Sunday, May 31, 2015

                     दर्द के हमदर्द
बन  रही  थी  आपदा  भी   सम्पदा  सरकार की
हरकते   देखो  सियासत  के   सबब   दरबार की
कब  कंहा  कितने  मरे  अनुमान   भी  होते नही
जनमतो   के  ये  गधे  अब  बोझ  भी  ढोते नही
तन्त्र  के   शडयन्त्र  में  खेती  है  खरपतवार की
बन  रही  थी  आपदा  भी   सम्पदा  सरकार की
             
बह गये  सब  खेत और खलियान इस तुफान में
खप   गये   हैं   लापता   परिवार  इस  उफान में
छुट गये,  कुछ  गिड  गिडाते  सें शिशू शैवाल में
ये हिमालय  का  शिवालय  हो गया महाकाल में
बे - समय  की  मौत  से  चित्कार हा-हा कार की
बन  रही   थी  आपदा   भी  सम्पदा  सरकार की

मौसमो  के  यन्त्र   भी षडयन्त्र  करते  जा रहे थे
बर्शात में  भी शुष्कता  के गीत खुलकर गारहे थे  
मेघ ,मौतों  का निमन्त्रण देख कर घबरा रहे  था
ये सियासी  गिद्ध क्यों आकाशा  में  मंडरा रहे था
विभत्स  में  भी  राजनीति  देख लो  फनकार की
बन  रही  थी  आपदा   भी    सम्पदा  सरकार की 

लाश  के  उपर  कफन  को  भी  चुरा  कर खा गये
इन पर्वता पर  अब सियासी   चील, कौवे आ गये
अब लंच, डीनर आपदा  की खुद बयानी कर रहे हैं
तन्त्र के खच्चर सियासत से  शिखर को चर रहे हैं
इन  नौकरो , नेताओं  में   कैसी, कहानी   यार की
बन  रही   थी  आपदा   भी   सम्पदा   सरकार की

नौकरों  की  मल्कियत  में  भी  किफायत हो गयी
राजनीति  में  सियासत  अब   शिकायत  हो गयी
अब  पैरवी   होती   है,  पर्वत  शर्म  से शर्मा रहा है
क्यों सियासी गीत  नौकर-साहों  के  ही  गा रहा है
क्यों  पर्वतों  में  हो रही  निलामीयाॅं  घर - बार की
बन  रही  थी   आपदा   भी   सम्पदा   सरकार की 

दुःख  दर्द  दीनो  के  दरिन्दों  को  नजर आते नही
चील, कौव्वे   चैन   की   भी  धुन  कभी गाते नही
अधमरे   शमशान   के   शव  राजनीति  खेलते हैं
अर्द्ध - चेतन   से   मरे   मुर्दे,   सियासत  झेलते हैं
मेरी कलम  में  भी लपट  है‘ आग ’के चिन्गार की
बन   रही   थी   आपदा  भी  सम्पदा   सरकार की ।। 
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     मो09897399815
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Saturday, May 30, 2015

         पद में-कद में-हद में-मद में
बे - बाक  खडी  है  सास बहु  की तैयारी में
बहुत  मजा  है  राजनीति  की  इस यारी मे
बडो - बडो  के  जीवन अनुभव  फेल हो गये
हम समझे थे साण्ड जिन्हे,सब बैल हो गये

सास  बनो  या  बहू,  खुले आँगन  में डोलो
झेप  मिटानी  हो  तो  बस,   अंग्रेजी  बाेलो
सभी  रोग   सुन्दर  शब्दो  से  दब  जाते है
श्रृंगार रसों  के  गीत  सियासी  सब गाते हैं

महत्वपूर्ण  पद में भी  नारी कद में भारी है
इस राजनीति में  नारी   सबकी  लाचारी है
अब  हारे  हुये  जूँवारी   सट्टा   लूट  रहे है
ये सारे  अजगर  माल  श्वांस  से घूट रहे है

तर्को  और   कूतर्को  से   सासन  चलता है
भारत   में   तो  नेता   शब्दो  से  पलता है
अब रिक्शा मन्त्री   भी   शिक्षा मत्री होते हेै
सौन्दर्य प्रसाधन, मानव   संसाधन ढोते है

इलाहबाद  का  वंश,  कभी   अमरूद रहा है
ब्रह्मचारी  बछडा  राहुल  भी  तो कूद रहा हेै
तुम हारी हो  फिर भी भारत  शान  रही हो
बच्चे को भी  वयस्क अभी से मान रही हो

इस  राजनीति  में  नंगा  होना ही पडता है
विपक्ष  वही  हैे ,अन्दर, बाहर जो लडता है
ये शब्द दंश  के सत्ता में क्यों  झेल रही हो
अब नेता  होकर भी बच्चो से खेल रही हो

जितना  ज्यादा   बोलोगे  उतना   झेलोगे
कब  तक  राजनीति  को शब्दो  से ठेलोगे
जब नारी मौन रहे समझो  भारत माता हेै
कवि आग तो मस्ती में  सब कुछ गाता है।।
      राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
           मो09897399815
   rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, May 28, 2015

   गुर्दा है,पर मुर्दा है
सेवा   करना  राजनीति   का   काम   नही है
नेताओ  में  राष्ट्र  -  भक्ति  का   नाम  नही है
मजहब,  कौम,  कबीले   बीहड  बन  जाते हैं
ये  सभी  नमूने  बीहड से  चुन  कर  आते हैं

जब  जैसा  बीज  पडेगा, फल  वैसा  आयेगा
अब प्रजातन्त्र  का  राष्ट्र - गीत   डाकू गायेगा
सम्भ्रान्त प्रान्त से रिपुदमन चुनकर आते है
लोक - तन्त्र  है , जन- मत जोकर बहलाते है

हम  डेढ  अरब  के मुर्दो  के  शमशान घाट है
मुर्दो  में  भी  जाति,मजहब के अलग बाट है
कुछ  मुर्दो   के  शब्दो   में   भी  चमत्कार हेै
इन  सभी   दलो   में   ऐसे  मुर्दे  दो - चार है

ये  कबर  के  बिज्जू लाशों को  ही छाँट रहे है
वतन   के   टुकडे   मुर्दे   ही  तो   काट रहे है
कुछ  सडी  गली  लाशों ने ऐसे  जाल बिछाये
मेरे   देश   में   सभी   पडोसी    नंगे   आये

चोर, उचक्के , डाकू   के   हम   भी  पोषक हैे
हम  बीहड  के  पालक  है, हम  ही  शोषक है
किस्म-किस्म  की  व्याधि, खादी पाल रही है
जनता भी सब देख  रही  है,  बस,टाल रही है

मैं  भी  मुर्दा हूँ, लेकिन कुछ  को जगा रहा हूँ
ग्लूकोष  के  छन्द   कलम   से  लगा रहा हू
प्रतिभा  तो  है, कुछ में, लेकिन मौन पढी है
ये  भी  तो  मुर्दे  प्रजातन्त्र  की   एक कडी है

कुछ  मुर्दो  को कर्कसता  भी  जगा  ना पायी
मुझे  बताओ  भारत  का   क्या   होगा  भाई
तीन  दशक  से  मैं भी  जीवन  खपा  रहा हूँ
फेस - बुको  में  केवल   कविता  छपा रहा हूँ

चेतनता   के   भाव   हृदय  में  आ  जाते हैं
कुछ  जिन्दो  को  मुझ   जैसे   मुर्दे  भाते हैं
यही सोचकर कुछ ना कुछ  लिखता जाता हूँ
मै  कवि  आग  हूँ शब्द   शवों के ही गाता हू ।।
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     ऋशिकेष
              मो09897399815
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                         आरक्षण
देश में फिर आरक्षण का जिन बोतल से बाहर आया
फिर से प्रजातन्त्र  में एस.सी,एस.टी  कोटा लहराया
अगडों,पिछडी  सैना   में  महाभारत  संग्राम मचा है
संविधान के  हर पन्ने में,  राजनीति,कोहराम रचा है

सभी सियासी अपना जनमत  आरक्षण में ढूॅंढ रहे हैं
खुंडे   चाकु ,छूरों  से नर - मुंड  झुण्ड  के मूॅंड  रहे हैं
कामुकता की वर्ण-शंकरीे नश्लों  ने क्या मोड़ लिया हेै
ब्राह्मण, ठाकुर,वैश्य,शूद्र का पैमाना  भी तोड़ दिया है

रक्त-चाप का क्रन्दन, बन्धन  दौडेगा  हर  चौराहों में
वर्णशंकरी जनमत,जनता,राजनीति की गलबाॅंहों में
अब तो मुझको भीशक होता है बच्चों के संस्कारों में
काम - वाशना  बना  रही   है परम्परायें  सरकारों में

मेरे  घर  की  आॅंगन - बाडी , बीज  पडा परदेशी का
संस्कार  स्वयं ही बोल रहा है,पौधा किसी कुरैसी का
ठाकुर, पण्डित, वैश्य, शुद्र के  बीज पडे़ अय्यासी से
अपने  घर  की   खेती   बंजर, हरियाली  है दासी से

