Monday, September 21, 2015

 
कलम का मजदूर हूं, इल्म से मजबूर हूं
जो हो गये हैं भ्रष्ट-पथ,मैं उन पथों से दूर हूं
कलम का बलम
हाथों   में  कलम  है   पर  धार  नही है
नैनो   में सितम  है  पर  प्यार  नही  है
दुनियां  में  समन्दर  का  कंही  पार  नही है
जोखिम  की जिन्दगी  कंही हार नही है
 
अंगार  देखता  हूं पर  कहीं आग  नही है
हर  साज  बज रहा   है   पर  राग  नहीं है
पूरी   महर   खुदा    की  पर भाग  नहीं है
चोरों  का  कफन  देखो  कहीं दाग नही है
 
गुब्बार अपने दिल में  कब तक दबाओगे
छोड.  जिन्दगी   को,   ना   भाग   पाओगे
जहाजों  के परिन्दे हो, घर  लौट आओगे
नई   नश्ल  आयेगी क्या   मुंह   दिखाओगे
 
ईस्लाम   गवाह   है   अपनी  कूरान  का
सिक्खों  में गुरु  ग्रन्थ , धन्धा  ईमान का
इशाईयत  मेंं   सौदा   होता    है   जान  का
हिन्दुओं    में   द्वंद    बहाना  भगवान  का

सियासत में चोर, डाकू, जनता ही डालती है
बीहड में डाकुओं को, जनता ही पालती है
जुमलों के जलजलों को जनता ही झेलती है
भीडों में देखो लाशें, लाशों से खेलती हैं
 
नकाब  सबके चेहरों से खुद ही हट रही है
मजहबों की खाई अब  खुद ही पट रही है
गन्दगी दिलों की अब  खुद ही कट रही है
सौगात  प्रेम  की  घर - घर  में  बंट  रही है
 
हर  वतन  में  धर्म  की बुनियाद  है कलम
गुल में  गुलिस्तां में महज खाद है कलम
शदियों  की  विस्मृति   में  याद  है कलम
ईबादत  है  आग  की, फरियाद है कलम ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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