Sunday, September 20, 2015

आॅंख
हैैशयत  की  बयानी  आंखो  से  देखता हूॅं
मर्देा की  जवानी  आंखों  से  देखता  हूूूं
दरिन्दों  की  कहानी  आंखो  से  देखता हूूं
परिन्दों  की  उडानी  आंखो  से  देखता  हूूूूँ

दिल   में  दगा  हो  तो  आंख  गवाह  है
कब कौन सगा है  तो  आंख   गवाह  है
कहां घाव लगा  है  तो   आंख  गवाह  है
कब प्यार जगा है  तो  आंख  गवाह  है

आंखे    में    हूूर  है   आंखों    में   नूूर  है
आंखेा   में  शूर  है   आंखो    में  तूर   है
आंखों   से  पास  है    आंखों  से  दूर  है
हर फन  सी ये  आंखें  कितनी  भरपूर  हैं

हूनर खुदा का, बख्शी हैं बन्दे  को दो आंखे
जीवन  संवारने को दी धन्धे को दो आंखे
आतंक करने  वाले  दरिन्दे  की  दो आंखें
आकाश  छानती  हैं  परिन्दे  की दो आंखे

साहित्य संस्कृति का सृजन करती आंख है
दो  दिलों  में पास  है   कहीं  दूर  आंख है
प्रेम   में  उत्साह  भी  भरती   ये  आंख है
पग-पग में जिलाती और मरती ये आंख है

राष्ट्र के   उत्थान  में  सहयोगी  आंख  है
पथ भ्रष्ट और पतन में भी रोगी ये आंख  है
हर   साधना में सिद्व  है  योगी ये आंख  है
सहवास हो या प्यार  हो भोगी ये आंख  है

दृ्टि  श्रृष्टि  के  सृजन  में भेद   हैं  आंखे
घर -घर के राष्ट्र के पतन में छेद  हैं आंखे
संस्कार,  कुल,  वर्ण , भेद,  वेद   हैं आंखे
सत्य  और  असत्य  मध्य  खेद  हैं  आंखे

जीवन जवानी  का सृजन  होता है आंख से
उत्थान  पतन आचरण होता  है आंख  से
सुख दुख में दीनता में मन रोता है आंख से
संंघर्ष का हर क्षण भी तय  होता है आंख से

जो राह दिखाती थी अब वो आंख  कहां है
जो प्यार  बहाती थी अब  वो  आंख कहां है
हर  जंग  जुदा  था  अब   वो  आंख कहां है 
हर  बन्दा  खुदा था  अब  वो आंख  कहां है

राष्ट्र का  अमन,  पतन  होता  है आंख  से
गुल में ‘बू’ और  चमन होता  है आंख  से
जीवन में लक्ष्य का गमन होता  है आंख से
कविता में आग का नमन होता है आंख  से।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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