Tuesday, September 22, 2015

आत्मघात
मैं सर्वण हूॅं मेरे बच्चे , भीख माॅंगते घूम रहे हैं
आरक्षण आयोग्य देश में देख शिखर को चूम रहे हैं
पेट काट कर जिनको पाला कष्ट उन्ही से पाता हूॅं
मैं मध्य - वर्ग का बाप, पाप हॅुं ,कैसे जीता जाता हूॅं

धीरे - धीरे संविधान भी जीने का हक छीन रहा है
मघ्य-बर्ग में जीने वाला तो शदियों से दीन रहा है
चारवर्ण भी कर्ण, दुशासन, एकलव्य को मान रहे हैं
ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य सदा से राजनीति फरमान रहे हैं

जाति-पाॅंति और लिंग-भेद परिणाम सियासत देती है
बैमनस्यता भारत की , ये राजनीति की खेती है
मत कूदो इस अग्निकुण्ड में खुद अस्तित्व मिटाने को
लाचार खडी हैं सब कौमें दो-वक्त की रोटी खाने को

आरक्षण में रक्त - शोध की तकनीकी उपयोग करो
उच्च पदों पर शुद्ध रक्त का संरक्षण विनियोग करो
सौभाग्य यहाॅं दुर्भाग्य बना है राष्ट्र नीति की गाथा से
शास्त्र यहाॅं पर कुण्ठित है बस, भारत-भाग्य विघाता से

चाॅंद जरूरी है माना ,पर प्रकाश- पुञ्ज तो दिनकर है
आने वाली पीढी का भी पथ - प्रर्दशन किन पर है
जाति ,लिंग के भेद मिटे, आरक्षण अर्थ-व्यवस्था हो
करे राष्ट्र - निर्माण धरा में ऐसी सर्मथ अवस्था हो

द्वंद गंद की जनसंख्या पर भी तो अब कुछ शोध करो
इन बच्चे पैदा करने वाली,भीडों का प्रतिरोध करो
बोट-बैंक की अभिलाषा से भारत ना बर्बाद करो
जाति,मजहब से कवि आग अब ना ज्यादा जेहाद करो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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