे तुम कल्याण बनो
शिशुओं की तरह सियासत् में हम जिन्हें पकड़कर लाये थे
ये मोहरे थे सतरंजो के जो हमने स्वयं बिछाये थे
हम सीधे - साधे लोगो को ये शकुनि समझ नही पाये
शिखरों की शस्य सियासत में ये डाकू बीहड से आये
हे!शिखरों के स्वाभिमान कुछ ऐसी अलख जगादो अब
जिनसे भी दगा मिला हमको उस दल में आगलगादो अब
जो खडे़ तुम्हारे कारण हैं, उनको अहसास दिलादो अब
ये खेल नही हैे दिल्ली का, उनको ये खेल सिखादो अब

दरिया दिली दलालों से क्यों शीश शिखर का झुकता है
क्यो गंगा,यमुना का जल भी इस प्रदूषण से ऱुकता है
सर्कस के सारे जोकर ही अब घूम रहे हैं तारों में
बीहड के डाकू छिपे हुये हैं चुनी हुयी सरकारों में

जिस देव-भूमि का मालिक ही करता हो खेल करोडों में
जो मुकुट हिमालय भारत का रखता लावारिस रोडो में
जो नंगी - भुखी जनता के मन्दिर में चुनकर आते हों
जो आंख मूंंद कर नर-भक्षी बस, लाश हमारी खाते हों

अब जुते मारो उन सबके, इस देव - भूमि से दूर करो
थोडी भी इज्जत बाकी हो,पकडो और हमले क्रूर करो
जितना भी अब तक लूटा है,सब सासन से सम्बद्ध करो
उत्तराखण्ड में रहने के, अधिकार सभी के ऱद्द करो

आदिकाल से शिखरों पर असुरों का आना -जाना है
क्यों दुनिया भर के चोरों का ये उत्तराखण्ड ठिकाना है
धर्मो की भांषा बोल रहे हैं डाकु टी0 वी0 चैनल पर
कवि आग की लपटों से ये, आग लगादो पैनल पर।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
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Friday, March 25, 2016

लिंग के किंग
ये भारत क्या माता है,या भारत भाग्य विधाता है
दो लिंगों के बीच फंसा ये राष्ट्र खडा कहराता है
तात-मात के द्वन्द में देखो ,लडते सारे भ्राता हेै
सबकी अपनी-अपनी ढपली अपना राग सुनाता है
अब राष्ट्र -भक्त की परिभांषा भी नेता हमें बताता है
ये भारत क्या माता है,या भारत भाग्य विधाता है

जांति,पांति और कौम ,कबीले भटक रहे लावारिस
मां में ढूंढो,बाप में ढूंढो, ढूंढो अपने-अपने वारिस
भारत मां की राष्ट्रभक्ति की बच्चे करें सिफारिस
वन्देमातरम्,जयहिन्द जैसी,कर्कस स्वर की बारिस
जिसको जो अच्छा लगता है उसको वही लुभाता है
ये भारत क्या माता है,या भारत भाग्य विधाता है

अखण्ड राष्ट्र की भांषा अब तक किस नेता ने गायी
हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख, इसाई सब वोटर हैं भाई
सम्प्रदाय, मजहब की भांषा, नेता ने समझायी
मौन खडी है भारत माता ,कैसी पीर परायी
झगडे से भीमुल्ला,पण्डित, साधू, सन्त का नाता है
ये भारत क्या माता हेै,या भारत भाग्य विधाता है

भारत मां की जय कह कर सब पनप रहे हैं डाकू
हर मजहब में पनप रहे हैें कीडे सभी लडाकू
क्या राष्ट्र तिरंगे और खादी ने व्यााधी ही पनपायी
मां की इज्जत लूट रहे हैं, नेता खटिक, कसाई
खोल रहे हैं मां की इज्जत पर सब नेता खाता है
ये भारत क्या माता हेै,या भारत भाग्य विधाता है

कांग्रेस, बी0 जे0 पी0 हो या बाम पन्थ के पन्थी
बने हूये है धर्म, मजहब में ग्राहक ग्रन्थ के ग्रन्थी
नेता और अभिनेता दोनो शिक्षा को भटकांए
अब सारे नेता अनपढ भौंदू शिक्षालय में जायें
विद्याालय में जाकर नेता क्यों औकात दिखाता हेै
ये भारत क्या माता हेै,या भारत भाग्य विधाता है

जिन बच्चों को पढने भेजा, सडा रहे हैं भेजा
राजनीति ने लावारिस बच्चो का भाग्य सहेजा
शिक्षा मे अपशिष्ठ आवरण एक कनैह्या आया
इस शिक्षा ने, शिक्षा-दीक्षा, गुरूकुल को भटकाया
कवि आग ये लुटि-पिटी अब भारत गौरव-गाथा है
ये भारत क्या माता हेै, या भारत भाग्य विधाता है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
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