शहीदों का अपमान
हम तो बस मातम मनाना जानते हैं
कितने शहीदों को यहाॅं पहचानते हैं
तस्वीर के आॅंशू नजर आते नही
जो मर गये जिन्दों को वो भाते नही
उत्तराखण्ड के मुर्दे कफन में सो रहे हैं
जो मर गये वो लाश अपनी ढो रहे हैं
नींव के पत्थर नजर आते नही
रण बाॅंकुरे दब कर भी चिल्लाते नही
बिखरी हुयी चिन्गारियाॅं भी बुझ रही हैं
कुर्बानीयाॅं किसको यहाॅं पर सुझ रही हैं
आदर्श का उपहास घर -घर हो रहा है
अस्तित्व,अपनी अस्मिता को खो रहा है
संघर्श की वो भीड़ अब दिखती नही है
तस्वीर भी बाजार में बिकती नही है
हम सर्मपण को नही पहचानते हैं
ये शहीदों के सफर की लानते है
संघर्ष की कीमत से हम खुलकर खडे़ है
भटके हुओं को देख लो कितने धडे़ हैं
चैराहों में बे-शर्म बन कर लड़ रहे हैं
सिद्यान्त में सम्भ्रान्त कीडे़ पड रहे हैं
श्रद्वांजलि में जोश होना चाहिये
हर शख्सियत को ठोस होना चाहिये
आग हो तो हर जगह खुशामते हैं
हम तो बस मातम मनाना जानते हैं !!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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