कंहा - कहा  ढूॅंढो आरक्षण ,इन खूनो के मजमूनो  में
कैसी - कैसी   हरकत  है  नश्लों  के  नब्ज  नमूनो में
अब  कैसे  पहचानोगे   कोटे ,  खोटे और  लंगोटे को
प्रजा-तन्त्र  की  अय्यासी  में  ढूॅंढो   उस  परकोटे को

आरक्षण  क्याें  माॅंग रहे  हो जन्म -  जात  पैमाने से
शदियों   से   प्रमाण  कर्म  है ,खाने  और  कमाने से
शिक्षा ,दीक्षा  और समीक्षा को  जीवन आधार बनाओ
नयी कौम को आरक्षण की राजनीति से ना भटकाओे

हर गरीब  को आरक्षण  की उस परिधी  मेंलाना होगा
हर तपके की शिक्षा सम हो,ऐसा नियम बनाना होगा
उंच-नीच  की राजनीति  को दिल से दूर भगाना होगा
भारत  माता  के  बच्चों  का सबका एक घराना होगा

ये मापदण्ड स्वीकार करो  बस  सबसे सस्ता नुक्ता है
हास्य-व्य!ग की कविता में हर षब्द यहाॅं पर पुख्ता हेै
आरक्षण  आधार   बनाओ डी. एन. ए , की  जाॅंचो से
असर ‘आग ’का  होता  है, जलते शब्दों  की आॅंचो से!!
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                              ऋशिकेष
                        मो09897399815
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Wednesday, May 27, 2015

          (राघवेन्द्र अवस्थी जी की टिप्पणी पर)
 साध्वियां राजनीति के मंच पर क्यों जातीं ? उमा भारती का उद्देश्य और अभीष्ट क्या है ?
उनके कौसेय वस्त्र धारण करने का अर्थ क्या है ?
गंगा की अविरलता के लिए उनका स्टैंड क्या है ?
पिछले एक बरस के दौरान गंगा कितनी और कहाँ -कहाँ मुक्त हुई ....क्या वे बताएंगी ?
गंगा के लिए अपने जीवन काल और मंत्री काल में उनका संकल्प क्या है ?
उन्हें आज अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए ...
राघवेंद्र अवस्थी ,          
                      गंगा की वेदना
नित  बन  रही अट्टालिका  गंगा  नदी  के  तीर में
मल-मूत्र  देखो मिल गया  माता के निर्मल नीर में
आश्रमों  मठ  मन्दिरों  से मल  छलकता जारहा है
भगवान  का  ही  भेष भागीरथ  की गंगा खारहा है

जल में मल की हल चलों से बन गया अमृत जहर
आज  तो   धर्मात्मा   भी  कर  रहा  माॅं  पर  कहर
सुर सरीता  शौच   स्थल   हर   नगर  हर  गाॅंव में
क्रीडा-स्थल  हो  गया  व्यवसाय  बन कर  नाॅंव में

जहान्नवी  का  नीऱ  अब बाजार में भी बिकरहा है
मौन  हिन्दुस्तान  है ,स्पष्ट  सब  को  दिख  रहा है
मर  रही  है  मछलियाॅं  हर  घाट  पर   बे  भाव से
नासूर  बनता जा रहा  है क्यों  धर्म  अपने घाव से
         
युग - युगों  से  फूॅंकते  हैं  हम  शवों  को  तीर  पर
विष  की  वृष्टि  हो  रही  माता  के  निर्मल नीर पर
आश्रमों  की  गन्दगी  गंगा  ही  ढोती   जा  रही है
माॅंता  शिशू  के कर्म से अस्तित्व खोती जा रही है
                 
गति धार माॅं की रोक  कर बस डाम बनते जायेंगें
अधर्म की इस आस्था से हर मजहब मिट जायेंगें
स्नान  देवों   का  यहाॅं  होता  था  निर्मल  नीर से
आॅंशू  टपकते  देखता  हूॅं ,माॅं  के  हृदय में पीर से
                
गौमुख से गंगा सागरों तक जल से जीवन बाॅंटती
निश्चल  धरा  की  ये  धरोहर  पाप  सबके काटती
धर्म से  और  कर्म  से  व्यवसायी  रोटी खा रहा है
घाट  पर  ढोंगी  भगत  गंगा  की  गाथा गा रहा है
                  
ये  धर्म   की  अवघारणा  अन्तर्मुखी  का  योग है
आज  तो  व्यवसाय  में  गंगा  बनी  बस  भोग है
मन  भी  निर्मल नीर  सा  स्वछन्द बहना चाहिये
वात्सल्यता की सुरसरि को निष्कपट मन चाहिये

गंगा  सुरक्षा की  समीति बन  रही  हैं हर घाट पर
धर्म   के   व्यवसायी   देखो   जी   रहे  हैं ठाट कर
क्यों  सनातन  सुर  सरिता  राष्ट्र - गंगा  हो रही है
बैकुण्ठ  की पहचान डबरोंमें सिमटकर  खो रही है
               
छोड  दो  गंगा  को  गंगा  पर  स्वयं  बच  जायेगी
कौन  कहता  है  कि  माॅं  अपने  शिशू को खायेगी
ये  हमारी  धारणा  माॅं  के   प्रणय   को  तोडती है
गंगा  सनातन  राष्ट्र  को  वात्सल्यता से जोडती है

मठ ,आश्रमों  की गंदगी गंगा में जब तक आयेगी
क्या कलयुगी  भागीरथों  से  आबरू  बच  पायेगी
तीर्थ  तट  जहान्नवी   से   मन   विरक्तों   मोड दो
माॅं  की त्वरा  और   धार को माॅं के हवाले छोड दो!!
      राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
 352 चन्द्रेष्वर मार्ग नावघाट मायाकुण्ड ऋशिकेष
                  मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

 यह रचना बडे खिन्न मन से लिखी  गयी है, पाठकों से निवेदन है कि यदि रचना अच्छी लगे तो अवश्य धर्म के उन ठेकेदारों तक पहुंचाइये जो  आज कल टी.वी. चैनलों पर गाय माता की  वकालत कर रहे हैं, तभी यह रचना सार्थक होगी ।                

                         धेनू-वेदना
धर्म,  धेनू   और  धरा   व्यभिचार   से  लाचार  है
ये  सनातन   की  धरोहर   क्यों    बनी  व्यापार है
संगठन  बनते  तो  हैं  पर  क्यों   सुरक्षित  है नही
कुछ तो कमी  है  आस्था  में  जो  हमें दिखती नही

अवलम्ब है जो इस धरा  की  आज  क्यों  चौराहे में
मूक  हो  कर  क्यों   खडी  धेनू  धरम्   के साये में
धर्म   के   उद्घघोष  में   जयकार  होती  जा रही  है
आज  मेरे  देश   में  गऊ   गन्दगी  क्यों खा रही है

तैंतिसों   कोटि   के    देवों   को   हृदय  में  धारती
गौ-धाम की  नित  हो  रही मठ  मन्दिरों में आरती
घर   से    बेघर   हो   रही   धेनू  सनातन  देश  में
गौ  सेवकों   को   देख   लो   आडम्बरों  के भेष  में

आश्रम  व्यवस्था चल  रही  है  गाय माॅं के नाम से
नित बन   रहे  हैं  संगठन  गौ - वंश  के  पैगाम से
ऐसी  व्यवस्था    आश्रमों    के   हाथ  होनी चाहिये
हे!---   विरक्तों   काम - धेनू    को    सुरक्षा  चाहिये

ये दिव्य रचना  ब्रह्म  की  मानव  परीक्षा  ले  रही है
युग -युगों   से  नाव  मानव   की  धरा में खे रही है
आडम्बरी ,   अज्ञानता    धेनू     सुरक्षा     गायेगी
वेदना  गौ -  वंश  की  इस  सृष्टि  को   खा  जायेगी

हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख ,इसाई  में ना माँ को बांटिये
मजहबों  के  मर्म  से, ममता   ना  मां  की काटिये
माँ नही, सब  बैल, बछडों  की   हिफाजत  कीजिये
मदिरा  समझ मां के  हृदय  की वेदना मत पीजिये

बस ! एक  रोटी  हर  घरों  से  गाय माॅं  के नाम की
ये  धरोहर   फिर   बनेगी   अास्था    घनश्याम की
सम्पन्न  होगी  ये  धरा   गौ - वंश  ही  के नाम से
मोक्ष  की   परिकल्पना   है   शास्त्र  में  गो-धाम से।।

              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
352 चन्द्रेष्वर मार्ग नावघाट मायाकुण्ड ऋशिकेष
                मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

Tuesday, May 26, 2015

               परीक्षा से पहले परिणाम
कुछ के  अच्छे दिन आने हैं,कुछ के बूरे दिन आने हेैं
सात  दशक  से राजनीति में गिने,चुने ये ही गाने हैं
काग,गिद्व,गीदड जंगल के सत्ता का  सुख भोग रहे हैं
जो जनमत से हार गये हैं वो प्रजातन्त्र में रोग रहे हैं

