Wednesday, September 2, 2015

अफसर लाल सिपाही हलाल
मैं कर्नल था , बेटा जर्नल, नाती लैफ्टीनैन्ट
घर की बहुवे, बेटी सारी कंही - कंही सर्वेण्ट
पाँच लाख के वेतन, भत्ते, पेन्सन परमानेन्ट
जगह - जगह सम्पत्तिया जैसे टूरिस्टो के टैन्ट

पढे लिखे सडको पर घूमें, सडक छाप एजेण्ट
राष्ट्र - द्रोह, व्यभिचारी , नेता छिड रहे हैं सेण्ट
बुद्वि- बल्लभ,वाणी - भूषण सब झेल रहे हैं डेण्ट
बीस हजार की पेन्सन वाले, वाह, नेवी मर्चेण्ट

तुम सबके होते भारत में भ्रष्टाचारी खेल रहा हेै
तेरे होते व्यभिचार का रोग देश में फैल रहा हेै
तुमने जीवन में अनुशासन,राष्ट्र तिरंगा अपनाया
स्वाभिमान के राष्ट्र गीत को केवल तुमने ही गाया

अच्छा होता सारे फौजी भ्रष्टाचारों से लडते
अच्छा होता बेरोजगारी, मंहगायी से भी अडते
अच्छा होता हर गरीब के साथ सडक पर आजाते
अच्छा होता फौजी ढंग से,राष्ट्र-द्रोह को समझाते

तुम सबके होते भारत माँ,आज सडक पर रोती हेै
तुम सबके कारण माता की कैसी इज्जत होती हेै
तुम सबके होते जोकर सब भारत माँ को लूट रहे
तुम सबके होते भारत की मिट्टी नेता कूट रहे

छाटे पद के सभी सिपाही की ये माँग जरूरी हेै
अर्थ दृष्टि से सर्वेक्षण हो किस की क्या मजबूरी है
वन रेंक की पेन्सन हो पर कमजारो को लाभ मिले
विधवाओं को, लाचारों को केवल ये महताब मिले

सच्चा फौजी राष्ट्रभक्ति में प्राण न्योेैछावर करता हैे
सच्चा फौजी इस मिट्टी में देश - प्रेम को भरता है
उठो राष्ट्र के सच्चे वीरों फिर से ये संकल्प करो
कवि आग की कविताओं से भ्रष्टाचारी अल्प करो ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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