पर्यावरण अपना शिकंजा कस रहा है
गेरूआ गंगा के तट पर बस रहा है
धर्म अपनी धारणा से धंस रहा है
क्यों समन्दर खिलखिला कर हंस रहा है
भ्रम के भागीरथ
आध्यात्म जगत की चिन्ता है गंगा को स्वच्छ बनाने की
विभत्स ,रोद्र की भांषा में , ये बाते चण्डूखाने की
गौमुख से गंगासागर तक , गंगा का तट घेरा है
मुर्दा सााधू गंगा में क्यों सन्त सनातन डेरा है
ये नाले और पतनाले भी गंगा की धारा पीती है
स्वयं प्रदूषण फैलाने वालों की ये परिणीति है
मठ, मन्दिर तैयार खडा क्यो गंगा चौकीदारी में
माॅं गंगा भी देख रही है भगवा भेष भिखारी में
आज दिगम्बर उत्तराखण्ड क्यों मौन हुआ चिल्लाता है
खुद बच्चे मॅा को नोंच रहे ये कैसी गौरवगाथा है
पथभ्रष्ट आध्यात्म हुआ बश अपनी ध्वजा फहराने को
गंगा से इनको क्या लेना ये गोरख- धन्धा खाने को
परकोटे में आज लंगोटे ए0 सी0 लुफ्त उठायेगें
पानी, बिजली, गिजर ,कूलर मठ, मन्दिर को भायेंगें
तकनीकी के नये दौर का पूरा मजा उठाते हो
हे भागीरथ के वशंज, क्यों गीत विरोध का गाते हो
आध्यात्म जगत के बाद आज ये विद्युत ही तो शक्ति है
रोशन हों सभी दिशांए भी और घर-घर में आशक्ति है
गाॅंव, खेत खलियानोँ में प्रकाश पुंज जलधारा है
घर - घर में दीवाली हो ये सदा सनातन नारा है
अगर सर्मपण है गंगा पर खुलकर ये संकल्प करो
मठ, मन्दिर में विद्युत के संसाधन सारे अल्प करो
माॅं गंगा से मिलने वाली बिजली, पानी बन्द करो
सन्यास पुनः स्थापित हो कुछ एैसा भी अनुबन्ध करो
नेेता जी के शब्द सुनो गंगा ने मुझे बुलाया है
छल,बल, कपटी राजनीति का क्यों गंगा पर साया है
धरती मां भी सिमट रही है पीरों और पैगम्बर से
गंगा तो मैली होती है बस, धर्मो के आडम्बर से
राजनिती मे साधू और सन्यासी जब - जब आयेगा
ये विरोध इस धरती में बश, अन्धकार फैलायेगा
कौन पढेगा धर्म, मजहब विपरीत दिशा की भांषा में
कवि ‘आग’ तो जीता है भारत विकास अभिलाशा में
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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