इस  सत्ता  में  हार  गये जो, च्वनप्रास ही चाट रहे हैं
स्मृति रानी, अरूण  जेतली, पूरी  मस्ती  काट रहे हैं
संघ,जंग  के  रंग  सियासी  सत्ता  रण में कूद पडे हैं
पी.एम,सी,एम. कोई  भी  हो, इनके  ही वजूद बडे हैं

तुमने पन्द्रह  लाख  दिये ,अब  कांग्रेस गाडी बाटेगी
फर्जी  नेता, मूरख  जनता प्रजातन्त्र  है फिर छाटेगी
मेरे  बाप  का  क्या जाता है जो मूंह में आये बोलूंगा
भूखे - नंगे जनमत की औकात  देख कर ही तोलूंगा

लेबर  सस्ती, बंजर  धरती  सब  परदेशी  देख रहे हैं
अनुमानो  से नाप तोल कर भीख बराबर फेक रहे हैं
शेखचिल्लि के सपनो में ही पूराभारत  मस्त खडा हैे
प्रतिष्पर्धा में सभी भिखारी झगड रहे हैं कौन बडा है

केवल जनता ही विधवा है श्वेताम्बर  को  देख रही है
राजनीति के इन साण्डों पर कातर दृष्टि   फेंक रही हेै
हानीमून मनाने वाले ,साण्डो  से  भयभीत  खडी हेै
मेरे देश मेंराजनीति ही व्यभिचार की  मुख्य कढी है

नंगे भूखे अच्छे दिन की परिभांषा को समझ पायेंगे
बूरे दिनो  में जीने  वाले मध्य - वर्ग  ही  तो आयेगे
नीचे गिरना, उपर उठना, इधर कूँआ है उधर खाई है
मध्य-वर्ग की जोरू भैय्या आज सियासी भौजायी है

काले-धन  के  सारे  खाते  खंगाले  तो खाली निकले
भांषण  के बड-बोले  बाबा,नेता सभी मवाली निकले
सुन्दर सुन्दर शब्दो मे श्रृंगार उछलकर  बोल रहा था
कवि आग भी नेताओ की गन्द,द्वन्द में  डोल रहा था।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                      9897399815
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Monday, May 25, 2015


                    वर्ष में-अर्स या फर्स
दागी,बागी और  अनुरागी,  राजनीति की  हरियाली है
नेता  प्रजातन्त्र  के जीजा, हम जनता इनकी शाली हेैं
डाकू, चोर, उचक्के, कतली  ही  तो  भारत चला रहे हैं
लोकतन्त्र  में  बोट - बैक  की  होली  नेता जला रहे हैं

चुनने  से पहले के  भाषण  सुनकर जनता  शर्माती है
नेताओं  को  याद  दिलाओ, इनको शर्म  नही आती हैेे
केवल कुर्सि को  हथियाना, राजनीति  का  ही फण्डा है
शब्दजाल से जनता को  बेवकूफ  बनाना  हथकण्डा है

महाकष्ट है पढी,लिखी जनता  भी  पागल बन जाती है
असमजस होता है,जनता  क्या कुडा  करकट खाती है
पशू,पक्षी  भयभीत  पथों  पर, जाने  से भी घबराते हैं
जानवरों  से  बद्तर  हम  है,बार-बार  पथ  दोहराते है

मुजरिम की है जगह  जेल  में उनको सत्ता पाल रही है
अपराधी  की  प्रतिभाओं  में  भारत  को खंगाल रही है
मुझे बताओ,अब किस मूह से तुमको बुद्विमान कहू मैं
छल,कपटी वाणीभूषण को असली  हिन्दुस्तान कहू मै

ये झूठे नेता हटे देश से ,अब  क्या कोई  कानून बनेगा
लाल बहादुर  जैसी  प्रतिभाओ के  तन का खून बनेगा
छल,बल,कपटी,मक्कारों  के  नेता  को कितना ढोओगे
हे प्रजातन्त्र की मुर्दा लाशों,कब तक जनमत से रोओगे

काले - धन  की  आशा-तृष्णा,हर  खाते को झेल रही है
लावारिस का  बीमा, जन-धन,घर-घर सत्ता खेल रही है
ये  चमत्कार  है,शब्दो  से ही  नेता  हमको  पाल रहे है
हम  सब  कुर्बानी  के  बकरे, गले  में  छूरी  डाल रहे है

मंहगायी   बढती  जाती   है,  सीमा  के  झगडे  जारी है
जिनको  दोस्त  बनाकर  आये, खेल  रहे  सब गद्दारी है
अन्नदाता  के विक्षत शव पर,कफन षब्द से पहनाते है
कवि आग की हिम्मत देखो,इन  पर भी कविता गाते है।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                        9897399815
            rajendrakikalam.blogspot.com

                         मजबूरी
भ्रष्टता  पर  अब  कलम  का  वार भी बेकार है
ये   बे-हया   सी  राजनीति   बेवफा   बेधार है
कुछ पता चलता नही  कब कौन सा नेता कंहा
कौन से  दल  से दबा है कौन  दल  देता पनाह

राजनेता  की  नजर  सत्ता  शिखर  पर है  गढी
वाशना  के  खेल में इस  देश की  किसको पढी
लक्ष्य दिल्ली को बनाकर  राजनीति  हो रही है
धृतराष्ट्र  की  औलाद देखो बीज कैसे  बो रही है

हर  जगह  शकुनि  के पासे चौपडों का  खेल है
ये   कौरवों   की  राजनीति  मेल  है   बेमेल है
न्यायालयों में कृष्ण की गीता  गुनाहों के लिये
हाथ भी रखता वही है कूकर्म जिसने भी  किये

कैसे  शपत  लेतें  है  नेता  राष्ट्र  के  उत्थान में
क्यों  बदलती  है  धरा ये मजहबी  शमशान में
फिर  चुनावी जंग  चौराहों   में  चढकर  बोलती
राजनीति  की  हवस औकात  सब की  खोलती

वीरान  है  घर, हम  विदेशी  सैर में मदमस्त हैं
सब  सियासी  शब्द  की  जादूगरी  में व्यस्त हैं
विश्व  में  इज्जत मिली है,ये सियासी बोलते हैं
चौराहे में अपने घरों की अस्मिता को खोलते है

सोचकर  ही  बोलता हूॅं ,अब कवि  क्या गायेगा
मृत शवों के बीच से तो व्यंग  ही  अब  आयेगा
श्रृंगार  में और हास्य में  तुकबन्द की  बौछार है
मै आग हूँ, मेरी  कलम में आज  भी  वो धार है
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                   9897399815
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                         मजबूरी
भ्रष्टता  पर  अब  कलम  का  वार भी बेकार है
ये   बे-हया   सी  राजनीति   बेवफा   बेधार है
कुछ पता चलता नही  कब कौन सा नेता कंहा
कौन से  दल  से दबा है कौन  दल  देता पनाह

राजनेता  की  नजर  सत्ता  शिखर  पर है  गढी
वाशना  के  खेल में इस  देश की  किसको पढी
लक्ष्य दिल्ली को बनाकर  राजनीति  हो रही है
धृतराष्ट्र  की  औलाद देखो बीज कैसे  बो रही है

हर  जगह  शकुनि  के पासे चौपडों का  खेल है
ये   कौरवों   की  राजनीति  मेल  है   बेमेल है
न्यायालयों में कृष्ण की गीता  गुनाहों के लिये
हाथ भी रखता वही है कूकर्म जिसने भी  किये

कैसे  शपत  लेतें  है  नेता  राष्ट्र  के  उत्थान में
क्यों  बदलती  है  धरा ये मजहबी  शमशान में
फिर  चुनावी जंग  चौराहों   में  चढकर  बोलती
राजनीति  की  हवस औकात  सब की  खोलती

वीरान  है  घर, हम  विदेशी  सैर में मदमस्त हैं
सब  सियासी  शब्द  की  जादूगरी  में व्यस्त हैं
विश्व  में  इज्जत मिली है,ये सियासी बोलते हैं
चौराहे में अपने घरों की अस्मिता को खोलते है

सोचकर  ही  बोलता हूॅं ,अब कवि  क्या गायेगा
मृत शवों के बीच से तो व्यंग  ही  अब  आयेगा
श्रृंगार  में और हास्य में  तुकबन्द की  बौछार है
मै आग हूँ, मेरी  कलम में आज  भी  वो धार है
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                   9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

Sunday, May 24, 2015

   प्रजातन्त्र में मुर्दा
राजनीति  के  सभी   दलो  ने  पिंजरे खोले
कुछ तोते दिनकर, अशोक  की   भांषा बोले
कवियों ने तो  महफिल मे भी लाज लुटायी
इस  लोकतन्त्र  मे  सभी  मदारी भाई-भाई

प्रजातन्त्र  में जनमत  का सम्मान  नही हेै
आधा  जनमत  मुर्दा  है   कंही जान नही है
मुर्दो  के  जनमत  से मुर्दे  चुनकर  आते हैं
जो  जिन्दे  हैं  ,बोट   डालने  कब   जाते है

नंगा-भूखा,  मध्य - वर्ग   ही   प्रजातन्त्र हेै
राजनीति   का  यही   देश  में  मरा यन्त्र है
निजी   स्वार्थ,  शब्दो  में  नेता   ढूंढ  रहे हैं
सब  मठाधीश  मजहब के  चेले  मूड रहे हेैं

