Monday, February 29, 2016

मध्य-वर्ग की मौत
वित्त मंत्री खडग उठाओ,मिलकर मध्य-वर्ग को काटो
लाशों के अम्बार लगे हैं सभी सियासी मिलकर बाटो
धार खडग की सात दशक से मध्य-वर्ग ही झेल रहा है
प्रजातन्त्र में मध्य - वर्ग र्निवस्त्र सडक पर खेल रहा है
मिर्च,मशाला,नमक लगाकर,नोचो,इन लाशों को चाटो
वित्त मंत्री खडग उठाओ, मिलकर मध्य-वर्ग को काटो

अन्नदाता बेजान खढा है, नेताओ का अलग धडा है
कंही फूल,कंही हंसिया बालि, कांग्रेस का हाथ खडा है
सपा,बा.स.पा.,दक्षिण पन्थी,बिन पेंदी का खास घडा है
भूमिधर जिन्दा मरता हेै, विकृत शव बेहाल पडा हेै
जो बचे-खुचे बेहाल पडे है, जाओ उन सब को भी छांटो
वित्त मंत्री खडग उठाओ ,मिलकर मध्य-वर्ग को काटो

मंहगायी और बेरोजगारी अब जुमले ही बोल रही है
पडी लिखी पीढी भारत की चौराहों पर डोल रही है
मध्य-वर्ग,उपसर्ग हो गयी ,कफन लाश से खोल रही है
ये राजनीति भी मध्य-वर्ग के मुर्दे ही तो तोल रही है
मध्य -वर्ग क्यों चूस रहे हो, हे सूखी सरिता के घाटो
वित्त मंत्री खडग उठाओ, मिलकर मध्य-वर्ग को काटो

आटा,चावल,मिर्च,मशाला नेता ने कब मोल लिया है
मुफ्त खोर का खाने वालों ने इसका कब तोल किया है
भ्रष्टाचारों की दावत का माल मुफ्त में खाने वालो
घडियाली आँखो के आंशू दरियादिली बहाने वालों
अर्थ-व्यर्थ से भरी हुयी, इन लाशों को तो अब ना डाटो
वित्त मंत्री खडग उठाओ ,मिलकर मध्य-वर्ग को काटो

अच्छे दिन आने वाले थे ,बूरे दिन हम झेल रहे हैं
मध्य - वर्ग निष्प्राण शरीरों से ,ये मुर्दे खेल रहे हैं
आम आदमी,बद् से बद्तर जीवन जीने को व्याकुल हेै
मघ्य-वर्ग की जीवन-शैली प्रजातन्त्र में क्यो ढुल-मुल है
कवि आग कहता है, गढ्ढे खोदो उसमें हमको पाटो
वित्त मंत्री खडग उठाओ,मिलकर मध्य-वर्ग को काटो।।

भारत का भविष्य
राजनीति के इस सर्कस में सारे जोकर यार हो गये
वाणी भूषण, बुद्वि वल्लभ जंग लगे हथियार हो गये
योगी, साधू, सभी विरक्ति, माया से बेकार हो गये
हिन्दू,मुस्लिम,सारे झगडे अब पशुओं की डार हो गये

गुरूकुल और मदरसे ही अब शिक्षा की अर्थी ढोयेंगे
राजनीति की ना समझी से नेता शिक्षा को खोयेंगे
शैशवता की इस क्यारी में, बीज सियासी ही बोयेंगे
अभी तो झगडा सूरू हुआ हेै आगे देखो सब रोयेंगे

भविष्य देश का चौराहों पर झण्डे लेकर घूम रहा है
चाचा नेहरू बनकर नेता, कलियों को ही चूम रहा हेै
शिक्षक भी लावारिस बनकर नेता के संग झूम रहा है
प्रजातन्त्र के इस बीहड में कौन मुक्त, मासूम रहा हैे

