Sunday, September 6, 2015

जन्म अष्टमी पर एक भजन आपको सर्मपित
ताव  मंजिल  रास्तों  पर  सैकडों  थी  मंजिलें,
हर कदम पर मंजिलें ,थी मगर मंजिल न थी
                       जै गोपाल
घनश्याम के चरण में,  ब्रह्माण्ड  है  समाया
मन वाशना मिटी तो बस!तू ही नजर आया 
आॅंखों की लपट लौ से,जलता है कपट सारा
कण-कण में तू बशा है,जब भी  तूझे पुकारा
डूबी  है  जब   भी  नैया  , तूने  सदा  बचाया
घनश्याम के  चरण  में, ब्रह्माण्ड  है समाया
ये ! एक  रूप  तेरा , अनेकों  में  दिख  रहा है
पुण्य -पाप  सबका, तू  ही  तो  लिख  रहा है
ब्रह्माण्ड में तू ही  तो, सब  खेल  खिलाता है
भक्तों की  वेदना  में,बे-खौफ  चला  आता है
तू जीव के हृदय की,ज्योति में टिमटिमाया
घनश्याम के चरण  में, ब्रह्माण्ड  है  समाया
संहार  की    कला   से , श्रृंगार   निकलता है
ज्ञानी का तेरी  लौ  में, अहंकार  पिघलता है
कमजोर  की   कलाइ ,  तेरे  हाथ  में  पडी है
हृदय  की  वेदना  ही , इम्तिहान  की घडी है
दानव !  सदा   दबाये , सच्चाई  को  बचाया
घनश्याम के  चरण  में, ब्रह्माण्ड  है समाया
मुश्किल  तेरी  डगर  है ,पूछूूॅं  कहाॅं  ठिकाना
भावों में भक्त-वत्सल , तेरा  ही आशियाना
मीरा के गीत  में  भी , तू  ही  तो  गा  रहा है
ये ! साज जिन्दगी  का , तू  ही  बजा  रहा है
अर्जुन हुआ है र्निभय,गीता  को  तूने गाया
घनश्याम के चरण  में, ब्रह्माण्ड  है समाया
यौनि बदल बदल कर काया  को  ढो  रहा हूॅं
तेरी झलक मिले बस! तेरी  बाट  जो रहा हूॅं
भटका हुआ हूॅं कब से अब तू   ही  सहारा है
मेरी डग-मगाती नैया का तू  ही  किनारा है
जो डूब करके उबरा,वो ही तेरे  दर  पे आया
घनश्याम के चरण  में, ब्रह्माण्ड  है समाया
ये !  तेरा   सहारा  है , ये   तेरा  ही  इसारा है
डूबे हुये को  हरदम  बस ! तूने  ही  उबारा है
मै हार कर  भी  तेरी , हरकत  से  खेलता हूॅं
हर हाल  में  तुझी  पर ,खुद  को  उडेलता हूॅं
ब्रह्माण्ड भी तूही है ,तू ही  है  जग  की माया
घनश्याम के  चरण  में,  ब्रह्माण्ड है समाया !!
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  मो0 9897399815
  rajendrakikalam.blogspot.com
   

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