हर   चौराहों  पर  राजनीति  की  चर्चा जारी
कंही  नेता  नपनो  में  हल्का  हैं कही भारी
मारपीट,  गाली,  ग्लौज   भी   हो  जाती है
ये राजनीति  बस, चौराहों  को  ही  भाती हेै

सभी  विरोधी  नेता , अन्दर  सभी  एक है
पागल जनमत  हैे जिनमे भी धडे अनेक हेै
डाकू  में  आदर्श   सभी  को  दिख जाता है
प्रजातन्त्र  का  मन्दिर, बीहड  को भाता है

पढे - लिखे , मुर्खों   के  पीछे  भाग  रहे हैं
घर बार  छोड कर चौबीस घण्टे जाग रहे हेैं
मात- पिता  की  तृष्कारी ,  यौवन पीढी हेै
ये भारत भाग्य विधाता की पहली सीढी है

अब चौथा  स्तम्भ,दम्भ  से बिक जाता है
चैनल  में  तोता  रटा-रटाया   ही  आता हेै
अपने झण्डे  तर्क- कुतर्क  से   टांग रहा है
चैनल  तो बस,अपनी  कीमत मांग रहा हेै

परदेशों  में  कंहा-कंहा  पी0 एम0 जाता है
ब्रेकफास्ट में,डीनर में  क्या-क्या  खाता हेै
अब लंच, मंच ,प्रपंच कैमरा  खोज  रहा हेै
ये चैनल-पैनल,प्रजातन्त्र  को  नोच रहा हेै

बहस  देश  में  इनको  सुनकर ही  होती हैं
सभी   पार्टीया  अपने  चैनल  को  ढोती हैं
अधमरे बोट  से सरकारे  भी  बन  जायेंगी
कवि  आग ,ये बात समझ मे कब आयेंगी।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                    9897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, May 23, 2015

                 तीसरा मोर्चा
टेढी - मेढी   बुनियादों   पर   भवन  खडा हेै
राजनीति   में  लावारिस   भी   एक  धडा है
ये  हारे   थके  सिपाही   धन्धा   ढूॅढ   रहे है
सब लूले , लंगडे़,  काणे   बन्दा   ढूॅढ  रहे है

वाह  रे, प्रजातन्त्र   तेरी भी माया  है न्यारी
हम   भूखे - नंगे  पाल  रहे   हैं   खद्दर-धारी
बीहड़   के   डाकू   संसद  की   शान   बढायें
अब  राष्ट्र - गीत  भी  राष्ट्र  लूटने  वाले गायें

थर्ड  - मोरचा   बनने    की    भी   तैयारी है
जनमत   में   ये    सारे   खंजर, दो  धारी हैं
गाली  दे - देकर   भी   सत्ता,  खंगाल  रहे हैं
सपनो   के   गमले   में   बरगद  पाल रहे हैं

पहले   भी  तो   थर्ड  -  फ्रन्ट   स्टंट  बने थे
जनमत  की  धरती   में, खरपतवार  घने थे
स.पा.,बा.स.पा, सी.पी.एम. और सी.पी.आइ
ममता, समता  ने  भी  अपनी  टाॅंग  अडायी

अब  नितीश, और  लालू   दोनो  एक  धडे हेै
सांप,   नेवले     देखो   दोनो   साथ   खडे हेै
हिन्दू ,  मुस्लिम,   अगडे,  पिछडे   ठेकेदारी
अब  ढूंढ  रही  है   चारा    देखो   गाय दुधारी

पूरब, पश्चिम  , उत्तर,   दक्षिण  के  लावारिस
वो  भी  बनना  चाहते  हैं   नाजायज  वारिस
तैयारी   में    बाबा    और  अन्ना   के   चेले
अब  नीम , गिलोइ  के  उपर  भी  चढे़ करेले

ये  सब चौराहों  के  लावारिस   भी  तैयारी में
गाजर  घासें  प्रजातन्त्र   की   इस  क्यारी में
जनमत  की  पूॅंजी  को  ये   मिलकर  खायेंगे
संसद   में   धोती   और    लंगोटे   लहरायेगें

नये  भानूमति  के  कुडमें के  ये प्रतिनीधी हैं
सत्ता  कब्जाने  की   इनकी  बस एक विधी है
क्या  लेना   इनको,  जनता   भाड़   में  जाय
अब  ये  संसद है , प्रजातन्त्र  का  एक सराॅंय

ये माया - धारी  सब  मोदी  के  साथ  खडे हैं
अब  भीड  जुटाने  वाले  डमरू  बहुत  बडे है
वब्रूवाहन  और  घटोत्कक्ष  के अलग  रूप हैं
अब बी. जे. पी. में बडे-बडे महा अन्ध कूप हैं

द्रोण,  भीष्म  और  कृपाचार्य  जैसे बरगद हैं
रण  में  कूदेंगे  चाहे  मोदी  ने  काटा  कद हैं
सतपाल, बीरेन्दर, बने विभीषण भी आयेंगें
स्तूति  गान  अब  शकुनि   मोदी  के गायेंगें

मोदी शब्दों का सौदागर है, क्या सहन करोगे
थर्ड  मोरचे   की  लंका,  फिर   दहन  करोगे
कुछ  साल  चुप  बैठो   तेल  की   धारें देखो
बची, खुची  ताकत  को  सडकों पर ना फेंको

तुम सबके नाटक जनता पहले झेल चुकी है
लूले,  लंगडो   के   खेलो  को  खेल  चुकी हेै
इस लावारिस जनमत को अब ना भडकाओ
कवि आग कहता  है  मिलकर शोक मनाओ।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                   9897399815
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Thursday, May 21, 2015

                          जागो
इस  राजनीति  के  तराजू  में  हमें  मत  ताेलिये
सम्मान देना  है अगर  तो  बस  कवि ही बोलिये
हम हृदय के  हादसों  की  हर  हदों  को  खोलते हैं
सत्यता  से  शब्द  को  निर्वस्त्र   करके  बोलते है

वास्तविकता भ्रष्टता की हम  तुम्हें  दिखला रहे हैं
हर छन्द में  हम बीहडों  के  डाकुओ को ला रहे हेैं
ये  सियासी  लेखनी   की  नोक  से  घबरा  रहे हैं
मेरा वतन जिन्दा रहे, हम गीत लिखते जा रहे हेेैं

ये  वतन, पैसा   हमारा,  किस तरह  से फूँकते हैं
जनमतो  की  भीख  से, मूँह पर  हमारे  थूकते हैं
इन डाकुओ  को आग से औकात में  मैं ला रहा हूँ
इसलिये  कर्कस ध्वनि के गीत  हरदम गा रहा हूँ

सोते  हुये  मुर्छित  नरो  को , मैं जगाता  जाउँगा
शब्द  में  लिपटा  हुआ, मैं  हर जहन में  आउँगा
कौशिस में  हूँ  कि  फिर  लगादूं आग  पूरे देश में
खुद खाक में मिल जायेगे  फिरका परस्ती भेष मे

बस, होलियाँ  जलती  रहें, प्रहलाद  बचने चाहिये
इस  देश  की  भटकी  जवानी   में  रवानी  लाइये
प्रतिकार को बस ठानलो खुलकर सडक पर आइये
इतिहास  की  इज्जत बचे, कुछ  गीत  ऐसे गाइये

सब   सियासी   राष्ट्र - हित नीलाम  करते  जायेंगे
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई  रोज मरते जायेंगे
कौमो,  कबीलों,  सम्प्रदायों   मे  हमे  ये  बाँटते हैं
इस  राष्ट्र को  ये केक  की भाँति सडक में काटते है

किसान  के  घर  बोरियां  थी, अब कनस्तर हेै नही
दो - वक्त  की  रोटी  गरीबों   को  मयस्सर  है  नही
खाद्यान्न  की  कीमत  हमे  बे-वक्त शूली  टाँगती हेै
अब  देश  की सत्ता सियासत वक्त हमसे  माँगती है

राष्ट्र  का उत्सव नही बस,अपना  मनाना  जानते है
लुट  रहा  है  धन  हमारा, ये भाँग अपनी  छानते हेै
इन  हरकतों  का  हर  तरफ  अवरोध  होना चाहिये
मैं  आग  हूँ, मुझ पर  भी  थोडा  शोघ होना चाहिये।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     मो0 9897399815
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 नवोदय का उदय
राष्ट्र  के कवि,राष्ट्र के उपर कभी लिखते नही हैं
एक हम  है,जो  कभी चौराहो मे बिकते नही है
ऐसा  नही  है  कि , हमारी  कीमतो मे  दाग है
हम  अभागे  हैं ,हमारे   शब्द   मे बस,आग है

मंच  मे प्रपंच करने  की  कला  नही जानते हैं
राष्ट्र के सम्भाव  को साहित्य अपना मानते हैं
चुटकुले सुनने, सुनाने  के  हुनर आते  नही हैं
भाट,चारण की कविता  मंच  पर गाते नही हैं

