Wednesday, December 31, 2014

     शिशू-धर्म
क्या भारत  इन बच्चों  जैसा   हो सकता है
सम्प्रदाय, औकात  स्वयं  की  खो सकता हेै
स्कूल, मदरसा, क्या शैशवता  बो सकता हेै
दाग कफन के लगे मजहब भी धो सकता है

सम्प्रदाय  का  इन  बच्चों  को ज्ञान नही है
खतना,  टोपी,  चोटी  का  अनुमान  नही हेै
पूजा,  नमाज,  पाठ,  प्रार्थना  क्या होती है
अचकन,  कुर्ता  और  लंगोटा क्या धोती है

बच्चों  को  तो  दुर्गन्ध प्रदूषित ही करती है
सम्प्रदाय   से   शैशवता   ही   तो  मरती है
ये  कच्ची  मिट्टी  है जैसा भी खेल बनालो
पत्थर,  ढेला   मारो   या   खपरैल  बनालो

मन्दिर,  मस्जिद,  गुरूद्वारे  हमने ही खोले
अल्लाह,  ईश्वर,  गुरू,  गाड  हमने ही बोले
बच्चों  को  आभाष  नही कुछ ,ज्ञान नही हेै
सम्प्रदाय  के  झगडों  का  अनुमान  नही हेै

हम  पढे़  लिखे,बूढे हैं, फिर भी भान नही है
अनुभव  में  हरकत  तो  है,पर जान नही है
सम्प्रदाय  से  राष्ट्र,  सदा  घुट  कर  रोता हेै
बस,चलने  का  प्रमाण  पहुंचना ही होता हेै

कट्टर पन  ने,  कंहा  हमें  लाकर  छोडा है
बच्चों  का पथ, मग, और रग-रग मोडा हेै
मन्दिर,  मस्जिद,  गुरूद्वारे, संग्राम अखाडे़
इन  बच्चों  ने  कम,बूढों ने ये चमन उजाडे़

राम ,कृष्ण, अल्लाह,ईसा का बचपन देखा
कंहा खिंची  हैे सम्प्रदाय ,मजहब  की रेखा
टोपी,  माला,  कण्ठी,  क्रास, इन्हे दे डाला
बीज  द्वन्द  का ,बचपन  से  हमने ही पाला

हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख,  इसाई सारे आओ
लव  जेहाद  को  छोडो, भैया - दूज मनाओ
क्रिसमस, होली, ईद,मुर्हरम सभी समान है
ये भारत  तो , हर  मजहब  का बागवान है

संघर्ष  छोड  कर  नये  वर्ष   में हर्ष मनाओ
निर्विकार   शैशवता  से  नव - वर्ष  मनाओ
कौम - कबीलों के झगडे सब निपट जायेंगे
अब  भारत मां  का राष्ट्र-गीत बच्चे गायेंगे

शैशवता  का  क्रन्दन  हो, सब झगडे़ छोडो
मानवता  के  भाव  हृदय  में  सभी निचोडो
हर मजहब,अब इस विकार से ही पकता है
शैशवता  का  राग‘आग ही लिख सकता है!!
       राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
              मो09897399815
  rajendrakikalam.blogspot.com

Tuesday, December 30, 2014

नव-वर्ष-2015
नव - वर्ष   मनाने  से  पहले,  ये  हर्ष  मानाने  से  पहले
उत्कर्ष   मनाने   से   पहले , आदर्श   दिखाने  से  पहले
अपने  दिल   के   भावों   को,  शीश  झुकाकर  तोलो ना
यें भारत है, इस भारत  को, बस, भारत- माता बोलो ना

हिन्दू, मुस्लिम  मीत  बने,हर जाति-पाँति नवनीत बने
ये गर्म  हवा  अब  शीत  बने, हर कौम कबीले गीत बने
तुुम सन्त, बसन्त  से  डोलो  ना,द्वार हृदय के खोला ना
यें भारत है, इस  भारत  को, बस,भारत- माता बोलो ना

भष्टाचार  हटे  दिल  से, व्यभिचार  हटे  इस  महफिल से
ईमान  बंटे  बस, तिल - तिल से,राष्ट्र दिखे हर मंजिल से
बस,भारत हो तन में मन में,इस रंग से अंग भिगोलो ना
यें भारत  है, इस  भारत  को, बस,भारत- माता बोलो ना

धर्म, मजहब   के   कूँओं  में, पाताल  का  पानी  एक रहे
सब भाँडे खडकाने बन्द  करो, बस, प्रेम  रवानी  एक रहे
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई  हाथ पकड कर डोलो ना
यें भारत  है, इस  भारत  को, बस,भारत-माता बोलो ना

इस राम,कृष्ण की धरती में कुरान को इतना प्यार मिले
चमन में  कलियाँ  ईसा  की,निर्भय  होकर हर बार खिले
धर्म,मजहब  के फूलों में स्वछन्द सी गन्ध को घोलो ना
यें  भारत  है,इस  भारत  को, बस,भारत-माता बोलो ना

हो चैत्र मास का स्वागत भी,आनन्दित हो अभ्यागत भी
बस,राष्ट्र- भक्ति  हो  भारत की,आजाद  रहे शरणागत भी
कलह, कष्ट  सब  दूर   करो,  हृदय   में  प्यार  टटोलो ना
यें  भारत  है, इस  भारत  को,बस,भारत- माता बोलो ना

कौम, कबीले, मजहब में, बस,प्यार की,यार की रीत बहे
हर बोली, भांषा  आशा से, माँ  भारत  के   ही   गीत कहे
नववर्ष में आग के छन्दो से,जो गन्द मिली वो धोला ना
यें  भारत है, इस  भारत को,बस,भारत - माता बोलो ना।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     मो0 9897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, December 27, 2014

  अब  युवा  इस  देश  का  बे-वक्त  बूढा  हो  गया
  एक रात में पैदा हुआ और ईश्क करके मर गया    
                 अब नर नही,किन्नर
हमें   नेता  बनादो   तुम  हम   वो   कर  दिखायेगें
वतन  की  आबरू   पर   भी  मिटेगे  मर दिखायेगें
झाडू   ही   लगाना  है   तो   सरहद   पर   लगायेगें
सुषमा  ने  कहा  था  हम   दश  नर - मुण्ड  लायेगें

अब तुम चूडियाँ  पहनो  हूकूमत  छोड  दो  हम पर
भरोसा करके देखो तो,इस किन्नर के दम-खम पर
ना  आगे  है  ना  पीछे  है, वतन  को  हम  बचायेगें
तिरंगा  हाथ  में   दे   दो, कंराची   तक   फहरायेगें

इस पाकिस्तान की हरकत से,कितने घर उजाडोगे
सियासत की सडक पर,अब कंहा तक तुम दहाडोगे
भरोसा  खो  चुकी  जनता, इन खादी  के नमूनो से
ये  सरहद लाल होती  है  क्यों  फौजो  के   खूनो से

तुम्हें  अब  है कंहा फुरसत,भारत माँ की छाती की
नेता  को  तो  चिन्ता  हेेै,वतन में और ख्याति की
वजीरों   का   चौराहो   में    चिल्लाना  अखरता हैेे
सरहद  का  सिपाही  क्यों  ,यंहा  बे-मौत मरता है

इधर  बंग्ला, उधर  चीनी भी, हमला रोज करते हैं
सियासी   कारनामे   तो, अब   सबको  अखरते हैं
ये  नैपाल  मण्डी  है, बस,  खुले  बाजार  में  घूमों
क्या  खाला  का  घर  है  ये, जंहा  चाहो वंहा झूमो

हम नाचेगें भी  गायेगें भी ,पर भारत को बचायेगें
हमें  मौेका  मिलेगा  तो ,हम  पाकिस्तान जायेगें
जूते   चार   मारेगें,  उन   शरीफो  के  नवाजों को
कुचल कर आयेगें उनके तवायफ तख्त,ताजों को

क्यों तुम्हारी  कूटनीति से यंहा  आवाम मरता हेै
क्यों तुम्हारा ये तरीका भी हम सबकोअखरता है
तुम्हारी बात सुन करके,यंहा कुछ आस जागी थी
ये  इतिहास  कहता  है कि ये सत्ता ही अभागी थी

किन्नर हैं,ना हिन्दू हैें,ना मुस्लिम हेैं सियासत में
हमें तो  नाच, गाना  ही  मिला हैे इस विरासत में
वतन  की  रोटियां  खाकर  हम  जीवन चलाते हेैं
हम  ना  मर्द  होकर  भी  वतन  के  गीत  गाते है