वैमनस्य को टी.वी.चैनल बढा - चढा कर छोैंक रहे है
सम्पादक, प्रवक्ता दोनो बे - लगाम हैं भौक रहे हैं
छल,बल,कपटी हवन कुण्ड मे भारत माँ को झोंक रहे हेैं
इस हरकत से चिन्तन - मन्थन के मुर्दे चौंक रहे हैं

आग लगी है हर कोने में, मिलकर ईंधन डाल रहे हैं
अपने ढंग से सभी संपोले दूध पिलाकर पाल रहे हैं
विषकन्या,विषपुत्र सियासी जहर खिलाकर ढाल रहे हैं
कफन उठाकर कवि आग भी मुर्दो को खंगाल रहे हेैं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Sunday, February 28, 2016

           भारत की इबारत
अगर  देश   के   सारे  नेता,  वेतन,  भत्ता,  पेन्शन छोडे
उद्योगपति  भी  लाभ  कमाएं,पर चोरी  की  टेन्शन छोडे
मठ, मन्दिर  भी माया  छोडे ,केवल  राष्ट्र-भक्ति अपनाये
बचे  खुचे  माया - धारी  भी  हर गरीब   को गले लगाये
सोने  की   चिडिया  को  छोडो, घर में    हीरे  दबे  पडे हेै
राजनीति के कारण हम सब कबर में  जिन्दे आज गडे हेै

भू - माफिया  अपनी   धरती  बे-घर  को  घर-घर मे बाटे
धन , माया  के  चोर, लुटेर, निर्धन  को  भी दर-दर छाटे
खाद्यान  के  भण्डारों  को नियम  बनाकर  अमल में लाएं
जंहा जंहा जितनी  जरूरत  है, उतना  भर-भर के पहुचाएं
सम्पन्न राष्ट्र की सूची  में  भी,आज  जगत मे हमी बडे है
राजनीति  के कारण हम सब कबर में  जिन्दे आज गडे हेै

इमान  धर्म  और सच्चाई  से  केवल  भारत माँ को पकडे
कौम कबीले,धर्म,मजहब भी,मन्दिर,मस्जिद में ना अकडे
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाइ,  मानवता  बनकर दिखलाएं
सारे भारत - वाशी, बच्चे भी , भारत माँता  के  बन  जाएं
फिर देखना  खुद को खुद  में, हम दुनिया  में कहा खडे है
राजनीति के कारण हम सब  कबर में  जिन्दे आज गडे हेै

देश के टुकडे -टुकडे   करने  की  ये  हरकत अब तो छोडो
एक राष्ट्र  हो  केवल  भारत, जोड  सको   तो   ऐसा  जोडो
जांति-पांति  और भांषाओं की  सीमाओं को मिलकर पाटो
जंहा  कंही  भी  गांठ  पडी   है, गले लगा कर  गांठे काटो
होने को  सब   कुछ  सम्भव है,पर थोडा सा नियम कडे है
राजनीति के कारण हम  सब  कबर में जिन्दे आज गडे हेै

अरब - खरब  की  माया  नेताओं  की   रैली  चाट  रही है
मंहगायी,  भुखमरी   देश   में  बे - रोजगारी  बांट  रही है
फिर   उपर   से   वेतन,  भत्ते,  पेन्सन   नेता  रगड  ऱहे हैं
मंचो पर  देखो  चुनाव  के, सब   कुत्तों  जैसे   झगड रहे हैं
ऱाजनीति  के  इस  बीहड  में  हर   डाकू  के  अलग धडे हैं
राजनीति के कारण हम  सब कबर  में  जिन्दे आज गडे हेै

सोच समझ  कर   बच्चे  पैदा   करने  की  नीति अपनाओ
कामदेव  की  इज्जत  करना  सीखो,  सडको पर ना लाओ
व्यभिचार  और  बलात्कार  की  भांषा  से  भारत मरता हेेै
भ्रष्टाचारी   परिभांषा   से   स्वाभिमान  गिर  कर  डरता है
कवि  आग की  मानो, हम  तो   हर  युग में परवान चढे है
राजनीति के कारण हम सब  कबर  में  जिन्दे आज गडे हेै।।
                   राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                         मो0 9897399815
            rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, February 26, 2016

