दर्द के हमदर्द
बन रही थी आपदा भी सम्पदा सरकार की
हरकते देखो सियासत के सबब दरबार की
कब कंहा कितने मरे अनुमान भी होते नही
जनमतो के ये गधे अब बोझ भी ढोते नही
तन्त्र के शडयन्त्र में खेती है खरपतवार की
बन रही थी आपदा भी सम्पदा सरकार की
बह गये सब खेत और खलियान इस तुफान में
खप गये हैं लापता परिवार इस उफान में
छुट गये, कुछ गिड गिडाते सें शिशू शैवाल में
ये हिमालय का शिवालय हो गया महाकाल में
बे - समय की मौत से चित्कार हा-हा कार की
बन रही थी आपदा भी सम्पदा सरकार की
मौसमो के यन्त्र भी षडयन्त्र करते जा रहे थे
बर्शात में भी शुष्कता के गीत खुलकर गारहे थे
मेघ ,मौतों का निमन्त्रण देख कर घबरा रहे था
ये सियासी गिद्ध क्यों आकाशा में मंडरा रहे था
विभत्स में भी राजनीति देख लो फनकार की
बन रही थी आपदा भी सम्पदा सरकार की
लाश के उपर कफन को भी चुरा कर खा गये
इन पर्वता पर अब सियासी चील, कौवे आ गये
अब लंच, डीनर आपदा की खुद बयानी कर रहे हैं
तन्त्र के खच्चर सियासत से शिखर को चर रहे हैं
इन नौकरो , नेताओं में कैसी, कहानी यार की
बन रही थी आपदा भी सम्पदा सरकार की
नौकरों की मल्कियत में भी किफायत हो गयी
राजनीति में सियासत अब शिकायत हो गयी
अब पैरवी होती है, पर्वत शर्म से शर्मा रहा है
क्यों सियासी गीत नौकर-साहों के ही गा रहा है
क्यों पर्वतों में हो रही निलामीयाॅं घर - बार की
बन रही थी आपदा भी सम्पदा सरकार की
दुःख दर्द दीनो के दरिन्दों को नजर आते नही
चील, कौव्वे चैन की भी धुन कभी गाते नही
अधमरे शमशान के शव राजनीति खेलते हैं
अर्द्ध - चेतन से मरे मुर्दे, सियासत झेलते हैं
मेरी कलम में भी लपट है‘ आग ’के चिन्गार की
बन रही थी आपदा भी सम्पदा सरकार की ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो09897399815
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