हमें  बस ,एक  मौका  दो  कुछ करके दिखाने का
हमें  बस  एक  मौका  दो, माँ  का  दर्द   गाने का
हम  फौजों  साये  में ही ,वो  कुछ  कर  दिखायेगें
जो  तुम  में  बुझी  है आग वो ,फिर  से जगायेगे।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  मो0 9897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com
          

Friday, December 26, 2014

                    अश्लीलता 
हम हरिबंस की मधुशाला को बांच रहे थे
पिता  पुत्र  नंगी  नारी  संग  नाच  रहे थे
बागवान  में  संस्कारों  को  झलकाया है
अलविदा ना  कहना ये नंगों को भाया है
 
फिल्मि दुनिया नैतिकता का गाना गाये
नंगी  दुनिया में  नंगों  का  नाच  दिखाये
नंगों   के   नाचों   से    नंगे  खुश  होते हैं
अभिनय के तो राजनीति में भी न्यौते हैं
चलचित्र नाटक शदियों से  चलता आया
कालिदास , भारतेन्दु  दुनिया  को भाया
संस्कारों को काम वाशना  झलकाती थी
इन्द्रपुरी की परियां भी  तो बलखाती थी
नारी  की  हर  इच्छा  में लज्जा होती थी
नगर वधु तो  व्यभिचार से भी रोती थी
चरित्र हीन की  परिभांषा केवल दृष्टि थी
काम शास्त्र  में  शर्म हया कैसी सृष्टि थी
नंगी  नारी  विश्व  सुन्दरी  बन  जाती है
नंगे  पन  के  लोगों  को   नंगी  भाती है
फिल्मी दुनिया सबके कपडे खोल रही है
नंगेपन  को  कलाकार  क्यों बोल रही है
सौ  से  उपर  टी. वी.  चैनल  देख  रहे हैं
सारे चैनल  अपनी - अपनी  फेंक रहे हैं
हम बिस्तर के सारे आशन दिख जाते हैं
ये रंग- बिरंगे  समाचार  हमको भाते हैं
नंगा  बदन  देखने  के  हम भी आदि हैं
मेरे देश  की  सौ  करोड  की  आबादी है
गर्म देश में गरम हवा को,अब ना छाडोे
नई नश्ल  को  काम वाशना में ना मोडो
यौवनता  से  नंगे  पन को दूर भगाओ
नई पीढी संस्कार बने कुछ ऐसा लाओ
नारी अगर आदर्श वस्त्र से ढक जाती है
भारत माॅं को तो  सारी दुनिया भाती है
नंगो  को  मैं  शब्दों  से  नंगा  करता हूं
नई-नई  कविताओं  से  पंगा करता हू
छोटे  और  बडे  का  मुझमें भेद नही है
कवि आग हूं,लिखने में भी खेद नही है!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com



                    अश्लीलता 
हम हरिबंस की मधुशाला को बांच रहे थे
पिता  पुत्र  नंगी  नारी  संग  नाच  रहे थे
बागवान  में  संस्कारों  को  झलकाया है
अलविदा ना  कहना ये नंगों को भाया है
 
फिल्मि दुनिया नैतिकता का गाना गाये
नंगी  दुनिया में  नंगों  का  नाच  दिखाये
नंगों   के   नाचों   से    नंगे  खुश  होते हैं
अभिनय के तो राजनीति में भी न्यौते हैं
चलचित्र नाटक शदियों से  चलता आया
कालिदास , भारतेन्दु  दुनिया  को भाया
संस्कारों को काम वाशना  झलकाती थी
इन्द्रपुरी की परियां भी  तो बलखाती थी
नारी  की  हर  इच्छा  में लज्जा होती थी
नगर वधु तो  व्यभिचार से भी रोती थी
चरित्र हीन की  परिभांषा केवल दृष्टि थी
काम शास्त्र  में  शर्म हया कैसी सृष्टि थी
नंगी  नारी  विश्व  सुन्दरी  बन  जाती है
नंगे  पन  के  लोगों  को   नंगी  भाती है
फिल्मी दुनिया सबके कपडे खोल रही है
नंगेपन  को  कलाकार  क्यों बोल रही है
सौ  से  उपर  टी. वी.  चैनल  देख  रहे हैं
सारे चैनल  अपनी - अपनी  फेंक रहे हैं
हम बिस्तर के सारे आशन दिख जाते हैं
ये रंग- बिरंगे  समाचार  हमको भाते हैं
नंगा  बदन  देखने  के  हम भी आदि हैं
मेरे देश  की  सौ  करोड  की  आबादी है
गर्म देश में गरम हवा को,अब ना छाडोे
नई नश्ल  को  काम वाशना में ना मोडो
यौवनता  से  नंगे  पन को दूर भगाओ
नई पीढी संस्कार बने कुछ ऐसा लाओ
नारी अगर आदर्श वस्त्र से ढक जाती है
भारत माॅं को तो  सारी दुनिया भाती है
नंगो  को  मैं  शब्दों  से  नंगा  करता हूं
नई-नई  कविताओं  से  पंगा करता हू
छोटे  और  बडे  का  मुझमें भेद नही है
कवि आग हूं,लिखने में भी खेद नही है!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, December 25, 2014

साथियों मैं अक्टूबर को राष्ट्र के गौरव श्री सरदार पटेल के जन्म दिवश पर लखनऊ एक कवि सम्मेलन में गया था,वापस लौटते समय रेल में वेटिंग का टिकट मिला,टी.टी. महोदय पैसा लेकर सीटें बांट रहे थे,मैने भी सीट के लिये निवेदन किया तो वे चिड गये और कहने लगे कि ज्यादा बोलोगे तो डिब्बे से बाहर फिंकवा दूंगा। मैं शान्त ऱहा और सारी रात खडे-खडे हरिव्दार पहुंचा,पूरी रात डिब्बे में बैठे यात्रीयों पर गौर करता रहा,सुबह तीन बजे उपरोक्त रचना रची गयी,जाते समय मैंने टी.टी महोदय को धन्यवाद दिया।
साथियों आपसे निवेदन है कि इस रचना को भारतीय रेल मंत्रालय तक पंहुचाने की कृपा करें,शायद ये शब्द राष्ट्र के काम आ सकें और प्रत्येक स्टेशन पर यह रचना राष्टहित में छपी मिले।                  

                              रेल
ये  हिन्दुस्तान  की  रेलें  जंहा  का  बोझ  ढोती हैं
गरीबों  और  अमीरों  की  ये   पुस्तैनी  बपौती है
कोई  कीमत चुकाता है ,कोई  है  मुफ्त का आदि
यहां ए.सी. में  बापू  की  चमकती  देख लो खादी

हिन्दू  और  मुस्लिम  भी  सफर में साथ चलते हैं
यहाॅ पर सिक्ख,इसाई के,मिलकर मन मचलते हैं
यहाॅं तो धर्म और मजहब का दरिया साथ बहता है
यहाॅं  निर्पेक्ष   कौमों    का  हमेशा   साथ  रहता है

यहां  फिरका  परस्ती भी  अदब  से  पेश  आते हैं
यहाॅ तहजीब  हिन्दुस्तान  की  जंक्सन  बताते हैं
हरी  और  लाल   झण्डी  के   करारों   के  इशारे हैं
यहाॅं  पर   मौन   अनुशाशन  , ये   कैसे  नजारें हैं

हरकत  भी  नही  होती  है जब  पटरी  बदलती है    
यहां  मजहब मचलते  हैं तो पूरी  कौम जलती है
हूकूमत  भी तो  रेलों  के  रवेलों  से  ही  पलती है
यंहा फिरकापरस्ती भी सियासत से  निकलती है

जीवन  के  सफर में भी मिलकर  रेल  बन जाओ
इसकी मौन भांषा का अमल जीवन में दिखलाओ
हर  मजहब  के डिब्बे   को  ,ईजंन   एक  ढोता है
सिमट कर आज भी डबरो में,हिन्दुस्तान रोता है

रेलों  के   ही  खेलों  से  ये  हिन्दुस्तान  पलता है
सियासत की  हूकूमत से क्यों अरमान जलता है
सभी डिब्बों में  बैठे  हैं अमन और चैन  लाने को
यंहा जंजीर खिंचती है  वतन  अपना  जलाने को

