आॅंख
हैैशयत की बयानी आंखो से देखता हूॅं
मर्देा की जवानी आंखों से देखता हूूूं
दरिन्दों की कहानी आंखो से देखता हूूं
परिन्दों की उडानी आंखो से देखता हूूूूँ
दिल में दगा हो तो आंख गवाह है
कब कौन सगा है तो आंख गवाह है
कहां घाव लगा है तो आंख गवाह है
कब प्यार जगा है तो आंख गवाह है
आंखे में हूूर है आंखों में नूूर है
आंखेा में शूर है आंखो में तूर है
आंखों से पास है आंखों से दूर है
हर फन सी ये आंखें कितनी भरपूर हैं
हूनर खुदा का, बख्शी हैं बन्दे को दो आंखे
जीवन संवारने को दी धन्धे को दो आंखे
आतंक करने वाले दरिन्दे की दो आंखें
आकाश छानती हैं परिन्दे की दो आंखे
साहित्य संस्कृति का सृजन करती आंख है
दो दिलों में पास है कहीं दूर आंख है
प्रेम में उत्साह भी भरती ये आंख है
पग-पग में जिलाती और मरती ये आंख है
राष्ट्र के उत्थान में सहयोगी आंख है
पथ भ्रष्ट और पतन में भी रोगी ये आंख है
हर साधना में सिद्व है योगी ये आंख है
सहवास हो या प्यार हो भोगी ये आंख है
दृ्टि श्रृष्टि के सृजन में भेद हैं आंखे
घर -घर के राष्ट्र के पतन में छेद हैं आंखे
संस्कार, कुल, वर्ण , भेद, वेद हैं आंखे
सत्य और असत्य मध्य खेद हैं आंखे
जीवन जवानी का सृजन होता है आंख से
उत्थान पतन आचरण होता है आंख से
सुख दुख में दीनता में मन रोता है आंख से
संंघर्ष का हर क्षण भी तय होता है आंख से
जो राह दिखाती थी अब वो आंख कहां है
जो प्यार बहाती थी अब वो आंख कहां है
हर जंग जुदा था अब वो आंख कहां है
हर बन्दा खुदा था अब वो आंख कहां है
राष्ट्र का अमन, पतन होता है आंख से
गुल में ‘बू’ और चमन होता है आंख से
जीवन में लक्ष्य का गमन होता है आंख से
कविता में आग का नमन होता है आंख से।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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