सरस्वति  के  दान को बाजार  मैं नही बेचते हैं
पाखण्ड  को  चौराहे  में  बूरी  तरह से थेचते हैें
हाथ में जबतक कलम है भाट बन सकते नही
श्रृंगार की  सूखी  नदी  के घाट बन सकते नही

चापलूसो  की  जमातों  से   सदा  हम   दूर हैं
वक्त  की  तासीर  मे  समसीर  के  हम  शूर हैं
खुलके गाते है, भयंकर  छन्द की  हर चोट से
छल,कपट  को  फोडते है,शब्द के विस्फोट से

हम एक  ही कविता  को  पूरे देश में गाते नही
इसीलिये तो राष्ट्र के कवियों को हम भाते नही
हर विषय  पर  चोट  करते  है  हमेशा छन्द से
लेखनी  से  जूझते  हैं, राष्ट्र   की   हर  गन्द से

रोज लिखने का हुनर माँ शारदा से मिल रहा है
आसियाने मे नवोदय पुष्प हरदम खिल रहा है
रोंदने  वालो  की  नजरो से  अगर  बच  पायेगें
तुम देख लेना गीत हिन्दुस्तान का हम गायेगें

बहती हुयी इस सरस्वति  में एक नाला चाहिये
इस  तमस  को  दीप का  थोडा उजाला चाहिये
हाथ  में   सब  चाबिया  है  बन्द  ताला चाहिये
मैं आग हू मुझको भभकने  का मशाला चाहिये!!
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

Tuesday, May 19, 2015

                   मर्म-शर्म-धर्म-गर्म
हर चैनल में बलात्कार और व्यभिचार अब तक जारी है
चैनल  मे  भी  धर्म  का  धन्धा हर चैनल की लाचारी है
निर्मल  बाबा  चाय, समोसे, चटनी  सबको दिखा रहे है
अष्टांग योग के करतब बाबा कुछ  चैनल मे सिखा रहे है
धर्म  का  धन्धा  करने  वालो  पर  भी तो माया भारी है
हर चैनल में बलात्कार और व्यभिचार अब तक जारी है

ईशू   बाबा  के   कुछ  तोते   हर   भांषा  में  बोल रहे है
अब कूरान  की  आयत  लेक  मुल्ला जी भी डोल रहे है
गीता और रामायण  का   तो  चैनल में  अम्बार लगा है
निरंकार  और राधा-स्वामि  वालो का भी  भाग्य जगा है
आधा  हिन्दुस्तान  मगन है, सभी समर्पित है नर नारी
हर चैनल में बलात्कार और व्यभिचार अब तक जारी है

सौन्दर्य प्रसाधन, मेकप  करके सारे गुरू जर झूम रहे है
कुछ तो  पारंगत  शिष्यों  को  गले  लगाकर  चूम रहे है
फिल्मी गानो  को  भजनो  में  तोड,जोड कर सुना रहे है
भक्तो की  औकात  देख  कर  भाव  भंगिमा  भुना रहे है
गुरू जी के  एजेन्ट  भीड  में बने  हुये सारे बहमचाारी है
हर चैनल में बलात्कार और व्यभिचार अब तक जारी है

केइ गऊ  माता  की  गाथा,माँ-माँ  कह  कर बोल रहा है
कोई   गंगा  में  गायित्री  अपने   ढंग   से  घोल  रहा है
कोई  सत्य, अहिंसाओं  की  परिभांषा  से  जगा  रहा है
कोई  मोक्ष  दिखा  कर ,सबके पाप,ताप से भगाा रहा है
चेलों  पर भी चंचल - चितवन  दृष्टि  गुरूजी  की जारी है
हर चैनल में बलात्कार और व्यभिचार अब तक जारी है

चौराहों   के   जगरातो   से  अब  माँ दुर्गाा भी शर्माती है
बजरंग बलि को हर मंगल  को केवल  बूंदी  ही  भाती है
शनि देव  की  साढे  सती  और  ढैय्या  भी  मार  रही है
दूध , तेल  और  गंगाजल  से  दशा सभी की तार रही है
बलि - प्रथा  मुर्गो, बकरों  की, कुछ  भक्तों की लाचारी है
हर चैनल में बलात्कार और व्यभिचार अब तक जारी है

इतने  धर्म-कर्म  का भारत ,महाभारत  को  झेल रहा है
सबसे  उँचा  चोर , उचक्का, धर्मो  में  खुश  खेल रहा है
कोष-कोष में जेल  खुली है ,फिर भी मुजरिम भरे पडे है
गाँव-गाँव  स्कूल - मदरसे  सम्प्रदाय  के  अलग  धडे है
स्तयुग में  ये ज्ञान नही था,जो इस कलियुग में जारी है
हर चैनल में बलात्कार और व्यभिचार अब तक जारी है

इतना ज्ञान-ध्यान इस युग में,घर-घर   मे शिक्षा जारी है
जगत गुरू  की  भीड  लगी है फिर भी  माँग रहे भिक्षा है
कुछ गरीब,कुछ मघ्यवर्ग,कुछ अरब-खरब में खेल रहे है
राजनीति  को  भारत-भाग्य-विधाता जनमत झेल रहे है
कवि आग  हम  भारत  माँ  से  क्यों करते  से गद्दारी है
हर चैनल में बलात्कार और व्यभिचार अब तक जारी है।।
                 राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                      मो0 9897399815
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Monday, May 18, 2015

             मॅंहगायी और धर्म का आतंक
हर  चैनल  को  मंहगायी की चिन्ता चिता संताती है
हे  शब्दों  के  सौदागर   ढॅूंढों ,  ये   कहाॅं   से आती है
अपने - अपने  पुरातत्व  के अनुभव  हमें सुनाते हो
राजनीति   का   दोषारोपण,  मंहगायी   से  गाते हो

अर्थ-व्यवस्था,फेल  हो  गयी गुण्डगर्दी खेल हो गयी
मघ्य-वर्ग में जीने  वालों ये तिहाड़ की जेल हो गयी
धन-वैभव के  सारे  कैदी मस्त हवा  में  घूम  रहे हैं
राज- काज में देख सियासी , खादी कुर्ते  झूम रहे हैं

ये मॅंहगायी  व्यवसायी ,उद्योगपति को, पाल रही है
कालेधन के चोर उचक्के ,शदियों  से  संभाल रही है
मॅंहगायी का कारण  क्या  है, सारे नेता  जान रहे हैं
हर चैनल में  जान - बूझकर, कैसे सीना तान रहे हैं

लोकतंत्र के मुर्दे जब तक  जनता से चुनकर आयेंगे
जन-मानस  में प्रजातन्त्र के, भूत हमेसा लहरायेगें
सभी  तिहाड़ी  अन्दर  बैठे   मस्ती पूरी  काट रहे हैं
आज  मीडिया चोरों  में  भी नौ -रत्नो को छाॅंट रहे हैं

आज  गेरूवे  काले-धन  को प्रमाणित करते जाते हैं
नेता के,उद्योगपति  के मठ,मन्दिर  से  क्या नाते हैं
खरबों की इस धनमाया में सन्यासी की अय्यासी है
मॅंहगायी  में  बरकत  देखो ये  कैसा  भारत वाशी है

सत्याग्रह  में  चंदा  देखो , बाबा   जी का धन्धा देखो
योग-भोग  में  जीने वाला,असमंजस में अन्धा देखो
देख सियासी सत्याग्रह में विस्फोटक सामान पडा है
लाल वस्त्र के  सन्यासी पर,माया का परवान चढा है

खरपतवारें  लोकतंत्र  की  खेती में खुद उग जाती हैं
राष्ट्र -द्रोह की फसलें भारत में शदियों से लहराती हैं
अज्ञानी  गुरूओं का गौरव  भारत माता को खाता है
अधकचरे चिन्तन से तो ये राष्ट्र हमेशा चिल्लाता है

देश का  नेता परदेशों में,जनता का धन लुटा रहा है
मंगोल  ने  देश को लूटा, फिर से उनको जुटा रहा है
भ्रष्टाचारी   जनता  भ्रष्टाचार  प्यार  से  पाल  रही है
व्यभिचार की  पुष्टि  में   भी  अहंकार खंगाल रही है

सत्य सतत् तीखा होता है,लिखने में भी दोष नही है
इन भावों  में  कष्ट  भरा  है,शब्दों का उदघोष नही है
भ्रष्ट व्यवस्था  अपने  हाथों से  हमने  पाली-पोशी है
कवि आग  हम  जैसे  मुर्दे  भ्रष्ट व्यवस्था के दोषी हैं।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  मो0 9897399815
         rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, May 16, 2015

                   भारत की इबारत
अगर  देश   के   सारे  नेता,  वेतन, भत्ता,  पेन्शन छोडे
उद्योगपति  भी  लाभ  कमाएं, पर चोरी की  टेन्शन छोडे
मठ, मन्दिर  भी  माया  छोडे ,केवल राष्ट्रभक्ति अपनाये
बचे  खुचे  माया - धारी  भी  हर  गरीब  को गले लगाये
सोने  की   चिडिया  को  छोडो, घर  में   हीरे  दबे  पडे हेै
राजनीति के कारण हम सब कबर में जिन्दे आज गडे हेै