नारी  का  ये कौमार्य   बदन
बनता श्रृष्टि  सोंन्दर्य   पतन
कहीं योगी रुप  है  शंकर का
कहीं अंग-अंग रमता है मदन
               51
योग- भोग   समरुप   सरस
श्रृष्टि  ने  ऐसी   रची    बाला
ये विशय  वृष्टि  नारायण की
वधु  से बनती   है   वधुशला
               52
कुछ वधु विरोधी  मजहब  हैं
नारी  निकृष्ट    बना     डाली
हर  शब्द  पुरुष  प्रधान  बना
कैसी  नारी  की   छवि  काली
               53
नारी  है नशल - फसल रचना
जो  पुरुष  वृक्ष की    हैे   डाली
वधु  ने गुल चमन बना  डाला
सिंचन करता  है   नर   माली
          54
कहते   हैं  नारी   बे ग म   है
जो  गम का जीवन जीती  है
सहती  है  अत्याचार  विकट
निज  घूंट लहु  का  पीती   है
               55
क्या धर्म इजाजत नही  देता
खुश  हो जीवन  में मधुबाला
आज  मजहब कमजोर  हुआ
हृदय  विदीर्ण  है    वधुशाला
               56
मजहब  में नारी  दफन  हुयी
घूंघट  में  जीवन अस्त  हुआ
विक्षिप्त नरों  की  दुनिया  में
संस्कार श्रृष्टि  से  पस्त  हुआ
               57
जंहा नूर जन्मता  बेगम   से
गम  से  बेगम को भर  डाला
अबला अब सबला  बन  बैठी
कैसी   सिरकस्त    वधुशाला
               58
पश्चिम ने वधु को खोल दिया
हर  वधु  बनी   है   वधुशाला
नर   पर  नारी परभावी     है
श्रृष्टि   में   शंशय   कर डाला
       59
वहां मात्र  भोग  है  वधु बनी
जीवन में मदिरा  का प्याला
विक्षिप्त बना  नर  जीवन  में
नारी   है   मस्त   मधुशाला
               60
स्वालम्बी जीवन पश्चिम का
नारी   स्वयं    बना     डाला
वेद  - शास्त्र  से   वचिंत   थे
नर   कैस  बनता  मतवाला
      61
नारी को जननी   नही माना
नर - नारी में कोइ भेद  नही
रमणी खुद रमण-भ्रमण करती
नर  को  नारी से    खेद     नही
                62
दोनो  गाडी.  के     चाक    बने
स्वछन्द  साथ    में चलते   है
नारी की विकसित  क्षमता  से
सब  राष्ट्र  स्वयं में  पलते    हैं
               63
नारी   का   पूर्ण   मनोरथ   है
नर    अश्व  बना, नारी  रथ  है
तन से मन  से स्वातन्त्र  बने
नारी का  मत  ही सतपथ   है
              64
पश्चिम की   नारी  सबला  है
विकृत अब भोग का भाव बना
जो स्वंय में जीवन जीता    है
उसका जीवन  ना  घाव  बना
               65
मन मस्तिष्क की  नारी    ने
हृदय प्रवेश अब  कर    डाला
ये   समय  चक्र   बतलायेगा
वो  वीर   बेनेगी     वधुषाला
    66
मिस  मैरी  का बुत देख जरा
ईशा  को जिसने जन्म दिया
ये  चमत्कार  है   नारी   का
भटकी हुयी कौम को सनम दिया
                  67
आज जगत  में  नारी   बिना
कोई काम चलता- फलता  है
कौम , कबीला , राष्ट्र    जमी
सब  नारी से  ही चलता   है
 68
कंही भोग में नारी केा देखो
कहीं योग ब्रह्म में लीन बनी
कंहीं रचना श्रृष्टि  की करती
कंहीं राष्ट्रों की गमगीन बनी
                69
एवरेस्ट   पर    नारी     का
कैसा ये विजय पताका   है
अब   संघर्ष   प्रवीण   बनी
कैसी कुदरत की  आका  है
  70
नारी   नभ  में   उडन  भरे
कहीं तैर रही जलधि तल में
कहीे काम देव ज्वाला मुख है
कहीं प्रियतम  है तन शीतल में
               71
कहीं  करती  काम  करो.डो का
हर  अदा में  नर घायल   होता
श्रृंगार  श्रृष्टि   वरदान    मिला
हर  काम  प्रेम  का पल  होता
             72
अहंकार   नर   में        देखो
नारी स्वाभिमान की मूरत है
मां, भगनी, पत्नि  में    देखो
नारी  में रब   की  सूरत    है
               73
निकृष्ट  नरों की  रचना   में
नारी क्यों  नगर-वधू  होती
मजबूरी नाम है अबला  का
श्रृष्टि   मानवता   पर  रेाती
              74
वैष्यालय  हो या   देवालय
सोंन्दर्य श्रृष्टि का   देती   है
कहीं करुणा है कहीं तरुणा  है
भावों  में सबको भिगोती  है
  75
नर के कारण वधु,वधिक बनी
संहार श्रृष्टि    का   कर   डाला
विस्मय में आज समाज बना
वधु बनी  भंयकर   वधुशाला