हर मजहब सिखाता है अमन और प्रेम को लाना
यहां इंजन का हर डिब्बा  है पटरी  का ही दीवाना
काफिर  हो , मुसाफिर  हो  सफर अंजाम  देता है
ना झण्डा है ,ना सीटी  है  यहाॅं   फरमान  नेता है

सारे   राज्य   जुडते   हैं,  इस  पटरी  के  धागे से
ये  रेलें   ही   तो  बुनती  हैं, हिन्दुस्तान  आगे से
बस, भारत ही दिखता  है, मजहब की निगाहों से
सिमटता   है   वतन  मेरा, रेलों  की  ही  बाहों से

सफर का एक ही चिन्तन,ये जीवन खेल हो जाये
हिन्दुस्तान  का  जज्बा जगत  की  रेल  हो जाये
बने पटरी मजहब और धर्म,का बस मेल हो जाये
चालक   आग  जैसा   हो, दरिन्दा  फेल  हो जाये।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  मो0 9897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

साथियों मैं अक्टूबर को राष्ट्र के गौरव श्री सरदार पटेल के जन्म दिवश पर लखनऊ एक कवि सम्मेलन में गया था,वापस लौटते समय रेल में वेटिंग का टिकट मिला,टी.टी. महोदय पैसा लेकर सीटें बांट रहे थे,मैने भी सीट के लिये निवेदन किया तो वे चिड गये और कहने लगे कि ज्यादा बोलोगे तो डिब्बे से बाहर फिंकवा दूंगा। मैं शान्त ऱहा और सारी रात खडे-खडे हरिव्दार पहुंचा,पूरी रात डिब्बे में बैठे यात्रीयों पर गौर करता रहा,सुबह तीन बजे उपरोक्त रचना रची गयी,जाते समय मैंने टी.टी महोदय को धन्यवाद दिया।
साथियों आपसे निवेदन है कि इस रचना को भारतीय रेल मंत्रालय तक पंहुचाने की कृपा करें,शायद ये शब्द राष्ट्र के काम आ सकें और प्रत्येक स्टेशन पर यह रचना राष्टहित में छपी मिले।                  

                              रेल
ये  हिन्दुस्तान  की  रेलें  जंहा  का  बोझ  ढोती हैं
गरीबों  और  अमीरों  की  ये   पुस्तैनी  बपौती है
कोई  कीमत चुकाता है ,कोई  है  मुफ्त का आदि
यहां ए.सी. में  बापू  की  चमकती  देख लो खादी

हिन्दू  और  मुस्लिम  भी  सफर में साथ चलते हैं
यहाॅ पर सिक्ख,इसाई के,मिलकर मन मचलते हैं
यहाॅं तो धर्म और मजहब का दरिया साथ बहता है
यहाॅं  निर्पेक्ष   कौमों    का  हमेशा   साथ  रहता है

यहां  फिरका  परस्ती भी  अदब  से  पेश  आते हैं
यहाॅ तहजीब  हिन्दुस्तान  की  जंक्सन  बताते हैं
हरी  और  लाल   झण्डी  के   करारों   के  इशारे हैं
यहाॅं  पर   मौन   अनुशाशन  , ये   कैसे  नजारें हैं

हरकत  भी  नही  होती  है जब  पटरी  बदलती है    
यहां  मजहब मचलते  हैं तो पूरी  कौम जलती है
हूकूमत  भी तो  रेलों  के  रवेलों  से  ही  पलती है
यंहा फिरकापरस्ती भी सियासत से  निकलती है

जीवन  के  सफर में भी मिलकर  रेल  बन जाओ
इसकी मौन भांषा का अमल जीवन में दिखलाओ
हर  मजहब  के डिब्बे   को  ,ईजंन   एक  ढोता है
सिमट कर आज भी डबरो में,हिन्दुस्तान रोता है

रेलों  के   ही  खेलों  से  ये  हिन्दुस्तान  पलता है
सियासत की  हूकूमत से क्यों अरमान जलता है
सभी डिब्बों में  बैठे  हैं अमन और चैन  लाने को
यंहा जंजीर खिंचती है  वतन  अपना  जलाने को

हर मजहब सिखाता है अमन और प्रेम को लाना
यहां इंजन का हर डिब्बा  है पटरी  का ही दीवाना
काफिर  हो , मुसाफिर  हो  सफर अंजाम  देता है
ना झण्डा है ,ना सीटी  है  यहाॅं   फरमान  नेता है

सारे   राज्य   जुडते   हैं,  इस  पटरी  के  धागे से
ये  रेलें   ही   तो  बुनती  हैं, हिन्दुस्तान  आगे से
बस, भारत ही दिखता  है, मजहब की निगाहों से
सिमटता   है   वतन  मेरा, रेलों  की  ही  बाहों से

सफर का एक ही चिन्तन,ये जीवन खेल हो जाये
हिन्दुस्तान  का  जज्बा जगत  की  रेल  हो जाये
बने पटरी मजहब और धर्म,का बस मेल हो जाये
चालक   आग  जैसा   हो, दरिन्दा  फेल  हो जाये।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  मो0 9897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

Wednesday, December 24, 2014

            भारत रत्न की सियासत

जिसमें हूनर है  चमचमाने  का  चमकता जायेगा
उसकी चमक का गीत  ये  जहान  हरदम गायेगा
इस तरह  उस रत्न  को  परिधी  में  लाना छोड दो
इतिहास हिन्दूस्तान का  बाजार  में बिक जायेगा

राष्ट्र - गौरव  रत्न  जनमत  भीड   में  मत  खोइये
इस  बैरता  का  बीज   भारत  रत्न  से   ना  बोइये
हूकूमते  जज्बात   के  आघात  से  चलती नही हैं
गरिमा वतन  की कीचडो  के  कीच से मत धोइये

अब तो भारत  रत्न  भी चौराहों  पर  बिकने लगे हैं
हर सियासी आज  भारत  रत्न  क्यों दिखने लगें है
जिनके कारण  मजहबों  और  जातियों में हम बटें
अब वो ही  भारत रत्न  की  इबारतें  लिखने लगें है

सूभाष  तो वो  रत्न  है जो  मोल  में बिकता नही हैे
आज  भी बाजार में, वो  रत्न  क्यों  दिखता नही है
चन्द्रशेखर और  भगत  हम  को  नजर आते नही
हाट  में  बहुमुल्य  हीरा  भी  कभी  टिकता नही है

रत्न  अपनी   कीमतें   चौराहों   में   कब  बोलते है
रण-बांकुरे मरते  हैं अपनी  कीमतों  को खोलते हैं
अनुमान होता  है शहीदो  का, निपट जाने के बाद
हम सियासत  से शहीदों  के  कफन  को तोलते हैं

नेहरू,अटल,इन्दिरा से कम ना,बांकुरों कोआंकिये
इतिहास को पढिये,सहादत  पर भी थोडा झांकिये
रत्न  के  इस  यतन   से  अपमान   करना छोड दो
हो  सके   तो, इस  अहं  की  रूढियां  अब  तोड दो

इस आग  को  प्रमाण  देने  की खता मत कीजिये
समकक्षता  चिन्गारियों  की सूर्य को मत दीजिये
चापलूसी  रत्न   भारत  का   कभी  बनती  है क्या
आग  के  दरिया  में  कपटों  से  लपट  ना पीजिये।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com

Tuesday, December 23, 2014

 बडा और कडा दिन
बडे.  दिनों  के  बाद , बडा  दिन  क्यों  आता हेै
दिनों   के   घटने  बढने   से  किसका  नाता है
केवल  अंग्रेजी  स्कूलों  में  क्रिसमस - डे जारी
सेन्टा - क्लाउस दानी था,क्यों शिक्षा व्यापारी

अब तक सेन्टा-क्लाउस से किसने क्या सीखा
क्या  भारत  में क्रिसमस - डे जैसा कुछ दिखा
धर्म, मजहब  के  झगडे, घर - घर  में  जारी हैं
हर सम्प्रदाय  में  कौम, कबीले   क्यों  भारी हैं

सेन्टा-क्लाउस  ने  बच्चो  में   प्यार  ही बाँटा
भेद - भाव  से  हमने  हरदम शैशव को काटा
दुनिया  में   ये  कैसा   क्रिसमस - डे  है  भाई
बदल  रहे  हैं  हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई

गुलदस्ते  हाथ  में  लेकर  बच्चे   भाग  रहे है
अब  अंग्रेजी  संस्कार  वतन   में  जाग रहे है
हर  नये  वर्ष  में   दारू  और  अय्यासी  जारी
इस  भारत  में   शिक्षा - दीक्षा  कैसी    न्यारी

