कामना
इस हूकूमत के स्वयंबर में मुझे भी साथ लेलो
मैं जवाॅं हूॅं , कामना हॅूं आओ मेरे साथ खेलो
सरसराकर ,हर अदा झंकार करती बोलती है
मैं थिरकती हूॅं ,सियासत राजनीति खोलती है
मैं हवश की लालसा में,बूढी कभी होती नही हूॅं
हार कर तुम गिर पढोगे ,मैं कभी रोती नही हूॅं
रब ने बख्शा है हूनर,मैं फडाफडा कर झेलती हूॅं
राजनीति में भी बूढों से बराबर खेलती हूॅं
मैं उर्वशी हूॅं , मेनका हूॅं , इन्द्र की चैपाल में
झूमती हूॅं मस्त होकर खादियों की खाल में
सम्पन्नता के सागरों में ,मैं बराबर डोलती हूॅं
मै वजीरों के जखीरों में,जवानी खोलती हूॅं
मैं तपस्या भंग करने की कला को जानती हूॅं
वाशना के अंकुरों का जलजला पहचानती हूॅं
मैं नगर की हर डगर की हर खबर को ताडती हूॅं
बे-हया बनकर लिबाशों को बराबर फाडती हूॅं
मैं विलासो के विकारों से सदा बदनाम हूॅं
मांस, हड्डी, चर्बीयों में , मैं चढी वो चाम हूॅं
काफूर है मेरी अदा , अय्यासियों के खेल में
श्रृंगार में भी चमचमातीे हूॅं हवश की जेल में
आज भी अबला बनी र्दुगन्द ढोने के लिये
मैं बची सब कुछ लुटाकर, सिर्फ रोने के लिये
गर्भ में भी भ्रूण बन, बे-वक्त मरती जा रही हूॅं
मौत से बच कर सदा ,श्रृंगार करती जा रही हूॅं
सीता ,अहिल्या, द्रोपदी , लक्ष्मी बनी संसार में
अस्मिता लुटती रही कंही प्यार में संहार में
कौमों कबीलो के लिये मैं इस जॅंहा को पालती हूॅं
कष्ट में भी प्यार बनकर मैं स्वयं को ढालती हूॅं
माॅं, भागिनी, भौजी बनी दुनियां बचाने के लिये
मैं जन्म लेती हूॅं सदा श्रृष्टि रचाने के लिये
उपाशना और वाशना में मैं सतत् सज के खडी हूॅं
श्रृंखला ब्रह्माण्ड की भी जोडने की मैं कडी हूॅं
यक्ष, किन्नर, नाग, देवों से सदा लुटती रही हूॅं
अय्यासियों में अप्सरा बन कर सदा घुटती रही हूॅं
ये जमाना काम-क्रिडा और हवश को जानता है
बस, वेदना मेरे हृदय की ‘आग’ ही पहचानता हेै!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो098973998
rajendrakikalam.blogspot.com

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