भू - माफिया  अपनी  धरती  बे-घर  को  घर-घर मे बाटे
धन , माया  के  चोर, लुटेर, निर्धन  को  भी दर-दर छाटे
खाद्यान  के  भण्डारों  को  नियम बनाकर अमल में लाएं
जंहा जंहा जितनी  जरूरत  है, उतना भर-भर  के पहुचाएं
सम्पन्न राष्ट्र की सूची  में  भी,आज जगत मे हमी बडे है
राजनीति  के कारण हम सब कबर में जिन्दे आज गडे हेै

इमान  धर्म  और सच्चाई  से केवल भारत माँ को पकडे
कौम कबीले,धर्म,मजहब ,मन्दिर,मस्जिद भी ना अकडे
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाइ,मानवता बनकर दिखलाएं
सारे  भारत - वाशी, बच्चे  बस,भारत  माँ  के बन  जाएं
फिर देखना  खुद को खुद में, हम  दुनिया मे कहा खडे है
राजनीति के कारण हम सब कबर में जिन्दे आज गडे हेै

देश के टुकडे -टूकडे  करने  की  ये  हरकत अब तो छोडो
एक राष्ट्र  हो  केवल  भारत, जोड  सको  ता  ऐसा  जाडो
जांति-पांति ओर भांषाओं  की  सीमाएं मिलकर के पाटो
जंहा  कंही  भी गांठ  पडी  है, गले  लगा कर  गांठे काटो
होने को  सब  कुछ सम्भव है,पर थोडा सा नियम कडे है
राजनीति के कारण हम सब कबर में जिन्दे आज गडे हेै

सोच समझ  कर  बच्चे  पैदा करने की  नीति अपनाओ
कामदेव  की  इज्जत  करना सीखो,सडको पर ना लाओ
व्यभिचार  और  बलात्कार की भांषा  से भारत मरता हेेै
भ्रष्टाचार  की  परिभांषा से स्वाभिमान गिर  कर डरता है
कवि  आग की  मानो,हम तो  हर युग में परवान चढे है
राजनीति के कारण हम सब कबर में जिन्दे आज गडे हेै।।
                   राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                         मो0 9897399815
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Friday, May 15, 2015

               ऋण कृत्वा,घृतम् पिवेत
क्या  मेरे   घर   में  परदेशी  अब  ठाठ  करेगे
लगता  है  हम  गरूड   पुराण  का  पाठ करेगे
हम  गीता , रामायण   की  भांषा  भूल  रहे है
कर्जा  खाकर   भीख   माँग  कर   फूल  रहे है

क्या भारत का चिन्तन मन्थन  भटक गया है
चाणक्य,विदुर  की   नीति नेता सटक गया है
दुश्मन   को   घर   में  ही   न्यौता  देने  वाले
ये  सभी   शिखण्डी और विभीषण हमने पाले

एक  कृष्ण  था   जिसने  ये   ब्रह्माण्ड बनाया
एक  राम  था  जो  लंका  को  छोड  के  आया
हरिश्चन्द्र   ने  स्वप्न  दोष  में सब कुछ छोडा
सतियों  ने  भी  काल - चक्र के भ्रम को तोडा

हम  भारत  के   कितने   टुकडे   काट चुके है
हर  टुकडे   को  जाति ,मजहब में बाँट चुके है
सोने  की  चिडिया  में   भी   मिटटी  के लाले
धर्म - धरा  में  भी  कलियुग  के खेल निराले

जापान, चीन  को  दर-दर   ठोकर  खाते देखा
क्या अमरीका  को  भीख  माँगकर गाते देखा
छोटे  -  मोटे    बहुत   देश   हैे   स्वाभिमानी
जिन   देशों   के   आगे  हम  भरते   हेै पानी

नैपाल, पाक  और  बंग्ला  चारों तरफ  है नंगे
हम  कई  दशकों  से   झेल  रहे  है इनके पंगे
इनकी  संगत  में  अब  हम  भी बने भिखारी
हर  बच्चा - बच्चा  कर्जे   में   डूबा   है  भारी

ये  डेढ  अरब  घर  के  हैं ,पहले इन्हे सभालो
तकनीकी  के  हर  विकाश  में  इनको   ढालो
भारत  का  हर  सपना  ये  ही साकार   करेंगे
अब ये  समाधान  है सारा सपना  पार  करेंगे

बिना  बात   के  कौन , किसे   कर्जा   देता है
जनता नंगी है, खुशहाल आज  केवल  नेता हेै
क्यो भीख मागने कीआदत   का  नशा चढा है
इस  धरती  में  कवि आग ,धन  बहुत पडा हैैे।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  मो0 9897399815
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Wednesday, May 13, 2015

                           चीन का सीन
मोदी   भैया   चीन  गये,  कुछ   साथी   गमगीन गये
सारे  चैनल  पहले  पंहुचे , साथ  में  केवल  तीन गये
हिम  शैलखण्ड  कैलाष  हमारा, मानसरोवर छीन गये
सरहद   पर  अपनी   धरती   थी,  धीरे-धीरे  बीन गये

अपना  कब्जा  चीनी  चूंहे  दिल्ली  पर  भी बोल रहे हैं
भारत की सीमा  से पाकिस्तान  का रस्ता  खोल रहे है
नैपाली   सीमा   से  माओवादी    भारत   छान  रहे हेै
हम भी हिन्दू  कहकर  इनको भाई  अपना मान रहे है

उद्योग जगत  के उत्पादन  को भारत में  ही बेच रहे हैं
मेरे  देश   की  असली  पूंजी, ये चीनी   ही  खैच रहे है
भारत   का   उद्योगपति  भी   धीरे-धीरे  सिमट रहा हेै
चिन्तन का आभाव देश  में व्यापारो  से  निपट रहा है

सुन्दर-सुन्दर सस्ती  चीजें  भारत  वाशी  को  भाती है
भव्य - सभ्यता  परदेशों   की   धीरे -घीरे  से  आती है
झूठे  आन,बान,शानो  से  संस्कारो   को  हम  खोते हेैं
ये राष्ट्र  हमेशा   नेताओ   के  कू-कर्मो  से   ही  रोते हैं

अमरीका, जापान, चीन  की नजरें  हम पर गढी पढी है
भारत में  तो  छोटे - मोटे   देशों  की   भी  माँग बढी है
बंग्ला,तिब्बत,नैपाली  को  हम   शदियो से झेल रहे हैं
असली   भारतवाशी   नंगा,  शरणागत  ही  खेल रहे है

स्वाभिमानी अन्य  देश से भारत  ने  कुछ सीखा होता
सोने की चिडिया का चेहरा क्यों दुनिया में  फीका होता
अति  बोलने,अति  डोलने  से इज्जत  गिरती जाती हेै
कवि  आग का छन्द नही ,ये  शास्त्र-वेदना समझाती है।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                     मो0 9897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com  

Tuesday, May 12, 2015

                कानून-पथ
दाउद  भी  अब  घर आने की  सोच रहा हेै
कानून हमारा  गुनाह सभी के  पोंछ रहा है
बडे - बडे   अधिवक्ता   सीना   तान  रहे है
अपराध  भाई  के ,धाराओं  में छान  रहे हेै

समय आगया आत्म सर्मपण कर दे भाई
सलमान  खान की देखा  कैसे  बेल कराई
कानूनो   के  जोड-तोड  के  सब  माहिर है
गुण्डों  की   रक्षा  होती  है ,जग -जाहिर है

अधिवक्ता,जज, गवाह सभी  तैयार खडे हैं
लोकसभा और राज्यसभा केअलग धडे हेैं
कानूनो  में परिवर्तन  भी  हो  ही जाता हेै
इस राजनीति में खूनी कतली ही आता है

तू   छंटा-छंटाया  व्यभिचारी, मायाधारी है
इस फिल्मी दुनियां में तेरे  किस्से जारी है
नर - नारी  किरदार,तुझे सब  मान  रहे हैं
तेरी महफिल के भारत मे  गुणगान रहे हैं

तू  जेल के  अन्दर से   भी  लड सकता हेै
ये प्रजातन्त्र है, उपर  भी तू चढ सकता है
बोट-बैंक   की   राजनीति  हैे  माया  बाँटो
हिन्द, मुस्लिम दंगो  में  मानवता  काटो

अब कानूनो से भारत की इज्जत खोती हेै
आज  कचहरी  अधिवक्ता,जज  से रोती हेै
गुनाहगार,सर चढा है खुलकर बोल रहा है
कवि आगऔकात नियम की खोल रहा हेै।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
               मो0 9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, May 8, 2015

               उत्तराखण्ड में बाबा के ढाबे        
गुल चमन  है इनकी बातों में रिस्ता है कितनी जातों में
कहीं  नदी  वार कहीं  नदी  पार  ये कैसा युद्व अनाथों में
यहाॅं  पुरूष  घूमते   बाडों  में नारी  है  नरक  पहाडों  में
शिखरों में सूरजअस्त हुआ गढवाल में भैजी मस्त हुआ