अच्छा  होता  क्रिसमस - डे  हर  कौम मनती
दो  वक्त  की  रोटी  हर गरीब के  घर मे आती
सेन्टा-क्लाउस  बन कर , बच्चों को  बहलाते
धर्म, मजहब  से  उपर  उठ  कर  बच्चे  आते

ये  कौम  कबीले, सभी   सुरीले  सुर  में  गाते
एक मजहब सब मिलकर हिन्दुस्तान  बनाते
ईसा, मूसा, राम,  कृष्ण   सब   एक  ही  होते
इस आतंकवाद को देख  मुहम्मद भी ना रोते

त्यौहार  कोई  भी  बूरा  नही  है हृदय  शुद्व हो
हर  बच्चों  में  राम, कृष्ण,  महावीर,  बुद्व हो
हर कौमो से सेन्टा-क्लाउस  निकल  के आएं
कवि आग  भी  क्रिसमस - डे  से  भारत गायें।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                 मो0 9897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com


                
                   वर्तमान भारत
सोने की चिडि.या था भारत,हम क्यों मिट्टी बेच रहे हैं
भू  माफिया , नेता , त्यागी,  वषुन्धरा  को  खेंच रहे हैं
धरती  काटी  जंगल काटा, मानव को  मजहब में बांटा
भ्रष्टाचारी   राजनीति    में  मजा  ले  रहे   बिडला टाटा
निम्न कोटि की मानवता में  मुझे  बतादो कंहा ज्ञान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है

नदियां  सूखी  नाले  सूखे  घर -  घर  के  पतनाले सूखे
अब तो पवन,वमन करती है,मन, मानव, मतवाले सूखे
सूख रहा है  धरती  अम्बर, जोगी, भोगी और पैगम्बर
कलियों का मुरझाता  नम्बर, कैसा  परंपिता, आडम्बर
देख रहा हूॅं  जर-जर दुनिया  मुझे  बतादो कंहा जान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है

विश्व सुन्दरी नंगी  नारी, यति,सति   घर - घर में भारी
बलात्कार की  मारा  मारी, व्यभिचार  से लज्जा हारी
व्यर्थ वासना जाग  रही है, यौवनता  क्यों  भाग रही है
महज प्यार धोखा है तन का,प्रेम  वासना  जाग रही है
ब्रहमचर्य से बानप्रस्त तक,  मानवता  की लुटि शान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है

सेवक बाबू और  अधिकारी,  पड. गये प्रजातंत्र में भारी
धनबल संकट मोचन हारी,चरित्रहीन की महिमा न्यारी
तंत्र यंही  से  लटक  रहा है, सत्ता  सेवक  सटक  रहा है
प्रजातंत्र  को  पटक  रहा है, भय से भारत भटक रहा है
अखवारों में  नित  पढ.ता  हूं,मुझे  बतादो कंहा मान हैं
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है

न्याय  व्यवस्था  टूट  रही है,तुला न्याय से छूट रही है
इज्जत खुलकर  लूट  रही है, मानवता  को कूट रही है
अधिवक्ता भी चिल्लाते हैं,अब तो सब  मिलकर खाते हैं
काया, माया, औखाते  हैं,  मुजरिम क्यों गीता गाते हैं
न्यायालय में देख रहे हो न्यायाधीश का कंहा ध्यान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है,जमी पे भारत ही महान है

धनवानों का धन काला  है,धन से क्यों  लुटती बाला है
धनिक, देष में मतवाला है,भाग्य विधाता  धन वाला है
ईष्वर को धन  पाल  रहा है, अपने ढंग  में ढाल रहा है
सच्चाई को टाल रहा  है, नरक में  सबको  डाल रहा है
चोर, उचक्के, भ्रश्टा चारी,सब दुनिया  में चरितवान हैं
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है

हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख, इसाई  परिवर्तन में लगे पडे हैं
धर्म,कर्म और सम्प्रदाय में,स्वर्ग,मोक्ष के अलग धडे हैं
सब  डेढ  अरब  की आबादी  में, नंगे - भूखे  ढूंढ रहे हैं
इन भेडों  को  सभी  अखाडे , अपने  ढंग से  मूंड रहे हैं
कवि आग को सब  कहते  हैं,भैय़्या ये तो धरम् दान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Monday, December 22, 2014

           बेरोजगारी
शिक्षित यौवन हांफ-हांफ कर क्यों मरता है
ना जाने सेवा की कितनी  निविदा भरता है
नये - नये  विज्ञापन  न्युक्ति   के  पड.ता है
परिवारों  की  लाचारी  से  नित   लड.ता है

विज्ञापन तो  धन संचय  की गहन चाल है
इस शिक्षा  से  यौवनता   का  बूरा हाल  है
एक   नौकरी में  आवेदन   हजार   खडे  है
आज  तो  बच्चे  मां, बापों  के गले  पडे  हैं

ज्ञान की  किमत  में  संस्थायें  पैसे  खाती
सरकारें  क्यों  जिम्मेंदारी    नहीं    उठाती
सेवा  की   आशा  में   बच्चे   बाप  पढाता
क्यों  स्नातक गली गली  में  धक्के खाता

भूमाफिया नेता और चोरों की कैसी मस्ती
आज  देश में  शिक्षा की हालत  है  खस्ती
पढ.लिखकर के  देखो यौवन भटक रहा है
भ्रष्टाचारी   केैेसे   भारत   सटक   रहा   है

शिक्षाओं   में   भांषाओं  के  भेद - भाव हैं
आज राष्ट्र में सब से  विकृत  यही  घाव है
शिक्षा सम  हो ,सत्ता  की  औकात नही है
यौवनता  में  राष्ट्र-भक्ति  जज्बात  नही है

राष्ट्र सृजन में  हर शिक्षित को आगे  लाओ
ऐसा सोचो शिक्षित को   भी काम दिलाओ
दायित्व राष्ट्र का शिक्षित को काम दिलाना
स्नातक शिक्षा तक व्यय अनुमान लगाना

क्यों उपनल वाले चौराहों पर आज खडे. हैं
मुर्दों  के  भी   संविधान  में  अलग धडे. है
अपने  खर्चे  नेताओं  के   कितने   भारी है
अब  रोजगार  देने  की  किसकी जि्मेदारी

शिक्षा का उपयोग राष्ट्र की अमुल्य निधि है
यह भी राष्ट्र सृजन करने  की एक  विधि  है
उर्जावान शरीरों  की  हर  युग   में    गाथा
शिक्षित  यौवन  ही  होता  है राष्ट्र  विधाता  ।।
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                 मो0 9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com

           बेरोजगारी
शिक्षित यौवन हांफ-हांफ कर क्यों मरता है
ना जाने सेवा की कितनी  निविदा भरता है
नये - नये  विज्ञापन  न्युक्ति   के  पड.ता है
परिवारों  की  लाचारी  से  नित   लड.ता है

विज्ञापन तो  धन संचय  की गहन चाल है
इस शिक्षा  से  यौवनता   का  बूरा हाल  है
एक   नौकरी में  आवेदन   हजार   खडे  है
आज  तो  बच्चे  मां, बापों  के गले  पडे  हैं

ज्ञान की  किमत  में  संस्थायें  पैसे  खाती
सरकारें  क्यों  जिम्मेंदारी    नहीं    उठाती
सेवा  की   आशा  में   बच्चे   बाप  पढाता
क्यों  स्नातक गली गली  में  धक्के खाता

भूमाफिया नेता और चोरों की कैसी मस्ती
आज  देश में  शिक्षा की हालत  है  खस्ती
पढ.लिखकर के  देखो यौवन भटक रहा है
भ्रष्टाचारी   केैेसे   भारत   सटक   रहा   है

शिक्षाओं   में   भांषाओं  के  भेद - भाव हैं
आज राष्ट्र में सब से  विकृत  यही  घाव है
शिक्षा सम  हो ,सत्ता  की  औकात नही है
यौवनता  में  राष्ट्र-भक्ति  जज्बात  नही है

राष्ट्र सृजन में  हर शिक्षित को आगे  लाओ
ऐसा सोचो शिक्षित को   भी काम दिलाओ
दायित्व राष्ट्र का शिक्षित को काम दिलाना
स्नातक शिक्षा तक व्यय अनुमान लगाना

क्यों उपनल वाले चौराहों पर आज खडे. हैं
मुर्दों  के  भी   संविधान  में  अलग धडे. है
अपने  खर्चे  नेताओं  के   कितने   भारी है
अब  रोजगार  देने  की  किसकी जि्मेदारी

