Tuesday, September 8, 2015

हिन्दी का विवश-दिवश
मैं हिन्दी हूं हिन्दुस्तानी जनता मुझको मार रही है
छोटी मोटी बोली ,भांषा भी मुझको ललकार रही है
मेरी कोक से जन्में बच्चे मांं कहने में शर्माते हैं
मेरे नाम से खाने वाले अंग्रेजी गाने गाते हैं

हिन्दी भांषा बाेलने वाले, आरक्षित क्यों हो जाते हैं
आडम्बर वालों से पूछो अंग्रेजी से क्या नाते हैं
माता को माता कहने में इनकी इज्जत कम होती है
कफन में लिपटी हिन्दी देखो भारत में घुटकर रोती है

मृत - शैया में लेटी हिन्दी कौमा में बेहाल पडी है
धवल बस्त्र में शोक मनाने वालों की चौपाल खडी है
सरकारी स्कूल कितने नेता के बच्चे पढतें हैं
भारत माता के लावारिस शिशू निकेतन में सढतें हैं

पैन्ट कोट टाई की भांषा ये भारत कब तक ढोयेगा
अंश, दंश, विध्वंश भाव से ये भारत कब तक रोयेगा
संस्कृत,हिन्दी,वेद शास्त्र की भांषा क्यों अवशेष होगयी
अपने घर में हिन्दी भांषा आज दिगम्बर भेष होगयी

अंग्रेजी के सभी विरोधी , अंग्रेजी के दास हो गये
हर चैनल में अंग्रेजी के, प्रवक्ता अब खास हो गये
हिन्दी के अवशेषों में भी, हिन्दी का सम्मान नही है
हे , हिन्दी तोतो सुनलो , अब ये हिन्दुस्तान नही है

रूशी, चीनी ,जापानी संस्कारों से कुछ शिक्षा पाते
संस्कृति भाषा क्या होती है,भारत में भी झलक दिखाते
इस दुनियां में कई राष्ट्र हैं अंग्रेजी बिन जीने वाले
इन सबने अंग्रेजी तोते ,घर -घर में पिंजरे में पाले

हे हिन्दी के भूखे नंगो बच्चों तुम संघर्ष करो ना
फिर से माहेश्वर सूत्रो को ढूंढो और स्पर्स करो ना
सौगन्ध उठाओ वेदों की,जिस पर ये भारत टिका हुआ
कवि आग की भांषा में तो भारत कब का बिका हुआ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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