Thursday, February 25, 2016

     इस एक पक्षीय भाव ने मेरे अन्तर हृदय को झकझोर दिया और नारी हृदय का भवनात्मक सुकोमल रुप उघड कर सामने आया ! साथ ही एक महत्व पूर्ण वैदिक मंत्र  मातृ देवो भव पित्री देवो भव ,गुरु देवो भव मंत्र में मातृ देवो भव सर्व प्रथम में आता है !इन सबके बावजूद भी शास्त्रों में नारी को निकृष्टता से वर्णित किया गया!और स्त्री मात्र भेाग्या बनकर रहगयी ! यदि युग-युगान्तर में कहीं  एक श्रुति या श्लोक नारी द्वारा रचा गया होता ओर उसका अन्य की भांति प्रचार-प्रसार होता तो निसन्देह ही नारी की यह दुर्दशा ना होती ! यही कारण है कि नारी मात्र भोग्य वस्तु बनकर रह गयी!
               इसके अतिरिक्त शास्त्र प्रमाण हेै कि सती अनुसुइया के पतिधर्म की शक्ति ने ब्रह्मा,विष्णु, शिव को बालक रूप में परिवर्तित कर दिया!सावित्री तो स्वयं यमराज से अपने पति को पुर्नजिवित करा लायी,आधुनिक युग में अहिल्या बाई ,लक्ष्मी बाई,सुल्ताना,जीजाबाई के अतिरिक्त बहुत सी वीरांगनाऐं हैं जो पुरूष  वर्ग से भी उत्कृष्ट अवस्था में हैं,चाहे वह सांसारिक जीवन हो या आध्यात्मिक जीवन हो! कुल मिलाकर मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि स्त्री में किसी भी क्षेत्र में पुरूष से कम क्षमता,प्रतिभा व सम्भावना नहीं है!

                     उदाहरणत
अभिशिप्त  हुयी  गौतम   पत्नि
अबला  को  शापित  कर डाला
घटना सतयुग  में घटित  हुयी
सोचो  कैसी   थी    वधु  बाला

त्रेता    सीता   द्वापर    द्रोपति
परमेश्वर   पुरुष   बना   डाला
सीता बन  में द्रोपदी  जन  में
देखो   अपमानित   वधुबाला

उत्थान पतन का अवलम्बन
वधु  ममता का कैसा बन्धन
यह दिव्य शक्ति  का आरोहण
संस्कार  श्रृष्टि  का  अन्वेषण

जल थल स्थल की वशुन्धरा
तपता यौवन ज्यों स्वर्ण खरा
अमुल्य  रत्न जग  जननी   है
हर  घाव  हृदय  का  करे हरा

ब्रह्माण्ड अखिल अखिलेश्रर की
वधु  शक्ति , भक्ति ,आशक्ति  है
ये रिम  झिम  वर्षा सावन की
वधु अनाशक्त अभि व्य क्ति  है