शिक्षा का उपयोग राष्ट्र की अमुल्य निधि है
यह भी राष्ट्र सृजन करने  की एक  विधि  है
उर्जावान शरीरों  की  हर  युग   में    गाथा
शिक्षित  यौवन  ही  होता  है राष्ट्र  विधाता  ।।
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                 मो0 9897399815
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           बेरोजगारी
शिक्षित यौवन हांफ-हांफ कर क्यों मरता है
ना जाने सेवा की कितनी  निविदा भरता है
नये - नये  विज्ञापन  न्युक्ति   के  पड.ता है
परिवारों  की  लाचारी  से  नित   लड.ता है

विज्ञापन तो  धन संचय  की गहन चाल है
इस शिक्षा  से  यौवनता   का  बूरा हाल  है
एक   नौकरी में  आवेदन   हजार   खडे  है
आज  तो  बच्चे  मां, बापों  के गले  पडे  हैं

ज्ञान की  किमत  में  संस्थायें  पैसे  खाती
सरकारें  क्यों  जिम्मेंदारी    नहीं    उठाती
सेवा  की   आशा  में   बच्चे   बाप  पढाता
क्यों  स्नातक गली गली  में  धक्के खाता

भूमाफिया नेता और चोरों की कैसी मस्ती
आज  देश में  शिक्षा की हालत  है  खस्ती
पढ.लिखकर के  देखो यौवन भटक रहा है
भ्रष्टाचारी   केैेसे   भारत   सटक   रहा   है

शिक्षाओं   में   भांषाओं  के  भेद - भाव हैं
आज राष्ट्र में सब से  विकृत  यही  घाव है
शिक्षा सम  हो ,सत्ता  की  औकात नही है
यौवनता  में  राष्ट्र-भक्ति  जज्बात  नही है

राष्ट्र सृजन में  हर शिक्षित को आगे  लाओ
ऐसा सोचो शिक्षित को   भी काम दिलाओ
दायित्व राष्ट्र का शिक्षित को काम दिलाना
स्नातक शिक्षा तक व्यय अनुमान लगाना

क्यों उपनल वाले चौराहों पर आज खडे. हैं
मुर्दों  के  भी   संविधान  में  अलग धडे. है
अपने  खर्चे  नेताओं  के   कितने   भारी है
अब  रोजगार  देने  की  किसकी जि्मेदारी

शिक्षा का उपयोग राष्ट्र की अमुल्य निधि है
यह भी राष्ट्र सृजन करने  की एक  विधि  है
उर्जावान शरीरों  की  हर  युग   में    गाथा
शिक्षित  यौवन  ही  होता  है राष्ट्र  विधाता  ।।
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                 मो0 9897399815
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Sunday, December 21, 2014

            धरम् के धन्धे करम् के अन्धे
वेद पुरान का छाता देखो,राम ,कृष्ण  की गाथा देखो
भीड़ भयंकर तांता देखो,धरम्  करम्  का खाता देखो
वक्ता कैसा बोल रहा  है, धनिक  कौन  है  तोल रहा है
कथा में किस्से खोल रहा है,मन पागल है डोल रहा है

दीन दुखी  की  भीड़  जमा  है, सुनने वाले खूब रवां है
नर नारी  का  खूब  संमा  है,फिर झगड़ा नहीं थमा है
देखो राम कृष्ण  की बातें, एक धरम में कितनी जातें
धन देखो  कितना  हैं खाते, कैसे  कटती  इनकी रातें

मुल्ला के उपदेश भी देखे,इस धरती में क्लेष भी देखे
धरम करम  के  द्वेश  भी देखे, कैसे  हैं दरवेष भी देखे
अब तो सिर्फ ईसाइ  हस्ती, पैग  हाथ  में देखो मस्ती
मजहब कीमती कौमें सस्ती,देखो कैसी हालत खस्ती

एक जमीं  जंहा  एक है, अल्लाह , ईश्वर  सभी नेक है
जल में कैसी खींची रेख है,कर्म गति का अटल लेख है
भिक्षु   नंगे   चलते   देखे,  धर्मो  से  मठ  पलते  देखे
बन  में  जोगी  गलते देखे,  खाली  हाथ  मसलते देखे

राधास्वामि  भीड़  है भारी, निरंकार की महिमा न्यारी
गुरुद्वारों  में  लंगर  जारी, धरम  का धन्धा है लाचारी
देखो सबका एक विधाता,फिर ये धन्धा क्यों भटकाता
देखो  धरम्  करम्  का नाता, कैसी आग लगाई भ्राता

मजहब शान्त कहां होते हैं, अपने घर को क्यों खाेते हैं
अब  तो  मुर्दे भी रोते हैं, धरम् मजहब को क्यों ढोते हैं
बैर मजहब  में  क्यों होता है, बन्दा घुटके क्यों रोता है
मूल्य धरम्  का क्यों खोता है, सारा धन्धा ही थोता है

भगवानों  की  माया  देखेा,  चमक भक्त में काया देखो
महाकाल   की  छाया  देखो, मुर्खो  ने  भरमाया  देखो
हर शरीर  में तत्व पांच हैं,फिर भी तनमें लगी आंच है
धरम् धरा में  बिछी  कांच है,पड़े भरम् में कहां सांच है

गऊ,गंगा,गायित्री  खोती,मस्जिद मुल्ला देख के रोती
ईसा,मैरी भीड  को ढोती, गुरूग्रन्थ अब महज है पोथी
बुध्द,जैन में देख चुनौती,सब की अपनी अलग बपौती
कुछ बची खुची औकातें खोती,पनप रहे हैं तोता,तोती

पशुओं  को कुछ  सुन्दर  पायासुन्दरता में भोली काया
नभ में  देख परिन्दा  छाया, सब के ऊपर रब की माया
अन्दर सबके एक खुदा है,फिर क्यों बन्दा जुदा जुदा है
भगवान भक्त तालाक शुदा  है ताकत वाला वही खुदा है।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

Saturday, December 20, 2014

जिन्दगी  में  आदमी  ना जाने क्या-क्या कर बैठा
कहीं  मन्दिर  बना  बैठा ,कहीं  मस्जिद बना बैठा
परिन्दा  हमसे  अच्छा है,जो आपस में नहीं लडता
कभी मन्दिर में जा बैठा कभी मस्जिद में जा बैठा।।                

            वक्त का रक्त            
जब आदमी ही नही रहेगा इस जमीं में
किस  तरह  फूटेंगे  नव-अंकुर  नमी में
कुछ ठूँठ है जो सूख गये हैं इस गमी में
कुछ कमी अब्बा  में है, कुछ है अमी में

संस्कार की तालीम अब तो बचपना है
क्यों मदरसों  में लगा  कोहरा  घना है
हर  जगह  शिक्षा  नुमाइस  हो  रही है
नई पीढियाँ तालीम से क्यों खो रही हेै

अब  किताबें  आदमी  लिखता नही है
क्या लिखे,जबआदमी दिखता नही है
अब  दूर  तक  हैवानियत  का  शोर हेै
दिल  का नही, अब  ये दिमागी दौर है

फिर भी पूजा, हज, नमाजी  हो रही है
इस धर्म से इन्सानियत ही खो रही है
मन्दिरो,मस्जिद के  झगडे  ही खडे है
हर धर्म के  अपनी  जमातो  के धडे है

हर  मजहब नस्लों में  कीडे पालता है
गन्दगी  हर  शख्स  उसमें  डालता है
हैवानियत   पूरा   जहर   निचोडती हेै
फिर सियासत भी कहर को मोडती है

क्याआदमी फिर से जमी पर आयेगा
कोई  फरिस्ता  गीत  रब  के  गायेगा
वो  भरोसा, आज ,बस, माँ  भारती है
उस आग को  चिन्गारिया पुकारती है।।
    राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
           मो0 9897399815
 rajendrakikalam.blogspot.com

Friday, December 19, 2014

                  धर्म का मर्म
इस जंहा में हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई पल रहे है
हर  मजहब  मे आदमी  ही  आदमी को  खल रहे है
दुर्भाग्य  है ,आतंक  भी  अब  धर्म से  ही चल रहे है
मजहबी धन्धो  में  बन्दे, किस  तरह  से ढल रहे है

क्या आदमी का धर्म से विस्वास  उठता  जा रहा है
इस  चमन  में हर कलि का श्वांस  घुटता जा रहा है
अब  आने  वाली  पीढीयाँ  विस्फोट  लेकर आयेंगी
अस्त्र  की जरूरत  नही है, ये कौम  दुनिया खायेगी

