Monday, September 7, 2015

  संस्कृत सब भांषाओं की जननी है,इसिलिये हिन्दी दिवस से पूर्व संस्कृत के शव पर भी कुछ आंशू बहाने का विचार आया जो आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूं। 

विलुप्त संस्कृत
संस्कृत भयभीत हो कर कन्दराह में गुप्त है
श्राद्व तर्पण को बचे बश वेद के कुछ सुक्त हैं
पर्णिनि की आंख से ,आंशू टपकते जा रहे हैं
नटराज के ये सूत्र हिंदी पुत्र अब क्यों खा रहे हैंं

बाणभट्ट भतृहरि की रचना दीमक चाटती है
श्रृगांर कालिदास का किस्तों में हिन्दी बांटती है
मतिमन्द के ही फन्द से रसछन्द में भी गन्ध है
उपयोगिता व्याख्यान की क्यों विद्वता में द्वन्द हैे

नक्षत्र रवि,शशि ज्योतिषि भविष्य का आधार था
अपशगुन , घटना क्रमों का सूचना संचार था
कम्प्यूटरों में बन्द हेाडा- चक्र घुटता जा रहा है
ज्योतिषि भृगुसंहिता से आज छुटता जा रहा है

नित बन रही हैं कुंडली बश शास्त्र के अनुमान से
पंचांग विकसित हो रहे कैसे गणित के ज्ञान से
आडम्बरों से विद्वता को राष्ट्र खेाता जायेगा
ये समय संस्कार की इस संस्कृति को खायेगा

मूर्ख औऱ बाणी विलासों की धरोहर हो रही है
राजनीति, संस्कृति ,संस्कार को क्यों खो रही है
मूर्ख के स्वागत में वेदों की ध्वनि को गाओगे
हे ! देव पुत्रों देव - वाणी को कहाॅं ले जाओगे

वेद की बहुमुल्यता की तुल्यता पर ध्यान दो
चौराहों पर ना बैठ कर ,इस तरह व्याख्यान दो
आत्मा की ये धरोहर शब्द से ना खोइये
ये राजनीति , संस्कृत के खेत में ना बोइये

अब भी समय है रत्न-गर्भा शास्त्र पर कुछ ध्यान दो
भृगु संहिता और पार्णिनी के सूत्र को सम्मान दो
खेाई प्रतिष्ठा में पुनः नव चेतना आ जायेगी
ये ब्रह्मविद्या , विद्धुता, आदर्श फिर से पायेगी!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:

Post a Comment