साथियों इस ईद में मैं थोडा सा सामाजिक चिन्तन प्रस्तुत कर रहा हूं,ईद का त्यौहार कूरान में अरब देशों की भौगोलिक परिस्थिती का का उद्बबोधन है,अरब देशों में कूरान के काल में कंही खेती बाडी का उल्लेख नही है,रेगिस्तानी क्षेत्रों में यह सम्भव भी नही है।रेगिस्तान में केवल कंटीली झाडियां व कांटेदार वृक्ष होते हैं,इसिलिये प्रकृति ने अपनी सुलभता के अनुसार वंहा ऊंट और बकरे जैसे जीवों काे इजाद किया ,जो वंंहा के निवाशीयों का आर्थिक व सामाजिक आधार था,इसिलिये इन पशुओं का दूध, मांस भी उपयोग में लाया जाता था,
लकडी की उपलब्धता ना होने के कारण ईंधन में झाडियों का ही उपयोग होता था,ऐसी परिस्थिती में उल्टे तवे का उपयोग किया जाना वैज्ञानिक मजबूरी थी,क्योंकि उल्टा तवा आग की लपटों को बाहर निकलने से रोकता है,जल की कमी के कारण पानी का उपयोग कम से कम था, इसिलिये गंगासागर जैसे पात्र का उपयोग होता था ताकि जल का दुरूपयोग रोका जा सके,जनसंख्या को दृष्टिगत रखते हुये खतना कर्म ईजाद हुआ,ये वंहा की भौगोलिक परिस्थिति थी जो आवश्यक भी थी ।
ठीक ऐसे ही भारत में भी भौगोलिक व सामाजिक आधार पर त्यौहारों का आविष्कार हुआ, जो आज की शदी में धर्मान्धता जैसे प्रतीत होते हैं, कोई भी धर्म हिंसा की इजाजत नही देता,भारत में रहने वाले मुशलमानों के लिये यंहा अन्न प्रचुर मात्रा में है,जलाने के लिये गैस,तेल,लकडी उपलब्ध है,जल की नदियां बह रही हैं,संतति उत्पन्न करने में कोइ प्राकृतिक बाधा नही है,इसिलिये किसी भी धर्म के नाम से जो परम्परायें किसी भी समाज के उपर थोंपी गयीं हो उनको व उनसे होने वाली बुराइयों को छोडने का समय आ गया है, परिस्थिति अनुसार नई परम्परायें इजाद होनी चाहियें जिससे मानवता व हर जीव की रक्षा हो सके ।
ईद में गीद्ध
बे - जुबा को अब ना काटो ईद में
खून के कतरे ना बाटो ईद में
कूरान से बकरे ना छाटो ईद में
इस तरह ना जीव, चाटो ईद में
वो समय कुछ और था इस ईद का
ना समझ का दौर था इस ईद का
क्या तरीका तौर था इस ईद का
हिंसा बना ,सौर्य क्या इस ईद का
मांस कितने खायेगें इस ईद में
गरीब भी क्या आयेगे इस ईद में
त्यौहार भी समतुल्य होना चाहिये
बराबरी हो हर दीन की इस ईद में
बकरे बिके है लाख में इस देश में
जीव मिलते खाक में इस देश में
ये तामसी त्यौहार हटने चाहिये
इमान के रैबार बंटने चाहिये
धर्म में हिंसा कभी होती नही है
कूरान ऐसे बीज भी बोती नही है
इन्शानीयत शख्शियत खोती नही है
मकबरों को मस्जिदें ढोती नही हैं
ईद में हर जीव का सम्मान हो
आदमियत ईद की पहचान हो
हर कौम भागीदार हो इस ईद में
हो मुबारक आग मेरी ईद में।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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