यह  आग  युगों की ज्वाला  है
विकराल  कराल    कराला   है
वधु   रंग   जमाती   हाला   है
वधु आग रचित  वधुशाला  है
               महान साहित्य कारो द्वारा महान कवियों की रचना में नारी मात्र श्रृंगार का माध्यम रही!चाहे वह संयोग  श्रृंगार हो या वियोग श्रृंगार,केन्द्र में नारी ही है!और  आधुनिक  युग में  तो कई  तथाकथित  कवि वर्ग  भी है, जो मात्र  नारी  को हास्य ओर व्ंयगात्मक  शैली से निम्न  स्तर तक पहुचाने  का कार्य निरन्तर करते रहते हैं !   कोई भी साहित्यकार कहीं या कभी  नारी से कुण्ठित या लज्जित हुआ हो तो उसने अपने कुण्ठित हृदय की  पीडा का प्रक्षेपण  अपने साहित्य में अवश्य वर्णित किया ! 
            प्रायः यह देखने में आया !इसका उदाहरण महा कवि कालिदास, तुलसी दास ,व भर्तृहरि इत्यादि हेैं ! जिनके संयोग व वियोग में नारी ही  केद्रित है!और आशेचर्य तो तब होता है कि कालिदास की प्रेरणादायिनी स्वयं विद्योत्तमा ,तुलसी दास की प्रेरणादायिनी रत्ना तथा सूरदास की प्रेरणादायी उनकी प्रेयसी कन्तो रही हो, इन सबके बावजूद भी इस आध्यात्मिक देश में दुर्गा,काली,उमा,पार्वती,लक्ष्मी, सरस्वति, सीता,राधा,अनुसुइया आदि कितनी नारियाॅं हें जो हमारे देवताओं ,भगवानों की प्रेरणा स्रोत रही हैं! ऐसा शास्त्र कहता है!
 
                                          
कवि  भर्तृहरि की  कुण्ठा   ने
कितना  नारी तृष्कार  किया
कालीदास   ने  नारी       का
इस  श्रृष्टि  में सत्कार  किया

          नारी शक्ति के भावो से उद्वेलित हो कर,ममत्व, वात्सल्य पूर्ण समाज से प्रेरणा पाकर वधुशाला शतक  लिखने की हिम्मत जुटा पाया हूं! अपने पाठकों से यह आकांक्षा रखता हूं कि इस अबोध बुद्वि से परिलक्षित हुई इस वधुशाला के शब्दों के अन्तराल में जो विकृत समाज की भाव भंगिमा है उसकी जटिलता से उपर उठकर नारी वेदना को ध्यान से परिलक्षित करें तोयह स्पष्ट हो जायेगा कि समाज में नारी का क्या मुल्यांकन होना चाहिये था!और यदि यही रुढी.वादी परंपरा समाज में चलती रही तो आने वाले समाज  एक विकृत रुप ले लेगा इसमें संदेह नही है! नारी के  वास्तिविक सौन्दर्य एवं गौरव  को बचाना ही  वधुशाला का  एक  मात्र  उद्वेश्य  ह