ये  तासीर  है  तालीम  की ,हम बीज ऐसे बो रहे हैं
ना  समझ  धर्मात्मा   ही  धर्म  को  अब  ढो रहे हैं
हर मजहबआतंक को,घर-घर में चुनकर बो रहा है
इस आदमी की भीड में बस,आदमी ही  खो रहा है

अब मन्दिर  बनेगे,आतंक के पर्याय के  चौराहे में
ये  खेल  होगा  अब सियासी सल्तनत के साये में
अब  आने  वाली  पीढीया, आर्दश  उनका गायेंगी
विस्फोट की ये कौम दुनियाँ में मजहब से आयेगी

हर  खबर  से  खून  के  कतरे  ही  गिरते जा रहे हैं
काफिर मुसाफिर,मजहबों से रोज घिरते जा रहे हैं
सिर फिरे  मरते  हैं, फिर भी रोज फिरते जा रहे हैं
हम  अहिंसक  भी  नपुंसक  से  सिंहरते जर रहे है

क्या  कोई  ऐसा धर्म,मजहब इस धरा में आयेगा
जो आदमी, बस, आदमी, बस आदमी ही गायेगा
मैं इन्तजारी  में  उसी  के, छन्द लिखता जाउँगा
मैं आग हूँ,इस आग  से  उस आग को भी गाउगा।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                 मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

Thursday, December 18, 2014

  क्या शास्त्र सार, नर संहार
वाह  रे  सासन  तेरा  भाषण  कितने  बच्चे  पाल रहा है
आज  सनातन  का  रखवाला  डी.एन.ए.  खगाल रहा है
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख, इसाई  कौम कबीले  काट रहे हो
वशुधैव  कुटुम्बकम्  की परिभांषा चौराहे  में बाँट रहे हो

कौम-कबीलों से  मिल  करके  मेरा  हिन्दुस्तान  बना है
हर रंगो  से  आज तिरंगा,  दुनिया  की  पहचान  बना है
सम्प्रदाय  के कौम कबीलों, क्यों  माँ को नंगा  करते हो
इतिहासों  के  विस्फोटो  से,  हिंसा   कर  पंगा  करते हो

धर्म-ग्रन्थ की सभी  ऋचाएं  चिल्लाकर  के क्यों रोती है
आर्य-खण्ड की धरा आज भी बोझ गधों का क्यों ढोती है
धर्म  सनातन  का  मतलब है, रंग-बिरंगे  फूल खिलाओ
धरती पर मानवता,ममता,समता की  ही शाख हिलाओ

मैं  कूरान  के  पन्नो  से  भी  आग  उगलती  देख रहा हूँ
वेद-शास्त्र  के ग्रन्थो  से  अब  राग  उगलती  देख रहा हूँ
धनपद,  बाईबिल, हिब्रू, में ,  दाग  उबलता  देख रहा हूँ
सम्प्रदाय  के  हर  नालों  में  झाग  उबलता  देख रहा हूँ

गुरूकुल  और  मदरसों  से अब  क्या आतंक पनपाओगे
सत्य,अहिंसा की  धरती  को  हिंसा से  कितना खाओगे
कितना,खून-खराबा होगा,धर्म,मजहब कब तक गायेगा
मानवता  की इस  खेती  को  नरभक्षी कब तक खायेगा

विश्वगुरू  की  परिभांषा  में  अमन-चैन  ही छिपा पडा है
फिर क्यों निष्ठुर  मानवता  में,आतंको का अलग धडा है
मानवता को  खटिक ,कसाई, किस आशा से काट रहे हैं
क्यों सम्प्रदाय के विषमन्थन से जहर धरा में बाँट रहे हैं

हर  मजहब  से  कोई  मानव, मानवता  को  लेकर आये
मानवता  के  नव- अंकुर  को,अब  कोई  दानव ना खाये
धर्मग्रन्थ को फिर से पलटो उस चिन्तनअमल मे लाओ
कविआग कहता है,जग में मानवता की अलख जगाओ।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                   मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com










Wednesday, December 17, 2014

                   पाक की राख
इन्दिरा  ने  भी  ऐसा  धोखा  भिण्डर  वाले से खाया है
वही  अस्त्र  अब  पाकिस्तानी  सरकारों  ने अपनाया है
भस्मासुर   को  पाला  है   तो   मिटने  को  तैयार रहो
अगर आदमी  बनना  है तो प्यार कहो,बस,प्यार कहो

लालन पालन,सर्प ,सपोलों  का तुमने ही सिखलाया है
भारत   में  आंतकवाद   भी   तेरे  ही  घर  से  आया है
दुसरों  की  खाई खोदोगे, खुद  भी  उसमे गिरना होगा
नई  पीढी  को  राजनीति  के  षडयन्त्रो से मरना होगा

हमतो तुमको मना रहे हैं,मिलजुलकर भी रहना सीखो
अगर पडोसी अच्छे हो तो,कुछ तो अच्छे बनकर दीखो
कोमल कलियाँ मशल रहे हो राजनीति के जज्बातो से
क्यों  औलादें  कटवाते   हो अपनी  ही कर्कस जातों से

अभी  समय  है  हाथ  बढाओ, उग्रवाद निपटाना है तो
देर नही  है, सोचो  समझो, प्रेम - पन्थ में आना है तो
कमजारी  में अकड के रहना अपने ही घर को खाता है
दुनिया में ना समझी वाला,नजरों  से भी गिर जाता हेै

तालीबानी अल्लाह-अल्लाह कह  कर ही तो मार रहे हैं
क्या कूरान में छिपे  हुये  थे, ये भी कुछ हथियार रहे हैं
दुख होता  है  एक  धर्म  है,फिर  भी बच्चों को खाता है
किस मूंह सेआतंकवाद भी,आयत अल्लाह की गाता है

बच्चे चाहे किसी मजहब के हों,खुद  ही अल्लाह होते है
खुद अल्लाह को मारने वाले खच्चर बोझा क्यों ढोते है
पाकिस्तानी  आवामो  को  मैं  छन्दों  से  समझाता हूं
जब-जब तुझको दुख होता है,मै भी दुख से कहराता हूं

ये   जेहादी  हरकत  छोडो,  सीमा  को  सीने  से  जोडो
पूरातत्व के इन काँटो से कोमल कलियों को मत तोडो
तुम  तो  मेरे  ही  हिस्से हो,फिर भी क्स्सिे काट रहे हो
कवि आग  की  चिन्गारी को क्यों शोलों में बाट रहे हो।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                 मो0 9897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com
                    मातृ देवो भवः
आज पुरूष प्रधान  देश में, नारी  का  अपमान देश में
बलात्कार शमशान  देश  में, ये कैसी  पहचान देश में
अन्धे लूले, लंगडे,  बहरे,  देश   की  सत्ता  चला  रहे है
सीता और  सावित्री, चौराहों  पर  जिन्दा  जला  रहे हैं

नारी की पहचान  देश में, व्यभिचार गुणगान  देश में
घर-घर गुण्डे  पनप  रहे  हैं, नेता जी अनजान  देश में
एक अकेली अबला  पर  छः गुण्डे  बलात्कार  करते हैं
भारत माॅं के ये  कू-पूत  भी  कैसा  चमत्कार  करते हैं

मजबूरी में यति, सती  भी  विचलित कभी  नही होती
मातृ-शक्ति है भारत  की  जो  इज्जत कभी नही खोती
मानवता क्यों काम-वाशना के कारण गिरती जाती है
सत्युग,त्रेता,द्वापर  युग  की, खेती  अय्यासी  खाती है

रक्षा - बन्धन  के  धागों को,व्यभिचार  से  तोड़ रहे हो
भाग्य विधाता भारत को तुम किस पथ पर मोड़रहे हो
मोबाइल और फिल्मी दुनिया कामदेव के अस्त्र-शस्त्र हैं
तकनीकी  के  नये दौर  से,आधा  भारत ग्रस्त त्रस्त है

बन्दर   के  हाथों  में  चाकू, बलात्कार  ही  करवाता है
पाश्चात्य  की मदर  इण्डिया, हिन्दू की भारत माता है
पूरा-तत्व  की  शिक्षा,दीक्षा  पुनः धरा  में लानी  होगी
कामवाशना की दुनिया में, फिर से आग लगानी होगी

