Tuesday, June 16, 2015

                   गुप्त-रोग
दुनियाभर में हलचल है तुम मौन खडी हो
प्रजातन्त्र  में लगता  है बस,तुम्ही बडी हो
राष्ट्र-द्रोह और राष्ट्र-भक्ति का अन्तर खोलो
मनमोहन तो  मौन रहा,पर तुम तो बोलो

गृह, वित्त  भी  तुमको  प्रमाणित करता है
अंग-अंग  में संघ  समर्थन   भी  भरता है
अब  सारे  तोते  इन्द्रजाल  में  फँसे पडे हैं
कमल  खिला  कीचड  में ,नेता धंसे पडे हैं

तर्को   से   कानून  यंहा  पर  मर  जाता है
संविधान को  साण्ड सियासी चर जाता है
न्यायालय से कब तक ये खिलवाड करोगे
अपराधों  की  और  कंहा  तक आड करोगे

ललित मोदी में दाउद में कोई फर्क नही है
मुजरिम,मुजरिम होता है बस,तर्क यही हैै
न्यायपालिका   की   नीलामी  चौराहों पर
खेल रहा  है  अपराधी  सत्ता  की  बाँहो पर

टी.वी. चैनल में  तोतो  से भी कष्ट  हुआ है
मर्यादा,  संस्कार   सियासी   नष्ट   हुआ है
संविधान  में मुजरिम मालिक बन जाते है
प्रजातन्त्र  को छल, बल, कपटी ही खाते है

रोज नये-नये  अपराध  पृष्ठ को खोल रहे हैं
इस भ्रष्ट वृक्ष के छिपी जडों को टटोल रहे हैं
शुक्ला और पँवार, वशुन्धरा  भी  सहयोगी
इस बीहड में  छिपे हुये हेै कितने महा रोगी

बिना  आग  के  धुँआ  कंहा   होता  है प्यारे
दुनियां  भर   में   चटक   रहे  हैं  ये  अंगारे
जब भ्रूण - गर्भ  में  होगा  तो बाहर आयेगा
सही गलत  को, समय स्वयं ही बतलायेगा

ये आग  लगी  है  जाने  कितने  घर फूंकेगी
जाग  रही  है  जनता  अब  मूँह  पर थूकेगी
षडयन्त्र  हमेशा  चलते  हैं, पर थक जाते हैं
ये  प्रजातन्त्र  है ,अच्छे - अच्छे बक जाते है

हे सासन  के  शहनशाहों  अब कुछ तो बोलो
असमंजस  में  आज  अस्मिता है मूँह खोलो
इस लोकतन्त्र  में अब  कितने  डाकू पालोगे
ये  आग  भभकती  है कब तक पानी डालोगे।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
               मो0 9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com


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