नीचे   से   दारू   ढोते    हैं   उत्पात  यहाॅं  पर  होते  हैं
खडा  कौन   है   पाॅंओं  पर  घर  बार   लगा  है दाॅंव पर
आज  हिमालय लुटता है  घर - घर  में रिस्ता  टुटता है
ये   देव  भूमि  की  लीला है यहाॅं लाल खून भी पीला है

घर  से  ही  माल  उठाता  है  व्यापारी  खूब  कमाता है
यहाॅं  हर  देश  का  मानव  है ये देव भूमि अब दानव है
संस्कार  गये  अब  पानी  में  ये  बूढी  कौम जवानी में
नेता में  देखो  लाली  है बस,  उत्तराखण्ड  ही  खाली है

राज्य  लूटकर  चन्दा  भी दिल्ली  के  दल  में  जाता है
उत्तराखण्ड  को  राजनीति का  मरा  भूत  भी  खाता है
क्यों   होते   हैं  रोज   फैसले  राजनीति   गलियारों से
मुख्यमंत्री   बदल    रहे    है   दिल्ली   के   दरबारों से

भीख  माॅंगकर  उत्तराखण्ड  को  स्वीटजरलैंड  बनायेंगे
स्विस  बैंक   के  सारे  खाते  उत्तरारखण्ड   में  आयेंगें
सपने   देखो    अपने   देखो   राजनीति   ये  गाती  है
अब  तो  टुच्चेपन के भाशण से  भी  जनता शर्माती है

सबसे  ज्यादा   उत्तराखण्ड  में   रामदेव  की  धरती है
योग - पीठ   गलियारे   में   सरकारें  पानी   भरती हैं
सारे  आसन  राजनिति   के   टी 0 वी0   दिखलाते है
सत्ता   और   सियासत   की   कपाल  भारती  गाते है

अन्तर्राष्ट्रीय   सभी   भिखारी  उत्तराखण्ड   में  रहते हैं
य़े सभी निशाचर उत्तराखण्ड को देव-भूमि  भी कहते हैं
अय्यासी  के  महल  बने  हैं,  पर्वत  की  मालाओं पर
ध्यान योग के शिविर में  सर्कस, परदेशी  बालाओं पर

सारे  नेता,  नौकर -  शाही   बाबा   जी  के  चरणो पर
उत्तराखण्ड भी टिका हुआ है,मठ,मन्दिर उपकरणो पर
स्वर्ग-मोक्ष  की  इस  धरती  पर राजनीति लहराती है
मोक्ष-दायिनी माँ  गंगा  भी  अब गीत  इन्ही के गाती।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com
                     क्रमशः-4 पर

                     शास्त्र व्यथा
आदि  शंकराचार्य   की  उद्घघोषणा  में  धर्म था
त्रिकाल की संध्या सनातन कर्म का भी मर्म था
विकसित  हुये  थे  चार  मठ,  वेद  के प्रचार में
साधना  थी , चार   शिष्यों  की  जगत उद्वार में

हो सुरक्षित धर्म  भी और विश्व  का कल्याण हो
धर्म  की  ही  साधना  से  जीव  का परित्राण हो
कर  में  शोभित  दण्ड था अरू वेद थे सज्ञान में
साधना  थी  धर्म  की  हर  वर्ण  के  सम्मान में

विरूद्व था जो भी सनातन  छिन्न करते ज्ञान से
परिकल्पना जन  जीव का  मोक्ष  हो सम्मान से
धर्म,की  रक्षा  में  केवल  ‘शास्त्र’  ही  तो शस्त्र है
आडम्बरों  के  भेष में ‘काषाय’ कलुसित वस्त्र है

 धर्म  के  अवलम्ब  पीठाधीश  भी  क्यों मौन हैं
शास्तार्थ   होना  चाहिये कि  सम्प्रदायी, कौन है
उद्वेश्य  था  चौमास   का   उर्जा  बचाने के लिये
क्यों  बनाते   हो   धरम्, धन्धा चलाने के लिये

लक्ष्य  होना  चाहिये बस  धर्म का व्याख्यान हो
नास्तिकों में,धर्म  का भी  ज्ञान  हो, सम्मान हो
धर्म  तो   केवल   सनातन  जो   स्वयं पर्याप्त है
ब्रह्म  का  उद्घघोष  ही  तो  चर अचर में व्याप्त है

तीव्रता  मजहब  व्यवस्था  भ्रांतियों  चल रही है
शास्त्र  वक्ता  मौन   हैं आडम्बरों  से  पल रही है
सन्यास   के  सारे  अखाडों  में  पनपती  वैरता
संस्कार  के  बिन,भेष  भी  सूखी नदी में तैरता

मनमुखी  मजहब  धरा  में  कंठ  ध्वनी गायेगा
नास्तिकों  की  भीड़ से दर्पण धुमिल हो जायेगा
मुक्त  कर  दो धर्म  को परिधि  में लाना छोड़ दो
निर्भेद्य,  की  परिकल्पना  से  भेद  सारे तोड़ दो

धर्म  में  मण्डलेश्वरों  का  आना  जाना  छोड़ दो
आचार्यों,  मठाधीश्वरोंका   ताना  बाना   छोड़ दो
पद के मद की  हर  व्यवस्था धर्म के,प्रतिकूल है
दिव्यता  ‘ब्र ह्माण्ड’  की सन्यस्तता  का  मूल है

जलनिधि  वर्षात  में  विचलित  कभी होता नही
आडम्बरों  से  धर्म   भी  स्वाधीनता  खोता नही
धर्म  तो  संस्कार  है कण -कण में है हर जीव में
ब्रहमाण्ड की  सारी व्यवस्था ,है सनातन नींव में

काटकर भ्रम  बादलो  को  फिर सनातन आयेगा
प्राणियों   में   वेद   का  उद्भव, पुनः  हो  जायेगा
मनमुखी मजहब तिरोहित,क्षय,स्वयं  हो जायेगें
शास्त्र  में मनु की  व्यवस्था,जीव फिर  से गायेगें

जगत्गुरू  पद  लक्ष्य  है  जग ,धर्म से आगे चले
शास्त्र  ’सम्मत  संप्रदायी,  भी  जगत में  हैं भले
मनमुखी   मजहब   जगत्  से  दूर  होना चाहिये
छोड़  दो  माया  के  मनके  बस  सनातन  गाइये ।।

             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, May 7, 2015

      स्टारप्लस की कल की प्राइम टाइम की बहस पर                    
                           आधारित
                            सन्यास
सन्यस्त का लक्षण यही है तन  भरा हो मन भरा हो
ज्ञान  हो  या   भक्ति   हो   उद्यान  हृदय  का  हरा हो
साकार  हो  निर्गुण  हो चाहे भाव, अन्दर का खरा हो
प्रफुल्लता  से  वाशनाऐं, हों  तिरोहित  मन  मरा हो

प्रारब्धता  का   दारिद्रता   से  स्मरण  होता  नही है
जागृत,हुआ दिखता तो है पर ध्यान में खोता नहीं है
तुच्छ  वैभव  का   भ्रम   भी  भाव  में, रोता नहीं है
भटकी  हुयी  हो आत्मा  तो मन, कभी सोता नहीं है

आकांछा  आडम्बरों  की  क्षण  भ्रमित   होती  तो है
श्रृंगार  की  दुनिया, क्षणिक  पल्लवित   होती  तो है
विभत्सता  कब  तक  छिपेगी, दृष्टि गत् होती तो है
आत्मा,  उपराम    होकर    भी  द्रवित  रोती  तो है

प्रारब्ध  के इस मार्ग को अब अवरूद्य करना छोड़ दो
आड़   लेकर   धर्म   की  वैभव  में  मरना  छोड़ दो
चौराहे  में  भगवान  का, व्यवसाय  करना  छोड़ दो
आध्यात्म  के  इस भेष  में सजना संवरना छोड़ दो

ब्रह्माण्ड  की  पूरी  व्यवस्था  शास्त्र  ही   तो  बोलता
श्रृष्टि  का  नयता  नियन्ता   शास्त्र   ही  तो खोलता
मोक्ष  का  परिधि   विनायक  शास्त्र ही   तो  डोलता
शास्त्र  से  साक्षात्  हो  हर   जीव   कर - कल्लोलता

सम्प्रदायों   का   भजन   कब  तक  धरा में गाओगे
रक्त - रंजित  है  धरा ,कब  तक  धरा   को  खाओगे
प्रारब्ध  के  इस  मार्ग  में  प्रारब्धता,  कब  लाओगे
ब्रह्म के  उद्घघोष   से   क्या  ब्रह्म   को   पा  जाओगे

कुम्भ  के  संगम,  विहंगम  बन  के  थोडा  नाच लो
धर्म  का  मौका   मिला   है , हो   सके   तो  बाॅंचलो
मन्थन  करो  इस  नीर का नवनीत लो या छाछ लो
‘आग’ के  हर शब्द को बस, तोल लो  और  जाॅंच लो।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                        मो0 9897399815
              rajendrakikalam.blogspot.com

