Tuesday, September 1, 2015

हौज में फौज
देश का रक्षक जन्तर मन्तर पर क्यों अनसन करता है
प्रजातन्त्र का भक्षक अपने घर केवल धन भरता है
सन् पैंसठ की सालग्रह में फौजी भूखा - प्यासा है
चाय - पार्टी में सब नेता, ये कैसा अजब तमाशा है

देश की रक्षा करने वाले खुद रक्षा को चिल्लाते है
आज देश के सारे नेता, वतन लूट कर खाते है
विधवायें अपने शौहर के स्वप्न सलौने देख रही हैं
नम आँशू की तपन,सियासत,मौन सदन मे सेंक रही है

राष्ट्र -भक्त सरकार देश में गुम-,गुम जुमले खेल रही है
बेमौत मौत सरहद पर भारत की सैना क्यों झेल रही है
पुलिस, मिलिट्री,अर्ध -बलों की जगह-जगह हडतालें हैं
राजनीति के इस सर्कस में हमने जोकर क्यों पाले है

भारत- भाग्य -विधाता नेता अधिनायक, नालायक हैं
मुझे बताओ प्रजातन्त्र में ये जोकर किस लायक हैं
अपने अपने कर्तब जोकर संसद में दिखलाते हेै
राष्ट्र - सुरक्षा मरती है, ये अपनी ध्वजा फहराते है

इन शब्दो के सौदागर को शब्दो का अनुमान नही
चमडे की जीव्ह्या से इनको शब्द-भेद का ज्ञान नही
केवल शब्दो की नीलामी होती है चौराहों में
राजनीति की नगर - वधु है, ना - मर्दो की बाहों में

जिस राष्ट्र में रक्षक, भक्षक का भोजन बन जाता हो
जिस राष्ट्र में जनगणमन अधिनायक लूट के खाता हो
ऐसे भारत - भाग्य विधाता से भारत शर्माता है
दुर्भाग्य राष्ट्र का कवि आग भी लपटों से समझाता है
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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