            वधुशाला - शतक
                  1
कौशिश   है  अंग-तरगं   बने
आनन्दित   अंग  बना  डाला
सामंजस   भृंग   तरंगो   का
रचता   नवरंग   व धू शा ला
               2
जुल्फें चन्दन बन व्याल बनी
खुशबू    है   दंश  कराल बनी
हर शाख में लिपटी माला सी
घन-घेार घटा घनशाल  बनी
               3
मस्तक में गगन  समाया  है
क्या सोम व्योम का नाता  है
त्रिनेत्र  भेद  की   गुप्त    गुहा
लट  से ललाट बल खाता  है
              4
सर सन्धान सी भृकुटि  बनी
कैसी   हरि  हर  की  दृष्टि   है
नटखट हर हरकत  हाट बनी
ज्यों इन्द्र धनुष पर  वृष्टि  है
                 5
नयना   है  तीव्र  कटारों   से
निर्जन बन सरल सरोवर सी
स्नान ध्यान ऋषि  देवों  का
श्रृष्टि  सोन्दर्य   मनोहर   सी
                  6
भृकुटि  भयंकर  बन    जाये
जब बात हृदय को  ना  भाये
कहीं विधु वधु शोला बनती है
कहीं  प्रेम नयन  में  हरषाये
                   7
पलके   नयना  पलकाती  है
दृष्टि   से  द्वार   हटाती     है
कब बन्द करे कब खुलजाये
हरी,  हर  से  हाट  हटाती  है
                8
पलकों  पर  बाल  झरोंखें  से
उनका  अपना  ही  धोखा   है
कुंजों   से  यौवन  झांक  रहा
कुदरत  का  खेल अनोखा  है
               9
कन्दराह है कर्ण हिमालय से
जहां गमन शब्द का होता  है
सूक्ष्म  शब्द  योगी   बनकर
प्रियतम के हिय में खेाता  है
                    10
कैसे कपोल  हैं रवि शशि  से
स्वछन्द व्यवस्थित मधुर रमण
सन्ध्या  सोन्दर्य घटित   होता
ज्यों  नभ सागर में छवि दर्पण
              11
अधरों   की   लाली   मतवाली
हिलमिल  सोंदर्य  बखान  करे
सरस   श्रृष्टि  अधरा धर    की
मासूम  अधर  रसपान     करे
                 12
संचार   व्यवस्था  जिव्ह्या  की
ये   गुप्त  गेह   रसराज    बनी
कंहीं  चूम रही  कंही  झूम रही
संगीत  सूरों  की   राग    बनी
                13
वधु   कंठ    सुधा  संवर्धन   है
ये  सरिता   सरस   बहाती   है
संयोग    वियोग  श्रृंगार   मधुर
वधुशाला  कण्ठ  से  गाती   है
                 14
बुद्वि  हृदय   मध्यस्त     बनी
संयोग    योग   बनवाती    है
अवलम्बन  है   दो  द्वीपों  का
चिन्तन मन्थन  करवाती  है
             15
स्तन हैं शिखर हिमालय   से
हिममण्डित से आच्छादित हैं
रवि लौ से  थोडा  सा  पिघले
गम्भी  दृष्टि    संम्पादित   है
             16
गोलाकृति   है  महाद्विपों  की
आकर्षित श्रृष्टि  भ्रमण करती
हर  छैल  छबीला वधु यौवन
आसक्त  वक्ष  अर्पण   करती
              17
स्तन है परिचय मां शशू  का
पय पान वधू   से  होता    है
नर का  आकर्षण  वक्ष   बने
अतरंग  खोज  में  खोता   है
              18                               
वधु  का  परिचय स्तन ही है
ये   उम्र  का  भेद  बताता  है
मर्मस्थल प्रियतम गुप्त रमण
हर  वधु   की यौवन  गाथा  है
                19                                     
नाभी  है  भंवर  बहाओं     का
जहां  नर पतंग  ही  फंसता  है
संचार  केन्द्र   उर्जा    का    है
इन्द्री  केा  रसों से  कसता  है
               20
ये  काम   देव ज्वाला मुख  है
लावा  की लहरे   गुप्त    लपट
विशय   वाशना    की  लौ  से
ये शीतल  तन अंगार  विकट
               21
भग,जनम द्वार  है  जीवों  का
जहां  बीज  अंकुरित  होता  है
सहवाशं  से   बदनाम     हुआ
हर  जीव  प्रतिष्ठा    खोता   है
                22
ये  प्रथम  सदन है रचना  का
जहां रज,हज पुण्य कमाता है
नौ मास  समाधि सुरति चढी
नवजात  शिशू  घर  आता  है
                  23
हर जीव की गेह  गुफा घर  है
योगी,वधु कोक में भ्रमण करे
फिर काम वाशना  पुरुषो  की
वधुशाला,वधु मिल रमण करे