Saturday, September 26, 2015

पागल पन
कुछ तन  के  पीछे पागल है, कुछ मन के पीछे पागल हैं
कुछ धन के पीछे  पागल  हैं  कुछ  जन  के पीछे पागल हैं
कुछ जन गन मन के पागल हैं कुछ राष्ट्रपतन के पागल हैं
कुछ  ऐसे  वतन में  पागल हैं मुर्दो के कफन के पागल हैं

सत्ता  में  पागल  आना है पागल  ने  देश  चलाना है 
झण्डा  आकाश चढाना  है  राष्ट्र  - गीत  भी    गाना है
पर अपना  नहीं  ठिकाना है  ये पागल   का   पैमाना  है   
पागल  का  आना   जाना  है ये  देश ही  पागल खाना है
 
कुछ राम के पीछे पागल हैं  कुछ  श्याम के पीछे पागल हैं
मन्दिर में मरते पागल  हैं  मस्जिद  में  पसरते  पागल हैं
पागल ही मजहब बनाते  हैं कुछ कौमो  को  भटकाते  हैं
कौमें  भी पागल  बनती हैं  पागल   तलवारें  तनती  हैं
 
पागल  की ढोंग फकीरी  से  भगवान भी पागल  होता  है
अल्ला  भी पागल  होता है  मुल्ला  भी  पागल  होता  है
धर्मों  को  पागल  खोते   हैं  बोझा   भी   पागल  ढोते  हैं
बीजों को  पागल  बोते   हैं  फसलों    में पागल   हाते  हैं
 
संगीत सड़गये राग सड़गये,गीत सड़गये गजल सड़ गयी
नश्ल सड़गयी फसल सड़गयी,देश की पूंजी असल सड़गयी
असली पहले सडा पडा था, अब तो देखो नकल  सड गयी
अब भी  हाथ धरे बैठे हैं  कैसी  देखो  अकल  सड़ गयी 

पागल खाने शहर, गांव में, गली, मुहल्लों में बनवाओ
धर्म,मजहब के राजनीति के, सब पागल भर्ती करवाओ
नौकर - साही, व्यवसायी के पागल ढूंढो उसमें डालो
कवि आग ये सारे पागल, पागल खानों में ही पालो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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