पढे लिखे  संभ्रान्त  वाशना  के  कीडे़  क्यो पनपाते हो
मेरे उद्यानों की  कलियों को  गलियों  में  क्यों खाते हो
जन्म-दायिनी  बालायें भी  अभिशापों में क्यों जीती हैं              
जिसको हमने शक्ति माना उसकी  ये क्या परिणीति है

मजबूरी   है   कानूनो   में  सख्त,वक्त  अपनाना  होगा
हवश,तमस, दकियानूसी जालिम  को  भी जाना होगा
दर्दनाक  हो  पीडा  ऐसी,  सभी  दरिन्दे   खोंप  मनाये
भारतवाशी   इस   घटना  की  पुनरावृत्ति  ना  दोहराये

संविधान  के अनुच्छेदों  में परिवर्तन  को  लाना होगा
नारी  को भी  संस्कारों का रहन, सहन अपनाना होगा
नंग,अंग,परिधान निमन्त्रण,भोगविलासी बनजाता है
कविताओ  से कवि ‘आग ’का छंद हमेशा समझाता है!!
                     राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                          मो0 9897399815
                rajendrakikalam.blogspot.com

      ना समझी का उत्तराखण्ड
मै  तो एक परिन्दा हूॅं  कविता में व्यंग दरिन्दा हॅूं
एक छोटे पद का बाबू हॅूं जो  पहले से बे - काबू  हूॅं
जनमानस में भाव जगा था नया राज्य बनवायेंगें
सुख सुविधा से इस प्रदेश का भारतभाल सजायेंगें

ना समझी की उत्सुकता ने घर घाट से खो डाला है
जनता नंगी घूम रही है बस  नेता   ही  मतवाला है
सूबे  के सरदार  बनेगें दल - बल   से  मंत्री  आयेंगें
कई जन्मों के दुख  दरिद्र पाॅंच साल में धुल जायेंगें

राजनीति की दुर्वाशना खण्ड-खण्ड से खुष  होती है
हल्केपन की राजनीति से  नई  पीढियाॅं  ही  रोती हैं
केन्द्र समर्पित हो जाते तो  जीवन स्वालम्बी  होता
उत्तराखण्ड  का जन-मानस क्यों  भ्रष्टाचारों से रोता

उत्तराखण्ड बनाया हमने क्या खोया क्यापाया हमने
जनता के थे क्या-क्या सपने यहाॅंतो लूट रहैं हैं अपने
लूट रहे है सेवक घर को जनता  का क्या भला  करेगें
उत्तराखण्ड की देव भूमि को राॅड,भाॅंड और साॅंड चरेंगें

पलता  था  जीवन  घ्याडी में अब घूम रहैं हैं गाडी में
मुर्ग   मसल्लम  चलता है ,जीते  थे  धबडी  बाडी में
घर  में  नही  झंगोरा  था  अब   बासमती की बातें हैं
परेशान   थे   भाडे   से   अब   बत्ती   लाल  घुमाते हैं

तृष्कार का जीवन था अब संग में डी.एम डोल रहा है
राजनीति की कृपा से  बस  भ्रष्ट जोर  से  बोल रहा है
मुशकिल था लखनउ जाना अब तो देहरादून ठिकाना
देख  के नेता गली-गली  में श्वान-देव ने भी पहचाना

कोई पौडी का कोई टिहरी का ये कैसा खेल जगीरी का
कुमाॅंऊ  यहाॅं पर  भारी  है  बस,दोनो कौम भिखारी हैं
क्या  विकास  की बोली है बस, भरती अपनी झोली है
हर  नेता   यहाॅं   अधूरा   है चमचों का   रूतबा पूरा है

कोई नेगी है कोई  रावत है  हर पद  के पीछे  दावत है
विस्थापित  बशवाने  हैं पर   अपने   नही   ठिकाने हैं
सभी  मुवावजा खातें  हैं  नाली  का  बिगाह बनाते  हैं
भू - माफिया भारी  है  बस  मालिक  यहाॅं  भिखारी है

उत्तराखण्ड  में  इस्क समाया  नेता से इन्दर घबराया
उर्वषी ,मेनका ,रम्भा गायब देखा तो मंत्री  संग  पाया
अय्यासी का जो फन देखा हुआ इन्द्र को खुद में घोखा
बोला  चलो  मेनका  दीदी  यहाॅं  का नेता बडा अनोखा

ये  राज  नही अब  राग बना 36व्यंजन का साग  बना
जो  राजसभा  को  भातें  हैं  वो  उत्तराखण्ड  से जाते हैं
बाण  नही  बस  तरकस है ये देव भूमि अब  सरकस है
सबकी  नजरों  में टुकडा है ये कैसा गजब का जुकडा है

अधिकारी  सब पर भारी है बस,खेल उन्ही  का जारी है
नेता  की  हस्ती  पहचानी   करते  हैं  अपनी मनमानी
नौकर से  मालिक डरता है फिर दोनों का  घर भरता है
इनकी  ही  कलमें चलती  हैं  फाइल से  सत्ता पलती है

खर्चा  कई  लाख  करोडों  में बस, माल नदारद रोडों में
फाइल  में  सडक  बनाते हैं ये खुल्लम खुल्ला  खातें हैं
जो  भी सत्ता में आता  है  अपना   ही   खेल दिखाता है
पाॅंच  साल  का  करा  धरा  उसमें   भी जाॅंच बिठाता है

विद्यालय   बन    जाते    हैं   बच्चे   भी   फर्जी  आते हैं
जो अन्न मिला सरकारों से मिल बाॅंट सभी  खा जाते हैं
वेतन  भी  अच्छा  पाते  हैं  शिक्षक   सरकार  हिलातें हैं
गुरूजी  तो  घर  में रहतें  हैं  ये  शिशू निकेतन कहते हैं

शिक्षक  हडताले  करते   हैं   शिक्षा   मंत्री   भी  डरते हैं
बस,  माॅंगे  पूरी  होती  हैं  बच्चों  की  किस्मत रोती हैं
गुरूजी  के   बच्चे   अंग्रेजी   स्कूल   में   शिक्षा  पाते हैं
उत्तराखण्ड   के   नव-अंकुर  इन  पहाडों  में सड जाते हैं

नदियाॅ तो हिम से झरती हैं जनता प्यासी क्यों मरती है
पाताल  से  पानी  लाना  है  पहाडों  में  पम्प  लगाना है
पानी  से  बिजली  गायब  है ये  कैसी  बात  अजायब है
बे - सिर   पैर   की   बातें   हैं   ये  नेता  की  औखातें हैं

शिखरों  में   रेल  बिछाायेगें  ये  कैसा  खेल  खिलायेगें
बस, गैरसैंण  की  बातें  हैं  कुछ  इसी बात की  खातें हैं
घर - घर में खाने  के लाले ,दो  चार बने  बस  मतवाले
भाषण  में  कैसी  भांषा  है   ये   उत्तराखण्ड  तमाशा  हैं

गुल चमन  है इनकी बातों में रिस्ता है कितनी जातों में
कहीं  नदी  वार कहीं  नदी  पार  ये कैसा युद्व अनाथों में
यहाॅं  पुरूष  घूमते   बाडों  में  नारी  है  नरक  पहाडों  में
शिखरों में सूरजअस्त हुआ गढवाल का भैजी मस्त हुआ

नीचे   से   दारू  ढोते   हैं   उत्पात   यहाॅं  पर  होते  हैं
खडा  कौन  है  पाॅंओं  पर  घर  बार   लगा  है दाॅंव पर
आज  हिमालय लुटता है  घर - घर  में रिस्ता  टुटता है
ये ! देव  भूमि  की  लीला है यहाॅं लाल खून भी पीला है

घर  से ही माल  उठाता  है  व्यापारी  खूब  कमाता है
यहाॅं  हर  देश का  मानव है ये देव भूमि अब दानव है
संस्कार  गये  अब  पानी  में  ये बूढी कौम जवानी में
नेता में देखो  लाली है बस,  उत्तराखण्ड  ही  खाली है

राज्य लूटकर  चन्दा  भी दिल्ली के  दल  में  जाता है
उत्तराखण्ड को  राजनीति का  मरा  भूत  भी  खाता है
क्यों   होते   हैं  रोज  फैसले  राजनीति  गलियारों से
मुख्यमंत्री   बदल    रहे    है   दिल्ली   के   दरबारों से

भीख माॅंगकर  उत्तराखण्ड  को  स्वीटजरलैंड बनायेंगे
स्विस  बैंक  के  सारे  खाते  उत्तरारखण्ड   में  आयेंगें
सपने   देखो    अपने   देखो   राजनीति   ये  गाती  है
अब  तो  टुच्चेपन के भाशण से  भी जनता शर्माती है

