वोट की खोट
हम भारत के गण नायक है राजनीति अभिशाप नही है
चोर चकारों की पञ्चायत, चैपालों की खाप नही है
खादी कुर्ते, कफन लिबासों वाले चौकीदार नही हैं
वतन लूट कर खाने वाले डाकू और गददार नही हैं
भीख मतो की हर खप्पर में,सात दशक से डाल रहे हैं
असमंजस होता है हमको, क्यों हम डाकू पाल रहे हैं
अच्छे-अच्छे शब्द सलौने,सुन कर पागल बन जाते हैं
प्रजातन्त्र की खेती, शब्दो के सौदागर क्यो खाते हैं
राष्ट्र-द्रोह के अभिशापों से,कौन सा नेता कंहा बचा हेै
जो भी सत्ता में आता है उसने ही इतिहास रचा हेै
उनके पग चिह्नो पर चलने वाले चोरों को भाते हैं
झण्डा उँचा रहे हमारा गीत डाकुओं के गाते है
राजनीति के किसी भी दल का नंगा नेता मुझे बतादो
करे राष्ट्र की सेवा दिल से उस नेता का मुझे पता दो
वेतन, भत्ते, घूस, लूटेरी, पेन्शन मुर्दे चाट रहे हैं
जाति कौम,कबीले,मजहब ये जनमत को बाँट रहे हैं
हिन्दू,मुस्लिम ,सिक्ख, इसाई के ये सारे बाप हो गये
हम देश के मालिक है,हम भारत में अभिशाप हो गये
पांच साल में डाकू अपने बीहड ही तो पाल रहे हैं
सात दशक से भ्रष्टाचारी भारत को खगाल रहे हैं
कोई ऐसी जगह बतादो व्यभिचार से मुक्त पडी हो
कोई ऐसी जगह बतादो, नजर से इनकी,लुप्त पडी हो
गिद्व दृष्टि आकाश मार्ग से,बस भारत को झाँक रही है
डेढ अरब के मुर्दो में भी सडी लाश को आँक रही है
कब तक इन मुर्दो के हाथों से यू ही मरते जाओगे
बोट बैंक की राजनीति से भारत को कितना खाओगे
नही चाहिये लोकतन्त्र अब वोट डालना बन्द करो
कवि आग की मानो, पहले नेता का प्रबन्ध करो
rajendrakikalam.blogspot.com
हम भारत के गण नायक है राजनीति अभिशाप नही है
चोर चकारों की पञ्चायत, चैपालों की खाप नही है
खादी कुर्ते, कफन लिबासों वाले चौकीदार नही हैं
वतन लूट कर खाने वाले डाकू और गददार नही हैं
भीख मतो की हर खप्पर में,सात दशक से डाल रहे हैं
असमंजस होता है हमको, क्यों हम डाकू पाल रहे हैं
अच्छे-अच्छे शब्द सलौने,सुन कर पागल बन जाते हैं
प्रजातन्त्र की खेती, शब्दो के सौदागर क्यो खाते हैं
राष्ट्र-द्रोह के अभिशापों से,कौन सा नेता कंहा बचा हेै
जो भी सत्ता में आता है उसने ही इतिहास रचा हेै
उनके पग चिह्नो पर चलने वाले चोरों को भाते हैं
झण्डा उँचा रहे हमारा गीत डाकुओं के गाते है
राजनीति के किसी भी दल का नंगा नेता मुझे बतादो
करे राष्ट्र की सेवा दिल से उस नेता का मुझे पता दो
वेतन, भत्ते, घूस, लूटेरी, पेन्शन मुर्दे चाट रहे हैं
जाति कौम,कबीले,मजहब ये जनमत को बाँट रहे हैं
हिन्दू,मुस्लिम ,सिक्ख, इसाई के ये सारे बाप हो गये
हम देश के मालिक है,हम भारत में अभिशाप हो गये
पांच साल में डाकू अपने बीहड ही तो पाल रहे हैं
सात दशक से भ्रष्टाचारी भारत को खगाल रहे हैं
कोई ऐसी जगह बतादो व्यभिचार से मुक्त पडी हो
कोई ऐसी जगह बतादो, नजर से इनकी,लुप्त पडी हो
गिद्व दृष्टि आकाश मार्ग से,बस भारत को झाँक रही है
डेढ अरब के मुर्दो में भी सडी लाश को आँक रही है
कब तक इन मुर्दो के हाथों से यू ही मरते जाओगे
बोट बैंक की राजनीति से भारत को कितना खाओगे
नही चाहिये लोकतन्त्र अब वोट डालना बन्द करो
कवि आग की मानो, पहले नेता का प्रबन्ध करो
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