Thursday, September 3, 2015

गुरू-उत्सव
गुरू उत्सव को भी अब बच्चे झेल रहे हैं
नेता जी अब शिक्षा से भी खेल रहे हैं
गुरूओ की आडो में ,बच्चे बन्धन में हेै
हर समाज में शैशवता क्यों क्रन्दन में हेै

प्राइवेट, सरकारी शिक्षा क्या होती है
गुरूओं को बच्चों की पीढी क्यों ढोती है
शिक्षा में भी राजनीति क्यों सिखलाते हो
राम,कृष्ण, महावीर ,बुद्व को क्यों गाते हो

अच्छा होता केवल गुरूओं को ही बुलाते
गूऱू, शिष्य का भेद, सियासत में ना गाते
क्या इन बातों से ये देश सुधरने वाला है
कंहा है शिक्षा, आज देश में सब लाला हैं

इन सढी,गली बुनियादों को कितना ढोओगे
शिक्षा की इज्जत बची,खुची कितनी खोओगे
इस नाटक से संस्कार बदलते किसने देखे
हमने तो कीचढ में हरदम हीरे फेंकें

सबकी नजरें क्यों बच्चों पर टिकी हुयी हेैं
मुर्झाये फूलों से कलियां बिकी हुयी हेैं
स्कूल, मदरसे, विद्यालय का यही हाल है
खटिक,मदरसों में, बच्चे क्यों हुये हलाल हेै

मौका था ,इस उत्सव में, शिक्षा सम होती
क्यों भेद-भाव की परिपाठी ,नई पीढी ढोती
एक आचरण, शिक्षा को समकोण बनाता
ऐकलव्य, नतमस्तक होकर द्रोण को गाता

राष्ट्रपति, पी. एम बच्चों को पढा रहे हैं
राजनीति संस्कार शिशू में गढा रहे हैं
अध्यापक होना जीवन में चमत्कार है
ये राजनीति तो आज नपुंशक रोजगार है

जिस देश मे गुरू, सियासत से बिकते हैं
इतिहास हमेशा, मुर्दों का मुर्दे लिखते हैं
इन मरे हुये नेता , गुरूओं से क्या आशा है
कवि आग की चिन्गारी ही परिभांषा है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

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