सबसे  ज्यादा  उत्तराखण्ड  में  रामदेव  की  धरती है
योग - पीठ  गलियारे  में सरकारें  पानी    भरती हैं
सारे  आसन  राजनिति  के   टी 0वी0    दिखलाते है
सत्ता   और   सियासत   की   कपाल  भारती  गाते है

पातंजलि  के  योग  सूत्र  से स्वाभिमान  को गाता है
एक लंगोटा दस  साल  में  दुनिया   में  छा जाता है
छिपी  हुयी  है  बीस अरब  की  माया एक लंगोटी में
राम  देव  जी  भारत  को   देखो  गरीब  की  रोटी में

आज दिवाकर बादल के पीछे से छिपकर झाॅंक रहा है
मुख्यमंत्री सभी  विधायक ,यू0के0डी के भाॅंप रहा है
सत्ता और सियासत भी तो हड्डी मुॅंह में डाल रही है
यू0के0डी के नेताओं की ,क्षमता  को खंगाल रही है

प्रीतम सिह भी  पराधीनता में खुश है अब खेल रहा है
सोने की  हथकडी  पहनकर  सत्ता  का रथ ठेल रहा है
त्रिवेन्दर   के   हाथों  मेम भी , जंग  लगी  तलवारें है
यू0  के0 डी0  का   शीत   युद्व  ऐरी  के  वारे न्यारे हैं

ये  आधा  टुकडा  काॅंग्रेस  सत्ता में  कब  तक  ढोयेगी
अब बी.जे.पी. भी इस लावारिस खेती में कुछ बोयेगी
जिनको मिला मुआवजा वो भी यू0के0डी0 से दूर हुये
सपने   आज   बढोनी   के  अपने  बच्चों  से  चूर  हुये

मचा  हुआ  है द्वन्द  यहाॅं  पर  नेता और विधायक में
कौन करेगा आज  फैसला  लायक  और नालायक में
बाल   नोचते   आज   बढोनी  रोते   पागल  खाने मे
क्यों  होते  बलिदान  यहाॅं  पर उत्तराखण्ड बनाने में

लीजों  का  बै-नामा  है, सत्ता  का  अमली  जामा है
कृष्ण कनैह्या नेता हैं, बस, जनता यंहा   सुदामा है
भू-माफिया  ग्राम  सभा  की  लीजों को खा जातें हैं
हेरा - फेरी  की   लिस्टों  में  कुछ बाबा  भी आतें हैं

पंगों  से  हर  कोई  डरता  है,  नंगा  यहाॅं निखरता है
पटवारी  और  रजिष्ट्रार , फिर दोनो  का घर भरता है
फार्म  हाउस  बनतें  हैं फिर  खेल  सियासी  चलतें हैं
दुनिया  भर  के  भूखे - नंगेे   उत्तराखण्ड  में पलते हैं

नई   पीडी  में  काम  नही  है  राजनीति  में  आयेगी
फर्जी  निर्माण दिखा  करके  सत्ता  से  हाथ मिलायेगी
जिला  गाॅंव और पंचायत में नये- नये खे खिलायेगी
उत्तराखण्ड  में  हेरा - फेरी  अब  यौवन  में  आयेगी!!
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                   मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com                 

Monday, December 15, 2014

क्या धर्म बिक रहा है
आज हमारा धर्म विदेशी धरती का एक हाट हो गया
जैसे लावारिस गंगा में, मन मर्जी का घाट हो गया
सभी विरक्ती इस धन्धे में तन मन धन से लगे हुये है
हम जैसे कुछ थोडे मुर्दे, इस भारत में जगे हुये है

गोपनीय आध्यात्म जगत को हम कौडी में बेच रहे हैं
माया मिथ्या कहने वाले, केवल माया खैंच रहे हैें
अतरंग चेतना की ये विद्या, धन से तन में डाल रहे हैं
दो कौडी के माया धारी धर्म सनातन पाल रहे हैं

गायित्री मंत्रो की कैसी चोैेराहों पर हाट लगी है
आज धरोहर धर्म-कर्म की क्यों मुर्खो की बाट लगी है
कू-पात्र भी वेद,शास्त्र और धर्म-ग्रन्थ को खोल रहे हैं
ऋषि ,मुनि की वाणी देखो सारे तोते बोल रहे हैं

आश्रम, मठ,मन्दिर में केवल,परी विदेशी नाच रही है
बृन्दावन की रास, नाश कर, गोरी चमडी बाँच रही हेै
सुर-तालो की इस माया में,बाबा जी संस्कार भूल गये
काम-वाशना की शूली में, सभी लंगोटे दार झूल गये

जो विदेश में गया यंहा से, वो ही इज्जत दार हो गया
दो पैसे क्या पडे हाथ में, कुल-द्रोही अवतार हो गया
आज विदेशी धरती जाने वालों की क्यों होड लगी हेै
देख रहा हूँ, जटिल व्याधि है,संस्कारो में कोढ लगी हेै

क्यों आज सनातन ठेकेदारों के हाथों से लुटा पडा हेै
भारत की ये मूल धरोहर योग, भोग से घुटा पडा है
तन्त्र-मंत्र की सारी विद्या, अखवारो में छप जाती हेै
पातंजलि कीयोगी पीढी,भीख मांग कर क्यों खाती है

आओ मिल कर धर्म बेचने वालों का बहिष्कार करो
ये इज्जत के योग्य नही है,मिल कर सब तृष्कार करो
आध्यात्म की गुप्त धरोहर का फिर से सम्मान करो
माया में जो गुरू फँसे है, उनका ना गुणगान करो

धर्मो का परिवर्तन छोडो, बस, अपना धर्म बचाना है
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई परिवर्तन बचकाना है
हमआर्यखण्ड के वाशी हैं,जंहा गमन मोक्ष का होता है
अस्तित्व धर्म का पाखणडी गुरूओं के कारण खोता है

धर्म जगत का छत विक्षत, विध्वंश दिखायी देता हेै
नासूर धर्म में छिपा हुआ, वो अंश दिखायी देता हेै
मैं सचेत करता हूँ केवल छन्दो की परिभांषा से
कवि आग हूँ, बोल रहा हूूूूँ, बुझा हुआ कुछ आशा से ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

  एक  खटमल  ने  कहा चिंघाड़कर
     कुछ ना पाओगे हमें तुम मार कर
     आप   से    ज्यादा  हमें  जूनून है
     मेरी  रगो  में  आपका  ही खून है।।
               धर्म और राजनीति
एक गर गोविन्द  है  तो अन्य कई शिशूपाल हैं
इस  अजूबे   देश   का   ये  राजनैतिक  हाल है
हर कारवाॅं बतला रहा  है  धर्म  की औकात को
फुटबाल बनकर पढ़गया हाथ को और लात को

नेता  बने  हर   धर्म   की   टीम   के  कप्तान हैं
पल में लय पल में  प्रलय,  कलयुगी भगवान हैं
अब तो बस,इतना  ही सोचो धूल में ना फूल दो
धर्म को बस, धर्म  समझो  बे  वजह ना तूल दो

नयी नश्ल  का उपयोग होता  है सियासतदार से
लुट रही  है  सल्तनत  क्यों  आज भी गद्दार से
क्यों मर रही है कोैम  हिन्दुस्तान की चौराहे में
क्यों   पनपती   हैे  जवानी , राजनीति  साये में

धर्म  में  घर  वापसी के सिलसिले भी चल रहे हैं
कालनिमी  भी सनातन  में अभी तक पल रहे है
इस धर्म से कब  तक  गरीबों को, गधे ये ढोयेंगें
कब  तलक  ये  बीज  घृणा  के  धरा  में  बोयेंगे

इनको  हमारी  क्या  पढी.लेटे हैं सूखी घास पर
तन में  लगती आग है सिकती है रोटी लाश पर
फिर दिखाते  हैं  दया, मजहब,  मरा  इन्सान है
अब तो  समझ  से  है परे क्या, खुदा भगवान है

आदमियत  सढ  गयी   धर्मान्धता   के  भाव से 
हर  लब्ज  उल्टा  पढ़  गया इस्लाम के प्रभाव से
देश  का  नेता  बिका  आदर्श   भी  बिक  जायेगा
हर  धरम  की  धृष्टता  इतिहास  लिखता जायेगा ।।
      राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
            मो09897399815
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