Wednesday, May 6, 2015

                न्याय  में अन्याय
न्यायालयों  की  आड  में कानून गिरता  जा रहा है
राजनितिक  भेष  में  मुजरिम शिखर को पा रहा है
खूनी   खडा   है  सामने   जज  पूछता   है  कौन है?
मजबूर  है  कानून   देखो , बिन गवाह  के  मौन है

नकली गवाह मौजूद है अब हर मुवक्किल के लिये
क्यों जल रहा है,न्याय का मन्दिर गुनाहो के  लिये
अब   तो  पेशी  में   भी  पैसा  पेशकारी  माॅंगता हेै
बे-गुनाह  को  किस  तरह ये न्याय शूली टाॅंगता है

फैसला , फर्जी   बशीयत  का   अदालत  दे  रही है
मैं नही   तहसील  की  ये  फर्द  हमसे कह  रही हेै
पीढीयाॅं मर -  खप गयीं  है ,आस  में  विस्वास में
मुर्दा  खडा  है  कचहरी  में ,न्याय  की  तालाश में

सलमान खान  की  पैरवी  में दण्ड  पर भी बेल है
सम्पन्नता का  आशियाना  वन गयी अब जेल है
इस  न्याय में  कीडे ,मकौडे  मर रहे  बे - भाव से
चूनाव  गुण्डे  लड  रहे हैं, अब देख लो  उन्नाव से

धन पास होना  चाहिये, कानून  बिकने को खडे हैं
कचहरी  में  भी  दलालों, और  वकीलों  के  धडे हैं
पैरवी   होती   दबंगों  की  खुली  सब  कह  रही है
सब  दलीलें  कचहरी  की  नालियों  में बह  रही हैं

खूनी, गुण्डे, माफिया अब  जमानतों  में घूमते हैं
दाउद, मवाली  सरगना  खुले सडक पर झूमतें हैं
कानून  ही  अन्धा  खडा  है, देखता  अब  कौन है
मंहगे  वकीलों  की  जिरह से,जज  बेचारा मौन है

वकील तो  हर  भ्रष्टता की बात को   भी जानते है
कब   कहां  कैसे  हुआ   बारीकियों  को  छानते हैं
झूठ में  और  सत्य में  क्या फर्क  है पहचानते हैं
पालकर  अन्याय   को  ये  कैसे  सीना  तानते है

न्याय तो मजबूर है बन्द आंख है बस सुन रहा है
तर्क बे  सिर  पैर  के  ना  जाने  कैसे  गुन रहा है
अन्त   में   सच्चाई  की  ही मौत  हेाती  जायेगी
एेसी  व्यवस्था   देश  में   आतंक  ही  फैलायेगी

गीता  भरोसा   बन  गया  न्याय में  ईमान  का
घनश्याम भी है बे-खबर क्या हश्र है ईन्सान  का
न्याय में  गीता  भरोसा , आदमी सच बोलता है
देेखो तराजू  न्याय का अन्याय  कैसे  तोलता है।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
                  मो09897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com

              प्यारू-न्यारू उत्तराखण्ड
घूम  रहे   थे  मारे - मारे    नाली   मुटठी  पाने को
नेता जी  अब   ढूॅंढ   रहे   है  देहरादून  ठिकाने को
कोदा,मंडवा और झंगोरा ,धबडी मिली विरासत में
अब  तो मुर्गा चबा रहा  हेैे  नेता देख सियासत में

मुख्यमंत्री  ढूॅंढ  रहा   चोरों   के  ठौर   ठिकाने को
लावारिस  भी लालाहित है  पूरी  कीमत  पाने को
खोज रहे हैं बी0 जे0पी0 के  नंग विधायक भाडे़ में
भूखे   नंगे   डटे   हुये   हैं   उत्तराखण्ड  अखाडे़ में

जनमत क्यों  नीलाम हुआ  है आज भरे चौराहे में
भू-कम्प भयंकर देख  रहा हूॅं  राजनीति के साये में
क्या जरूरत  थी उपर से  नेता को यहाॅं जमाने की
राजनीति  की परम्परा, जयचंद फन्द लटकाने की

अर्थ-व्यवस्था खोल  रही  है  नंगे  पडे खजानो को
पाल  रहे है फिर भी देखो,  लावारिस मेहमानों को
शर्म  नही  आती  है हमको अपना  घर लुटवाने में
ठाकुर, पण्डित,वैश्य,शूद्र का बोट  बैंक तहखाने में

क्या चुनाव के लडने से अब भाग्य सुधरने वाला हैे
उत्तराखण्ड  में  बिन पेंदी  का  लोटा ही मतवाला है
जनता सब कुछ देख रही है,धन्धा चोर  चकारी का
नेताओं पर  आस  लगी  है ,कैसा खेल  मदारी का

कंही  कुमाॅंउ चिल्लायेगा कंही  टिहरी, पोैडी गायेगा
भू - माफिया  गैर- सैण  में  पूरी  आस   लगायेगा
राम-राज  भी  ढूॅढ  रहा  है अपने खाली तरकस को
सारी  दुनिया  देख रही  है उत्तराखण्ड के सर्कस को

पानी और जवानी  से  अब  राजधानी  चिल्लाते हो
भूखे  नंगों  के सपनो में  छत्तीस  व्यंजन  खाते हो
उत्तराखण्ड  की  अय्यासी में  खादी  और  लंगोटे हैं
देव - भूमि  को चरने वाला ,कंही  सांड कंही झोटे हैं

हाथ  सफायी  वालों  से हम चमन बनाना चाहते हैं
उत्तराखण्ड के जनमानस को यवन बनाना चाहते हैं
थोडी  सी  भी  बुुद्धि  है तो  केन्द्र समर्पित हो जाओ
हम  तो  पहले  से  नंगे  है और ना  नंगा  करवाओ

सीधे-साधे  पथ  पर  चलना  ये  संस्कार  हमारा है
धर्म-सनातन,स्वर्ग, मोक्ष, भी आविष्कार  हमारा है
मोक्ष दायिनी  माॅं  गंगा  भी  मेरे  घर  से  बहती है
छल,कपटी व्यभिचारों को,ये देवभूमि क्यों सहती है!!
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
                          मो09897399815
              rajendrakikalam.blogspot.com

Monday, May 4, 2015

              उत्कण्ठा      
देश   की   बे - चैनिया   बढने लगी हैं
चींटिया वट - वृक्ष  पर   चढने लगी हैं
ग्लेशियर  से  बर्फ क्यों झडने लगी हेै
मौसमों की  हर फसल  सढने लगी है

भू-कम्प  से धरती बराबर हिल रही है
ये आपदाएं  दीनता  को   छिल रही है
दुश्मनो के घर कलि क्यों खिल रही हेै
ये  हवा,  ढूँढो  कंहा  से  मिल  रही है

अब   सहन    होती  नही  दुस्वारियाँ
चल   रही    सीने  में सबके आरियाँ
क्यों फड फडाती है ध्वजो की धारियाँ
मौन  हेै  क्यों, राष्ट्र   की  नर-नारियाँ

हर  तरफ संकट बराबर  दिख  रहा हेेै
भाग्य-भारत  का भरोसा लिख रहा हेै
आदमी  चौराहे  पर  क्यों बिक रहा है
अब कंहा सिद्यान्त है, जो टिक रहा है

मौन  है ,इतिहास  भी तो सुन रहा हेै
अब शहीदों का सफर सिर धुन रहा है
षडयन्त्र  से सत्ता,सियासी बुन रहा है
भीड  में पागल को पागल चुन रहा है

हर जगह बे-वक्त  हम दिल खोलते हैं
जो  भी मूँह  में आ गया,वो बोलते हैं
हैशियत   दुश्मन   हमारी   तोलते हैं
जख्म में भी हम जहर खुद घोलते है

शब्द  की   बाजीगरी  ही  चल  रही हेै
सौेदागरी भी शब्द  की ही खल रही है
अब आश्वासन  से  गरीबी पल रही है
राजनीति  ही तो  सब को छल रही है

कीमतें खादी   लिबासों  की  गिरी  है
राष्ट्र  की इज्जत  इन्ही से ही फिरी है
तस्वीर  माँ  भारती  की क्यों चीरी है
हर जगह नेताओं  की ही किरकीरी हेै

सब का  भरोशा छोड  कर आगे  बढो
इतिहास कुछ,जिन्दे  जवानी के गढो
जिस लक्ष्य से नेता गिरे उसपर चढो
ये राजनीति  मर गयी,अब तुम लडो

मृत - शवो  का अब  भरोशा  छोड दो
पाखण्ड  की  ये रूढियाँ  सब  तोड दो
कोैमों, कबीलो,जातियों  को  जोड  दो
राष्ट्र  को  फिर से  नया  कुछ  मोड दो

चारों  तरफ   से   सरहदें  पुकारती है
आज संकट  में   पढी   माँ  भारती है
वो मर रही है, जो जंहा  को  तारती है
इस सत्य को मेरी  धरा  ही धारती है

मजबूर हूँ  मैं आग ही  सुलगा रहा हूँ
हर  लपट से  गीत माँ  के  गा रहा हूँ
कुछ बचे,जिन्दे हैे मेरी  सर जमीं  में
इस गीत से ही मैं,उन्हे समझारहा हूँ
  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
         मो09897399815
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