Friday, September 4, 2015

आतंक एक विकार
मैं पराधीनता फैलाता हूॅं, राजनीति की जेहाद हूॅं
इस दुनिया में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं
मैं मारूगाॅं मैं काटूगाॅं घर-घर टुकडों में बांटूगाॅं
मावो वादी, नक्सल वादी पूरी दुनिया से छाटूंगा
चोर, लूटेरा , भ्रष्टाचारी , व्यभिचारी हूॅं आबाद हूॅं
इस दुनियां में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

हिन्दू,मुश्लिम, सिक्ख, इसाई मैं ही तो पैदा करता हूॅं
वैमनस्यता फैलाता हॅूं ,दुनिया का करता,धरता हूॅं
संस्कारों के घने अरण्य की,पढी मूल में मैं बिष्टा हूॅं
पाप ,पूण्य की परिभांषा हॅूं अहंकार की मैं निष्ठा हूॅं
मैं आलोचक भी रोचक हूॅं समरसता का संवाद हॅूं
इस दुनियां में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

संविधान का परिणेता हूॅं, भ्रष्टाचारी अभिनेता हूॅं
अय्यासी में जीने वाले नर, नारी का मैं क्रेता हूॅं
सर्प विषैले पाल रहा हूॅं,अपने ढंग में ढाल रहा हूॅं
घनश्याम की गीता में भी अन्याय खंगाल रहा हॅूं
भटकी कौमें के मुॅंह पर भी लगा हुआ मैं वो स्वाद हॅूं
इस दुनियां में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

दहसत,व्यभिचार का रस्ता,मैं हूॅं साधन सबसे सस्ता
मंदिर,मस्जिद,गुरूद्वारा भी मान रहा है मुझे फरिस्ता
धर्मो का मैं शास्त्र नियंता आदि अंत का मैं अभियन्ता
मानवता के मन मन्दिर में,राग-द्वेश का मैं भगवन्ता
युगों-युगों से इस श्रृष्टि में दबा हुआ मैं अवसाद हॅूं
इस दुनिया में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

मैं माया हूॅं, मैं काया हूॅं ,उस परमेश्वर की छाया हूॅं
सत्य,सनातन के विरोध में हर विरोध को मैं लाया हूॅं
मैं श्रृष्टि के आदि अन्त से आवारा हॅूं घूम रहा हूॅं
भव सागर के तल में बैठा, देख रहा हॅूं सूॅंघ रहा हॅूं
सत्ता और सियासत के इस सर्कस में भी आजाद हूॅं
इस दुनियां में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं


चमक-दमक में जीने वालों का मैं ही पोषण करता हॅू
अल्पमृत्यु आकालमृत्यु से जीवन का शोषण करता हॅूं
सम्प्रदाय के विष मन्थन से द्वन्द गन्द मैं फैलाता हॅूं
छिपी हुयीअभिलाषाओं की दहशत् से दिल दहलाता हॅूं
हर फतवे से फैल रहा हॅूं कलि, फूल में फौलाद हॅूं
इस दुनियां में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

अभिलाषाओं के कारण ही व्यभिचारी मानव होता हॅूं
आस निरास की दुविधाओं का जीवन आजीवन खोता हॅूं
अन्तस्थल की लगी आग से उठा घुआॅं मैं बन जाता हूॅं
छल,बल,कपटी जीवन ढोने वालों को मैं ही भाता हॅूं
पावन मन-मन्दिर की सरिता में बहती मैं छिपी गाद हॅूं
इस दुनियां में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

काम ,क्रोध,मद,लोभ, मोह की अन्तर दृष्टि की छाया हॅूं
उसी ब्रह्म से प्रतिबिम्बित हॅूं, उसी ब्रह्म की मैं माया हॅूं
भरे हुये हर भोग विलाशों से मैं आतंकित होता हॅूं
भय के भावों के इस भ्रम से दहसत् गर्दी को ढोता हूॅं
अन्तर बर्हि चेतनाओं की असमंजस की मैं फसाद हॅूं
इस दुनियां में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

स्वाभिमान की ध्वजा बना हूं सबके उपर घूम रहा हॅूं
मेरे नीचे मार काट हेै , मैं व्योम को चूम रहा हॅूं
राष्ट्र,धर्म और अहंकार को पोषित कर मैं पाल रहा हूॅं
राजनीति की भ्रष्ट्र-व्यवस्था शदियों से संभाल रहा हॅूं
धर्मगुरू की राजनीति में सहस्रार से उठी नाद हूॅं
इस दुनियां में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

मैं स्वयं अन्त हॅूं महा सन्त हॅूं परिवर्तन में छिपी कला हॅूं
सत्,रज,तम के उपयोगों में आदि, अन्त से सदा चला हूॅं
निर्विकार हॅूं ,निर्विचार हॅूं , चंचल मन से चहक रहा हूॅं
मैं पंच विकारों से बहता हॅूं दावानल से दहक रहा हॅूं
संस्कारों की समर भूमि में, संभल गया तो परं स्वाद हॅूं
इस दुनियां में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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